आत्मज्ञान (Enlightenment) के लिए हमारा प्रयास अनिवार्य है, या प्रतीक्षा पर्याप्त है?

Question

प्रश्न – साकार से निराकार में छलांग कैसे लगे? हमारा प्रयास अनिवार्य है या केवल आनंद से भरी प्रतीक्षा पर्याप्त है?

Answer ( 1 )

  1. तीन बातें जरूरी हैं-प्रयास, प्रतीक्षा और प्रसाद। प्रयास करना होगा, प्रयास के बाद प्रतीक्षा भी करनी होगी और प्रतीक्षा करते-करते जब प्रतीक्षा भी छूट जाएगी तब प्रभु का प्रसाद बरसता है- उसकी कृपा से वह घटना घटती है जिसका इंतजार था।

    पहले कर्ता-भाव सहित, सक्रियता से हम संलग्न होते हैं। श्रमपूर्वक साधना करते हैं फिर हमारी सक्रियता कम होती। प्रतीक्षा में भी एक सूक्ष्म सक्रियता मौजूद रहती है। हम इंतजार करते हैं कि कुछ हो! माना कि हम अपनी तरफ से कुछ नहीं कर रहे लेकिन फिर भी इंतजार तो है… एक सूक्ष्म क्रिया अभी भी भीतर चल रही है। अंततः वह भी धीरे-धीरे खो जाएगी।

    मैंने सुना है- सेठ चन्दूलाल की पत्नी ने रात को 12 बजे अपने पति को जोर से हिलाकर कहा कि उठो मैं परेशान हो रही हूं। लड़के को भेजा था बड़े प्रयास से, बहुत समझा-बुझाकर कि बाजार चला जाए कुछ सामान लाने के लिए, 8 बजे रात को भेजा था, 12 बज गये; चार घंटे हो गये अभी तक वह नालायक वापस नहीं लौटा। और मैं परेशान हो गई हूं। बोर हो गई हूं। मुझे नींद आने लगी जोर की, अब बोलो मैं क्या करूं?

    चन्दूलाल ने पूछा- तुमने उसको बाजार किसलिए भेजा था?

    श्रीमती ने बताया- कैमिस्ट-शॅाप से नींद की गोली लाने के लिए।

    वह कह रही है मैं परेशान हो गई हूं मुझे जोर की नींद आ रही है। अब बताओ क्या करूं? तो पहले प्रयास करो लड़के को भेजो नींद की गोली लाने के लिए फिर इंतजार करो कि आ जाए। लेकिन तुम्हारे इंतजार से भी वह नहीं आने वाला। लेकिन इस बीच में तुम्हें नींद आने लगेगी। इतना पक्का समझो। तो इंतजार करते-करते सो जाना और वह परम घटना घट जाएगी जो घटनी चाहिए। तुम्हारा प्रयास भी जरूरी, प्रतीक्षा भी जरूरी यद्यपि तुम्हारे प्रयास और प्रतीक्षा से कुछ भी नहीं होता।

    लेकिन मेरी बात सुनकर अगर तुम कुछ भी न करोगे तब भी कुछ नहीं होगा। अतः पूरा-पूरा प्रयास करो ताकि जल्दी थक जाओ। मैं बारंबार कहता हूं पूरी समग्रता से, टोटलिटी से, सारी शक्ति लगा दें ध्यान में। इसलिए नहीं कि आपकी सारी शक्ति लगा देने से कुछ हो जाएगा। संपूर्ण शक्ति लगाने से आप जल्दी थक जाओगे; बस इतना ही होगा।

    आप कुनकुनी साधना धीरे-धीरे करोगे तो सालों-साल या जन्म लग जाएंगे। आप थकोगे नहीं और तब वह प्रसाद की घड़ी कभी न आ सकेगी। जब हम पूरी तरह निष्प्रयत्न हो जाते हैं तभी वह प्रसाद बरसता है और उस क्षण में यह भी पता चलता है कि यह प्रसाद तो सदा-सदा से बरस रहा था। हम अपने प्रयास के कारण अथवा प्रतीक्षा के कारण वंचित रहे। हम अपनी ऊहापोह में व्यर्थ ही व्यस्त थे।

    ~ स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

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