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“परिवारजनों, रिश्तेदारों और मित्रों से कलह हो जाती है, झगड़ा हो जाता है; क्या करें?” – स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

प्रश्न -परिवारजनों, मित्रों और रिश्तेदारों से मेरा अक्सर झगड़ा हो जाता है, किन्तु अजनबी लोगों के बीच में मैं अच्छा व्यवहार करता हूँ और सभी लोग मुझे एक अच्छा आदमी समझते हैं?
महत्वपूर्ण सवाल है। एक व्यक्ति का नहीं, मैं समझता हूँ अधिकांश लोगों पर लागू होता है। जहाँ प्रेम का जूता पहनना चाहिए था, वहाँ आप क्रोध का जूता पहन लेते हैं। परिवारजनों, रिश्तेदारों और मित्रों से कलह हो जाती है, झगड़ा हो जाता है। नए लोग, अजनबी लोग इन्हें बहुत अच्छा आदमी समझते हैं। उनके साथ सदा बड़ा अच्छा सदव्यवहार करते हैं। कारण आप अपने भीतर जरा टटोलो। क्या आप भी ऐसे ही करते हो? जरूर करते हो। मात्रा थोड़ी बहुत कम या ज्यादा होगी। आप भी यही करते हो। इसका गहरा कारण खोजो कहाँ है? इसका गहरा कारण है, जिन्हें हम अपना कहते हैं। उनके साथ हमारी अपेक्षाएँ, जुड़ी हैं। पति उम्मीद करता है कि पत्नी को ऐसा-ऐसा करना चाहिए। बाप अपेक्षा कर रहा है कि बेटे को कैसा होना चाहिए। बेटा अपेक्षा कर रहा है कि बाप को कैसा होना चाहिए।
मैंने सुना है एक आठ साल का बच्चा स्कूल से लौटते हुए एक किताब की दुकान पर रुका। वहाँ उसने एक किताब खरीदी। किताब का शीर्षक था बच्चों का ठीक से लालन-पालन कैसे किया जाए। दुकानदार ने कहा कि बेटा यह किताब तुम्हारे काम की नहीं है। तुम इसका क्या करोगे? यह तो बड़ों के काम की है। उसने कहा कि मैं पढ़ कर देखना चाहता हूँ कि मेरा ठीक से लालन-पालन हो रहा है कि नहीं। बेटे की अपेक्षाएँ हैं बाप से। बाप कैसा होना चाहिए। भाई की अपेक्षा है भाई से। जहाँ अपेक्षा है, वहाँ कलह है, वहाँ झगड़ा है। वहाँ क्रोध आएगा। क्यों? दूसरे लोग आपकी अपेक्षाएँ पूरी करने के लिए पैदा नहीं हुए। उनकी अपनी जिन्दगी की अपनी इच्छाएँ हैं, अपनी आकांक्षाएँ हैं। उनकी अपनी जिन्दगी है। उनकी अपनी स्वतन्त्राता है। वे आपकी मर्ज़ी के गुलाम होकर नहीं जीएंगे। कोई बेटा अपने बाप की इच्छा पूरी करने नहीं आया है इस दुनिया में, उसका अपना जीवन है। उसकी अपनी पिछले जन्मों की कहानी है। उसकी अपनी कामनाएँ और वासनाएँ हैं। लेकिन बाप सोच रहा है कि मेरे अनुसार चले। पति सोच रहा है कि पत्नी मेरे अनुसार चले। पत्नी सोच रही है पति मेरे अनुसार चले।
अभी कल परसां किसी ने मुझे एक SMS भेजा कि ओसामा बिन लादेन और वफादार पति में क्या समानता है। उसका उत्तर है कि दोनों एक दूसरे से नहीं मिलते। हर पत्नी को उम्मीद है कि उसका पति वफादार हो। करते रहो उम्मीद। फिर दुःखी होओगे। फिर लड़ाई-झगड़ा होगा, फिर कलह होगी। न ओसामा बिन लादेन मिलता न वफादार पति मिलता। एक और SMS उसी व्यक्ति ने भेजा है कि डायनासोर और शरीफ लड़की में क्या समानता है? आधुनिक युग में दोनों ही खो गए हैं। खोजते रहो। मैं देखता हूँ लोगों को कई लोग कहते हैं कि लड़के के लिए तीन साल हो गए बहू खोजते-खोजते कोई ढंग की लड़की ही नहीं मिलती। लड़के की उम्र बढ़ती जा रही है। शादी की उम्र बीतने के करीब आ गई। नहीं मिल रही। ठीक कह रहे हैं जो SMS आया है कि न डायनासोर मिलते अब, न शरीफ लड़की मिलती।
हमारी एक्सपैकटेशन जिनसे हमारी पहचान है। जिनके हम निकट हैं। उनके प्रति हमारी अपेक्षाएँ बहुत ज्यादा हैं। अजनबी के साथ हमारी कोई अपेक्षा नहीं है। आप रेल में यात्रा कर रहे हैं। बगल में एक आदमी बैठा है। आपने उससे नाम पता पूछा, कहाँ जा रहे हो, क्या है? साथ-साथ आपने चाय पी। उसने अपना टिफिन खोला और कहा कि आइये साथ में नाश्ता करते हैं। खाली समय था ताश खेल लिया उसके साथ। अब इस आदमी के साथ आपका कोई एक्सपैकटेशन नहीं है। अगर उसने चाय-नाश्ते में आपको इन्वाइट किया है तो आपके मन में धन्यवाद का भाव भी आएगा। लेकिन आपकी पत्नी पिछले सात सालों से आपको भोजन करा रही है। आपकी माँ पिछले चालीस सालों से भोजन करा रही है। उनके प्रति धन्यवाद नहीं आता। उसमें हम नुक्स निकालेंगे कि तूने दाल में नमक ज्यादा डाल दिया, कि चाय में शक्कर कम क्यों है, कि ठण्डी चाय दी है आज। उस अजनबी आदमी से आपको कोई उम्मीद ही नहीं थी। चलो ठण्डी चाय मिली तो ठीक। चाय तो मिली। ज्यादा नमक की दाल ही सही। उससे कोई उम्मीद ही नहीं थी। समथिंग इज बैटर दैन नथिंग। इस आदमी ने प्रेमपूर्वक आमंत्रण दिया कि आओ बैठ कर ताश खेलते हैं। क्या इतना ही बहुत है? हम उसी के लिए धन्यवाद से भर गए। तो याद रखना आप जो कह रहे हैं कि अजनबियों के बीच मैं अच्छा व्यवहार करता हूँ। कारण! वहाँ कोई अपेक्षा, एक्सपैक्टेशन, कोई उम्मीद आपकी नहीं होती। अब आप सूत्रा को समझ सकते हैं। अपने लोगों के बीच, परिवार के बीच, रिश्तेदारों के बीच अगर आप चाहते हैं सुखी होने की कला तो आपको क्या करना होगा? ड्रॉप यूअर एक्सपैक्टेशन। अपेक्षा न करें। जिसने आपके लिए जो किया है उसके लिए धन्यवाद भाव से भरें, अहोभाव से भरें। अगर वह व्यक्ति इतना भी न करता तो आप क्या करते? आपके पिता ने आपके लिए क्या कुछ नहीं किया? ठीक है; कभी-कभी उन्हांने कोई ऐसे काम भी किए, जो आपको पसन्द नहीं थे। आपके भाई ने आपके लिए क्या-क्या नहीं किया? ठीक है दो चार बातें ऐसी भी हुइंर् जो आपको अच्छी नहीं लगीं। छोड़ो दो चार बातों को हजारों बातें ऐसी हैं जो आपके जीवन के लिए सहयोगी थीं।
लोग आते हैं मेरे पास शिविर में। मैं पूछता हूँ तुम्हारी जिन्दगी की सबसे दुःखद घटना क्या है? याद करो और बताओ। अक्सर लोग बताते है कि मैं पाँच साल का था और पिताजी ने एक चांटा मार दिया था। उसको मैं भूल नहीं पाता। अब ये सज्जन जो कह रहे हैं कि उनको चांटा मारा था, अब उनकी खुद की उम्र पचास साल है, साठ साल है। मैं उनसे पूछता हूँ कि पिताजी आपके हैं अभी? वे कहते हैं कि नहीं पिता जी तो मेरे स्वर्गवासी हो गए। न वे सज्जन बचे। पचास साल पुरानी बात, पैंत्तालीस साल पुरानी बात ये कह रहे हैं कि पिता जी ने चांटा मारा था। उनके प्रति क्रोध की भावना आज भी मेरे मन में है और बड़ा दुःख है इस बात का कि मुझे चांटा मारा था। मैं पूछता हूँ कि चलो अच्छा आपके बच्चे कितने हैं? एक लड़की है। क्या आपको उनको कभी चांटा मारना नहीं पड़ता? उनको सुधारने के लिए मारना ही पड़ता है। आप अपने लिए अलग तर्क बता रहे हो। अपने पिताजी के लिए अलग। आपको अपने बच्चे को सुधारने के लिए मारना पड़ता है। आपके पिता जी पागल थे, जो आपको मारा था। उन्होंने भी किसी कारण से ही मारा होगा। आपके पिताजी ने आपके लिए क्या-क्या किया है? जरा वह तो याद करो। आपको जन्म दिया। आपको पाला-पोसा। कितनी बीमारियों में आपका इलाज करवाया। कभी रात भर आपके पास बैठ कर जागे होंगे बुखार में। स्कूल पढ़ने लिखने भेजा। आपके लिए नौकरी की। आपके लिए मकान बनाकर आपके लिए छोड़ गए। आपके नाम वसीयत लिख कर छोड़ गए। कितना कुछ किया आपके लिए। वह कुछ याद नहीं है। एक चीज याद है वह चांटा क्यों मारा? अपनों के साथ हमारी अपेक्षाएँ बहुत ज्यादा हैं। इसलिए वहाँ पर तनाव है, दुःख है, कलह है, क्रोध है। अजनबियों के साथ हमारी कोई अपेक्षा नहीं है। तो फार्मूला समझ लो। जहाँ दुःख है, वहाँ अपेक्षा है। इसलिए अपनां के साथ भी अपेक्षा रखना छोड़ दो। एक जिन्दगी का सफर। ये पृथ्वी एक बड़ी ट्रेन है। यहाँ हम सभी तो अजनबी हैं। थोड़ी देर के लिए मिले हैं। प्रेम से, भाईचारे से, बिना अपेक्षा से हम समय को कांटें। जीवन के इस सफर को तो जीवन में आनन्द हो जाए।

– स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

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