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“क्या सम्मोहन से आंतरिक प्रतिभा जगाई जा सकती है?” – स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

सम्मोहन है संस्कारों को बदलने की प्रक्रिया

प्रश्न-क्या सम्मोहन से आंतरिक प्रतिभा जगाई जा सकती है?

हां। मानो कि एक संगीतकार है जो कि सितार बजाना सीख रहा है, ऐसे ही थोड़ा छुटपुट सीख लिया है उसने। फिर नर्वस हो जाता है, सेल्फ कान्फीडेंस नहीं है। अगर हम सम्मोहित करके उसको कह सकें कि पिछले जन्म में तुम बड़े गुलाम अली खां थे, तुम बहुत अच्छा गीत गाते थे, बहुत अच्छा सितार बजाते थे, तुम तो बहुत कुशल संगीतकार हो पिछले जन्म के, फलां-फलां उस्ताद हो तुम, तो अगर उसका अवचेतन मन इस धारणा को ग्रहण कर ले तब ये अवचेतन मन से जो आर्डर आएगा उसको कांसस माइण्ड फालो करता है। भीतर से जो आएगा अचेतन से चेतन मन उसको फालो करता है।

अब यह व्यक्ति अपने संगीत की कला में बहुत निपुण हो जाएगा। इसको आर्टीफिशियल रीइनकार्नेशन कह रहे हैं। यद्यपि यह बात झूठी है, आर्टीफिशियल है लेकिन अगर उस व्यक्ति ने इस बात को रिसीव कर लिया अचेतन मन से तब उसके व्यक्तित्व में अद्भुत क्रांतिकारी परिवर्तन हो जाएगा। वह जो साधारण सा संगीतकार था उसकी कला ऐसी तेजी से विकसित होगी जिसका कोई हिसाब नहीं।

ओशो कहते हैं, अधिकांश लोग प्रतिभाशाली पैदा होते हैं। घर परिवार में लालन-पालन के दौरान, स्कूल में शिक्षक और मित्र मंडली ये सब जो निगेटिव कमेंट भरते रहते हैं दिनभर, जब मां कहती है पड़ोसी के बच्चे के लिए कि देखो कितना अच्छा है, एक तुम, नालायक कहीं के। यह कमेंट छोटा सा है मां के हिसाब से लेकिन उस बच्चे के हिसाब से बहुत बड़ा है, उसने भीतर ग्रहण कर लिया है कि पड़ोस के बच्चे अच्छे हैं, मैं तो खराब हूं, मैं नालायक हूं। अब धीरे-धीरे वह अपने मां के इस वचन को सत्य साबित कर देगा बड़ा होकर कि हां, मैं नालायक हूं।

मैं फिर से याद दिला दूं, कि अचेतन मन में तर्क क्षमता नहीं है, वह इस चीज का नाप-जोख नहीं कर सकता कि यह जो वचन कहा गया है ये सच है कि झूठ, वह तो सीधा रिसीव कर लेता है, एज इट इज। मूलरूप में जैसा कहा जाता है वैसा ही रिसीव कर लेता है और उसके अनुसार फिर वह अपने अचेतन मन को या शरीर को आर्डर देता है कि ऐसा-ऐसा करो। और वह सब उसको फालो करते हैं।

इसका उल्टा भी संभव है, अगर कोई अपने बच्चे से बड़ी एक्सपेक्टेसन करता है कि अरे तुम तो बहुत खूबसूरत हो, तुम बहुत होशियार हो बेटा, तुम तो कमाल करके दिखाओगे, ये काम तुमसे जरूर हो जाएगा, मुझे पूरी उम्मीद है कि जरूर हो जाएगा, अरे तुम्हारे लिए तो बाएं हाथ का खेल है, जब आपका एक छोटा सा कमेंट उसके लिए कठिन काम को भी उसके बाएं हाथ का खेल बना देता है। ही इज हिप्नोटाइज्ड कि वो इसको कर लेगा और तब वह जीवन में सफलता पाएगा।

आपने देखा होगा कि जीवन में कुछ लोग कुछ भी काम करते हैं तो उनको सफलता मिल जाती है, आश्चर्य! वह कुछ भी करें लेकिन वह सफल हो जाते हैं। और इसका उल्टा भी है कुछ लोगों के साथ, वह जिस काम में हाथ डालेंगे उसी में फ्लाप हो जाएंगे। इनके भीतर कंडीशनिंग बैठी हुई है, प्रोग्रामिंग। ओशो के प्रवचन में एक जिक्र आता है कि एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन कर रहा था, टेन्थ क्लास के बच्चों के स्कूल में वह गया है। एक स्कूल में चालीस बच्चे थे उस क्लास में। चालीस को उसने रेण्डमली दो हिस्सों में बांट दिया बीस-बीस। अब दो अलग-अलग कमरों में उनको ले गए। एक कमरे में जाकर उस सायकोलाजिस्ट ने कहा कि बच्चो, एक सवाल तुमको दे रहा हूं गणित का, हल करने के लिए हम लोग जीनियस टेस्ट करने आए हैं कि जो बहुत प्रतिभाशाली बच्चे हैं, उनकी जांच करेंगे। तो आप लोग तो अभी टेन्थ में हैं, मैं आपको सवाल दे रहा हूं ग्यारवीं, बारवीं के स्टेंडर्ड का। मैं देखना चाहता हूं कि क्या टेन्थ में भी कोई ऐसा बच्चा है जो हायर मैथेमेटिक्स का सवाल हल कर सके। वैसे तो उम्मीद कम है कि कोई कर पाएगा, लेकिन फिर भी अगर कोई है तो हम खोजना चाहते हैं, हम जीनियस की खोज में निकले हैं। उनको गणित का एक सवाल हल करने को दिया गया। दूसरी क्लास में जाकर बीस बच्चों को डिफरेंस भूमिका दी गई। वहां कहा गया कि एक गणित का सवाल आपको दे रहे हैं ये पता लगाने के लिए कि कोई नकल करके तो टेन्थ में नहीं आया, ये सवाल आठवीं, नवमी का बच्चा भी बड़ी आसानी से हल कर सकता है, आप लोग तो टेन्थ में हो। लेकिन अगर कोई नकल-वकल करके टेन्थ में आया है तो वो पकड़ा जाएगा। क्योंकि वह नहीं कर पाएगा, इसका मतलब कि बहुत ही बिलोस्टेण्डर्ड है वो, आठवीं, नवमी का भी सवाल जो हल नहीं कर सकता।

आश्चर्यजनक परिणाम, जहां कहा गया था कि बिल्कुल सरल है वहां बीस में से अठारह बच्चों ने कर लिया और जहां कहा गया था कि बहुत कठिन है वहां बीस में से केवल चार हल कर पाए। क्यों? हमने पहले ही एक धारणा दे दी। अगर हमने कहा कि कठिन है तो वह कठिन हो गया, अगर हमने कहा कि सरल है तुम लोग तो कर ही लोगे तो ज्यादा लोगों ने कर लिया। तो किस भूमिका के साथ वह चीज हमको दी गई है हमारी कंडिशनिंग हो जाती है वैसी। तो बहुत सी साइकोसोमेटिक इलनेस और उनके जो साइकोमेटिक इफेक्ट्स हैं उनसे छुटकारा दिलाया जा सकता है बहुत ही आसानी से।

स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

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