Register Now

Login

Lost Password

Lost your password? Please enter your email address. You will receive a link and will create a new password via email.

Captcha Click on image to update the captcha .

Add question

You must login to ask a question.

Login

Register Now

Register yourself to ask questions; follow and favorite any author etc.

“सम्मोहन से कंडीशनिंग होती है या अनकंडीशनिंग?” – स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

प्रश्नः सम्मोहन के बारे में एक्चुली बहुत सारे सवाल हैं और काफी वर्ष पहले मैंने सम्मोहन की काफी प्रेक्टिस की थी। और जब मेरा ओशो से इंट्रोडक्शन हुआ तो मैंने सबकुछ पूरी तरह से ड्राप कर दिया। क्योंकि उस समय हिप्नोसिस मेरे लिए बहुत सारे कांट्राडिक्शन खड़े कर रहा था। पहला कांट्राडिक्शन तो मुझे ऐसा लगता था कि जैसे सम्मोहन अगर मैं अपनी खुद की प्रोग्रामिंग कर रहा हूं तो वह मेरे अहंकार का ही एक हिस्सा है। तो सुपरकांसस की जो एक इच्छा है उसके अनुसार मैं चलूं और मैंने अपनी एक प्रोग्रामिंग बीच में खड़ी कर दी कि नहीं-नहीं, मुझे तो ऐसे चलना है। तो मुझे ऐसा लगा कि वह जैसे एक बाधा है उसकी इच्छा में। फिर दूसरा जो उससे मुझे अनुभव हुआ वह ऐसा हुआ कि सम्मोहन से जो मांगा अपने आपको प्रोग्रामिंग करके कि लाइफ ऐसी चाहिए वह लाइफ तो मिल गई, लेकिन क्या वह लाइफ मेरे लिए अच्छी थी यह तो मुझे मालूम नहीं था। और फिर वह तो मांगा था हर चीज का एक सिक्वेंस है, हर चीज का एक परिणाम है। तो जब वह प्रोग्रामिंग की तो उसका परिणाम क्या है यह तो मालूम नहीं था और वह तो साथ में आएगा ही। इसके अलावा अभी जब समाधि प्रोग्राम की शुरूआत हुई और जब प्रभु हृदय में विराजने लगे तो फिर बीच में ऐसा समय आया कि लाइफ में एक्सट्रीम कठिनाइयां आईं। तो फिर एक जगह से ऐसे रास्ता रुक गया, एक जगह से किसी ने ऐसे पकड़ लिया कि अगर ये इतनी कठिनाइयां हैं तो फिर यह एक हार्ड ब्रसिंग हो रही है डायमंड की तो होने दो। अगर इतना कठिन समय है तो होने दो, फिर क्यों इसको सहज करना। क्योंकि वह भी अपना टेलेंट एक दिन के लिए जरूरी है। अभी ऐसा लगता है कि क्या एक प्रोग्रामिंग कर दी जाए अपनी या तो हृदय में जो प्रभु विराजमान हैं उनकी पल-पल सुनते हुए अपने जीवन को बिताया जाए। क्योंकि दोनों में कांट्राडिक्शन अलग-अलग हैं?

 उत्तर: पहली बात जो इन्होंने कही उसको क्लियर कर दूं। प्रोग्राम्ड हम आलरेडी हैं। अनजाने में आस-पास के माहौल ने, परिवार ने, समाज ने, शिक्षा ने, कालेज ने, किताबों ने, अखबारों ने, टी.वी. ने, प्रचार ने, विज्ञापन ने हमको हिप्नोटाइज्ड किया हुआ है, हमारी इच्छा के खिलाफ हमसे बिना पूछे। तो अभी ऐसी स्थिति तो नहीं है कि हम अनकंडीशंड हैं कि अनप्रोग्राम्ड हैं, प्रोग्राम्ड तो हम हैं हीं। कोई भी चीज जो रिपीट की जाती है वह सुझाव बन जाती है। रोज-रोज आप अखबार में एक चीज देखते हैं, विज्ञापन के बोर्ड देखते हैं, टी.वी. पर उसी को सुनते हैं, आप उस सम्मोहन को ग्रहण कर रहे हैं और आप उसके एकार्डिंगली व्यवहार करते हैं। आप रोज देखते हैं कोलगेट टूथपेस्ट, कोलगेट टूथपेस्ट, कोलगेट टूथपेस्ट, जहां-तहां बोर्ड लगे हैं, अखबारों में सुंदरियां मुस्कुरा रही हैं, उनके मोती जैसे दांत और नीचे लिखा है कोलगेट टूथपेस्ट। एक दिन आप बाजार जाते हैं तो दुकानदार कहता है कि कौन सा टूथपेस्ट? आप कहते हैं कोलगेट टूथपेस्ट। हिप्नोटाइज्ड तो आप हैं हीं। बचने का कोई उपाय भी नहीं है। हम चारों तरु से जो सूचनाएं ग्रहण कर रहे हैं उससे हम हिप्नोटाइज्ड हो रहे हैं।

अब सवाल यह है कि अगर हम जानबूझकर अपने भले के लिए अपने जीवन को एक सम्यक्दिशा देने के लिए अगर हम सम्मोहित करें तो यह ज्यादा उपयोगी होगा। यानि किन्हीं न किन्हीं धारणाओं से तो हम प्रभावित हैं हीं। वह अनजाने में हो गईं, हमको कुछ मालूम नहीं है दूसरों ने कर दिया। हो सकता जिन्होंने किया है उनको भी नहीं मालूम हो, लेकिन हम हिप्नोटाइज्ड तो हो ही रहे हैं। इन पुरानी हिप्नोसिस को तोड़ा भी जा सकता है, जैसे कांटे से कांटा निकालते हैं प्लस हम नई से नई स्वस्थ हिप्नोसिस कर सकते हैं जो हमारे भले और कल्याण के लिए हो। हम जानबूझकर वैसा सम्मोहन पैदा कर सकते हैं। इसलिए इसमेें विरोधाभास कहीं भी नहीं है।

और दूसरी बात आपने कहा ध्यान समाधि ओशो से जुड़कर और हिप्नोसिस से जुड़कर आपने भेद देखा। प्यारे मित्रों आपको शायद पता नहीं कि दुनिया में सबसे बड़ा हिप्नोसिस पर काम करने वाला आश्रम, ओशो का पूना आश्रम ही रहा है। कम से कम सन 1975 से लेकर 1981 तक पूना आश्रम की पोजीशन इंटरनेशनल लेवल पर, सबसे बड़ा साइकोथेरेपी का, वह सेंटर रहा है। और साइकोथेरेपी के इस स्थान पर एक सबसे बड़ा डिपार्टमेंट था वह डी-हिप्नोथेरेपी का ही था। जहां पर हम अपनी पुरानी हिप्नोसिस को कैसे तोड़ सकें और नई पाजिटिव कंडीशनिंग कैसे खड़ी कर सकें, क्योंकि कंडीशनिंग के बगैर हम चल नहीं सकते। आदत से ही हम चल रहे हैं। समझो एक आदमी की आदत है कि कोई भी जरा सा उसके विरोध में या विपरीत में कर दे कोई बात या उसके इच्छा के खिलाफ कुछ कर दे तो वह भड़क उठता है, गुस्सा आ जाता है। यह भी एक कंडीशनिंग है। यह उसने कहां से सीख ली, कहीं न कहीं से उसने पकड़ी है। हो सकता है फिल्मों में उसने देखा हो कि हीरो जो है जरा-जरा में एकदम से एंग्री यंग मैन बन जाता है, मार-पीट कर देता है और लोग तालियां बजाते हैं। धीरे-धीरे उसने बात को पकड़ लिया हो कि अगर सम्मानित होना है, तालियां बजवाना है तो प्रतिशोध और बदले की भावना होनी चाहिए। सारी फिल्मों की, टी.वी. सीरियलों की कहानी वही है कि प्रतिशोध करने वाला हीरो है, जो बदला ले उसके साथ अगर कोई भी बुराई की गई है उसका वह जमकर मुकाबला करे, लड़े वह उसके लिए। अब यह धारणा उसके भीतर बैठ गई है इसलिए वह जरा-जरा सी बात में क्रोधित होता है। यह अनजाने में हुई कंडीशनिंग है।

वह छोटा बच्चा था, कमरे में दौड़ रहा था, टेबल से टकरा गया और सिर में चोट लग गई। मां ने आकर टेबल को दो चांटे मारे और कहा कि मेरे बच्चे को तूने चोट मारी, बच्चा खड़ा होकर मुस्कुराने लगा। मां ने उसके भी प्रतिशोध का एक सम्मोहन बैठा दिया कि जो तुमको चोट मारे तुम उसको उससे भी ज्यादा चोट मारो। अब यह बच्चा हिप्नोटाइज्ड हो गया। टेबल तक को उसने मारा, मां ने मारा, बच्चा सीख रहा है। अनजाने में सीखेगा, प्रोग्रामिंग तो उसकी हो गई। उल्टी भी प्रोग्रामिंग की जा सकती है, मां जाकर उस टेबल के ऊपर पे्रम से हाथ फेरकर, पुचकारकर हाथ सहलाए और कहे कि अरे, तुम तो यहीं रखी हुई थी, तुमने तो कुछ किया नहीं, मेरा बेटा ही आकर तुमसे टकरा गया, बेटे को चोट लगी है, तुमको भी लग गई होगी, मैं तुम्हें सहलाती हूं, चुंबन करती हूं, हाथ फेरती हूं, मेरे बेटे से गलती हो गई, तुमको चोट लग गई होगी टेबल। अगर मां ऐसा करती तो भी बेटा कंडीशंड होता पे्रम करने के लिए, करुणा करने के लिए, अपनी भूल को समझने के लिए। इसमें टेबल की तो कोई भूल नहीं थी उसको चोट लगी तो, बच्चा ही आकर टकराया था, टेबल तो आकर नहीं टकराई। यह तब पे्रम के लिए प्रोग्राम्ड हो जाता। अगर दुनिया में इतनी हिंसा और आतंकवाद व्याप्त है तो याद रखना, यह हम सबकी कंडीशनिंग की वजह से है, हमको ऐसा ही सिखाया गया। जानबूझकर किसी ने नहीं सिखाया है लेकिन हमने कैच कर लिया चारों तरु। वहां से हम वाइबे्रशन कैच कर रहे हैं, हम कंडीशंड हो गए हैं।

तो सवाल यह नहीं है मित्र कि कंडीशनिंग और अनकंडीशनिंग में च्वाइस है, सवाल गे्रटर इविल और लेसर इविल में है, बुरी आदत और अच्छी आदत में है। एक आदमी को सिगरेट पीने की आदत है यह भी एक आदत है। एक आदमी सुबह उठकर व्यायाम करता है और प्राणायाम करता है, यह भी एक आदत है। लेकिन एक आदत स्वास्थ्यकारी है और एक आदत स्वास्थ्य बिगाड़ने वाली है, कैंसर पैदा करने वाली है। चुनाव इनमें करना है, हमको रिप्लेसमेंट करना होगा। और यह बिल्कुल संभव है, वह सिगरेट पीने वाले आदमी को एक नई कंडीशनिंग की जा सकती है कि सुबह से उठकर साफ-सुथरी हवा में प्राणायाम करो, यह हो सकता है। तब यह उसके लिए लाभकारी होगा, दूसरों के लिए भी लाभकारी होगा। नहीं तो वह चारों तरु धुआं उड़ाता है और सब लोगों के अंदर भी धुआं जाता है, सबको नुकसान पहुंच रहा है। वह भी आदत है, यह भी आदत है। एक आदमी रात को दो बजे सोता है और दिन को ग्यारह बजे उठता है यह भी उसकी आदत है, इससे उसकी बॅाडी डेमेज हो रही है, उसके मन की प्रतिभा नष्ट हो रही है, जीवन के सुंदर क्षणों को वह चूक रहा है। इसकी उल्टी आदत भी डल सकती है कि ठीक समय में सो जाओ और ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाओ यह भी एक आदत है। है तो यह भी कंडीशनिंग लेकिन यह बहुत उपयोगी है।

मुझे याद आता है कि ओशो से किसी ने पूछा कि आप कहते हैं कि कोई संस्कार नहीं डालना है तो मैंने अपनी लड़की को बिल्कुल स्वतंत्र छोड़ दिया है? ओशो उसके घर में ठहरे हुए थे तो एक-दो दिन उसकी लड़की को देखा ओशो ने कि वह तो बिल्कुल फिल्मी हीरोइनों की तरह व्यवहार कर रही थी। ओशो ने फिर उसकी मां को समझाया कि तुम मेरी बात समझी नहीं, नकल तो वह कर ही रही है। वह फिल्मी हीरोइनों की नकल कर रही है, जो माडल्स हैं उनका अनुकरण कर रही है, किसी न किसी का अनुकरण तो वह कर रही है, इससे तो अच्छा होता कि वह मां का अनुकरण करती, जो आदर्श नारियां हुई हैं हमारे देश में, संस्कृति में सारी दुनिया में उनकी कहानियां पढ़ती, नकल ही करनी थी तो उनकी नकल करती तो उसका जीवन बेहतर होता। अब वह थर्ड गे्रड अखबार में जो माडल्स छप रही हैं, फिल्म की हिरोइनें और टी.वी. सीरियल में काम करने वाली लड़कियां, जो बुरी से बुरी हो सकती हैं उनकी नकल कर रही हैं। बच्चे अनुकरण से सीख रहे हैं तो वह कुछ तो सीखेंगे, आप अगर अच्छा नहीं सिखाओगे तो वो बुरा सीख जाएंगे, सीखेंगे तो जरूर। इसलिए च्वाइस इसमें नहीं है कि हम कंडीशनिंग और टोटली कंडीशनलेस अनकंडीशंड अवस्था में से चुनना है, चुनाव यह कि बेटर आर वर्स कंडीशनिंग, उनमें से चुनना है। पतंजलि ने तो अपने अष्टांग मार्ग में अंत में जो तीन अंतरंग कहे हैं योग के उसमें हैं- धारणा, ध्यान, समाधि। तो धारणा का वही मतलब है जो हिप्नोसिस का, हमारी कैसी धारणा है। हमारी धारणा ऐसी भी हो सकती है कि जो हमको ध्यान और समाधि की तरु ले जाए और हमारी धारणा इसके विपरीत भी हो सकती है जो हमको इन सबसे विमुख कर दे।

समझो, एक आदमी की धारणा है कि कहीं कोई ईश्वर वगैरह कुछ नहीं है, कहीं कोई आत्मा नहीं है, बस ये भौतिक पदार्थ हैं, यह माटी की बनी काया है और कुछ भी नहीं है, यह भी एक धारणा है। ऐसा नहीं है कि उसने कोई परमसत्य खोज लिया है खोजबीन करके। एक दूसरा आदमी है जिसकी धारणा है स्थूल शरीर के अतिरिक्त और भी कुछ सूक्ष्म चैतन्य है। माना कि मैं नहीं जानता हूं लेकिन उसकी धारणा ऐसी है कि कुछ और भी है खोजने जैसा, पाने जैसा। कहीं कोई परमात्मा है, कोई आत्मा है, मैं जानता तो नहीं हूं लेकिन जीवन में मंदिर भी हैं। और एक आदमी इन सब बातों से इंकार कर रहा है कि कोई मंदिर-वंदिर नहीं है, सब झूठ है। बस वह क्लब और बियरबार को ही सत्य मानता है। इन दोनों ही व्यक्तियों की अलग-अलग धारणाएं हैं लेकिन एक की धारणा विकासोन्मुख है। अगर यह मानता है कि आत्मा-परमात्मा है तब यह ऊपर की तरु उठना शुरू होगा। जिस व्यक्ति की मान्यता है कि बस यह शरीर ही सब कुछ है, खाओ पियो ऐश करो मित्रों, अगर इसकी यही धारणा है तो इसने पतन का रास्ता चुन लिया। अब ऊपर उठने को तो कुछ है ही नहीं, ऊपर देखने को तो कुछ है ही नहीं, इसकी धारणा काम करेगी। जब ऊपर कुछ है ही नहीं तो बस नीचे की तरु ही जाना है। तो हैं तो दोनों धारणाएं लेकिन एक उध्र्वगामी है और एक अधोगामी है। तो जब पतंजलि कहते हैं धारणा, ध्यान, समाधि तो पहले हमारे पास उस प्रकार की धारणाएं हों, उस प्रकार की हिप्नोटाइज्ड हो कि ऊपर उठने को है, कुछ हमसे ऊपर आकाश में है, कुछ अद्भुत पुरुष हुए हैं, कोई बुद्ध पुरुष, कोई संत हुए हैं ऐसी अगर हमारी धारणा है तो हमने विकास का एक द्वार खोला। अगर हम कहते हैं कि यह सब फालतू बकवास है, कोई बुद्ध पुरुष नहीं होते, इसका मतलब कि प्रकरांतर से हम कह रहे हैं कि बस हमारे जैसे बुद्धू ही होते हैं। बस यही सत्य है इसके अलावा कुछ नहीं है, अब हमने विकास का द्वार ही बंद कर दिया। जब कुछ बेहतर होता ही नहीं है तो बस सब ठीक है, जैसा चल रहा है, यही है जिंदगी। हमने अपने विकास का द्वार बंद कर दिया, यह भी एक धारणा है।

हम बेहतर, स्वास्थ्यदायी, विकासोन्मुख धारणाओं से भर सकते हैं। तो यहां जब हम जानबूझकर हिप्नोसिस करते हैं तो हम अपने लिए नेचुरली कल्याणकारी धारणाओं को पकड़ेंगे। और अगर कहीं गलत आदतें, गलत संस्कार, गलत कंडीशनिंग बैठ गई हैं तो उसको हम निकाल भी सकते हैं। क्योंकि वे अनजाने में बैठ गई हैं, हम जानते नहीं थे। तो इन दोनों में कहीं भी कोई भी विरोधाभास नहीं है। पतंजलि के इन तीन अंतरंगों से आपको स्पष्ट हो जाएगा, धारणा को तो उन्होंने पूर्व भूमिका कहा है ध्यान और समाधि की। तो यह हम पर निर्भर है कि हम कहां कैसे उसका उपयोग करेंगे। तो सद्गुरू के हाथों में वह सम्मोहन की बात भी ध्यान समाधि की तरु ले जाने वाली होती है। ओशो ने जो इसके संबंध में प्रवचन दिए हैं हमने उसकी एक पूरी एमपीथ्री तैयार की है, करीब बीस घण्टे की रिकार्डिंग है। जहां ओशो कह रहे हैं मैं चाहता हूं कि हिप्नोसिस और मेडिटेशन का सम्मिलन हो जाए। ओशो कह रहे हैं कि मैं एक दम नई बात चाहता हूं जो पहले आज तक ट्राई नहीं की गई। आपने जो कहा इनको हमेशा से ही विपरीत समझा गया है। आप जो कह रहे हैं बिल्कुल ठीक कह रहे हैं, ऐसा नहीं है कि आप गलत कह रहे हैं। लेकिन याद रखना, आप जो कह रहे हैं यह भी एक धारणा है जो कि पुरानी धारणा है, इसको आपने अपने अतीत से ग्रहण की है, यह कोई आपका चिंतन-मनन नहीं है। हमेशा से माना गया है कि ये दो विपरीत दिशाएं हैं, ओशो कह रहे हैं कि मैंने सब जगह अद्वैत किया है, जोरबा द बुद्धा से लेकर संसार और संन्यास तक, परमात्मा से लेकर पदार्थ तक, मैं इसको भी जोड़ देना चाहता हूं। सम्मोहन की आटोसजेशन विधियों को ध्यान की भूमिका बना देना चाहता हूं।

ओशो ने सन् 1953 से लेकर 70 तक जो ध्यान प्रयोग करवाए हैं, जिसको निष्क्रिय ध्यान कहा जाता है, शिथिल ध्यान कहा जाता है उसके सारे सजेशन हिप्नोसिस के सजेशन हैं। ओशो सुझाव देते हैं कि भाव करें कि शरीर शिथिल हो रहा है, शरीर शिथिल हो रहा है, बाडी इज रिलैक्सिंग। वे रिपीट करते जाते हैं, करते जाते हैं। और फस्र्ट पर्सन में आप इसको भीतर ही भीतर कहें तो और भी अच्छा कि मेरा शरीर शिथिल हो रहा है, मेरा शरीर शिथिल हो रहा है। तीन-चार मिनट में शरीर बिल्कुल शिथिल हो जाता है। क्यों, मैं टेंशन में हूं, मैं तनाव में हूं यह भी मेरी धारणा और सम्मोहन है। हमारे चारों तरु वैसे ही लोग है चिंतित, परेशान लोग उनको देख-देखकर हम भी हो गए, हमने एक धारणा ग्रहण कर ली कि जिंदगी एक टेंशन का नाम है, मुसीबत की नाम है तो हम लोग भी परेशान हैं। क्योंकि सब लोग परेशान हैं कि यही जिंदगी है, ऐसा हमने भी मान लिया। लेकिन जब हम कहते हैं कि मैं शांत हो रहा हूं, शिथिल हो रहा हूं, मेरी श्वांस धीमी हो रही है, श्वांस धीमी हो रही, लयबद्ध हो रही है और अचानक श्वांस लयबद्ध हो जाती है। सिर्फ सजेशन से, यह हिप्नोसिस ही है।

यह कहना कि मन शांत हो रहा है, मन शांत हो रहा है, मन शांत हो रहा है, मन शांत होने लगता है। अशांति भी हमारी धारणा थी, वह निगेटिव हिप्नोसिस है कि मैं अशांत हूं, मैं परेशान हूं। इसका उल्टा भी मैं कर सकता हूं कि मैं शांत हूं, मैं शांत हूं, मैं शांत हूं। मैं स्वीकार भाव में हूं। ये चार बातें अगर हो जाएं- शरीर के तल पर शिथिलता, श्वांस के तल पर लयबद्धता, मन के तल पर शांति और भाव तल पर स्वीकार। अब पूरी भूमिका बन गई। अब बहुत आसान है चैतन्य हो जाना। तो ओशो ने इन दोनों चीजों को जोड़ा है और इसको खूब अच्छे से विधिवत ढंग से समझाया भी है। तो जहां-जहां उन्होंने इसको समझाया है उसके लिए मैंने एक स्पेशल एम. पी. थ्री तैयार की है ओशो के प्रवचन की। इसमें अधिकांश अंग्रेजी के हैं, बहुत सारे हिन्दी के भी हैं। अंगे्रजी के प्रवचन अधिक इसलिए हैं कि ओशो वल्र्ड टूर के दौरान 1985-86 में इस बात पर बहुत इम्फेसाइस किया। उस किताब का नाम भी बियाण्ड सायकालाजी है जिस किताब में प्रवचन इस संबंध में हैं। और ओशो ने कहा कि जल्दी ही मैं चाहूंगा कि छोटे-छोटे मिस्ट्री स्कूल खुलें, रहस्य विद्यालय। जैसे कि यह ओशो फ्रैगरैंस का धाम है। इस प्रकार की ओशो की धारणा थी कि जहां सौ-डेढ़ सौ मित्र आएं, ज्यादा से ज्यादा दो सौ मित्र आएं हफ्ता-दस दिन रहें, प्रयोग में डूबें और जाएं। फिर बड़े आश्रम की जरूरत नहीं है, वहां हिप्नोसिस और मेडिटेशन को सम्मिलन किया जाए। तो आपके मन में अगर कोई विरोधाभास है तो यह आपके मन की भ्रांत धारणा ही है।

– स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

Leave a reply

Captcha Click on image to update the captcha .

By commenting, you agree to the Terms of Service and Privacy Policy.