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“सम्मोहन द्वारा सेल्फ हीलिंग से स्वस्थ्य कैसे हो?” – स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

वैसे तो हिप्नोसिस के बारे में बहुत सुना है, यही पहली बार मैं सुन रहा हूं कि सेल्फ हीलिंग हो सकती है। मैं सेल्फ हीलिंग सीखना चाहता हूं। दूसरी बात कि जिसको हार्टअटैक आया हो, जो बी.पी. वाले हैं, जो डायबिटीज वाले हैं उसके बारे में तीन दिन के अंदर हो सके तो ज्यादा भार देकर बोलो ताकि हमारे जैसे बहुत से सीनियर सिटीजन हैं जिनको कि फायदा होगा।

जो इन्होंने कही वह है सेल्फ हीलिंग के बारे में। निश्चित रूप से इसके ऊपर एक पूरा सेशन होगा डेढ़ घण्टे का सेल्फ हीलिंग के बारे में। कौन-कौन सी तकलीफें हैं, जिनको सेल्फ हीलिंग से ठीक किया जा सकता है? वे हैं साइकोसोमेटिक प्राब्लम्स। दो प्रकार की बीमारियां हैं- एक हैं जो बाहर से आईं भीतर तक उन्होंने अपना प्रभाव दिखाया और दूसरी हैं जो भीतर से, मन से उत्पन्न हुईं और बाहर शरीर को उन्होंने प्रभावित किया। जो बाहर से भीतर आईं उसके संबंध में दस-बीस प्रतिशत मदद हो सकती है, इससे ज्यादा नहीं हो सकती। लेकिन जो भीतर से बाहर की तरु जा रही हैं उनमें सौ प्रतिशत असर हो सकता है। जिनको हम साइको सोमेटिक प्राब्लम्स कहते हैं। अब समझो सिरदर्द की बीमारी है, बहुत सी स्किन बीमारियां हैं, ज्वाइंट्स प्राब्लम और पेनफुल कंडीशंड्स हैं, पेप्टिक अल्सर है, हाई ब्लडपे्रशर है, एक हद तक हृदय की बीमारियां भी उसी केटेगरी में आती हैं। कुछ बीमारियां हमारी आदतों पर आधारित हैं।

समझो एक आदमी भयभीत रहता है, डरा-डरा सा रहता है। इस डर की वजह से उसके पेट में एसिड सीक्रेशन ज्यादा होता है और इसको पेप्टिक अल्सर हो जाता है। कोई आदमी ज्यादा चिंतित रहता है, चिंता की वजह से वह ड्यूडोनल अल्सर का शिकार हो जाता है। परेशान रहने वाला आदमी जो शिथिल नहीं हो पाता धीरे-धीरे उसका ब्लडपे्रशर बढ़ने लगेगा। अगर वह रिलैक्स होना सीख जाए तो काफी मात्रा में डाउन हो जाएगा। अगर सौ प्रतिशत नहीं भी डाउन होता है, समझो जितनी दवाइयों की जरूरत उसको पड़ती थी नार्मली, उससे आधी या चैथाई में ठीक हो जाएगा। जो बार्डर लाइन पर हैं ब्लडपे्रशर के वे हो सकता है बिल्कुल लाइन पर पहुंच जाएं। तो कुछ चीजें भीतर से बाहर को आ रही थीं। अगर मन प्रभावित हो जाए हमारा तो शरीर तक पर उसका असर आ जाएगा। अब ये जो पेप्टिक अल्सर का बीमार व्यक्ति है हम इसको कितनी ही अल्सर की दवाइयां दें लेकिन यह पूरी तरह से ठीक कभी नहीं होता। महीने-दो महीने, चार महीने के लिए ठीक हो जाता है फिर अल्सर नया बन जाता है। क्योंकि उसका मन तो वही का वही है बेचारे का, हमने उसके लिए तो कुछ किया नहीं, हमने एसिड सीक्रेशन रोकने वाली दवाइयां दे दीं तो टेम्प्रेरी रिलीव हो गया, अल्सर ही लो हो गया, लेकिन उसकी मेंटल टेंडेंसी वही की वही हैं जो कि फिर एक नया अल्सर जल्दी ही पैदा कर लेंगे। सेल्फ हीलिंग के द्वारा अगर उसका मन शांत और शिथिल हो जाता है तब नया अल्सर पैदा नहीं होगा। पुराने को हम दवाई से ठीक कर लें, नया प्रिवेंट हो जाएगा सेल्फ हीलिंग के द्वारा। बहुत से स्किन प्राब्लम्स ऐसे हैं, याद रखना, सब नहीं कह रहा हूं। बहुत से प्राब्लम इनफेक्शन की वजह से हैं। समझो बैक्टीरिया, फंगल इनफेक्शन है तो वह तो ठीक नहीं होगा सेल्फ हीलिंग से। किन्तु बहुत सी तकलीफें जो कि आटोंइम्युन सिस्टम का हिस्सा हैं वे ठीक हो सकती हैं, वे सिर्फ मन से ही आई हैं। मन कहीं इरीटेड होता है और देह में उसका असर स्किन में पड़ जाता है तुरंत। यह ठीक हो सकता है।

कुछ बीमारियां अतीत में जो ज्यादा थीं वे फिजिकल ज्यादा थीं। समझो विटामिन डिफिसिएंसी आज से पचास साल पहले, इनफेक्शन की बीमारियां बहुत ज्यादा थीं, मिनरल की डिफिसिएंसी। जैसे-जैसे साइंस डेवलप हुई है मेडिकल साइंस का प्रचार-प्रसार हुआ है, लोगों को पता हो गया है कि क्या खाना चाहिए क्या नहीं खाना चाहिए काफी हद तक, कम से कम अमीर देशों से तो बहुत सी बीमारियां खत्म ही हो गईं, जहां हाइजेनिक कंडीशन पैदा हो गई रहने की अच्छी अब वहां वे इनफेक्शन नहीं होते जो आए दिन हुआ करते थे। हमारे गरीब देश में भी पिछले पचास सालों में बीमारियों का पिक्चर एकदम बदला है।

अब आपको शायद ही कभी सुनने में आए कि किसी को बेरीबेरी की बीमारी है बीटामिन वन की कमी से, कि किसी को स्कर्वी की बीमारी हो गई है बिटामिन सी की कमी से, शायद ही सुनने में आए कि कैल्शियम की कमी से किसी को रिकेट्स हो गया है। कितनी बड़ी-बड़ी महामारियां जिसमें बड़े-बड़े गांव के गांव मर जाते थे दो-चार दिन में। चेचक, हैजा और प्लेग और डिप्थीरिया ये बस गायब ही हो गए करीब-करीब। और जल्दी ही वैक्सीनेशन के द्वारा और भी बीमारियां खत्म हो जाएंगी। लेकिन आदमी का मन रुग्ण है और वह नई-नई तकलीफें पैदा कर रहा है। तो फिजिकली अभी हम बहुत ही हेल्दी सिचुएशन में हैं पुराने दिनों की तुलना में, किन्तु मेंटली हम जितने स्टेªस और स्टेªस से गुजर रहे हैं और जितने तनाव, आकांक्षाओं से पीडि़त हैं उसकी वजह से नए-नए प्रकार के रोग उत्पन्न हो गए। इनका इलाज मेडिकल साइंस नहीं कर पाएगी क्योंकि इनकी जड़ शरीर में ही नहीं है इसलिए फिजिकल और केमिकल चीजें इस पर असर नहीं कर सकतीं। वे मन से उत्पन्न हो रही हैं तो मन को ही बदलना होगा।

अब समझो कोई आदमी इनसोमिनया से पीडि़त है। इसमें केमिकल ड्रग्स क्या करेंगे? छुटपुट हेल्प कर सकते हैं, उसकी बेसिक बीमारी को दूर नहीं कर सकते। तो आज विकसित देशों में, विकसित समाज में, संपन्न समाज में सत्तर-अस्सी प्रतिशत बीमारियों साइकोसोमेटिक इलनेस में आती हैं। अब इन्हीं बीमारियों को ले लें- डायबिटीज, हाई ब्लडपे्रशर, हृदय की बीमारी का इन्होंने जिक्र किया तो कुछ हिस्सा इसका फिजिकल है, जेनेटिक है तो वह तो होगा, उससे नहीं बचा जा सकता। लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा, बड़ा इम्पैक्ट साइकोलॅाजिकल है। याद रखना, हमारा होना साइकोसोमेटिक है, मनोशारीरिक। हम न तो केवल देह हैं और न ही केवल मन हैं, हम दोनों का मिश्रण हैं। और जो कुछ भी हो रहा है वह मिश्रित हो रहा है। तो जब मैं कह रहा हूं कि कुछ बीमारियां मिश्रित हैं तो उसका एक हिस्सा शरीर से संबंधित है, वह जेनेटिक स्ट्रक्चर से आ रहा है और एक बड़ा हिस्सा साइकोलॅाजिकल है। उस साइकोलॅाजिकल हिस्से को हम सेल्फ हीलिंग के द्वारा ठीक कर सकते हैं। ठीक है वह अभी भी छोटा-मोटा हिस्सा रह जाएगा पीछे जेनेटिक वाला, उसको तो हम नहीं मिटा सकते, वह तो जीन्स में, क्रोमोसोम्स मेें ही मौजूद है। लेकिन फिर भी काफी कुछ प्रभाव सायकोलॅाजिकल कम किए जा सकते हैं।

अब समझो मुझको डायबिटीज थी। सन् 1994 में मेरा वजन 94 केजी था। लोग कहते हैं न कि समय के साथ बढ़ो। तो मैं 1992 में 92 केजी का था, 1993 में 93 का हो गया, 1994 में 94 का हो गया। समय के साथ चलता गया। फिर मेरे पैर और जाघें इतनी मोटी हो गईं कि आपस में टकराने लगीं और चलते ही नहीं बनता था। तब मैंने सोचा कि अब समय के साथ नहीं चला जा सकता, तब मैंने रिवर्स गियर लिया। मैंने एक महीने में दस किलो वजन कम किया, 84 पर आया, मेरी डायबिटीज, ब्लडप्रेशर वगैरह कई सालों के लिए पोस्टपोन हो गए। फिर जाकर धीरे-धीरे डेवलप हुए। याद रखना, डायबिटीज मेरी जेनेटिक है। माता-पिता, उनके माता-पिता दो-तीन पीढि़यों से चली आ रही है यह बीमारी। और भी पहले से रही होगी, पहले तो पता ही नहीं चलता था। तो जेनेटिक स्ट्रक्चर में तो वह है लेकिन एक बड़ा हिस्सा जो कि ओबीसीटी से संबंधित है, ओवर वेट से संबंधित है वह तो सायकोलॅाजिकल है। हमारा खाना-पीना तो हमारे मन से तय हो रहा है न। 1994 में 84 केजी पर आया, करीब दस साल तक कोई प्राब्लम नहीं हुई। फिर 2004 में फिर मुझे इंसुलिन की इंजेक्शन की जरूरत पड़नी शुरू हुई, फिर मैंने पांच किलो वजन और कम किया और छः महीने के बाद इंसुलिन छूट गई और फिर से गोली का डोज भी बहुत कम हो गया, अब मैं बहुत स्वस्थ रह रहा हूं। तो मन का भी एक रोल है और शरीर का भी एक हिस्सा है। अब यह जेनेटिक डायबिटीज तो खत्म नहीं होगी, वह टेंडेंसी रहेगी लेकिन इसको बहुत मिनिमाइज किया जा सकता है। ठीक वही बात अन्य बहुत सारी बीमारियों पर लागू होती है। हम करीब 70-80 परसेंट अपना मैनेज कर सकते हैं। तो सेल्फ हीलिंग पर एक पूरा सेशन होगा, आप भी वह कला सीख सकेंगे और अपनी बहुत सी बीमारियों को प्लस अपने घर-परिवार के अन्य परिचितों की बीमारियों को भी ठीक करने के लिए सुझाव दे सकेंगे।

– स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

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