अपने अंदर संकल्प को कैसे विकसित करें? संकल्पवान व्यक्ति बनने के लिए क्या करना चाहिए?
Question
प्रश्न – एक संकल्पवान व्यक्ति बनने के लिए मुझे किन-किन सोपानों पर कदम रखने होंगे?
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प्रश्न – एक संकल्पवान व्यक्ति बनने के लिए मुझे किन-किन सोपानों पर कदम रखने होंगे?
Answer ( 1 )
सात सोपानों की चर्चा मैं आपसे संक्षेप में करना चाहूँगा। पहला सोपान हैं भाव और विचार का सन्तुलन– एक समझ हमारे भीतर हो। निश्चित रूप से जब हम कोई यात्रा शुरू करेंगे, जो समझ हमारी होगी वह प्राथमिक समझ भी हो सकती है। एक आरंभिक समझ बहुत परिपक्व समझ तो वह नहीं होगी। परिपक्व समझ तो अनुभव के बाद ही आएगी। लेकिन शुरूआत में भी थोड़ी सी समझ चाहिए। उस समझ में सम्यक विचार हों और सम्यक भाव का सन्तुलन हो। यदि किसी व्यक्ति ने केवल भावावेग में आकर कोई निर्णय लिया वह भी गलत हो जाएगा। और यदि किसी व्यक्ति ने केवल विचारों से प्रेरित होकर निर्णय लिया वह भी गलत हो जाएगा। बिना सोचे-विचारे निर्णय लिया तो भी गलत और अति सोच विचार किया, तो निर्णय ही नहीं हो पाएगा। इसलिए अक्सर ऐसा होता हैं कि बहुत विचारवान आदमी, बहुत बुद्धिमान आदमी संकल्पहीन हो जाता हैं। तो दो अतियाँ हुईं, एक हुई बिना विचारे निर्णय करना और दूसरी- अति विचार करना, उसमें निर्णय ही नहीं हो पाता। कीर्क गार्ड के बारे में आपने सुना होगा डेनमार्क का प्रसिद्ध दार्शनिक और विचारक हुआ। हमेशा संशय में डोलता रहता था यह करूँ कि वह करूँ। उसकी प्रसिद्ध किताब का शीर्षक हैं ‘आइदर और’ यह या वह। यही उसके पूरे जीवन की पद्धति थी, वही उसके जीवन की शैली थी; यह करूँ कि वह करूँ। कार ड्राइव करता चौराहे पर जाकर खड़ा हो जाता। बैठकर अपना सिर खुजा रहे हैं बाएँ सड़क पर जाएँ कि दाहिने जाएँ या सीधे निकल जाएँ या जरूरत ही क्या हैं, लौट ही क्यों न जायें। पीछे ट्रैफिक जाम हो गया उसकी परवाह ही नहीं। वे कह रहे हैं रूको, अभी थोड़ा सोचने तो दो, इतनी जल्दी कहीं तय होता हैं। धीरे-धीरे ट्रैफिक पुलिस वाले उसकी कार को पहचानने लगे। जहाँ उन्होंने देखा कि कीर्क गार्ड की गाड़ी आ रही हैं, पुलिस वाला आकर उसे धक्का मारकर उसे कहीं भी भेज देता। तुम यहाँ से तो टलो, जहाँ तुम्हें जाना हैं जाओ। वह कहता भई रूको, मुझे विचार तो करने दो। तुम बाद में विचार कर लेना यहाँ ट्रैफिक जाम मत करो। कीर्क गार्ड जिंदगी में कभी कुछ निर्णय नहीं कर पाता था, बहुत ज्यादा सोच-विचार करता था। एक महिला ने प्रेम प्रस्ताव रखा। र्सोरेन कीर्क गार्ड ने कहा कि जरूर तुम्हारे प्रेम प्रस्ताव के सम्बंध में विचार करूँगा। अब कोई प्रेमी ऐसे उत्तर नहीं देते; प्रेमी या तो हाँ कहते हैं या न कहते। र्सोरेन कीर्क गार्ड ने कहा कि विचारूँगा। देखूँगा इसके पक्ष-विपक्ष में क्या तर्क हैं; प्रेम करना चाहिये या नहीं करना चाहिये, शादी करने योग्य है कि नहीं करने योग्य है। वह महिला बहुत प्रसन्न हुई कि देश के इतने प्रसिद्ध दार्शनिक से उसका विवाह होने वाला है। तीन-चार दिन बाद उसने पूछा कि र्सोरेन कीर्क गार्ड तुमने क्या निर्णय लिया। कीर्क गार्ड ने कहा कि इतनी जल्दी कैसे निर्णय होगा। मेरे बगल में लायब्रेरी है घर के, उसको ज्वाइन कर लिया है। प्रेम के ऊपर, विवाह के ऊपर जो भी किताबें हैं उन सबको मैं पढ़ रहा हूँ, नोट्स बना रहा हूँ, पक्ष-विपक्ष में दलीलें इकट्ठी कर रहा हूँ। अभी तक बराबर के तर्क दोनों तरफ मिले हैं, अभी तय नहीं हो पाया। एक दस-पन्द्रह दिन बाद उस लड़की ने फिर पूछा कि तय हुआ। कीर्कगार्ड ने कहा यह जिंदगी भर का सवाल है, विवाह इतनी जल्दी तय नहीं होने वाला। मैं बहुत मेहनत कर रहा हूँ। तुमको जान कर आश्चर्य होगा कि सुबह से लेकर शाम तक लगा रहता हूँ, रात देर तक उसी काम में लगा हुआ हूँ। महीना भर बाद उस लड़की ने फिर पूछा। फिर कीर्कगार्ड ने कहा कि डार्लिंग, तुमको जान कर बड़ी प्रसन्नता होगी कि गद्य साहित्य पूरा समाप्त हो गया। अब थोड़ा पद्य साहित्य देखना है कि कवियों ने क्या कहा है प्रेम के सम्बंध में, विवाह के संबंध में। उस लड़की ने सोचा कि चलो थोड़े दिन और लगेंगे। एक-आध महीने बाद फिर उसने पूछा। कीर्कगार्ड ने कहा कि तुम्हें जानकर प्रसन्नता होगी, घर के पास जो एक छोटी सी लायब्रेरी थी, उसकी सारा साहित्य समाप्त हो गया है और कल से मैंने यूनीवर्सिटी की बड़ी लायब्रेरी ज्वाइन कर ली है। उस लड़की ने फिर तो आशा छोड़ दी कि जब तीन महीने में छोटी लायब्रेरी समाप्त हुई है तो बड़ी लायब्रेरी समाप्त होगी शायद उससे पहले हमारी जिंदगी समाप्त हो जाए, जवानी समाप्त हो जाए।
कीर्कगार्ड अपने काम में लगा रहा। वह धीरे-धीरे यह भी भूल गया कि उद्देश्य क्या था। वह तो अपने नोट्स बनाने में लगा हुआ था। पर्चे पर पर्चे दलीलें इकट्ठी कर रहा था। चार, छह महीने के बाद एक पत्र उस लड़की को डाल देता। अभी तक इतना-इतना हो चुका हैं। लेकिन तर्क बराबर मिले दोनों तरु। बहुत तार्किक व्यक्ति अगर खोजेगा तो उसे हमेशा ही दोनों तरफ के तर्क दिखाई देंगे। एक दिन उस बड़ी लायब्रेरी के चपरासी ने पूछा कि आप कौन सा रिसर्च वर्क कर रहे हैं। कुछ समय तक आप डैनिस साहित्य देखते रहे, फिर आप जर्मन साहित्य देखने लगे, अब आप रशियन साहित्य देख रहे हैं, फिर अंग्रेजी साहित्य देख रहे हैं। यह कौन सा काम आप कर रहे हैं। बड़े-बड़े पी. एच. डी, डी लिट् करने वाले हमने देखे हैं। तीन साल में, चार साल में उनका काम भी पूरा हो जाता हैं। आप कौन सा प्रोजेक्ट लिये हुए हैं जो खत्म ही नहीं होता। कीर्कगार्ड ने बताया कि मेरी बड़ी मुसीबत हो गयी, एक लड़की ने प्रेम प्रस्ताव रख दिया है। वह चपरासी भी खूब हँसा, उसने कहा कि एक तर्क मैं अपको ऐसा बताता हूँ कि विपक्ष में कोई आर्गुमेन्ट नहीं होगा। कीर्कगार्ड ने कहा जल्दी बताओ उसी की तो मैं तलाश में था। उसने कहा कि एक तर्क ऐसा है- वह है अनुभव का। कुछ चीजें ऐसी हैं कि अनुभव करके ही जानी जा सकती हैं कि करने योग्य है कि नहीं; सच पूछो तो ‘है कि नहीं’ की बजाय करने योग्य ‘थीं कि नहीं थीं’ बाद में पता चलता हैं अनुभव के बाद। पहले एडवांस में पता नहीं चल सकता।
निश्चित रूप से अनुभव के विपक्ष में कोई तर्क नहीं हो सकता था। तो शादी के पक्ष में एक तर्क ज्यादा हो गया। र्सोरेन कीर्क गार्ड भागा उस लड़की के घर पहुँचा, दरवाजा खटखटाया। एक बूढ़े आदमी ने दरवाजा खोला कीर्कगार्ड ने कहा कि आपको जानकर खुशी होगी कि आपकी बेटी का विवाह प्रस्ताव मैंने स्वीकार कर लिया है, आपको बधाई हो। बूढ़े आदमी ने अपना माथा ठोंक लिया कि कीर्कगार्ड तुमने बहुत देर कर दी, मेरी बेटी की शादी हुए तो बीस साल हो गए। उस बेचारी ने तुम्हारा बहुत समय तक इंतजार किया। लेकिन कब तक इंतजार करती?
याद रखना जिंदगी इंतजार नहीं करती। प्रति पल हमारे हाथ से जीवन चुकता चला जा रहा हैं। निर्णय तो करना ही होगा। यहाँ तक कि अनिर्णय की अवस्था भी एक प्रकार का निर्णय है। जो व्यक्ति संशय में डोल रहा हैं। बजाए यह कहने के कि मैंने अभी तय नहीं किया उसे यह कहना चाहिए कि मैंने अनिर्णय में रहने का तय किया है। क्योंकि अंततः तो अनिर्णय भी एक निर्णय बन गया जाने अनजाने-’इनडिसीजन इज ऑलसो ए डिसीजन’। अनिर्णय की स्थिति में डोलना भी एक निर्णय है। इसका मतलब हुआ कि निर्णय से हम बच ही नहीं सकते। चाहे हम पक्ष में निर्णय लें, चाहे हम विपक्ष में निर्णय लें अथवा हम अनिर्णय का निर्णय लें। वह भी एक प्रकार का निर्णय हैं। जब निर्णय करना ही है, निर्णय से बचा नहीं जा सकता तो फिर क्यों न हम निर्णय ही करें पक्ष या विपक्ष में। कम से कम अनुभव से कुछ समझ तो आएगी। अनिर्णय में डूबा हुआ आदमी तो कभी भी कुछ न समझ सकेगा, अनुभव को प्राप्त न कर सकेगा। इससे तो अच्छा गलत ही निर्णय हो जाता। कम से कम निर्णय के बाद पता तो चलता कि हमसे गलती हो गयी। फिर हम सही की तरफ कदम उठा सकते थे। अनिर्णय वाला व्यक्ति अनुभव से वंचित रह जाता है।
तो सबसे पहली बात मैं कहना चाहता हूँ- सम्यक समझ, सम्यक सोच विचार, सम्यक भाव। टटोल लेना अपने भीतर जो निर्णय तुम करने जा रहे हो इसके पीछे तुम्हारे हृदय का भाव भी है कि नहीं। कहीं दूसरों के कहने में आकर तुम कोई निर्णय तो नहीं करने जा रहे हो। तुम्हारा भाव हो, तुम्हारी समझ साथ दे रही हो, एक बार विचार कर लेना, दो बार विचार कर लेना, इतना बहुत है। फिर उस दिशा में आगे बढ़ना।
दूसरा सोपान है साहस- अतीत से मुक्ति का साहस और नई सम्भावनाओं को खोजने का साहस। अक्सर हम नए से डरते हैं। नया कुछ होने लगे हमारे प्राण काँप जाते हैं। पुराने की हमारी बहुत गहरी पकड़ है, पुराने को हम छोड़ना नहीं चाहते। हमारा मन बड़ा रूढ़ीवादी, परम्परावादी है। जो होता चला आया है हम उसी को करते चले जाना चाहते हैं। कोई भी नई चीज हमको बड़ी खतरनाक लगती है। जो व्यक्ति खतरों से खेलने को राजी नहीं है, जो थोड़ा सा जोखिम उठाने को तैयार नहीं है, रिस्क लेने को राजी नहीं है, वह संकल्पवान नहीं हो सकता। तो अतीत से बहुत ज्यादा मोह न करना। जो बात हो चुकी सो हो चुकी। उसी-उसी को रिपीट करने से उसकी पुनरावृत्ति से क्या लाभ? एक ढंग का जीवन तुम जी तो चुके। उससे जो प्राप्त करना था वह तो प्राप्त हो चुका। चलो कुछ नया देखें, कुछ नया सोचें, कुछ नया हो। नये के साथ सम्भावना है- अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। इसलिए हमें डर लगता है। थोड़ा सा खतरा उठाने का, जोखिम उठाने का साहस चाहिए।
तो पहला कदम हुआ समझ, दूसरा कदम हुआ साहस, तीसरा कदम संकल्प लें, निर्णय करें। अब एक कमिटमेंट शुरू होना चाहिए। हर क्षण जीवन में हम एक चौराहे पर हैं और हमें तय करना होगा हम किस दिशा में जाएं। निश्चित रूप से जब हम तय करते हैं दक्षिण की तरफ जाएंगे तो बाकी की तीन दिशाओं में जाने से हम वंचित रह जाते हैं। सब दिशाओं में एक साथ नहीं जाया जा सकता इस बात को समझ लें। तीन दिशाओं का त्याग अपने आप हो जाता है, जब हम एक दिशा चुनते हैं। कोई व्यक्ति चारों दिशाओं के लोभ में पड़ गया हो, वह आत्महीन हो जाएगा। वह चार कदम इस तरफ चलेगा, चार कदम विपरीत दिशा में चलेगा। थोड़ा सा आगे, थोड़ा सा पीछे, वह कहीं भी नहीं पहुंच पाएगा। अंत में वह पाएगा उसकी मृत्यु के समय वह ठीक उसी चौराहे पर खड़ा है- जहाँ जन्म के समय मौजूद था। चलने की उसने कोशिश बहुत की पर पहुंचा कहीं भी नहीं। इस प्रकार के लोग मुझे मिल जाते हैं और कहते हैं- हम ध्यान कर रहे हैं 20 साल से, अभी तक हुआ नहीं, होश सधता नहीं। मैं उनसे पूछता हूँ- और विस्तार से बताइए आपकी जीवन शैली कैसी है? तब पता चलता है वह सज्जन रोज शाम को शराब भी पीते हैं, रोज सुबह ध्यान करते हैं। ध्यान यानि होश की साधना और शराब यानि बेहोशी की साधना- दो बातें एक-दूसरे के विपरीत हो गइंर्। यह तो ऐसा हुआ कोई कहे कि मैं दस कदम रोज सुबह पूरब की तरफ चलता हूँ और फिर शाम को दस कदम पश्चिम दिशा में चलता हूँ, मैं कहीं पहुँच क्यों नहीं पा रहा? सीधी सी बात कहीं भी पहुँचना नहीं हो सकता। यह तो ठीक ऐसे हुआ कोई आदमी कहे कि मैं मकान बना रहा हूँ। सुबह से ईंट जोड़ना शुरू करता हूँ, दीवार उठाने की कोशिश करता हूँ और दोपहर तक तीन-चार फुट ऊँची दीवार बन जाती हैं। और दोपहर के बाद मैं एक-एक ईंट गिराना शुरू कर देता हूँ और शाम तक सारी ईंटें गिरा देता हूँ। फिर धरातल साफ। दूसरे दिन फिर सुबह से मकान बनाना शुरू कर देता हूँ। 20 साल हो गये मकान बनाते-बनाते अभी तक बन नहीं रहा। यह 20 साल में नहीं, बीस जन्म में भी नहीं बनेगा, 20 हजार जन्मों में भी नहीं बनेगा क्योंकि तुम बना भी रहे हो और तोड़ भी रहे हो। जिन ईटों को तुमने जोड़ा, तुमने ही उनको तोड़ दिया। य भवन तो कभी भी निर्मित न हो सकेगा। कोई आदमी रोज ध्यान करता है और रोज शराब भी पीता है, कब इसकी यात्रा पूरी होगी? कभी भी नहीं। सिर्फ समय बर्बाद हो रहा है, जिंदगी बेकार जा रही है। यह सोच रहा है कि मैं भक्त हूँ और प्रेम की साधना कर रहा हूँ और प्रेम का उपाय करता है, कोशिश करता है ओर जिन लोगों से यह प्रेम करता है उन्हीं से घृणा भी करता है। उन्हीं पर क्रोधित भी होता है। उन्हीं से ईर्ष्या और वैमनस्य भी रखता है। इसके प्रेम का फल कब आयेगा? कभी भी नहीं आयेगा क्योंकि यह विपरीत काम एक साथ कर रहा है। यह प्रेम और क्रोध इकट्ठे साध रहा है। दो चार दिन प्रेम चलता है, दो चार दिन क्रोध शुरू हो जाता है। मिला-जुलाकर नतीजा शून्य। यह करूणावान होता है कुछ समय के लिए कुछ घन्टों के लिए, कुछ दिनों के लिए और कुछ दिन बहुत कठोर हो जाता है। कुल मिलाकर नतीजा शून्य हो जाएगा, हाथ में कुछ भी नहीं आयेगा। मेहनत बहुत करेगा पर परिणाम कुछ भी न होगा। इसलिए निर्णय लो, संकल्प लो, यह तीसरा कदम हुआ।
इस निर्णय को, अपने संकल्प को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट लो। एक टारगेट सेटिंग करो, एक लक्ष्य निर्धारित करो कि क्या तुम्हें पाना है, क्या तुम्हें होना है और छोटे-छोटे खंडो में उसको बांट लो। और एक बार में एक ही खंड का, अभी सामने जो है वर्तमान में, उसकी चिन्ता लो उसकी फिक्र करो। बहुत दूर की मत सोचना, अभी सामने जो है उसको देखना। ऐसा समझें कि आप यहां सोनीपत से दिल्ली कार ड्राइव करते हुए जा रहे हैं। तो आपके मन में एक तो दूर का लक्ष्य है कि दिल्ली पहुँचना है। लेकिन आपकी नजर कहाँ होती है? नजर होती है वर्तमान पर, अभी सामने जो ट्रैफिक है, गाड़ियां आ जा रही हैं, लोग गुजर रहे हैं। हाँ, बीच-बीच में आप तिरछी नजर से देख लेते हैं सड़क के किनारे लगे माईल स्टोन कि दिल्ली कितने किलोमीटर दूर है। पहले 30 था, अब 25 बचा, अब 20 बचा। इसका मतलब है कि ठीक दिशा में जा रहे हैं। लेकिन मुख्य रूप से नजर वर्तमान पर होती है। ऐसे ही हम अपने भविष्य का लक्ष्य निर्धारित करें उसके प्रति कमिटिड रहें। बीच-बीच में थोड़ी सा पुर्नविचार करते रहें कि हम उसी दिशा में जा रहे हैं कि नहीं, कहीं भटक तो नहीं गये। लेकिन मुख्य रूप से हमारी दृष्टि वर्तमान पर हो। जैसे ड्राइवर बीच-बीच में कार में लगे बैक मिरर (पीछे देखने वाले दर्पण) पर दृष्टि दौड़ा लेता है, वैसे ही हम भी कभी पुर्नविचार कर लें। जो हमने किया, जो हुआ, जो परिणाम आए उन पर चिन्तन मनन कर लें कि ठीक हो रहा है कि नहीं हो रहा है। तो अतीत और भविष्य से बस इतना ही संबंध रखें जैसे ड्राइविंग करते समय माईल स्टोन और बैक मिरर पर कभी-कभी नजर पड़ती है। मुख्य रूप से 99 प्रतिशत दृष्टि वर्तमान के ट्रैफिक पर होती है। ऐसी ही हमारे जीवन की शैली हो।
चौथा कदम मैं कहना चाहूंगा शेयरिंग- अपने संकल्प की घोषणा करें। लोगों को बताएं, अपने मित्रों परचितों को खबर पहुंचाएं कि मैंने यह संकल्प लिया, मैंने यह निर्णय लिया है। इससे आपको बहुत प्रकार की सूचनाएं मिलेंगी। बहुत अनुभवी लोग जो उस दिशा में आपसे आगे गए हुए हैं, जिन्होंने उस प्रकार का काम किया हुआ है, उनसे बहुत प्रकार की सूचनाएं आपको मिल सकेगी जो आपके काम आयेंगी।
फिर लोगों का सहयोग प्राप्त करें, एक टीम निर्धारित करें। छोटे मोटे संकल्प हम स्वयं पूरे कर सकते हैं लेकिन बड़े संकल्प को पूरा करने के लिए हमें पांचवां कदम उठाना पड़ेगा- समर्थन की प्राप्ति, सहयोगी की प्राप्ति। अब उन लोगों को ढूंढे जो आपकी मदद करने के लिए तैयार हैं। निश्चित रूप से आप सौ लोगों से बात करेंगे, 5-10 लोग अवश्य ही ऐसे मिलेंगे जो आपके काम में मदद पहुंचा सकते है(, उनकी मदद लें। अक्सर अहंकारी व्यक्ति किसी की मदद लेना नहीं चाहता। वह स्वयं ही सब कुछ करना चाहता है। लेकिन इस प्रकार का व्यक्ति कोई बहुत बड़े काम नहीं कर सकता। ठीक है छोटे-मोटे काम वह कर सकेगा लेकिन बहुत बड़ी सफलता हासिल न कर सकेगा। बड़ी सफलता हासिल करने के लिए हमें एक संघ, एक टीम निर्धारित करनी होती है। अपने मित्रों का चयन करें जो आपको सहयोग दे सकते हैं।
इसके बाद छटवां कदम हुआ- श्रम करें। अब समय आ गया लोग सहयोग करने को तैयार हैं, आवश्यक सूचनाएं आपने इकट्ठी कर ली हैं, अब मेहनत करना शुरू करें। अब हाथ पर हाथ धरे बैठे न रहें।
और सातवां कदम है- एक दिन आपका संकल्प सफलता तक पहुंचता है। बीच में कभी-कभी छोटी-मोटी असफलताएं भी मिलती हैं। असफलताएं जब मिलें उन पर पुनर्विचार करें कि कहां हम से भूल-चूक हुई। क्या हमसे गलती हो गई? और फिर से अतीत से मुक्त होकर नये सिरे से नया संकल्प लें। अपने संकल्प को पूरा करने के लिए फिर कदम आगे बढ़ाएं।
तो ये सात कदम हुए। पहला समझ, दूसरा साहस, तीसरा संकल्प, चौथा शेयरिंग, पांचवां सहयोग प्राप्ति, छठवां श्रम, सातवां सफलता अथवा असफलता दोंनो चीजें सम्भव हैं। हमेशा हर बार सफलता ही नहीं मिल जाएगी। जब सफलता मिले तो याद रखना उसको अहंकार से मत जोड़ना। धन्यवाद देना अस्तित्व को, धन्यवाद देना अपने मित्रों को जिन्होंने सहयोग पहुंचाया, धन्यवाद देना उन परिस्थितियों को जिनके कारण सफता मिली। असफलता मिले तो देखना कहां भूल-चूक हुई। कौन सी गलती हो गई ताकि आगे से हम उसे सुधार सकें।
सांतवे कदम के बाद हमारी समझ और विकसित होती है। हम फिर पहले कदम पर पहुँच जाते हैं, समझ। पहले हमारी समझ एक प्राथमिक समझ थी बस। वह बहुत गहरी समझ नहीं थी। लेकिन ये सात कदम चलने के बाद अब हममें एक और गहरी (एक डीपर अन्डरस्टैन्डिंग) समझ पैदा होती है। और जीवन में आगे हम फिर से नये संकल्प लेने के लिए और बेहतर, उच्चतर सफलता हासिल करने के लिए तैयार हो जाते हैं। तो ये सात कदम सात सोपान हैं।