क्या कुंडलिनी जागरण में कोई खतरा हो सकता है? क्या साधक को कुंडलिनी जागरण करना चाहिए या नहीं?

Question

प्रश्न –  ‘जिन खोजा तिन पाइयां’ नामक प्रवचन माला में किसी साधक ने ओशो से पूछा कि कुंडलिनी जागरण में अगर खतरा है तो फिर उसे जगाया ही क्यों जाए? ओशो ने उत्तर दिया खतरा तो बहुत है इसलिए निमंत्रण है, चुनौती है। एक दूसरी प्रवचन माला ‘झरत दसहुं दिस मोती’ में ओशो ने कहा है कि भीतर की शक्ति से छेड़खानी मत करना, कुंडलिनी जगाना खतरनाक है। ओशो के इन दो वक्तव्यों के विरोधाभास को स्पष्ट करने की अनुकंपा करें।

Answer ( 1 )

  1. निश्चित रूप से जब भी कोई नई घटना घटती है चाहे वह ऊर्जा का जागरण हो, खतरे तो हैं। जहां लाभ होने की संभावना है वहां हानि होने की भी संभावना है। मस्तिष्क में इतने विचार चल रहे हैं जितनी ऊर्जा मस्तिष्क में है वही ऊर्जा लोगों को अशांत और बेचैन किये हुए है। अगर और ज्यादा ऊर्जा उर्ध्वगमन करके ऊपर पहुंच जाए-यह भी संभव है मनुष्य और ज्यादा विक्षिप्त हो जाए और ज्यादा बेचैन और उत्तेजित हो जाए बजाय शांत होने के। ऊर्जा जागरण के पहले इसलिए भावनाओं का शुद्धिकरण यानी अंतस की सफाई जरूरी है। अकेली ऊर्जा का जागना नुकसानदायी भी हो सकता है। विद्युत ऊर्जा है इससे अभी पंखा चल रहा है। विद्युत के बल्ब जल रहे हैं, इसका उपयोग हो रहा है। लेकिन इससे इलैक्ट्रिक करंट और शॅाक भी लग सकता है। और मृत्यु भी हो सकती है।

    अतः ऊर्जा का हम कैसा उपयेग करेंगे हम पर निर्भर है। अकेला ऊर्जा जागरण खतरे में ले जा सकता है। और बहुत लोगों को ले भी गया है। मस्त नाम आपने सुना होगा सूफी कहते हैं दीवाने हो गए हैं, मस्त हो गये हैं। पागलों जैसे हो गये हैं, ध्यान करते-करते। सच पूछो तो इन्होंने अपनी ऊर्जा को जगा लिया और यह शांत नहीं हो पाए। अब वह ऊर्जा एक प्रकार की दीवानगी, एक प्रकार की मस्ती बन गई बजाय स्वास्थदायी होने के, बजाय शांत और समाधिस्थ करने के वह एक प्रकार के पागलपन में ले गई- ध्यान का पागलपन।

    ‘जिन खोजा तिन पाइयां’ में ओशो ने जो कहा है और ‘झरत दसहुं दिस मोती’ में जो कहा है; याद रखना इनके बीच में दस साल का फासला है। जिन खोजा तिन पाइयां प्रवचनमाला के वक्त ओशो नये प्रयोग करवा रहे थे। ऊर्जा जागरण के प्रयोग करवा रहे थे लेकिन उसके परिणामों को देखकर दस साल बाद जो कह रहे हैं वह हमारे लिए ज्यादा उपयोगी है। दस साल के अनुभव भी उसमें जुड़ गये। याद रखना जब कोई बुद्ध पुरुष कुछ कहते हैं श्ुरुआत में वह स्वयं को आधार मान कर कहते हैं वह सोचते हैं जैसा मैं हूं वैसे ही सब होंगे। बहुत सी बातें ऐसी बता देते हैं जो लोगों के उपयोग की नहीं हैं। लेकिन वह तो धीरे-धीरे पता चलता है कि जिस-जिस अवस्था में मैं हूं वैसी अवस्था में लोग नहीं हैं और सब तो उनके लिए खतरनाक भी हो सकता है।

    ओशो ने ‘झरत दसहुं दिस मोती’ में जो कहा है कि कुंडलिनी जगाना खतरनाक है और इसलिए ओशो ने कुंडलिनी ध्यान जो विधि बनाई है उसका नाम मात्र ही है कुंडलिनी ध्यान। उसका उस प्रकार की ऊर्जा जागरण से संबंध नहीं है जैसा कि परम्परागत रूप से समझा जाता है। आपने जिस प्रवचन का उल्लेख किया झरत दसहुं दिस मोती का मुझे स्मरण आता है उसमें ओशो ने यह भी कहा है कि कुंडलिनी ध्यान तो मैंने नाम यूँ ही रख दिया है कुछ तो नाम रखना था। कोई शब्द तो चुनना था।

    शब्द मैं खुद तो गढ़ूंगा नहीं। इसलिए पुराने शब्दों का ही उपयोग करना होगा। इसलिए कुंडलिनी ध्यान नाम रख दिया है। लेकिन परम्परागत ढंग से कुंडलिनी से जो समझा जाता है वह मेरा अर्थ नहीं है। मैं चाहता हूं तुम्हारी ऊर्जा नृत्य बने, तुम्हारी ऊर्जा नाचे, तुम आनंद मग्न होओ, तुम अपने भीतर डूबो, झूमो, संगीत में डूबो, शांत होओ, साक्षी में डूबो। ऊर्जा अगर जाग जाए तो उपद्रव भी हो सकता है।

    मैं एक चुटकुला पढ़ रहा था एक बच्चा दूसरे से पूछ रहा है कि बताओ जब रावण ने कुंभकर्ण को छह महीने के बाद नींद से जगाया और कुंभकर्ण ने जाकर राम की सेना पर आक्रमण किया तो वहां अचानक भगदड़ क्यों मच गई? दूसरे बच्चे ने कहा कि कुंभकर्ण छह महीने से नहाए हुए जो नहीं थे।

    अचानक ऊर्जा जाग जाएगी बिना नहाए हुई बिना शुद्धिकरण के तो भगदड़ तो मचने वाली है। इसलिए ऊर्जा जागरण के साथ-साथ शुद्धिकरण पर बहुत जोर है। इसलिए ध्यान के प्रयोगों के पहले चित्त का शुद्धिकरण। ध्यान सूत्र नामक प्रवचनमाला में ओशो ने शरीर का शुद्धिकरण, चित्त का शुद्धिकरण और हृदय का शुद्धिकरण ये तीन प्रवचन दिये हैं। और कहा है कि इसके बाद ही कोई व्यक्ति ध्यान में डूबे। तो ध्यान का सदुपयोग हो पाता है। ऊर्जा का सदुपयोग हो पाता है।

    निश्चित ही खतरा तो है। जहां लाभ है वहां नुकसान का डर भी है। तो समझपूर्वक ही अपनी ऊर्जा को जगाना उसके पहले अपने शरीर को, मन को, हृदय को शुद्ध कर लेना- शून्य कर लेना। फिर यह ऊर्जा तुम्हें परम आनंद की तरफ ले जाएगी। नहीं तो बुद्धत्व की तरफ जाने के बजाय विक्षिप्तता की तरफ भी जा सकते हैं। तो ओशो की इस बात को बहुत महत्व देना क्योंकि दस साल के अनुभव के बाद उन्होंने यह वक्तव्य दिया है।

    दूसरी बात यह भी याद रखना कि दोनों वक्तव्य अलग-अलग प्रश्नकर्त्ताओं को अलग-अलग लोगों को दिये गये हैं। हर व्यक्ति का सत्य अलग होता है। किसी अशुद्ध व्यक्ति के लिए कहा होगा कि ऊर्जा की छेड़खानी मत करना, ऊर्जा को जगाना खतरनाक है। किसी बहुत सरल, सहज व्यक्ति को कहा होगा कि ऊर्जा को जगाओ, खतरा है तो भी लो उसको चुनौती की तरह, एक निमंत्रण की तरह स्वीकार करो। तो किस व्यक्ति से कौन सी बात कही जा रही है बाद में किताब में यह तो नहीं रह जाता। किससे कहा गया था सिर्फ वक्तव्य रह जाते हैं। जैसे डॅाक्टर अलग-अलग वक्तव्य देता है। किसी मोटे मरीज से वह कहे कि खाना कम करो, थोड़ा खाना खाओ, खूब व्यायाम करो। चार मील रोज पैदल चलो और किसी हृदय के मरीज से कहे कि बिस्तर से हिलना मत, चलना फिरना बिल्कुल नहीं। और किसी दुबले-पतले मरीज से कहे कि खूब खाना खाओ। और बाद में यह वक्तव्य रह जाए और किससे कहे गये थे इसलिए कोई भी वक्तव्य को आउट आफ कन्टैक्सट, संदर्भ के बाहर मत करना। हर वक्तव्य किसी के संदर्भ में दिया गया है किसी खास व्यक्ति के लिए कहा गया है।

    ~ स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

Leave an answer