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  1. यह अन्तर्द्वन्द्व से पार जाने की विधि ही मैं बता रहा हूँ। जब आपने श्वास रोक ली अचानक आपके भीतर का पूरा मन इकट्ठा जागरूक हो गया। अब आप श्वास ले ही नहीं रहे और अपने निर्णय को दोहरा रहे हैं कि मैं चार बजे सुबह उठूंगा। दस बार आप इसको करके सो गये। फिर अचानक सुबह 4 बजे आपकी नींद खुल गयी और भीतर से कोई विरोधी स्वर नहीं आया। तो यह प्रयोग बहुत कारगर हैं संकल्प शक्ति को बढ़ाने के लिये।
    इसी प्रकार निर्णय की शक्ति को बढ़ाने के लिए आज्ञा चक्र के प्रयोग, राज योग के प्रयोग बहुत उपयोगी हैं। कुछ विधियों का मैं नाम लेता हूँ जैसे त्राटक ध्यान की बहुत सी विधियाँ, शिवनेत्र ध्यान, मंडल ध्यान, गौरीशंकर ध्यान, सडन स्टॅाप एक्सरसाइज। गुरजिएफ ने इनका बहुत प्रयोग किया। ओशो ने भी सक्रिय ध्यान अंतिम चरण में सडन स्टॅाप विधि का प्रयोग किया अचानक रूक जाना। क्योंकि जब आप अचानक कुछ करते-करते रूक जाते हैं, मूर्तिवत हो जाते हैं, पत्थर की प्रतिमा हो जाते हैं तब आपने एक निर्णय लिया कि आधा मिनट के लिये कि एक मिनट के लिये मैं इसी अवस्था में रहूँगा, नहीं हिलुंगा-डुलुंगा। आपके भीतर से एक निर्णय, एक संकल्प आया और आपने उसे पूरा किया। ऐसे छोटे-छोटे संकल्प लेना शुरू करें। कई बार बहुत छोटे-छोटे संकल्प जिनका सीधा हमारे जीवन से संबंध भी नहीं, उनको लेने से शुरूआत करें। समझो कि आपने तय किया कि आज जब मैं बाजार में से गुजरुंगा, आफिस से अपने घर जाऊँगा, साइनबोर्ड नहीं पढूँगा। बहुत छोटी सी बात है, लेकिन अगर आप इसको पूरा कर पाये, पुरानी आदत है साइनबोर्ड पर नजर पड़ती ही है। फिजूल ही और हम पढ़ते चले जाते रास्ते में जो भी बोर्ड पड़ता उसी को पढ़ लेते हैं। आज आपने तय किया कि साइनबोर्ड पर मेरी नजर नहीं जाएगी आफिस से अपने घर तक जाते समय। यह संकल्प आप पूरा कर पायेंगे। क्योंकि यह सिगरेट छोड़ने जैसा कठिन नहीं हैं। सिगरेट में एक रासायनिक आदत बन चुकी है शरीर की, उसको छोड़ना बहुत कठिन है। लेकिन इसमें तो कोई ऐसी बात नहीं थी। सिर्फ एक पुरानी आदत है कि हम चलते हुए कुछ भी पढ़ते जाते हैं जो रास्ते में मिलता है। आज हमने तय किया कि हम नहीं पढ़ेंगे यह कोई सिगरेट जैसा एडिक्शन नहीं, इसको करना आसान होगा। लेकिन एक छोटा सा संकल्प आपने पूरा किया, आपके भीतर आत्मा का विकास हुआ, आप ज्यादा निर्णयात्मक बनें। इस प्रकार छोटे-मोटे प्रयोग करते रहें। गुरजिएफ ने सडन स्टॅाप एक्सरसाइज पर बहुत बल दिया। गुरजिएफ के जो नृत्य होते हैं उनमें अचानक रूकने का आदेश दिया जाता है। अब किसी का एक पैर ऊंचा उठा हुआ है, एक विचित्र अवस्था में शरीर है और स्टॅाप की आज्ञा आ गई। हो सकता है उस अवस्था में वह रुक भी न पाये, सम्भल भी न पाये और गिर जाए। कोई हर्ज नहीं। वह गिरने के बाद भी वैसा ही पड़ा रहेगा जैसा गिरा था। गुरजिएफ ने बहुत लोगों को आत्मवान बनाया। उसने बड़ी विधियां ढूंढी थीं संकल्प को जगाने की।
    तिलक-टीका का प्रयोग भी आज्ञाचक्र को जगाता है, संकल्पवान बनाता है। सालिगराम का प्रयोग जो हैं वह नाभिकेन्द्र को मजबूत करता है और भीतर साहस को पैदा करता है। जीवन में छोटे-मोटे जोखिम और कठिनाई वाले काम करने की कोशिश करें। छोटी-मोटी चुनौतियों को स्वीकार कर लें। हमने अपने जीवन की व्यवस्था कुछ ऐसी बना ली है कि हम बिल्कुल ही संकल्पहीन हो गये हैं। और खासकर प्रेम के नाम पर, सुरक्षा के नाम पर हम अपने बच्चों को संकल्पहीन बनाते हैं।
    तिब्बत के दलाईलामा ने उल्लेख किया है अपनी जीवन कथा में कि जब वह 5 वर्ष का हुआ उसके पिता ने उससे कहा कि बेटे कल सुबह तुम्हें पाठशाला जाना होगा। घर का बूढ़ा नौकर घोड़े पर तुम्हें बिठाकर स्कूल ले जाएगा। दो तीन बातें तुमसे कह दूं- एक बार घोड़े पर बैठ जाओगे तो पीछे मुड़कर न देखना। दूसरी बात- तुम्हारी आंखों में आंसू नहीं आने चाहिए। तीसरी बात- स्कूल में जो प्रवेश की परीक्षा होगी उसमें असफल मत होना। यदि असफल हो गये तो लौटकर फिर इस घर मे मत आना, यह घर तुम्हारा नहीं है। हमारे घर में ऐसे असफल लोगों का स्वागत नहीं है। जो पीछे मुड़कर देखते हैं, हमारे कुल में ऐसे लोग पैदा नहीं हुए। जहां जाना है वहां देखो।
    वह बच्चा 5 साल का सोचो उस पर क्या बीती होगी। शायद रात को ठीक से सो भी नहीं पाया होगा। सुबह हुई उसके घर के बूढ़े नौकर ने उसका सामान घोड़े पर लादा, उसको बिठाया और फिर से तीनों बातें उसको याद दिला दीं कि तुम्हारे पिता और माता खिड़की पर खड़े होकर देख रहे हैं। यदि तुमने पलट कर देखा तो वे तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिये त्याग देंगे। यह जीवन-मरण का प्रश्न है कोई छोटा-मोटा सवाल नहीं है। चेहरे पर मक्खी बैठ गयी उड़ाने के लिये गर्दन हिला लो पीछे, फिर भी वे सुनेंगे नहीं कि हमने तो मक्खी उड़ाने के लिये सिर हिलाया था। फिर वे तुम्हें घर से निष्कासित ही कर देंगे। इस कुल की मर्यादा का ख्याल रखना। वह बच्चा बैठ गया है। दलाईलामा ने लिखा है अपने संस्मरण में कि बहुत मन हुआ कि पीछे मुड़कर एक बार उस घर को देख लूं, जिसमें इतने समय रहा। लेकिन भीतर से उतना ही एक प्रगाढ़ संकल्प आया कि नहीं, नहीं मुड़ना है तो नहीं। आंखों में आंसू आने-आने को थे लेकिन सूख गये। स्कूल पहुंचा, वहां के प्राचार्य ने कहा तुम्हारी परीक्षा होगी। बैठ जाओ यहीं द्वार पर और जब तक मैं न आऊं तब तक यहां से हिलना-डुलना नहीं, आंख नहीं खोलना, आंख बन्द करके बैठो। न बोलना है कुछ, न हिलना-डुलना है। यही तुम्हारी परीक्षा है। हो सकता है मैं आधे घंटे बाद आऊं, घंटे बाद आऊं या 2 घंटे बाद आऊं। वह बच्चा वहां बैठ गया बेचारा आंख बंद करके। जो नौकर उसे छोड़ने आया था उसने कहा कि मैं तो वापिस घर जा रहा हूँ। क्योंकि मेरे रूकने का कोई सवाल नहीं। या तो तुम स्कूल की परीक्षा में पास हो जाओगे तो तुम यहीं हॅास्टल में रहोगे या तुम फेल हो जाओगे तब तुम्हें जहां जाना है चले जाना क्योंकि घर लौटने का तो कोई सवाल ही नहीं। इसलिय मैं तो चला। अब जरा सोचो वह 5 साल का बच्चा वहां बैठा है, घर का नौकर वापिस चला गया है। उसका जीवन दांव पर लगा है, आंख नहीं खोलनी है।
    थोड़ी देर में वहां से एक खिलौना बेचने वाला निकलता हैं। इस बच्चे का बड़ा मन होता है कि कम से कम एक बार तो आंख खोलकर देख लूं। यह पहली बार शहर में आया, शहर में कैसे खिलौने बिकते हैं। लेकिन आंख नहीं खोली; भीतर एक मजबूत निर्णय कि आंख नहीं खोलनी। क्योंकि आंख खुलने का मतलब स्कूल की परीक्षा में असफल और घर में प्रवेश से भी इंकार। मिठाई बेचने वाला निकला, बच्चे का मन बहुत ललचाया लेकिन आंख नहीं खोली। फिर स्कूल के बच्चों की छुट्टी हो गयी वे वहां से गुजरे तो इस बच्चे को तंग करने लगे। कोई उसका पीछे से कुर्ता खींच रहा है, किसी ने उसको कंकड़ मार दिया, किसी ने उसके बाल खींच दिये। वे बच्चे उसका मज़ाक उड़ा रहे हैं, व्यंग्य कर रहे हैं। इसका मन तो हुआ कि आंख खोलकर देखूं कि कौन मेरे बाल खींचता है। जवाब दूं उसको जिसने मुझे कंकड़ मारा। लेकिन नहीं, उसके भीतर एक प्रगाढ़ संकल्प पैदा हो रहा था कि आंख नही खोलनी है, जवाब नहीं देना है, चाहे जो हो जाए। घंटे भर बाद वह प्राचार्य आया। उसने उठाकर इस बच्चे को गले लगाया और कहा कि बेटे तुम परीक्षा में पास हुए। आओ, तुम्हारा स्वागत है। तुम हो संकल्पवान, तुमसे उम्मीद की जा सकती हैं कि तुम जिंदगी में कुछ करके दिखाओगे। जो बच्चा एक घंटा आंख बंद न कर सके वह जिंदगी में क्या खाक करेगा। मैं देखता हूँ लोग ध्यान करने आते हैं नये-नये साधक। बार-बार मैं कहता हूँ आंख बंद कर लें, आंख बंद कर लें, मगर उनकी आँख ही बंद नहीं होती। आँखें खोल-खोलकर देखते रहते हैं कि क्या हो रहा है। डूबना है अपने भीतर, देखना है अपने भीतर, लेकिन वे बाहर देख रहे हैं। अब ये संकल्पहीन आदमी- क्या ये अपने भीतर विचार को बंद कर पायेगा? जो आंख बंद नहीं कर पा रहा वह विचार कैसे बंद कर पायेगा। इतना स्थूल काम नहीं कर पा रहा है, विचार तो बहुत सूक्ष्म है। क्या यह क्रोध को जीत पायेगा? कि काम को जीत पायेगा? वह तो बहुत गहरे, बहुत सूक्ष्म, बायलॅाजी में घुसे हुए हैं। यह तो बहुत छोटे से काम को भी नहीं कर पा रहा है।
    दलाईलामा ने लिखा है कि उस दिन जो मुझे लगा था कि मेरे शिक्षक, मेरे माता-पिता कितने क्रूर हैं, कितनी कठिन मेरी परीक्षा ले रहे हैं। लेकिन मैं आज जानता हूं कि वे लोग क्रूर नहीं थे, वे कठोर नहीं थे, वे बड़े करूणावान थे। उन्होंने मेरे भीतर संकल्प को जगाया।
    तो मैं आपसे कहना चाहूँगा कि छोटी-मोटी चुनौतियां, छोटे-मोटे रिस्क, कुछ खतरे के काम, कुछ काम जिनमें आपको कठिनाई जान पड़ती है, उनको करने की कोशिश करें। और तब आप पायेंगे कि आपके भीतर संकल्प शक्ति मजबूत होने लगी।

    ~ स्वामी शैलेंद्र सरस्वती

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