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  1. ओशो ने एक प्रवचन में ऊर्जा का पूरा विज्ञान दिया है- भीतरी शक्तियों के संबंध में विस्तृत रूप से समझाया है। भोजन से हमें ऊर्जा मिलती हैं। शरीर में ऊर्जा संग्रहीत होती है। गहन निद्रा में ऊर्जा संरक्षित होती, कन्जर्ब होती है। दैनिक क्रियाकलापों में ऊर्जा खर्च होती है। प्राणायाम और व्यायाम से ऊर्जा जागती है। धारणा से ऊर्जा केंद्रित होती है, फोकस्ड, एकत्रित होती है। ध्यान से ऊर्जा उर्ध्वगामी होती है- ऊपर चढ़ती है। काम, क्रोध, लोभ आदि वासनाओं में ऊर्जा नीचे गिरती है- अधोगामी होती है। प्रेम में, प्रसन्नता में, आनंद में ऊर्जा फैलती है। समाधि में ऊर्जा ब्रह्म की परम ऊर्जा के साथ एक होती है- उसमें विलीन होती है। यह ऊर्जा का पूरा विज्ञान है।

    ऊर्जा को जगाने के लिए व्यायाम और प्राणायाम बहुत उपयोगी हो सकते हैं। योग की साधना में इन दोनों का बहुत उपयोग किया गया है। धारणा से ऊर्जा एकत्रित होगी, केंद्रित होगी। ध्यान से ऊर्जा ऊपर को चढ़ेगी। प्रेम से ऊर्जा फैलेगी। भय और चिंता में ऊर्जा सिकुड़ती है।

    विपरीत को भी याद रखना। जैसे प्रेम में फैलती है, आनंद में विस्तार लेती है। इसका ठीक उल्टा दुख में, चिंता में, डर में ऊर्जा सिकुड़ती है। ध्यान में ऊपर चढ़ती है वासना में नीचे गिरती है। इस पूरे विज्ञान को समझ लो तब अपने जीवन की ऊर्जा के साथ हम उसका ठीक-ठीक सदुपयोग करना सीख सकोगे। ओशो ने जो ध्यान की विधियां बनाई हैं उनमें अलग-अलग तरीकों से ऊर्जा को उर्ध्वगामी करने के उपाय किये गये हैं। उदाहरण के लिए सक्रिय ध्यान में कपालभाति प्राणायाम का उपयोग किया गया है। कुंडलिनी ध्यान में शरीर के कंपन वाला व्यायाम, नादब्रह्म ध्यान में गुंजार की ध्वनि का प्रयोग; जो पिछले सवाल के जवाब में आपसे कहा कि एक अर्थहीन ध्वनि ज्यादा उपयोगी होगी इसलिए नादब्रह्म ध्यान में गुंजन का उपयोग किया गया है। गुंजार की आवाज में कोई अर्थ तो है नहीं। वह ऊर्जा जगा सकेगा। सारे शरीर में उसकी ध्वनि के कंपन, देह-ऊर्जा को जगा देंगे। मंडल ध्यान में जॅागिंग का, एक ही जगह खड़े होकर तेजी से उछलने का उपयोग किया गया है शक्ति जगाने के लिए। गौरीशंकर ध्यान में कुंभक का प्रयेग किया गया है। त्राटक ध्यान में आज्ञाचक्र पर ऊर्जा एकत्रित करके उसे उर्ध्वगामी किया जाता है। साक्षी भाव, सहस्रार की घटना है। त्राटक की ध्यान विधियां आज्ञाचक्र की घटनाएं हैं। जब हम इन दो केंद्रों पर फोकस करते हैं ऊर्जा को, तब ऊर्जा स्वतः उर्ध्वगामी हो जाती है।

    जिन्हें हम षटरिपु कहते हैंः काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष; ये ऊर्जा को नीचे की तरफ ले जाते हैं। ऊर्जा को नष्ट करते हैं। इसलिए इनको रिपु कहा गया है- दुश्मन। ये हमारी जीवन ऊर्जा को नष्ट करते हैं। क्रोध में तुम दूसरे को नुकसान पहुंचाओगे, वह तो अलग बात है लेकिन उसके भी पहले तुम स्वयं को नुकसान पहुंचा लेते हो। तुम अपनी ही ऊर्जा को अस्त-व्यस्त कर लेते हो। ईर्ष्या में जल भुन कर तुमने अपनी ऊर्जा को नष्ट कर लिया। दूसरे को क्या हानि पहुंचेगी, सो अलग बात; सर्वप्रथम तुम्हें तो हानि पहुंच ही गई।

    महावीर ने जिन सूत्र में कहा है कि आत्म हितैषी पुरुष हिंसा नहीं करते। बड़ा अद्भुत वचन है- ‘आत्म हितैषी पुरुष’ अर्थात् जिन्हें स्वयं का भला करना है वे लोग हिंसा में नहीं जाते। इसमें दूसरे पर परोपकार करने की बात नहीं है। आत्म हितैषी, जो अपना शुभ चाहते हैं, आत्म-मंगल चाहते हैं, जो स्वयं की ऊर्जा को सुव्यवस्थित रखना चाहते हैं, जो अपनी ऊर्जा को एक सम्यक मार्ग देना चाहते हैं वे हिंसा में नहीं उतरते।

    जिन्हें दुश्मन की तरह जानकर रिपु कहा गया है वे बातें वही हैं जो तुम्हारी ऊर्जा को बेचैन करती हैं, उद्वेलित करती हैं, जलाती-भुनाती हैं, उसे नष्ट-भ्रष्ट करती हैं। वे चीजें साधना में अति सहयोगी है जो तुम्हें साधना में सम्यक्दिशा देती हैं, शांत करती है, विस्तार देती हैं।

    इसलिए ध्यान के साथ प्रेम उपयोगी है। ध्यान ऊर्जा को उर्ध्वगामी करेगा, प्रेम उसे विस्तार देगा और ये दोनों ही आयाम बिल्कुल जरूरी हैं।

    इसलिए ओशो की देशना खूब संक्षेप में अगर कहें तो दो शब्दों में समा जाती है होश और प्रेम या दूसरे शब्द में कहें तो ध्यान और भक्ति। तो ऊर्जा के इस विज्ञान को स्मरण रखना। भोजन से ऊर्जा मिलती है। नींद में ऊर्जा संरक्षित होती है। दिनचर्या में खर्च होती। प्राणायाम और व्यायाम से जागती। धारणा से केंद्रित होती। ध्यान से ऊपर चढ़ती। भय में सिकुड़ती, वासना में नीचे गिरती, प्रेम में फैलती तथा समाधि में विराट के संग एकात्म होती।

    ऊर्जा को जगाने का एक और बहुत सुंदर उपाय जो ओशो ने शायद धर्म के जगत में पहली बार किया और वह है हंसी का उपयोग। हास्य का प्रयोग। पहली बार ओशो ने इतिहास में चुटकुलों का उपयोग ऊर्जा के जागरण में और ध्यान में डुबाने के लिए किया। आश्चर्य की बात है कि किसी को पहले यह बात ख्याल क्यों नहीं आई। प्राणायाम साधने या व्यायाम करने में, या अन्य विधियों में बहुत देर लगेगी। लतीफा आधा मिनट के भीतर ऊर्जा को वैसे ही उर्ध्वगामी कर देता है और न केवल उर्ध्वगामी, वरन फैला भी देता है। प्रसन्नता का भाव, आनंद-भाव; दोनों काम कर देता है जो ध्यान व प्रेम मिलकर करते हैं। ऊर्जा ऊपर की ओर भागती, सहस्रार की तरफ और साथ-साथ विस्तृत भी होती है फैलती भी है। चलो उसका प्रयोग करके ही देख लें।

    (1) एक महिला के छह बच्चे थे और जब भी कोई बच्चा रोता वह महिला कहती थी देखो गलती करके रोते नहीं। हमेशा वह यही समझाती थी, बेटा गलती करके रोते नहीं। एक दिन छहों बच्चे उसे बहुत तंग कर रहे थे और उस महिला ने कहा तुम्हारे जैसे बच्चे पैदा करने से तो बेऔलाद रह जाना ज्यादा ठीक था। उसकी छोटी बेटी बोली-‘मम्मी, गलती कलके लोते नहीं’।

    (2) दो महिलाएं ट्रेन में सफर कर रही थी, एक ने फुसफुसाकर अपनी बगल में बैठी स्त्री से कहा-देखो सामने की सीट पर बैठा वह आदमी आधे घंटे से मुझे घूर-घूर कर देख रहा है। कुछ न कुछ करना होगा। दूसरी महिला ने उसे जवाब दिया-कुछ करने की जरूरत नहीं, वह आदमी कबाड़ी है। उसे पुरानी सड़ी-गली रद्दी व बेकार चीजों को घूरकर देखने की आदत है।

    (3) सेठ चंदूलाल बस से उतरकर अपनी पत्नी के लिए एक पान खरीद कर लाये। खूब बड़ा किंग साइज पान। कहा- लो भागवान, यह पान खाओ। श्रीमती चंदूलाल ने कहा कि पान सिर्फ मेरे लिए! अपने लिए क्यों नहीं लाए? सेठजी ने कहा- भागवान, मैं बिना पान खाए भी बस में चुप बैठ सकता हूं।

    (4) वैद्यराज ने बहुत ही कड़वे स्वाद का काढ़ा बनाकर सरदार विचित्र सिंह को दिया और कहा कि इससे दो दिन के अंदर ही खांसी ठीक हो जाएगी। दूसरे दिन सरदार विचित्र सिंह बाजार में घूमते हुए वैद्यराज जी से मिले, वैद्यराज ने पूछा- खांसी में कुछ कमी हुई कि नहीं, काढ़ा पी रहे हो न। विचित्र सिंह ने कहा- यह कड़वा काढ़ा पीने की बजाय खांसना ही मैंने बेहतर व आसान समझा है। काढ़े से तो खांसी ही भली!

    (5) वृद्धावस्था उस आयु को कहते हैं जब किसी खूबसूरत लड़की को देखकर आशाएं नहीं बल्कि यादें जागती हैं।

    (6) रेफ्रिजिरेटर वह उपकरण है जिसमें गृहणियों की बची-खुची चीजें तब तक रखी रहती हैं जब तक कि वे फैंकने लायक न हो जाएं।

    (7) यदि किसी महिला की सही उमर जाननी है तो उसकी सास, देवरानी, ननद, जेठानी या पड़ोसन से पूछिये।

    (8) बेचारा मर्द जब पैदा होता है तो लोग उसकी मां को बधाइयां देते हैं। उसका विवाह होता है तो लोग उसकी पत्नी को उपहार देते हैं और उसके मरपे पर बीमे वाले आकर उसके बीमे का पैसा भी उसकी पत्नी को देते हैं।

    (9) दो गप्पी फुटबॅाल की ऊंची-ऊंची गप्प मार रहे थे। एक ने कहा- एक बार मैंने फुटबॅाल में ऐसी किक मारी जो 15 मिनट बाद जमीन में आकर गिरी। दूसरे ने कहा-यह तो कुछ भी नहीं मैंने एक बार ऐसी किक मारी थी कि 15 दिन बाद फुटबॅाल वापस आई और उसमें चिट लगी थी कि आईंदा आपकी फुटबाल चांद पर आई तो हम उसे वापस नहीं भेजेंगे।

    ~ स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती.

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