पाकिस्तान या चीन से लड़ाई के वक्त, हम अपने अहिंसा के सिद्धांत का क्या करें?
Question
प्रश्न – पाकिस्तान से लड़ाई के वक्त, चीन से लड़ाई के वक्त, या सीमांत पर जब भी उपद्रव होता है, तो हम अपने अहिंसा के सिद्धांत का क्या करें?
प्रश्न – युद्ध के वक्त अहिंसा के सिद्धांत का पालन कैसे करें?
Answer ( 1 )
सिद्धांतों को आग जला कर उसमें डाल देना चाहिए। सिद्धांतों की कोई जरूरत नहीं है। जिंदगी की जरूरत है। सिद्धांत सब झूठे होते हैं, वक्त पर काम नहीं आते। अगर कोई आदमी अहिंसक होगा तो वह यह पूछेगा कि अब युद्ध आ गया है तो हम अहिंसा का क्या करें? जब युद्ध नहीं था तब अहिंसा की जरूरत नहीं थी और अब युद्ध आ गया है तो हम अहिंसा का क्या करें? अगर मैं प्रेमपूर्ण हूं और आप मुझे गाली दे दें, तो मैं पूछूंगा कि अब मैं अपने प्रेम का क्या करूं? यह आदमी मुझे गाली दे रहा है, मैं शांत था और एक आदमी ने आकर मेरा अपमान कर दिया, तो मैं यह पूछूंगा कि अब मैं अपनी शांति का क्या करूं? यह आदमी मेरा अपमान कर रहा है? अगर कोई मेरा अपमान न करता तो मैं शांत बना रहता, अब तो बड़ी मुश्किल की बात हो गई, अब तो यह शांति के सिद्धांत का क्या हो? सिद्धांतों की कसौटी तब होती है जब उनके प्रतिकूल परिस्थिति खड़ी हो जाती है। चीन और पाकिस्तान के उपद्रवों ने यह जाहिर कर दिया कि हमारी सब अहिंसा की बातचीत बकवास और झूठी थी। इस सत्य को हम नहीं देखेंगे। हम फिर वही पुरानी बकवास दोहराए चले जाएंगे जो कि वक्त पर काम नहीं आई।
हमें जानना चाहिए, ठीक से जान लेना चाहिए कि हम केवल अहिंसा की बातें करने वाले लोग हैं। अहिंसा से हमारा कोई संबंध नहीं है। इसलिए यह कोई मुसीबत न हो तो हम मंदिरों में अहिंसा के प्रवचन चलाते हैं और किताबें छापते हैं और अहिंसा परमोधर्मः का गुणगान करते हैं और झंडों पर लिखते हैंः अहिंसा परमोधर्मः। और जब प्रतिकूल परिस्थिति आ जाती है, तो हम कहते हैं, अब तो हमें अहिंसा की रक्षा के लिए तलवार उठानी ही पड़ेगी। बड़ी मजे की बात है, अहिंसा की रक्षा के लिए तलवार उठानी पड़ेगी? तो अहिंसा इतनी कमजोर है कि उसको अपनी रक्षा के लिए हिंसा की जरूरत पड़ती है? तो ऐसी कमजोर अहिंसा को छुट्टी करो, इसकी कोई जरूरत नहीं है। जो वक्त पर हिंसा का सहारा जिसे खुद ही खोजना पड़ता हो तो ऐसी अहिंसा को हम क्या करेंगे? लेकिन हमने धोखा दिया है अपने आप को। हम कुछ बातें कर-कर के, शोरगुल मचा-मचा कर यह समझने लगे हैं कि हम अहिंसक हैं। अहिंसक होना इतना सस्ता नहीं है। धर्म इतना सस्ता नहीं है। अहिंसक होना बड़ी तपश्चर्या सेगुजर जाना है। अहिंसक होने का मतलब हैः जिस व्यक्ति के हृदय से घृणा के, क्रोध के, ईष्र्या के, प्रतिहिंसा के, महत्वाकांक्षा के, एंबीशन के समस्त द्वार समाप्त हो गए हैं, जिसका हृदय प्रेम की एक धारा बन गया है। फिर, फिर उसके साथ कुछ भी स्थिति खड़ी हो जाए, वह मरने को राजी हो जाएगा, लेकिन यह नहीं पूछेगा, अब अहिंसा के सिद्धांत का क्या करें। तो बात ही नहीं है पूछने की।
बुद्ध का एक शिष्य था, पूर्ण। उसकी दीक्षा पूरी हो गई, उसकी शिक्षा पूरी हो गई। उसने बुद्ध से कहाः अब मैं जाऊं और आपने जो प्राणवान संदेश मेरे हृदय में फूंका है, मैं उसकी खबर दूर हवाओं तक पहुंचा दूं, दूर किनारों तक जमीन के।
बुद्ध ने कहाः जरूर जाओ, लेकिन इसके पहले कि तुम जाओ मैं कुछ पूछना चाहता हूं। कहां तुम जाना जाहते हो? किस प्रदेश में? बिहार का एक छोटा सा इलाका था, सूखा, उसने कहा, मैं सूखा की तरफ जाऊंगा, वहां अब तक कोई भी भिक्षु नहीं गया है।
बुद्ध ने कहाः वहां न जाओ तो अच्छा है, तुम युवा हो, अभी नये हो। कहीं और जगह चुन लो तो अच्छा है।
पूर्ण ने कहाः क्यों ऐसा कहते हैं?
बुद्ध ने कहाः वहां के लोग बहुत बुरे हैं। हो सकता है, तुम जाओ, वे गाली-गलौज दें, बुरे भले शब्द कहें, तो तुम्हारे मन को क्या होगा?
पूर्ण ने कहाः यह भी आप मुझसे पूछते हैं? अगर वे मुझे गाली देंगे, अपशब्द कहेंगे, अपमान करेंगे, तो मेरे मन को होगा, भले लोग हैं, सिर्फ गाली देते हैं, इतना ही क्या कम है, मार-पीट भी तो कर सकते थे।
बुद्ध ने कहाः और यह भी हो सकता है कि वे मार-पीट करें, फिर क्या होगा?
तो पूर्ण ने कहाः होगा मेरे मन को भले लोग हैं, सिर्फ मारते हैं, मार भी तो डाल सकते थे।
बुद्ध ने कहाः अंतिम बात और पूछे लेता हूं, फिर कुछ भी नहीं पूछूंगा। और अगर उन्होंने तुम्हें मार ही डाला, तो मरते क्षण में तुम्हारे मन को क्या होगा?
पूर्ण ने कहाः धन्यवाद दूंगा उन लोगों का, भले लोग हैं, उस जीवन से छुटकारा करवा दिया जिसमें कोई भूल-चूक हो सकती थी।
बुद्ध ने कहाः अब तुम कहीं भी जाओ। अब सारा जमीन तुम्हारा घर है और सब तुम्हारे मित्र हैं। क्योंकि जिसके हृदय में ऐसी अहिंसा का जन्म हो गया हो उसका कोई भी शत्रु नहीं है।
इस आदमी को तो हम अहिंसक कह सकते हैं, लेकिन ‘अहिंसा परमोधर्मः’ की जय लगाने वालों को नहीं। बेईमान, अपने आप को धोखा देने का हम बहुत रास्ता खोज लेते हैं, हम बहुत बेईमान हैं। अहिंसा का नारा लगाते हैं, हिंसा भीतर सुलगती रहती है। उसी सुलगने की वजह से जोर-जोर से नारा लगाते हैं। वह जो भीतर सुलग रही है हिंसा, वह जो भीतर चल रहा है क्रोध, वह जो भीतर उबल रही है सब कुछ, और जोर-जोर से नारा लगाते हैं और जोर-जोर से कूदते हैं, झंडा उठाते हैं। और अगर पड़ोस में कोई दूसरा झंडा उठा ले और तुमसे जोर से नारा लगाने लगे, तो तुम दोनों में झगड़ा भी हो सकता है। कि हम श्वेतांबर अहिंसावादी हैं, तुम दिगंबर अहिंसावादी हो, यह नहीं चल सकता। हम और हैं, तुम और हो, आ जाओ फिर, कौन सबसे बड़ा अहिंसावादी है इसको सिद्ध ही करना पड़ेगा। तो अदालत में भी जा सकते हैं, लकड़ी भी चला सकते हैं, हिंसा भी कर सकते हैं, क्योंकि अहिंसा की रक्षा के लिए इन सबकी जरूरत पड़ जाती है। यह हम सब कर सकते हैं।
यह कोई अहिंसा-वहिंसा नहीं, सब झूठी बातचीत है। और बहुत झूठी बातचीत में हम पड़े रहे हैं। और जब तक इस झूठी बातचीत में हम पड़े रहेंगे तो दुनिया में अहिंसा का कैसे जन्म हो सकेगा? एक दुनिया चाहिए जिसमें अहिंसा का जन्म हो। जरूर चाहिए, बिना अहिंसा के मनुष्य का कोई हित नहीं है, कोई मंगल नहीं है। लेकिन कौन लाएगा यह अहिंसा? अहिंसा की बातचीत करने वाले लोग या वे लोग जो अपने हृदय को एक बार प्रेम की क्रांति से गुजर जाने दें? अहिंसा सिद्धांत नहीं है, अहिंसा तो जीवंत प्रेम का नाम है। सिद्धांत की मत पूछें। सिद्धांतों से क्या लेना-देना है? सिद्धांत किसके काम पड़ते हैं? जीवंत प्रेम का नाम है अहिंसा, उसे अपने भीतर पैदा होने दें। और वह जिस दिन पैदा हो जाएगी, उस दिन आपके लिए कोई पाकिस्तानी नहीं है, कोई चीनी नहीं है। तो अहिंसक के लिए कोई अपना देश नहीं, कोई पराया देश नहीं। जो यह न कहता हो कि भारत पर पाकिस्तान का हमला हुआ, बल्कि जो यह कहता है कि भारत और पाकिस्तान की लड़ाई दुर्भाग्यपूर्ण है। जब हम कहते हैं कि भारत पर हमला हुआ, तो हम भारत के हो जाते हैं और दूसरा हमलावर हो जाता है।
दुनिया में ऐसे लोग चाहिए जो हर झगड़े को गृहयुद्ध के रूप में देखें, एक-दूसरे के ऊपर हमले की शक्ल में नहीं। जैसे घर के दो आदमी लड़ पड़े हों, इस तरह से देखें। जो आदमी अहिंसक है वह ऐसे ही देखेगा कि घर के दो लोग लड़ रहे हैं, एक गृहयुद्ध हो रहा है। पाकिस्तान और हिंदुस्तान के भाई लड़ रहे हैं। कोई इस तरह देखेगा, जिसके मन में अहिंसा है। और वैसा आदमी युद्ध समाप्त हो इसका मार्ग खोजेगा। इसके लिए श्रम करेगा, हो सकता है इसके लिए उसे मरना भी पड़े, तो मरेगा। इस भाषा में वह नहीं सोचेगा कि मेरे देश पर हमला हो गया है तो अब, अब अहिंसा के सिद्धांत का क्या करें? जो आदमी कहता है, मेरा देश, उसने तो हिंसा को स्वीकार कर लिया। यह मेरा और दूसरे का देश हिंसा के आधार पर खड़ी की गई सीमाएं हैं। सब दुनिया की सीमाएं वायलेंस की, हिंसा की सीमाएं हैं। प्रेम की कोई सीमा होती है? मैं अगर प्रेम से भर जाऊंगा तो मैं यह कहूंगा कि मेरा प्रेम, देख कर चलना, पाकिस्तान की सीमा आ गई, इसके आगे मत जाना, इधर अपना देश नहीं है। मेरे भीतर प्रेम पैदा होगा तो पाकिस्तान की सीमा पर ठिठक कर रुक जाएगा कि देखना इधर बगल में मुसलमान रहता है, यह अपने वाला नहीं, इधर मत जाना। प्रेम कहीं रुकेगा, अगर पैदा होगा। प्रेम कोई सीमा नहीं मानता, प्रेम असीम है। और जहां-जहां सीमाएं हैं वहां-वहां हिंसा है, वहां-वहां घृणा है। ये देशों की सीमाएं भी हिंसा की सीमाएं हैं। इसलिए अहिंसक देश को स्वीकार नहीं करता और न अहिंसक किसी देश का नागरिक हो सकता है। नागरिक से मेरा मतलब सामान्य काम-काज के अर्थों में नहीं, राजनैतिक चित्तता के अर्थ में, पॅालिटिकल अर्थ में। कोई नागरिक किसी देश का नहीं हो सकता, अहिंसक व्यक्ति तो विश्व नागरिक होगा। दुनिया में ऐसे लोगों की जरूरत है जो छोटे-छोटे देशों की क्षुद्र सीमाओं से अपने को मुक्त करें, छोटे संप्रदायों की सीमाओं से मुक्त करें, तभी शायद एक ऐसी मनुष्यता का जन्म हो सके जहां युद्ध न होते हों, जहां युद्ध समाप्त हो जाएं।
लेकिन राजनैतिक नहीं मान सकता यह कि सीमाएं न हों। क्योंकि जिस दिन सीमाएं नहीं हैं उस दिन राजनीतिज्ञ भी नहीं। वह उसी के साथ जुड़ा हुआ है। उस दिन वह नहीं बच सकेगा। इसलिए राजनीतिज्ञ बड़ा मोह रखता है सीमा का। नक्शे बनाता है और सीमाएं बनाता है। और लड़ता है और लड़वाता है। एक-एक इंच जमीन के लिए करोड़ों-करोड़ों लोगों को कटवाता है। और बड़ा मजा यह है कि जमीन किसके लिए है यह? जमीन के लिए लोग कटते हैं। और जमीन इसलिए है कि लोग इस पर रहें। जमीन लोगों के लिए है कि लोग जमीन के लिए हैं? सीमाएं किसके हित के लिए हैं, इसलिए कि इस पर लोग रोज कटें? अगर इसीलिए ये सीमाएं हैं लोगों के कटने के लिए तो यह किसके मंगल में हैं, किसके हित में हैं? वह दुनिया करीब आ रही है, जो जवान हैं, जो नई पीढ़ी के लोग हैं वे उस तरफ देखें और उस तरफ श्रम करें। एक दुनिया आए जहां कोई सीमाएं न हों, क्षुद्र टुकड़े न हों। मनुष्यता इकट्ठी खड़ी हो सके, ऐसे श्रम में वही लग सकता है जिसका हृदय प्रेम और अहिंसा से भरा हुआ है।
— ओशो [अज्ञात की ओर-(प्रवचन-04) ]