क्या ऊर्जा जागरण के लिए मंत्रों का प्रयोग किया जा सकता है?

Question

प्रश्न – क्या ऊर्जा को जगाने के लिए किन्हीं मंत्रों का प्रयोग किया जा सकता है, जैसे ओम मणि पद्मे हुम्, अहम् ब्रह्मस्मि अथवा सोहम् ?

Answer ( 1 )

  1. मंत्रों का प्रयोग किया तो जा सकता है लेकिन वह मंत्र ज्यादा उपयोगी होंगे जिनमें कोई अर्थ नहीं है। जब आप कहते हैं- अहम् ब्रह्मस्मि मैं ब्रह्म हूं या सोहम् मैं वही हूं। इनमें अर्थ है- इन शब्दों को रिपीट करने से सम्मोहन तो जरूर पैदा हो सकता है, निद्रा पैदा हो सकती है लेकिन ऊर्जा का जागरण संभव न हो सकेगा।

    ऊर्जा जागरण के लिए ज्यादा अच्छा हो कि हम ऐसी ध्वनियां या मंत्र चुनें जिनमें कोई अर्थ नहीं है- कोई शब्द नहीं है। जब एक व्यक्ति कह रहा है मैं ब्रह्म हूं तो वह किसको समझा रहा है। अपने आप को समझा रहा है और किसी को नहीं।

    मैंने सुना है एक स्टेशन के प्लेटफॅार्म पर एक पति-पत्नी अपने बच्चे को लिए हुए बैठे थे, पत्नी ने अपने पति से कहा कि मैं पांच मिनट में टॅायलेट होकर आती हूं बच्चे को जरा संभालो। पति देव ने बच्चा अपनी गोद में ले लिया। वह महिला जैसे ही वहां से गई वह बच्चा जोर-जोर से चीख-चीख कर रोने लगा। मम्मी-मम्मी चिल्ला रहा है, जोर-जोर से चीख मार-मार कर रो रहा है। उसका बाप उसको हिला-डुला रहा है संभाल रहा है। लेकिन वह संभल नहीं रहा। फिर वह धीरे-धीरे उसको कहना शुरू करता है कि मुरारी शांत रह, मुरारी बिल्कुल शांत रह, थोड़ा सा धीरज रख, बस अभी वह आती ही होगी। पांच मिनट की तो बात है, बिल्कुल शांत, मुरारी देख- लोग क्या कहेंगे, शांत रह कुछ न कर बिल्कुल शांत रह। दूसरे लोग आसपास में खड़े यह बातचीत सुन रहे थे। वह अपने बच्चे से कह रहा था, बच्चा बिल्कुल उसकी सुन नहीं रहा था। पांच मिनट बाद वह महिला आई तो एक दूसरी महिला जो बगल में बैठी थी उसने कहा कि आपके पति देव ने तो बच्चे को बड़े प्रेम से बड़े ढंग से संभाला। बार-बार उसे बड़े प्रेम से समझा रहे थे देख मुरारी शांत रह, मुरारी धीरज रख अरे लोग क्या कहेंगे; वह महिला बोली कि माफ करिये मुरारी लाल तो मेरे पति का नाम है। बच्चे का नाम तो पप्पू है। अपने आप को समझा रहे हैं गुस्सा तो आ रहा है कि एक बार उठा कर पटक दें इस बच्चे को। अपने आप को ही समझा रहे थे कि मुरारी, शांत रह! अरे थोड़ा तो धैर्य रख! कुछ कर मत बैठना। पांच मिनट की बात है, अरे लोग क्या कहेंगे! कुछ कर मत बैठना।

    जब तुम कह रहे हो अहमं ब्रह्मास्मि तो सोहम् किसे समझा रहे हो। मुरारी शांत… धीरज रख। अगर पता ही होता मैं ब्रह्म हूं तो कहने की जरूरत न पड़ती। कोई आदमी सड़क पर जा रहा हो और बार-बार कहता जाए मैं पुरुष हूं क्या समझ रखा है। मैं पुरुष हूं चाहे कोई कुछ भी कहे मैं पक्का पुरुष हूं। 100 प्रतिशत कोई शक नहीं है। तो सभी को शक पैदा हो जाएगा कि मामला क्या है। अगर तुम्हें पता ही है कि तुम पुरुष हो तो कहने की जरूरत क्या है। नहीं जो लोग रट रहे हैं अहम् ब्रह्मास्मि, अहम् ब्रह्मास्मि उन्हें बिल्कुल पक्का पता है कि जो वे कह रहे हैं वे वो नहीं हैं। इसलिए मंत्र का उपयोग आत्म सम्मोहन तो पैदा कर सकता है, एक प्रकार की निद्रा पैदा कर सकता है। अगर सम्यक्रूप से उपयोग किया जाए तो ऊर्जा के जागरण में उपयोगी हो सकता है। उससे ज्यादा बेहतर हो कि हम अर्थहीन ध्वनियों को चुनें। वह ऊर्जा के जगाने में ज्यादा सहयोगी होंगी।

    ~ स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

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