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“चिकित्सा में सम्मोहन/हिप्नोसिस का उपयोग” – स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

सम्मोहन की कुंजी, स्वास्थ्य की पूंजी

प्रश्न 1 – जब पेशेंट आता है तो काफी टेंशन में होता है तो पहले तो हम उसको रिलैक्स करते हैं और उसके साथ पांच-दस मिनट इधर-उधर की बातें करते हैं जिससे कि थोड़ी देर के लिए वह भूल जाए अपनी बीमारी के बारे में। फिर उसके बारे में सुनते हैं फिर हम लोग ट्रीटमेंट करते हैं। बहुत बार तो कुछ प्राब्लम्स होते ही नहीं हैं, सिर्फ कैल्शियम की गोली इफेक्ट कर जाती है और अगले टाइम जब पेशेंट आते हैं तो काफी कम्फर्टेबल रहते हैं। जैसे पुराने लोग बोलते हैं कि डॅाक्टर के पास जाते ही आधी बीमारी दूर हो जाती है, मतलब क्या यह भी एक सम्मोहन का हिस्सा है?

प्रश्न 2 – सम्मोहन के लिए हमेशा से ही मुझे आकर्षण रहा है। इसलिए यह जानना चाहता हूं की कितने टाइप के हिप्नोसिस हैं, ये सारे हिप्नोसिस के ही पैटर्न हैं और उसमें क्या-क्या गे्रडेशन हैं, क्या-क्या वेरिएसन है, क्या-क्या डेप्थ है इसमें? और इसे हम अपने यूज और अपने पेशेंट के लिए कैसे एप्लाई कर सकते हैं?

बहुत महत्वपूर्ण सवाल पूछा है आपने हिप्नोसिस के बारे में। हिप्नोसिस की तीन ग्रेड हम मुख्य रूप से मानते हैं जिसको कि मैं हिप्नोसिस के तल भी कहता हूं। एक हम जिसको कहते हैं उथली सम्मोहन, लाइट ट्रांस। दूसरी है मीडियम ट्रांस, मध्यम सम्मोहन की अवस्था। और एक होती है डीप ट्रांस, इसको दूसरे शब्दों में कहते हैं सोमनाम्बुलस्ट्रिक ट्रांस या हम कह सकते हैं बहुत गहरा सम्मोहन। ये तीन प्रकार के सम्मोहन अलग-अलग टेकनीक से पैदा किए जाते हैं। 97 परसेंट लोग उथले सम्मोहन में जा सकते हैं। उथला सम्मोहन, इसमें एक प्रकार का रिलैक्सेशन महसूस होता है, शिथिलता आ जाती है मांसपेशियों में, चेहरे पर रिलैक्सेशन आ जाता है। वह जो प्रजेन्ट सिचुएशंस थी जिनसे हम बहुत प्रभावित हो रहे थे कुछ देर के लिए हम उनसे दूर हो जाते हैं। इसको मेडिकल भाषा में कहते हैं डिसोसिएशन। वह जो हमारा एसोसिएशन बना था उनसे हम थोड़ी देर के लिए दूर हट जाते हैं, डिसोसिएशन हो जाता है।

डिसोसिएशन की यह घटना वैसे भी दिन में कम से कम पच्चीस बार रोज घटती है। जब आप एक टी.वी. सीरियल को गौर से देख रहे हैं, अब आप आस-पास की परिस्थितियों से डिसोसिएटेड हो गए हैं। आप एक नॅावेल पढ़ने का मजा ले रहे हैं, कि कविता पढ़ने का आनंद ले रहे हैं, कि गीत सुन रहे हैं या गुनगुना रहे हैं या अपने बाथरूम में नहाते हुए मुंह बिचका रहे हैं आइने के सामने, अब आप सारे संसार को भूल गए हैं इतनी देर के लिए। ठीक है दो-चार मिनट के लिए, लेकिन अगर दिन में ये बीस-पच्चीस बार न हो तो हम शायद जिंदा भी न रह पाएं इतना टेंशन हमारे ऊपर हो जाए। अब आप अपने छोटे बच्चे के साथ थोड़ी देर के लिए खेल रहे हैं आप डिसोसिएटेड हो गए। वह जो अपने आपको आप एडल्ट समझ रहे थे और दुनिया भर की समस्याएं आपने अपने सिर पर रख ली थीं कि देश की राजनीति का क्या होगा? और अमेरिका के पे्रसीडेंट को क्या करना चाहिए और सन 2012 में दुनिया खत्म होगी कि नहीं; जो बड़ी-बड़ी चीजें सोच रहे थे अभी बच्चे के साथ गेंद खेलते हुए आप डिसोसिएटेड हो गए। ये दस मिनट के लिए आप बिल्कुल रिलैक्स हो, रिफ्रेश हो गए। तो दिन भर में कम से कम पच्चीस बार कुछ-कुछ मिनट के लिए हम उथली ट्रांस में जाते हैं, उसी से हमारा जीवन बचा हुआ है। अगर वह न हो तो हमारा जीवित रहना मुश्किल हो जाएगा। उथली ट्रांस की अवस्था 97 परसेंट लोगों को बिल्कुल आसानी से घटती है। पास्ट लाइफ रिगरेशन और फ्यूचर लाइफ प्रोजेक्शन के लिए उथली ट्रांस की अवस्था पर्याप्त है।

दूसरी स्थिति कहलाती है मीडियम ट्रांस, मध्यम सम्मोहन। इसमें मांसपेशियां बिल्कुल ही रिलैक्स हो जाती हैं, एक केटालेप्सी की कंडीशन बनती है शुरूआत में। श्वांस थोड़ी गहरी चलने लगती है, गला सूखने लगता है, पुतलियां और आंख की पलकें तेजी से कंपित होने लगती हैं। अभी आप लोग अधिकांशतः उसी कंडीशन में पहुंचेंगे। सेल्फ हीलिंग के लिए, पुरानी आदतें छुड़ाने के लिए इस प्रकार की ट्रांस चाहिए। यह थोड़ा गहरा प्रयोग है इसमें मीडियम ट्रांस चाहिए।

अभी यहां तीन दिन जो होगा तो हमारी कोशिश होगी कि आप मीडियम ट्रांस की अवस्था में पहुंच पाएं। जहां बॅाडी बिल्कुल ही ढीली हो जाती है। और जो सुझाव दिया जाता है उसके अनुरूप रिस्पांस आना शुरू हो जाता है। तब भीतर भी आप इसका मतलब सुझाव को ग्रहण कर रहे हैं। अगर मैं कहता हूं कि आपका हाथ बिल्कुल हल्का हो गया, हल्का हो गया, हल्का हो गया। तो अगर आप इसको ग्रहण कर रहे हैं तो धीरे-धीरे आपका हाथ ऊपर को उठने लगेगा। इसका मतलब आपका अनकांसस माइण्ड सजेशन को ग्रहण कर रहा है और शरीर में उसका असर पहुंच रहा है। इस स्थिति में समझो मैं कहूं, अगर एक आदमी सिगरेट पीने वाला है कि अब आप विज्युअलाइज करो अपने आपको, आप बहुत प्रसन्न हो बिना सिगरेट पिए, एक पॅाजिटिव विज्युअलाइजेशन बिना सिगरेट के, शुद्ध हवा में गहरी श्वांस लेते हुए आप बहुत प्रसन्न हैं, आनंदित हैं। अब उसके सबकांसस माइण्ड ने अगर इसे ग्रहण कर लिया तब उसके बॅाडी में भी इसका असर आ जाएगा, उसकी वह आदत छूट जाएगी।

समझो छोटी-छोटी चीज से शुरू कर सकते हैं। मान लो कहा कि ग्लोब एनेस्थीसिया, जहां तक ग्लोब पहनते हैं न हथेली में, कल्पना करें कि आपका हाथ ठण्डे पानी में डूबा हुआ है। अब मैं कल्पना का एक सुझाव दे रहा हूं कि बर्फीला पानी है कटोरे में और आपने उसमें अपना हाथ डुबोया हुआ है, हाथ बिल्कुल ठण्डा हो गया, ठण्डा हो गया। अब आपको कुछ पता नहीं चल रहा, सुई भी वहां गड़ाएंगे तो पता नहीं चलेगा, चींटी काट ले पता नहीं चलेगा, हाथ बिल्कुल लकड़ी की तरह हो गया। अगर तीन-चार मिनट में आप पाते हैं कि हाथ सुन्न हो गया तब आप इस मीडियम ट्रांस की अवस्था में हैं। इसका बहुत उपयोग हो सकता है, तब आप अपने दर्दीले हिस्सों पर भी वही प्रयोग कर सकते हैं। अनावश्यक दर्द जो पैदा हो रहे थे वे खत्म किए जा सकते हैं। और कई चीजें खत्म की जा सकती हैं। समझो एक आदमी को भय लगता है मंच पर जाने में लेकिन है वह कलाकार, संगीतकार लेकिन परुार्मेंस के समय घबरा जाता है, नरवस हो जाता है, पसीना आ जाता है, भूल जाता है गीत, माइण्ड ब्लैंक हो जाता है उसका। इसका सेल्फ कान्फीडेंस जगाया जा सकता है, इस मीडियम ट्रांस की अवस्था में। अगर उसे कहा जाए कि तुम कल्पना करो कि तुम मंच पर बैठे हो हजारों लोगों की भीड़ है और तुम बहुत सुंदर गाना गाए और लोग तालियां बजा रहे हैं। इस पाजिटिव विज्युअलाइजेशन को अगर वो हृदयगम्य कर लेता है मीडियम ट्रांस की अवस्था में तो यह घटना घट जाएगी, वह ऐसा कर पाएगा। बिल्कुल संभव है, बिल्कुल कान्फीडेंस के साथ वह माइक पर पहुंच जाएगा और अपनी बहुत सुंदर परुार्मेंस कर पाएगा।

मीडियम ट्रांस से फिर और गहरी है जिसको कहते हैं सोमनाम्बुलस्टिक ट्रांस या डीप ट्रांस। सोमनाम्बुलम शब्द शायद आपने सुना होगा कुछ लोगों ने, इसका मतलब होता है नींद में चलना। कुछ लोगों की आदत होती है, करीब पांच प्रतिशत उनकी गिनती है जो रात को नींद में उठकर चलते हैं और जाकर के फ्रिज में से खाना निकालकर खा लेते हैं, बाथरूम भी चले जाते हैं, कई बार दरवाजा खोलकर सड़क पर भी घूम आते हैं, फिर उनको बाद में कुछ नहीं पता होता और वे आकर सो जाते हैं। सुबह उनको कुछ भी पता नहीं होता कि वे बाथरूम गए थे, कि खाना खाया था कि रोड़ में घूमने गए थे। आंखें उनकी खुली थीं, न टकराए, न कुछ हुआ, उस समय इनको कोई देखकर यही समझेगा कि ये पूरे होश में हैं। तो सोमनाम्बुलिज्म इसको बोलते हैं, निद्रा में गतिविधियां करना। तो डीप ट्रांस जो है उसकी आवश्यकता हम जिस परपस से कर रहे हैं उसमें कहीं नहीं है। न तो पास्ट लाइफ रिगरेशन के लिए, न तो फ्यूचर लाइफ प्रोजेक्शन के लिए, न यहां तीन दिन में जो प्रयोग होगा इसमें किसी में भी सोमनाम्बुलिज्म का उपयोग नहीं है। सोमनाम्बुलिज्म में पॅाजिटिव और निगेटिव हेल्युलेशन होते हैं। पाजिटिव हेल्युलेशन का अर्थ है जो चीज नहीं है वह व्यक्ति वह भी देख पाएगा। और निगेटिव हेल्युलेशन का अर्थ है कि जो चीज है अगर उसको सुझाव दिया जाए कि यह नहीं है तो वह उसको नहीं दिखाई देगी। यह इस डीप ट्रांस की अवस्था में होता है। लेकिन इसका हमारे जीवन में सीधा-सीधा कोई उपयोग नहीं है, इसका उपयोग केवल वे सम्मोहनविद जो मंचों में अपना शो दिखाते हैं जादूगरी का उनका काम है। इसका हमारे जीवन में कोई उपयोग नहीं है और यहां हम इसका कोई भी प्रयोग नहीं करेंगे। क्योंकि जितनी भी बदनामी सम्मोहन की होती है वह इसी की वजह से होती है।

ओशो ने एक प्रवचन हेल्युलेशन में जिक्र किया है कि वे बम्बई में किसी मित्र के यहां रुके थे जो कि बहुत अमीर आदमी थे। उन्होंने अपने घर में ही एक छोटा आडिटोरियम भी बना रखा था। और ओशो के स्वागत में उन्होंने कहा कि आज दौ सौ मित्रों को बुलाएंगे। और एक हिप्नोटिस्ट को भी बुलाएंगे जादू का खेल दिखाने के लिए। वह हिप्नोटिस्ट आया और अपना खेल दिखाना शुरू किया, कोई दो सौ मित्र उसने आमंत्रित किए थे और ओशो भी देख रहे थे वह खेल। उस हिप्नोटिस्ट ने तीन-चार लोगों को भीड़ में से बुलाया, उनको पहचानने के उपाय हैं। मैं आपको बताऊंगा कैसे पहचानते हैं कौन हैं वे व्यक्ति जो सोमनाम्बुलिज्म में जा सकते हैं वे चुनकर उन्हीं को बुलाएंगे मंच पर। और उनसे जो खेल दिखाया उसने, उसने कहा कि बैठ जाओ और फिर उनको हिप्नोटाइज करके उसने कहा कि तुम्हारे सामने एक गाय खड़ी है और तुम गाय को दुहो, इसका दूध निकालो, यह लो बरतन। उसने दिया कुछ भी नहीं ऐसे ही हाथ बढ़ाया और उन लोगों ने ऐसे पकड़ लिया जैसे दूध दुहने के लिए बरतन ले लिया हो, उस पोजीशन में बैठ गए वे लोग जैसे गाय दुहने के लिए बैठते हैं और उन्होंने गाय दुहना शुरू कर दिया और सारे लोग हंस रहे हैं और मजाक उड़ा रहे हैं। उनको कुछ भी नहीं पता कि बाकी के लोग हंस रहे हैं। ओशो ने बाद में कहा कि इस प्रकार के खेल नहीं दिखाने चाहिए, इससे सम्मोहन के प्रति घृणा बैठ जाएगी, ऐसा लगेगा कि इन्होंने तो वशीकरण कर लिया। याद रखना, यह अवस्था केवल तीन से पांच प्रतिशत लोगों में पैदा की जा सकती है। और वे लोग वे हैं जो रात को नींद में उठकर चलते हैं। और यह भी उनकी इच्छा के अनुरूप हो सकती है। अगर वे इसके विरोध में कहें कि नहीं होने देंगे तो कभी नहीं होगी। इसलिए सारी हिप्नोसिस मुख्य रूप से सेल्फ हिप्नोसिस हैं। वशीकरण जैसे कोई चीज नहीं होती। अगर आपको आपरेट करेंगे, आप चाहते हैं कि ऐसा हो जाए तो ही वैसा होगा, अगर आपके मन में विरोध है कि ऐसा नहीं होने देंगे तो कभी भी वैसा आपके साथ नहीं होगा। यह जो मंच में दिखाता है यह व्यक्ति भी खेल नहीं दिखा सकता अगर उस व्यक्ति के मन में विरोध की भावना है। उसका को-आपरेशन चाहिए। तो उनकी सारी ट्रिक्स होती हैं कि कैसे को-आपरेशन गेम किया जाता है। फिलहाल हम उस क्षेत्र में नहीं जा रहे हैं, उसका सेल्फ हीलिंग से या हमारे जीवन के कल्याण से संबंध नहीं है। और ओशो ने कहा कि इस प्रकार के खेल नहीं दिखाना चाहिए और उससे भी कहा कि इस प्रकार के खेल तुम्हें नहीं दिखाने चाहिए, ये जो दो सौ आदमी देख रहे हैं तुम्हारा खेल इनके मन में तुमने एक धारणा बैठा दी हिप्नोटिज्म के खिलाफ, अब अगर भविष्य में कोई इनको हिप्नोटाइज करके इनके लिए कुछ अच्छा करना चाहेगा तो ये नहीं होने देंगे। इनके मन में आ गया कि अरे मैं तो वशीभूत हो जाऊंगा, यह हिप्नोटिस्ट पता नहीं मुझसे क्या करवा ले। ये कुछ होने ही नहीं देगा, प्रतिरोध की दीवार खड़ी कर लेगा। तो ओशो ने कहा कि सम्मोहन का बहुत विधायक उपयोग संभव है। लेकिन यह जादूगरों के उपयोग के कारण नहीं हो पाता।

फिर आपने पूछा है सम्मोहन के जो बाद में होता रहता है, मेडिकली जो उपयोगी ढंग से किया जा सकता है मास हिप्नोसिस। ये सारी बातें संभव हैं? मुख्य बिन्दु एक हमेशा याद रखना, आल हिप्नोसिस इज सेल्फ हिप्नोसिस, सब आत्मसम्मोहन हैं। चाहे दूसरा हमें सुझाव देकर करे लेकिन पहले उसने स्वीकार लिया है कि हम इसका सुझाव मानेंगे। वह वास्तव में हम आत्मसम्मोहित ही हो रहे हैं। समझो मैं आपसे कह रहा हूं कि भाव करो कि आप रिलैक्स हो रहे हो, शांत हो रहे हो। पहले आप यह मान कर आए हो कि आप मेरी बात मानोगे, अगर आपके मन में विरोध भावना है, समझो कोई आ जाता है देखने के लिए कि क्या हो रहा है देखें हम भी तो वह को-आपरेट नहीं करेगा। वह पहले से ही निरीक्षक बनकर आया हुआ है कि देखेंगे दूसरे लोगों को क्या करते हैं, कैसे करते हैं। तो वह निरीक्षक बना रहेगा और अपने ऊपर वह कुछ होने ही नहीं देगा, उसको कुछ भी नहीं हो पाएगा। उसका सहयोग चाहिए। जो लोग शिष्य की भावना से आए हैं, गुरू के प्रति उनकी श्रद्धा है, यह श्रद्धा का, समर्पण का भाव ही चमत्कार करेगा। याद रखना, गुरु चमत्कार नहीं करता, वह तो शिष्य के भीतर का समर्पण भाव है जो कि चमत्कार करता है। वह सेल्फ हिप्नोसिस के लिए तैयार हो रहा है। हां, गुरु इतना ही करेगा कि वह जो सुझाव देगा वह शिष्य के कल्याण हेतु होंगे। शिष्य अगर उसी भावना से ग्रहण कर रहा है तो बस, चमत्कार हो जाएगा। आल हिप्नोसिस इज सेल्फ हिप्नोसिस।

आपको डॅाक्टर और मरीज के उदाहरण से कहूं। मरीज जो ठीक हो रहा है करीब-करीब पैंतीस परसेंट प्लेसिबो इफेक्ट है। कोई कैल्शियम की गोली दे देते हैं या कुछ भी दे देते हैं और मरीज ठीक होकर आ जाता है। वही प्रभाव होमियोपैथी का भी है, वही प्रभाव एक्युपंचर का भी है, वही प्रभाव मैग्नेटिक थेरेपी का भी है। सारी पैथियां दुनिया में काम करती हैं, कैसे? ये पैंतीस परसेंट लोग किसी भी चीज से ठीक हो जाते हैं। किसी साधु के आशीर्वाद से भी पैंतीस परसेंट लोग ठीक हो जाते हैं, कोई बाबा जी भभूत दे देते हैं तो उससे भी लोग ठीक हो जाते हैं। और याद रखना, जब आप किसी मेडिकल डॅाक्टर से इलाज कराने जाते हैं तब भी दवाइयों का प्रभाव कम है, अन्य चीजों का प्रभाव ज्यादा है। अगर वह डॅाक्टर आपसे बहुत प्यार से मिलता है, आपका स्वागत करता है, एक रिलैक्सिंग माहौल में आपको बैठाता है, आपसे पे्रमपूर्ण डिस्कशन करता है, आपको अच्छे से सुनता है, उसकी डेªस, उसके ड्राइंगरूम में बहुत सारे मरीज वेट कर रहे थे, वहां उसकी डिग्रियां लटकी हुई हैं देश-विदेश की, आप हिप्नोटाइज्ड हो चुके पूरे। अब उसने कैल्शियम की दवाई लिख दी आप उसको भी खाकर ठीक हो जाएंगे।

जब आप वहां पहुंचे तो एपोइमेंट एक हफ्ते बाद का मिला, अब आप वहीं से सम्मोहित होना शुरू हो गए कि अरे भाई बहुत बड़ा डॅाक्टर है, एक सप्ताह बाद का टाइम मिला है। वहां पहुंचे तो उसकी बड़ी सी कार खड़ी थी और जब अंदर घुसे तो बड़ा भारी वेटिंगरूम और तीस-पैंतीस मरीज बैठे हैं, और बैठे ही बस थोड़ी हैं, वहां बात-चीत भी चल रही है। कोई बता रहा है कि मेरे को बहुत बीमारी थी मैं तो बहुत भटका लेकिन इन डॅाक्टर साहब के पास आते ही ठीक हो गया। आप कुछ नहीं कर रहे हैं, सिर्फ सुन रहे हैं। अब आपकी धारणा बैठने लगी कि डॅाक्टर बहुत अच्छा है, सही जगह हम आ गए। फिर उसकी डिग्रियां, उसकी खूबसूरत रिसेप्शनिस्ट आपके इलाज में सहयोगी है। उसकी मुस्कुराहट से आप प्रभावित हो रहे हैं, अब इस डॅाक्टर का इलाज काम करेगा।

अब मान लो वहां कोई खतरनाक चुड़ैल सी बैठी होती जरा उल्टा सोचो। आप गए डॅाक्टर के पास टूटा-फूटा सा मकान था, एक टूटी साईकिल रखी थी एक पैडल वाली, आप समझे कोई मजदूर वगैरह काम करने आया होगा लेकिन पता चला कि वही डॅाक्टर साहब का वाहन है। अंदर पहुंचे तो लंगोट पहने एक आदमी बैठा था। आपने पूछा डॅाक्टर साहब कहां हैं? वह बोला मैं ही हूं। मक्खी उड़ा रहे थे वह और मरीज कोई भी नहीं था। उसने कहा अच्छा हुआ आप आ गए बहुत देर से मैं इंतजार कर रहा था, आज तो सुबह से कोई नहीं आया। अब शायद ही आप उस डॅाक्टर से इलाज कराओ। यहां तक कि आप यहां से भागोगे किसी प्रकार से और वह आपको पकड़ेगा कि अरे, भागते कहां हो? आप क्या मेरे सूट से और टाई से इलाज करवाने आए थे, कपड़े से आपको क्या मतलब? मैं कुछ भी पहनूं, लंगोट पहनूं, कि सूट-पैंट पहनूं, हाऊ डज इट मैटर, मैं डॅाक्टर हूं तो डॅाक्टर हूं। ये देखो मेरी डिग्रियां। अब आप बहाना बनाओगे कि नहीं-नहीं, एक्चुली मैं तो देखने आया था कि आप हो कि नहीं, मेरा पड़ोसी बीमार है उसको लेकर आता हूं। इस आदमी से कैसे इलाज कराना, आपकी धारणा के अनुकूल होना चाहिए।

डॅाक्टर अगर लंबा सा हो, हैवी वेट हो, आप जो समझते हो स्वस्थ की धारणा तो आपकी धारणा में अगर वह फिट बैठे थोड़ा ओवर वेट ही हो तब आपको लगेगा कि हां, अब वह एक दुबला-पतला, एक मरियल सा आदमी निकले खुद ही दीवाल पकड़-पकड़कर चल रहा है कि गिर न जाऊं। अब आप कहोगे कि पहले अपना इलाज तो कर लो। वह कहेगा भाई आपको मुझसे क्या मतलब, मैं पोलियाग्रस्त हूं, बचपन मेें पोलियो हो गया था आपको उससे क्या मतलब है? मैं आपका इलाज करूंगा। आप कहोगे रहने दो, आपके सारे लॅाजिक फेल हो जाएंगे। जो इंप्रेशन आपका पड़ा है उसका प्रभाव है। याद रखना, यही प्रभाव दूसरे ढंग से दूसरी जगह पैदा हो रहा है। आप एक साधु के पास पहुंचे और वह सूट-पैंट और टाई-हैट लगाए बैठा हो तो फिर आप भाग आओगे वहां से। वह लंगोटी में मिलना चाहिए राख लपेटे हुए और लंबा सा टीका लगा हुआ हो, खूब लंबी चोटी हो, जितनी लंबी चोटी होगी उतना ही प्रभावशाली साधु हो जाएगा, फिर उसकी दी हुई राख चमत्कार का काम कर देगी। याद रखना, वह कैल्शियम की गोली और राख बराबर हैं। जो दे रहा है अगर वह आपकी धारणा के अनुकूल है। आपके मन में संन्यासी की जो धारणा है, वैसे ही मिले बाबा जी और वहां भी पहले शिष्य लोग मिले, जैसे वहां वेटिंगरूम में मरीज मिल गए थे और वे बातचीत कर रहे थे, अगर यहां पहले शिष्य मिल गए और बातचीत करते हुए, उनके साथ खाना खाते हुए आपने सुनी बड़ी-बड़ी चमत्कार की कहानियां कि बाबा जी ने ऐसा कर दिया, वैसा कर दिया, फंलाने को यह चमत्कार हो गया, अंधे को आंखें मिल चुकी, तब आप आलरेडी हिप्नोटाइज्ड हो चुके। अब बाबा जी की भभूत बहुत इफेक्टिव होगी।

बाबा जी अगर आपकी धारणा के अनुकूल न निकले, एक भी शिष्य वहां था ही नहीं कोई, वही अकेले बैठे थे और अपने जूते-मोजे, टाई-बेल्ट लगाए हुए और सिगरेट फूंक रहे थे, छल्ले उड़ा रहे थे और न कोई शंकर जी की फोटो है, न त्रिशूल है, न कुछ है और वह कहें कि भाई बाबा हैं हम। आप कहोगे किस प्रकार के बाबा हो जो सिगरेट पी रहे हो। अब बड़ी मुश्किल है, अब इस सिगरेट पीते आदमी से आप आशीर्वाद नहीं लेना चाहोगे। यद्यपि न तो सिगरेट से इसके आशीर्वाद का संबंध है, न उस डॅाक्टर से लंगोट का कोई संबंध था। डॅाक्टर तो डॅाक्टर है चाहे वह कुछ पहने हो, इससे आपको क्या करना। लेकिन नहीं, आपकी धारणा में फिट बैठना चाहिए तो इफेक्ट होगा। तो जहां हम कहते हैं कि हम वैज्ञानिक तरीके का इलाज करा रहे हैं उससे हम ठीक हो रहे हैं वहां भी मेजर पोर्शन हमारा सायकोलॅाजिकल ठीक हो रहा है। और इसलिए वे जो पढ़े-लिखे डॅाक्टर हैं उनसे कई बार ज्यादा इफेक्ट तो वे क्वेक्स हैं जिनकी कोई डिग्री भी नहीं है, लेकिन उनको दूसरी कलाकारी बहुत अच्छी आती है। मेडिकल ज्ञान नहीं है तो उससे क्या होता है।

ओशो ने वर्णन किया है कि जबलपुर में एक डॅाक्टर थे उनके पहचान के, उन्होंने छोटी-छोटी चीज के लिए बड़ा भारी इंतजाम किया था। अगर ब्लडप्रेशर नापना है तो मक्ररी वाली छोटी सी मशीन से नहीं नापेंगे, उन्होंने पानी की लंबी-लंबी ट्यूब लगा रखी हैं। अब पारे का वजन बहुत कम होता है, इन्हें लंबी-लंबी ट्यूब चाहिए जो कि एक ट्यूब ही दस-दस फुट की हैं। एक में हरा पानी है, एक में लाल पानी है, फिर वह पे्रशर डाल रहे हैं और पानी उछल रहा है, हिलता हुआ ट्यूब में नजर आ रहा है, उसमें चमकीली रोशनी पड़ रही है, मरीज लेटा देख रहा है। कई प्रकार के लाइट जल रहे हैं, बुझ रहे हैं उस पानी के ऊपर-नीचे आने-जाने से। अब यह ब्लडपे्रशर बड़ी आसनी से नापा जा सकता था लेकिन वहां करीब बीस मिनट लगते हैं ब्लडपे्रशर नापने में। और कई प्रकार की लाइटें जलती-बुझती हैं और पता नहीं क्या-क्या हो रहा है रहस्यमय सा और मरीज लेटा-लेटा देख रहा है। उस डॅाक्टर ने बहुत लोगों को ठीक किया, उसने जांच के लिए बहुत ही विचित्र-विचित्र तरकीबें बना रखी थीं, मेडिकल नालेज उसको कुछ नहीं था। लेकिन ऐसे-ऐसे रोगियों को उसने ठीक किया है जो कहीं ठीक नहीं हो रहे थे।

याद रखना, हम एक साइकोसोमेटिक यूनिट हैं, दोनों चीजों का प्रभाव पड़ता है। तो डॅाक्टर से भी जब कोई ठीक होता है तो बहुत सी चीजें उसमें ठीक करती हैं। अगर आपको पता चल जाए कि डॅाक्टर दुष्चरित्र है। अब आपको उसके चरित्र से कोई मतलब नहीं है, आपको टी.बी. की बीमारी है वह आपको टी.बी. की दवाई दे रहा है आपसे क्या मतलब कि एक पत्नीव्रता है, कि कई प्रेमिकाएं हैं। इससे टी.बी. का कोई संबंध नहीं है लेकिन अगर आपने उसकी बदनामी सुन ली है पहले ही तो अब वह दवाई आप पर उतना काम नहीं करेगी। क्योंकि आपकी एक खास धारणा है कि सद्चरित्र आदमी कैसा होता है। वह भी हिप्नोसिस है, एक खास समाज में एक खास धारणा पुष्ट की गई है कि यह सद्चरित्र आदमी के लक्षण हैं। अगर आपको डॅाक्टर के बारे में पता चल जाए कि वह सद्चरित्र है तो उसकी दवाइयां ज्यादा असर करेंगी। अकेला केमिकल इफेक्ट नहीं है, साइकोलॅाजिकल इफेक्ट हैं। तो आपने जो पूछा है कि क्या डॅाक्टर को हिप्नोसिस सीखनी चाहिए तो मैं बिल्कुल इस पक्ष में हूं। क्योंकि बहुत सी चीजें ऐसी हैं जहां पर मेडिकल साइंस उतना काम नहीं करेगी जितना कि हिप्नोसिस का ज्ञान काम करेगा।

कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट सबसे प्रसिद्ध है हिप्नोथेरेपी के लिए। उसके ब्रांचेस भारत के सभी महानगरों में हैं। वहां जो भी हैं वे सभी मेडिकल डॅाक्टर्स ही हैं। और जो टेªनिंग लेने आ रहे हैं उसमें से भी 90 परसेंट डॅाक्टर ही हैं। और बहुत बेनीफिट्स उनके पेशेंट्स को वे दे पा रहे हैं। उनकी छोटी-छोटी बातें जब हमको पता चल जाएं कि ये असर करती हैं तो क्यों वे जहरीले केमिकल्स देना जिनके साइड इफेक्ट्स हैं। जब जरूरत हो तो वह देना, जहां जरूरत नहीं है तो उसके बिना भी काम चल जाएगा। तो धीरे-धीर तो एक दिन जरूर आएगा, मैं समझता हूं कि बीस-पच्चीस साल के अंदर ही वह दिन आएगा जब हिप्नोसिस मेडिकल साइंस का एक हिस्सा होगा। हर डॅाक्टर को टेªनिंग होनी चाहिए। क्यों जबरदस्ती लोगों को केमिकल्स खिला रहे हो अनावश्यक रूप से, जो काम तुम्हारी बातचीत से ही हो सकता है।

मैंने बारह साल तक नौकरी किया। जिस हॅास्पिटल में मैं काम करता था तो वहां साल में दस महीने तो पैरासिटामाल के अलावा कोई दवाई नहीं रहती थी। बड़ी मुश्किल थी, लेकिन करोगे क्या। मैं केवल अनजाने में ही हिप्नोसिस का यूज करता था। मीठी वाणी, लोगों को प्रसन्न करना, हंसाना, वे अपना दुख लेकर आए हैं तो उनको जरा डिसोसिएट करने के लिए कोई हंसी-मजाक की बात करना और चाहे उनका रोग कोई भी हो, मुझे तो कोई खास मतलब नहीं था, मेरे पास एक ही दवाई थी। इसलिए मुझे सुनने से कोई खास मतलब भी नहीं था कि सिर दर्द होता है कि बुखार है, कि पेट दुख रहा है, कि टांग दुख रही है, कि गर्दन दुख रही है, कि गला दुख रहा है, कि नाक दुख रही है, कि कान दुख रहा है, हमारे पास एक ही दवाई है चाहे कुछ भी दुख रहा हो। लेकिन मैं देता बड़े प्यार से था। और जिस प्यार और विश्वास से उसका कान्फीडेंस जीतकर बिना दवाई के मैंने काम चलाया है उससे एकदम क्लीयर हो गया कि इट डजेंट मैटर। उस व्यक्ति ने खूब प्यार से ग्रहण किया है, उसका मेरे ऊपर भरोसा है, वह मेरे ऊपर समर्पित है।

हम लोग चार डॅाक्टर थे वहां, चार सौ मरीज आते थे। तो चार सौ में से तीन सौ मैं देखता था और बाकी के सौ अन्य तीन डॅाक्टरों के पास जाते थे। अब आप सोच ही सकते हो कि चार-पांच घण्टे की ड्यूटी में तीन सौ मरीज रोज देखना, मैं कितना समय देता रहा होऊंगा एक को? आधा मिनट, एक मिनट से ज्यादा नहीं। उनकी बात ठीक से सुन भी नहीं सकता था। धीरे-धीरे यह भी प्रचलित हो गया कि मैं नब्ज भी नहीं देखूंगा, न स्टेथोस्कोप का यूज करूंगा, समय ही नहीं है तो करेंगे कैसे। भाई स्टेथो लगाने में समय लगेगा, सुनने में वक्त लगेगा इतना मौका ही नहीं है। लोगों की धारणा हो गई थी कि डॅाक्टर शेखर के पास जाओ तो ठीक तो हो ही जाना है। चाहे वह कुछ भी न करें जो भी देंगे ठीक हो जाएंगे। लोगों की धारणा बन गई थी और अपनी धारणा से वे लोग ठीक होते थे। लेकिन धारणा बनाने के लिए एक माहौल तो बनाना पड़ेगा। तो प्यारे मित्रों, डॅाक्टरी के क्षेत्र में हिप्नोसिस का बहुत उपयोग हो सकता है। यहां और भी जो डॅाक्टर मित्र बैठे हों जो कि और भी किसी प्रकार की थैरेपी करते हों अल्टरनेट थेरेपी कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट आफ हिप्नोसिस ने डिग्रियां देना शुरू किया है, डिप्लोमा की डिग्री वे देते हैं, उनका कोर्स भारत के सभी महानगरों में होता है। एक-एक महीने में तीन दिन के, फिर बाद में छः दिन के प्रोग्राम्स होते हैं, चार-पांच प्रोग्राम में पास्ट लाइफ रिगरेशन पूरा सिखाते हैं। हिप्नोसिस की पूरी टेकनीक सिखाते हैं और बाकायदा उसकी पूरी डिग्री भी देते हैं तब आप एक आथराइज्ड हिप्नोटिस्ट हो जाते हैं। और बहुत सुंदर तरीके से आप काम कर सकते हैं। जो डॅाक्टर्स नहीं भी हैं और फिर भी यह सीखना चाहते हैं तो उनको भी टेªनिंग लेनी चाहिए। इट इज वर्थ, हम अपनी जिंदगी में भी बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकेंगे और अपने आस-पास बहुत सारे मित्रों का हेल्प कर सकेंगे।

– स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

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