क्या बुरे कर्म का बुरा परिणाम और अच्छे कर्म का अच्छा परिणाम मिलेगा? क्या कर्म का सिद्धांत (Law of Karma) सही है?
Question
प्रश्न – लोग कहते हैं कि हम बुरा कर्म करते हैं तो बुरा परिणाम मिलेगा। अच्छा काम करेंगे तो अच्छा परिणाम मिलेगा?
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प्रश्न – लोग कहते हैं कि हम बुरा कर्म करते हैं तो बुरा परिणाम मिलेगा। अच्छा काम करेंगे तो अच्छा परिणाम मिलेगा?
Answer ( 1 )
यह जो हम सोचते हैं, मिलेगा, फ्यूचर की भाषा में, यह गलत हैं हमने बुरा काम किया, उसी क्षण बुरा हो गया। कुछ आगे नही मिलेगा। उसी क्षण, हमारे भीतर कुछ भला हो गयां हम अपने को कांस्टेण्टी क्रियेट कर रहे हैं, हमारा प्रत्येक कर्म हमको बना रहा है। बनायेगा नहीं, इसी क्षण बना रहा हैं हम जिसको जीवन कहते हैं वह जीवन ही नहीं है, वह एक सेल्फ क्रियेशन भी है। वह जो हम कर रहे हैं, उससे हम बन रहे हैं। हमारे भीतर कुछ बन रहा है, कुछ घना हो रहा है। कुछ अपने ही भीतर हम अपने चैतन्य का निर्माण कर रहे हैं, तो हम जो कर रहे हैं, ठीक उसके अनुकूल या उसके जैसा हमारे भीतर कुछ बनता चला जा रहा है।
लोग कहते हैं कि आप नरक में चले जायेंगे, या स्वर्ग में चले जायेंगे। कुछ इस तरह की बातें करते हैं, स्वर्ग और नरक, भूगोल में, ज्योंग्राफी में कहीं होंगे। लोग जिस तरह की बातें करते हैं, मैं ऐसी बातें नहीं करता। नरक और स्वर्ग ज्योग्राफी में नहीं है, साइकोजाली में है। वह भौगोलिक धारणाएं नहीं हैं, मानसिक धारणाएं हैं। जब आप बुरा करते हैं, उसी क्षण नरक में चले जाते हैं। मैं अपनी धारणा से आपसे कह रहा हूँ-जब मैं क्रोध करता हूँ तो मैं उत्तप्त हो जाता हूँ और अग्नि की लपटों में अपने-आप चला जाता हूँ, उसी वक्त।
तो नरक में आप चले जायेंगे, ऐसा नहीं है या स्वर्ग में कभी आप चले जायेंगे, ऐसा भी नहीं है। चौबीस घण्टों में आप अनेक बार नरक में होते हें और अनेक बार स्वर्ग में होते हैं। जब-जब आप क्रोध से भरते हैं, उत्ताप और तीव्र वासना से भरते हैं तब-तब आप अपने भीतर नरक को आमन्त्रित कर लेते हैं। लोग कहते हैं कि आप नरक में चले जायेंगे या स्वर्ग में चले जायेंगे तो मेरा मानना ऐसा है कि आप में नरक और स्वर्ग अनेक बार आ जाता हैं वह आपकी मानसिक घटना है। कहीं जमीन फोड़कर नीचे नरक नहीं मिलेगा। और कहीं आकाश में खोजने से, कहीं कोई स्वर्ग नहीं मिल जायेगा।
और आप हैरान होंगे कि सारी दुनिया के लोगों की, स्वर्ग-नरक की धारणाएं भिन्न-भिन्न बनी हैं, क्योंकि वह तो साइकोलाजिकली है। तिब्बत का जो नरक है, उनकी जो कल्पना है नरक की, वह बड़े ठण्डे स्थान की है, क्योंकि तिब्बत में ठण्ड बहुत कष्टप्रद है, ठण्ड से कष्टप्रद, तिब्बत में कुछ भी नहीं है। तो तिब्बत की जो कल्पना है नरक की कि जो पापी होंगे, वह ऐसे स्थान में जायेंगे जहाँ इतनी ठण्ड है कि उनकी मुसीबत हो जायेगी। इस ठण्ड से बड़ी मुसीबत नहीं है कोई।
हमारे मुल्क की जो कल्पना है नरक की, वह अग्नि की लपटों वाली है। वहाँ ठण्ड नहीं है। नहीं तो हमको तो वह हिल-स्टेशन साबित होगा। तो हमारे मुल्क में हम सोचते हैं, जो नरक है, वहाँ अग्नि की लपटें उठ रही हैं, उसमें डाला जायेगा और कड़ाहियां गर्म हो रहीं हैं तेल की, उनमें पटका जायेगा। वे हमारी कल्पनाएं हैं, क्योंकि गरमी हमें कष्ट देती है तो हम सोचते हैं कि पापी को कष्ट देने के लिए तो गरम जगह होगी। तो नरक तिब्बत में ठण्डी जगह है और भारत में गरम जगह है। नरक ऐसा नहीं हो सकता है, या उसमें ऐसे खण्ड नहीं हो सकते कि वहाँ ठण्डा ही नरक है।
तो असल में, यह हमारी कष्ट की जो कल्पनाएं हैं, उनको हम इस भाँति कल्पित कर लेते हैं। कष्ट मानसिक घटना है, भौगोलिक घटना नहीं है। अभी भी आप जब बुरा करते हैं तो आपके भीतर अत्यन्त कष्टप्रद स्थितियों का निर्माण होता है। अभी कभी-कभी होता है, अगर आप निरन्तर बुरा करते जायेंगे तो वह सतत होने लगेगा और करते ही चले जायेंगे तो एक घड़ी ऐसी आ सकती है कि आप चौबीस घण्टे नरक में होंगे। तो आदमी कभी नरक में होता है, कभी स्वर्ग में होता है। फिर बहुत बुरा आदमी बिल्कुल स्वर्ग में रहने लगता है। जो भले और बुरे दोनों से मुक्त है, वह आदमी मोक्ष में रहने लगता है। मोक्ष में रहने का मतलब है आनन्द। कोई स्थान हीं है, कहीं स्पेस खोजने पर, ये जगहें नहीं मिलेंगी कि यह रहा स्वर्ग और यह रहा नरक। इसलिए मनुष्य की जो साइकोलाजी है, उसका जो मानसिक जगत है, उसके विभाजन हैं। तो मानसिक जगत के तीन विभाजन हैं-नरक, स्वर्ग और मोक्ष। नरक से जैसा आज सुबह मैंने कहा दुख, स्वर्ग से जैसा मैंने आज सुबह कहा सुख, मोक्ष से मेरा मतलब है न सुख, न दुख वह जो आनन्द है।
तो यह मत सोचिए कि कल कभी ऐसा हेगा कि हम बुरा करेंगे तो उसका बुरा फल होगा। यह मत सोचिए कि हम भला करेंगे तो भला फल होगा। जो भी हम कह रहे हैं, साइमलटेनिअसली, उसी वक्त, क्योंकि यह हो ही नहीं सकता कि अभी क्रोध करूं और अगले जन्म में मुझे उसका फल मिले, यह बड़ी ब्लफ हो जायेंगी, यह बात फिजूल हो जायेगी, क्योंकि उतनी देर क्या होगा? मैं अभी क्रोध करूं, अगले जन्म में मुझे फल मिले, यह बात बड़ी फिजूल हो जायेगी। इतनी देर क्यों होगी? में जब क्रोध कर रहा हूँ, क्रोध के करते ही क्रोध का फल भ्ल्लाग रहा हूँ। क्रोध के बाहर क्रोध का फल नहीं है। क्रोध ही मुझे वह पीड़ा दे रहा है जो क्रोध का फल है और जब मैं अक्रोध कर रहा हूँ तो मुझे उसी क्षण फल मिल रहा है, क्योंकि अक्रोध का जो आनन्द है, वही उसका फल है। जब मैं किसी की हत्या करने जा रहा हूँ तो हत्या करने में ही मैं कष्ट भोग रहा हूँ, जो कि हत्या करने का है और जब मैं किसी की जान बचा रहा हूँ तो जान बचाने में ही मुझे वह सुख मिल रहा है, जो कि उसमें छिपा है।
मेरी बात आप समझ रहे हैं न? कर्म ही फल है, कर्म का कोई फल नहीं होता, कभी भविष्य में नहीं। कर्म-प्रत्येक कर्म का अपना फल स्वयं है। तो बुरा कर्म मैं उसको नहीं कहता जिसके बाद में बुरे फल मिलेंगे। बुरा कर्म मैं उसको कहता हूँ जिसका बुरा फल उसी क्षण मिल रहा हे। फल को जांचकर ही अनुभव कर लेना कि कर्म बुरा है या भला। जो कर्म अपनी क्रिया के भीतर ही दुख दे, वही बुरा है।
— ओशो [आनन्द गंगा-(प्रवचन-02)]