क्या ओशो के विचारों से विद्रोह व अराजकता (Rebellion & Chaos) पैदा हो सकती है?
Question
प्रश्न – आपकी बातें ठीक मालूम पड़ती हैं, लेकिन उनसे तो क्रांति हो जाएगी, उससे तो विद्रोह पैदा हो जाएगा, उससे तो अराजकता पैदा हो सकती है।
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प्रश्न – आपकी बातें ठीक मालूम पड़ती हैं, लेकिन उनसे तो क्रांति हो जाएगी, उससे तो विद्रोह पैदा हो जाएगा, उससे तो अराजकता पैदा हो सकती है।
Answer ( 1 )
अगर हम ठीक से देखें, तो हमारे समाज में जितनी अराजकता है, जितनी अनार्की है, इससे ज्यादा भी अनार्की किसी समाज में कभी हो सकती है? यह समाज जितना बीमार और रुग्ण, जितना अशांत, अभिशापग्रस्त है, कोई और समाज भी इससे ज्यादा अभिशापग्रस्त हो सकता है? क्या है इसमें जो बचाने जैसा है? क्या है इसमें? सब कुछ सड़-गल गया है, सब कुछ कुरूप हो गया है। तो घबड़ाहट क्या है अगर कोई बात ऐसी मालूम पड़ती हो कि उससे क्रांति हो जाए? क्रांति तो चाहिए, परिवर्तन तो चाहिए। जो समाज परिवर्तित होना बंद कर देता है वह असल में जीवित ही नहीं रह जाता। परिवर्तन तो रोज, जितना जीवित समाज होगा उतने तीव्र परिवर्तन होते हैं उसके भीतर। जितना जीवंत होता है प्रवाह उतनी ही दूर की यात्रा करता है, उतने ही नये पथों को खोजता है। क्रांति तो जीवन है, उससे क्या घबड़ाना? और युवक होकर कोई ऐसी बात करे कि क्रांति हो जाएगी और डरे, तो उसे समझ लेना चाहिए वह बूढ़ा हो चुका है, वह युवक नहीं है। एक बूढ़ा आदमी भयभीत हो सकता है। लेकिन जरूरी नहीं होता कि कोई शरीर से बूढ़ा हो गया हो तो बूढ़ा ही हो गया।
मैं एक गांव में अभी था, उस गांव के एक धनपति ने मुझे फोन किया और कहाः मैं अपनी मां को भी लाना चाहता हूं आपको सुनने, लेकिन उसकी उम्र नब्बे वर्ष है और पिछले चालीस वर्षों से वह चैबीस घंटे माला जपती रहती है, मुझे डर लग रहा है कि कहीं आपकी बातों से उसे चोट न पहुंच जाए, और इस उम्र में कहीं उसके मन को बेचैनी न पैदा हो जाए, तो मैं लाऊं या न लाऊं ? मैंने उनसे कहाः अगर तुम्हारी मां जवान होती तो मैं कहता न भी लाओ तो कोई हर्जा नहीं है, अभी वक्त है, लेकिन तुम्हारी मां के आगे कोई वक्त नहीं है इसलिए तुम जल्दी ले आओ। क्योंकि कुछ हो सकता हो तो हो जाना चाहिए। वह अपनी मां को डरते हुए लेकर आया। सभा के बाद मुझे मिले और कहने लगे, मैं बहुत हैरान हूं, सभा से उठने के बाद उन्होंने अपनी मां को पूछा होगा, कैसा लगा? उनकी मां ने कहाः चालीस साल से मैं माला जपती थी, वह माला हमेशा हाथ में रखती थी, उन्होंने कहाः माला जपने से कुछ भी नहीं होगा, मेरा अनुभव भी कहता है कि कुछ भी नहीं होता, तो मैं माला वहीं छोड़ आई हूं उसी सभा में, उसको वापस नहीं लाई हूं अपने साथ। वह बात खतम हो गई।
मैंने उनके लड़के को कहाः तुम बूढ़े हो, तुम्हारी मां जवान है। नब्बे साल की उम्र में वह माला छोड़ आई उसी भवन में। और उसने कहा कि उन्होंने कहाः माला जपने से कुछ न होगा, यह बात ठीक है, पचास साल का मेरा अनुभव भी कहता है कि कुछ भी नहीं हुआ। मैंने पचास साल जप कर देख लिया। यह बात ठीक है, बात खत्म हो गई। मैं माला वहीं छोड़ आई हूं।
इस स्त्री को कोई बूढ़ा कह सकता है? लेकिन जवान आदमी जब विद्रोह और कं्राति से डरे तो उसे कोई जवान कहेगा? जवानी का मतलब क्या है? जवानी का मतलब हैः जिसका हृदय अभी परिवर्तन के लिए तैयार है। जो नये की खोज में निकल सकता है, जो नये की खोज का साहस कर सकता है, वह जवान है। जो नये से भयभीत होता है और पुराने से चिपट जाता है, वह बूढ़ा हो गया, मन से बूढ़ा हो गया।
हिंदुस्तान में जवान बहुत दिनों से पैदा होने बंद हो गए हैं, यहां बूढ़े आदमी ही पैदा होते हैं, जवान पैदा ही नहीं होता। हमारी सारी भाषा बूढ़ी हो गई। मेरा मतलब समझे बुढ़ापे से? क्रांति से क्या घबड़ाना? क्रांति तो होनी चाहिए, जरूर होनी चाहिए। क्योंकि क्रांति तो जिंदगी को रोज नया-नया करने की प्रक्रिया का नाम है। रोज नई-नई जिंदगी होती जानी चाहिए। ठहर नहीं जाना चाहिए जीवन का प्रवाह।
एक तालाब होता है, उसमें प्रवाह रुक गया होता है। एक नदी होती है, उसमें प्रवाह खुला और मुक्त होता है। नदी बड़ी क्रांतिकारी है, जो नये-नये रास्ते खोजती रहती है, अनजान सागर की तरह उसकी यात्रा चलती जाती है। तालाब शायद डर गया है। तालाब शायद बूढ़ी हो गई नदी, वह घबड़ा गया है, उसने अपने को बंद कर लिया है एक जगह, वह डरता है आगे जाने से। परिवर्तन करना पड़ेगा, न मालूम किन रास्तों पर चलना पड़े, न मालूम सुख हो कि दुख हो, यही ठीक है, जहां हैं वहीं ठीक है। एक स्टेट्स-को पैदा करता है। वहीं रुक जाता है, वहीं बंध जाता है। फिर पता है जो तालाब बंध जाता है तो क्या होता है? सिर्फ मरता है। फिर उसमें कोई जिंदगी नहीं रह जाती। सूखता है और मरता है। सूखता है और मरता है और गंदा होता चला जाता है। क्योंकि गंदगी, जब कोई नदी बहती है तो बह जाती है और नदी रोज फिर पवित्र हो जाती है। और तालाब? तालाब में तो पानी तो उड़ता जाता है, गंदगी ठहरती चली जाती है। धीरे-धीरे पानी तो नहीं रह जाता, कीचड़ रह जाती है, कचरा रह जाता है। वह कचरा इकट्ठा होता चला जाता है।
तो तालाब की जिंदगी होती है एक, एक नदी की जिंदगी होती है। जवान आदमी वही है जो उद्याम नदी के वेग से जीता हो, जो तालाब न बन जाए। और पूरा समाज जब नदी के वेग से जीता है, तो पूरा समाज जिंदा होता है। और जब पूरा समाज ही एक डबरे की तरह हो जाता है, तो मर जाता है। कई कौमों ने अपने आप को डबरा बना लिया है। और वे बड़ी गौरवांवित भी समझती हैं अपने को कि देखो हम कहीं बहते नहीं, हम कहीं जाते नहीं, हम तो जहां के तहां हैं। हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति बड़ी महान है। इसको कहीं जाना नहीं पड़ता, जहां की तहां ठहरी रहती है। लोग आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन हम वहीं के वहीं हैं। यह कोई गौरव की बात है? यह कोई सम्मान की बात है? यह तो इस बात की खबर है कि हमने जीना छोड़ दिया है। वह जो डाइनैमिक, वह जो परिवर्तनशील, गत्यात्मक जीवन होना चाहिए, वह जा चुका है। निरंतर-निरंतर गत्यात्मक होना चाहिए।
युवक को तो सोचना चाहिए विद्रोह की भाषा में। लेकिन विद्रोह का क्या मतलब? विद्रोह का क्या यह मतलब है कि मकानों को जला दो, बसों में आग लगा दो, स्कूल के कांच फोड़ दो, शिक्षक का जीना हराम कर दो, यह विद्रोह का मतलब है? अगर यही विद्रोह का मतलब है, तो, तो बात दूसरी है, लेकिन यह विद्रोह का मतलब नहीं है, यह तो मूर्खता का मतलब हो सकता है विद्रोह का नहीं। विद्रोह तो बड़ी गहरी चीज है, विद्रोह तो मूल्यों को बदलने की बात है, वैल्यूज को बदलने की बात है। विद्रोह किसी बस पर पत्थर फेंकने का नाम नहीं है और न कहीं हड़ताल कर देने का नाम है। और जो हम चारों तरफ देख रहे हैं विद्रोह वह विद्रोह नहीं है। विद्रोह तो है जीवन जहां-जहां जकड़ गया हो, जिन-जिन मूल्यों ने जीवन को पकड़ लिया हो और उसकी गति को अवरुद्ध कर लिया हो, उन-उन मूल्यों को बदल देना। हजार-हजार जकड़नें हमारे ऊपर हैं, सारी मनुष्य-जाति के ऊपर, उनको तोड़ना है, वहां विद्रोह करना है।
लेकिन हमारे समाज के अगुआ बहुत होशियार हैं, वे विद्रोही न हो सके, असली विद्रोही न हो सके। इसलिए वे जवान को अंत्यंत टुटपुंजिया विद्रोह करना सिखा देते हैं, वे कहते हैं, पत्थर फेंको बस पर, जैसे बस पर पत्थर फेंकने से और मकान में आग लगा देने से कोई क्रांति होने वाली है। बल्कि सच यह है कि अगर लड़के यही करते रहे और उनकी ताकत इसी में लग गई, तो क्रांति कभी न हो पाएगी। और ये बहुत जो होशियार हैं हमारे समाज में शोषण करने वाले, उनके पक्ष में हैं, उनके हित में हैं। ऐसे में ऊपर से चिंता जाहिर करते हैं कि बहुत बुरा हो रहा है, लेकिन मन से वे इसे पसंद करते हैं कि यह होता रहे, युवक की ताकत इस बेवकूफी में लगी रहे। वह जिंदगी जैसी डबरे में बंद है वहीं बंद रही आएगी। वे चाहते हैं दिल से बहुत भीतर कि यही नासमझियां युवक करता रहे, तो असली क्रांति कभी नहीं कर पाएगा।
मैं तो आपसे कहूंगाः अगर अपने स्कूल के मास्टर के खिलाफ पड़ गए हैं, तो आप नासमझ हैं। अगर लड़ाई ही करनी है तो मनु महाराज से करो, बेचारे मास्टर से क्या करनी। मनु महाराज से लड़ाई लो, अगर लेनी है। मूल्य तीन हजार साल पहले जहां मनु छोड़ गए हैं वहीं रुक गए हैं, वहां से उन्हें आगे बढ़ाना है। वहां टक्कर है, वहां लड़ाई है। मुल्क को जिन्होंने गलत मूल्य दे दिए हैं उनसे लड़ाई है, उनसे टक्कर है। और वह लोगों से नहीं है वह मूल्यों से है, वैल्यूज से है, जो हमें पकड़ लेती है।
अब हिंदुस्तान में आज भी शूद्र हैं, यह बड़ी आश्चर्य की बात है! यह होना चाहिए क्या? आज भी हिंदुस्तान में अजीब-अजीब बातें हैं, जिनकी कि कल्पना करने में भी हंसी आती है। छोटी-छोटी टुच्ची बातों पर विरोध है–मराठी और गुजराती का विरोध है, हिंदी और गैर-हिंदी वाले का विरोध, हिंदू और मुसलमान का विरोध; आने वाले बच्चे हसेंगे हम पर। कैसे लोग थे? कैसे नासमझ? कैसे स्टुपिड? क्या बेवकूफियां करते थे? कैसी टुच्ची बातों पर लड़ते थे, आग लगाते थे, हत्या करते थे, हड़ताल करते थे? हैरान होंगे आने वाले बच्चे कि ये कैसे लोग थे? इन सबको तोड़ देना जरूरी है, इन सब दीवालों को तोड़ देना जरूरी है, इस तरह की नासमझियों को तोड़ देना जरूरी है। और सोचना जरूरी है। और सोचने से जो क्रांति आए, विद्रोह आए, वह बहुत शुभ होगा। इससे घबड़ाएं न।
— ओशो [अज्ञात की ओर-(प्रवचन-04) ]