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“सम्मोहन व ध्यान का अनूठा संगम !” – स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

प्रश्न- मैं डॅाक्टर एच एस गुप्ता हूं। मैंने हिप्नोसिस के बारे में पढ़ा है और रुचि भी है। ये जो कांसस माइण्ड, अनकांसस माइण्ड और सुपर कांससनेस हैं, इनके अनुभव करना है। वल्र्ड में जो साइकोसोमेटिक डिसीज़ फैल ...

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“कामवासना ओर प्रेम !” – ओशो

"कामवासना ओर प्रेम" कामवासना अंश है प्रेम का, अधिक बड़ी संपूर्णता का। प्रेम उसे सौंदर्य देता है। अन्‍यथा तो यह सबसे अधिक असुंदर क्रियाओं में से एक है। इसलिए लोग अंधकार में कामवासना की और बढ़ते है। ...

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“मैं गुरु किसी का भी नहीं हूं, मेरा कोई शिष्य नहीं है !” – ओशो !

भगवान श्री, आपने कहा है कि बाहर से व्यक्तित्व व चेहरे आरोपित कर लेने में सूक्ष्म चोरी है तथा इससे पाखंड और अधर्म का जन्म होता है। लेकिन देखा जा रहा है कि आजकल आपके आस-पास अनेक नये-नये ...

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“गांधी, महावीर या किसी और का खंडन क्यों?” – ओशो

प्रश्नः मेरे सामने एक दूसरा सवाल आया। कई विचारक लोग भी थे, कई लोग भी थे--आपकी जो प्रवृत्ति है, उनके प्रति थोड़ा सदभाव भी था--इनके पास धारणाएं हैं कि इंसान दो ढंग से काम करता है, सब्जेक्टिव और आब्जेक्टिव। तो ...

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“अहंकार को पूरी तरह मिटाने का सबसे तेज ढंग क्या है?” – ओशो !

Q.  अपने अहंकार को पूरी तरह और सदा के लिए मिटाने का सबसे तेज और सबसे खतरनाक ढंग क्या है? अहंकार को मिटाने का कोई ढंग ही नहीं है--न धीमा, न तेज; न सरल, न कठिन; न आसान, न खतरनाक। अहंकार ...

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“बुद्ध ने चालीस वर्षों तक लोगों को क्या सिखाया?” – ओशो

भगवान बुद्ध ने ज्ञानोपलब्धि के तुरंत बाद कहा : स्वयं ही जानकर किसको गुरु कहूं और किसको सिखाऊं, किसको शिष्य बनाऊं? और फिर उन्होंने चालीस वर्षों तक लाखों लोगों को दीक्षित भी किया और सिखाया भी। लेकिन महापरिनिर्वाण ...

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“अप्प दीपो भव !” – ओशो

गौतम बुद्ध ऐसे हैं जैसे हिमाच्छादित हिमालय। पर्वत तो और भी हैं, हिमाच्छादित पर्वत और भी हैं, पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध जैसे। पूरी मनुष्य-जाति के ...

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“ध्यान और विचार !” – ओशो

ध्यान चेतना की विशुद्ध अवस्था है- जहां कोई विचार नहीं होते, कोई विषय नहीं होता। साधारणतया हमारी चेतना विचारों से, विषयों से,कामनाओं से आच्छादित रहती है। जैसे कि कोई दर्पण धूल से ढका हो। हमारा मन एक सतत प्रवाह है- ...

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“अंतर्यात्रा प्रारंभ कैसे की जाए?” – ओशो

यात्रा का प्रारंभ तो पहले ही से हो चुका है, तुम्हें वह शुरू नहीं करना है। प्रत्येक व्यक्ति पहले से यात्रा में ही है। हमने अपने आपको यात्रा पथ के मध्य में ही पाया है। इसकी न तो कोई शुरुआत ...

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“ध्यान के लिए समय कहां !” – ओशो

मेरे पास लोग आते हैं। कहते हैं : मन अशांत है, शांति चाहिए। अगर मैं उन्हें कहूं ध्यान करो, वे कहते हैं : समय कहां! अशांत होने को समय है, अशांत होने में चौबीस घंटे लगाते हैं-शांत होने ...

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