क्या कोई भी व्यक्ति डिवाइन हीलिंग कर सकता है? डिवाइन हीलिंग की विधि क्या है?

Question

प्रश्न – किसी को डिवाइन हीलिंग देते समय कौन-कौन सी सावधानी बरतें और डिवाइन हीलिंग किस विधि दूसरे को दें?

Answer ( 1 )

  1. सबसे पहली बात- प्रत्येक व्यक्ति एक हीलर हो सकता है। यह हम सबकी प्राकृतिक क्षमता है। कोई विशेषता या खूबी की बात नहीं है। यह कोई विशिष्ट कला नहीं हैं। हमने उपयोग नहीं किया है इस विधा का, यह अलग बात है। उपयोग करना अगर हम चाहें तो हमारे भीतर वह शक्ति छिपी हुई है और वह शक्ति शीघ्र ही अपना असर दिखाने लगेगी। जल्द ही आप उसके प्रभावों को महसूस कर सकेंगे और जिन मित्रों को आप हीलिंग दे रहे हैं वे भी असर देख पाएंगे। भीतर दिव्य ऊर्जा को व्यवस्थित करने की बात है। कुछ प्रयोगों से वैसा हो जाएगा।

    दूसरी बात, याद रखें कि असली हीलर परमात्मा है। डिवाइन इनर्जी, उसकी दिव्य ऊर्जा ही चिकित्सा का कार्य करती है। हम केवल उसके माध्यम हैं। अगर अहंकार बीच में आ गया और आप सोचने लगे कि मैं हीलिंग कर रहा हूं, कोई बड़ी खूबी का काम कर रहा हूं तब हीलिंग न हो सकेगी। आप माध्यम न बन पाएंगे। बिल्कुल बांस की पोली पोंगली के सामान हो जाएं, प्रभु के होंठो पर बांसुरी बन जाएं, प्रभु को अपना गीत गाने दें। आप स्वयं से शून्य हो जाएं। अहंकार से शून्य, विचारों से शून्य, मंगल भाव से, प्रार्थना भाव से भरे हुए। जिस व्यक्ति को आप हीलिंग देने जा रहे हैं उसके प्रति खूब-खूब सद्भाव से भरें।

    परमात्मा को अपना काम करने दें। स्वयं को एक उपकरण की भांति मानें- प्रभु के हाथों में नाचती हुई कठपुतली; और तब पाएंगे कि आप एक बहुत अच्छे माध्यम बन गये। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर यह क्षमता है, प्रत्येक व्यक्ति यह कर सकता है। थोड़े से आप प्रयोग करेंगे तो बात ख्याल में आ जाएगी।

    तीसरी बात, यदि कोई आपके अहंकार को चैलेंज करता है, चुनौती देता है कि मेरी हीलिंग करके बताओ, उसकी हीलिंग कभी मत करना। क्योंकि वह व्यक्ति रिसेप्टिव नहीं है। वह आपसे संघर्ष करेगा, उसकी ऊर्जा शिथिल नहीं होगी। वह आपसे ऊर्जा ग्रहण नहीं करेगा। और जब उसने चुनौती दी है तो उसने आपके अहंकार को भी सजग कर दिया है। आप भी एग्रेसिव हो जाएंगे। आप कुछ करने की सोचेंगे और फिर कुछ भी न हो सकेगा। प्रयोग असफल जाएगा। तो कभी ऐसे व्यक्ति की हीलिंग मत करना। क्योंकि उसने ठान लिया है कि वह हील नहीं होगा। उसकी हीलिंग करने से कोई लाभ नहीं।

    स्मरण रखिए कि हीलिंग तो एक बहुत ही प्रेमपूर्ण माहौल में, भाईचारे की मनस्थिति में, बड़े सद्भाव, सिम्पैथी व सहानुभूति के शांत, आशापूर्ण माहौल में ही संभव है। हीलर और हीलिंग लेने वाला इन दोनों के बीच में कोई संघर्ष नहीं होना चाहिए। एक हार्दिक तालमेल होना चाहिये, प्रेम-ऊर्जा का प्रवाह होना चाहिये तो ही चिकित्सा संभव है, अन्यथा हीलिंग नहीं हो सकती।

    चौथी बात, हीलिंग का समय सुबह चुनें तो अच्छा। उस समय आप ताजे होते हैं। अभी-अभी नींद पूरी हुई है, चित्त शांत है, शून्य है उस समय हीलिंग करना ज्यादा आसान है। कोई व्यक्ति सोचे कि शाम को थके-मांदे दिनभर के काम-काज से लुटे-पिटे से किसी की हीलिंग करने बैठेंगे तब मुश्किल जाएगी। क्योंकि आप स्वयं ही अपनी सारी ऊर्जा दिन भर के क्रिया-कलापों में खो चुके हैं। इसलिए जब आप सुबह ताजगी से भरे हुए, प्रसन्न, ऊर्जावान हैं, वह समय उपयोगी है। स्नान करने के बाद हीलिंग दें और जो व्यक्ति हीलिंग ले रहा है वह भी स्नान किया हो तो बेहतर। आप स्वयं ताजे कपड़े पहनें और जो व्यक्ति हीलिंग ले रहा है वह भी।

    पांचवीं बात, ऐसा स्थल चुनें जहां स्वच्छ हवा आती हो। खिड़की-दरवाजे खोलकर रखें। मन शांत हो। कमरे में कोई फूल या कोई अगरबत्ती, अपनी पसंद की कोई खुशबू, रूम स्प्रे का इस्तेमाल करें। एक विशिष्ट भावदशा आपकी बन जाए।

    छटवीं बात, जिन गुरु या इष्ट देवता के प्रति आपकी श्रद्धा है उनकी तस्वीर या मूर्ति उस कमरे में हो।

    सातवीं, जिस कमरे में आप हीलिंग करने जा रहे हैं, उस कमरे को उसी कार्य के लिए सुरक्षित रखें। छोटा हो कमरा और सिर्फ वहां पर हीलिंग का ही काम हो तो वह कमरा धीरे-धीरे चार्ज हो जाता है। ऐसे ऊर्जावान कक्ष में हीलिंग देना सरल है। यदि वहां अन्य गतिविधियां भी चलती हैं तो थोड़ा मुश्किल हो जाता है, बहुत प्रकार की तरंगों के प्रभाव वहां छूट जाते हैं।

    आठवीं, हीलिंग देने के पहले थोड़ा-सा व्यायाम कर लें, अपने भीतर की शक्ति को जगा लें। पांच मिनिट भस्त्रिका प्राणायाम या कपालभाति क्रिया कर लें, अपनी ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी कर लें। कुछ मिनिट शांत, शून्य, ध्यानपूर्ण हो जाएं। साक्षी हो जाएं स्वयं के। और जिन मित्रों को समाधि का ज्ञान है वह सुरति और निरति का स्मरण करें। परमात्मा के संगीत को सुनें, उसके आलोक को देखें। कुछ मिनिट उसमें डूबने के बाद फिर हीलिंग की प्रक्रिया शुरू करें।

    नौवीं, जिस व्यक्ति को आप हीलिंग दे रहे हैं उसको लिटा दें। वह आराम से हो, सुविधापूर्ण हो।

    दसवीं, यदि रोगी अपरिचित हो तो उसे स्पर्श न करें। व्यक्ति का आभामंडल शरीर से करीब छह इंच दूर तक फैला हुआ होता है। आप तीन-चार इंच दूर अपनी हथेली को रखें वहां से भी वही प्रक्रिया हो सकेगी जो छूने से होती है। सामान्यतः किसी के छूने से हम चौंकते हैं, सजग हो जाते हैं और जो व्यक्ति हमें छू रहा है उससे एक प्रकार का संघर्ष व प्रतिरोध शुरू हो जाता है। जिस प्रकार की सभ्यता हमने विकसित की है उसमें स्पर्श अच्छी बात नहीं मानी जाती। स्पर्श का अर्थ या तो कामुकता से या हिंसा से होता है। पिता ने चांटा मारा बच्चे को। पिता का यही स्पर्श बच्चे ने रिसीव किया है। स्पर्श के साथ-साथ हिंसा, क्रोध जुड़ गये या फिर स्पर्श के साथ कामवासना जुड़ गई। और इन दोनों ही स्थितियों से व्यक्ति बचना चाहता है। दोनों ही आक्रमण जैसे लगते हैं।

    अतः हीलिंग देते हुए सामान्यतः स्पर्श न ही करें। जब तक बहुत नजदीकी न हो, जब तक वह व्यक्ति बिल्कुल शिथिल न हो और स्पर्श के लिए तैयार न हो। तो इस बात को आप परख लें। क्योंकि जैसे ही आप स्पर्श करते हैं वह व्यक्ति चौंककर सजग हो जाता है। ग्रहणशील नहीं रह जाता, वह अपना बचाव करने लगता है। यह घटना बहुत सूक्ष्म तल पर घटती है- अनजाने में। अचेतन में स्पर्श से हम बचना चाहते हैं। इसलिए स्पर्श न करें। तीन या चार इंच दूर से भी आप हीलिंग दे सकते हैं। वह उतनी ही प्रभावी होगी।

    ग्यारहवीं बात, हीलिंग की शुरुआत प्रार्थना से करें, मंगल भाव से करें। वह व्यक्ति भी प्रार्थना की भावदशा में हो, आप भी प्रार्थना की भाव दशा में हों। दोनों मिलकर परमात्मा से प्रार्थना करें कि हम एक छोटा सा प्रयोग करने जा रहे हैं- इस प्रयोग में हमारी मदद करें। हम आपके माध्यम बन रहे हैं, आपकी ऊर्जा हमसे बहने दें। इस मंगल भावना एवं प्रार्थना के संग, करुणा से भरे हुए हीलिंग शुरू करें। यदि उसका कोई विशिष्ट अंग रुग्ण है तो उस अंग के पास अपनी हथेलियां रखकर भाव करें कि प्रकाश ऊर्जा या ऊष्मा आपकी हथेलियों से निकलकर उसके शरीर की ओर जा रही है। आपके आभामंडल से निकलकर उस व्यक्ति के ‘ऑरा’ में प्रवेश कर रही हैं। जो मित्र निरति समाधि कर चुके हैं उनके लिए तो यह कल्पना नहीं, वास्तविकता है। अंतस आलोक में डूबकर अपने आभामंडल का स्मरण करें और भाव करें कि आपके आभामंडल से ऊर्जा व्यक्ति के आभामंडल में प्रवेश कर रही है।

    यदि आपको स्पष्ट ऊर्जा का अहसास न हो तो अपनी दोनों हथेलियों को एक मिनिट रगड़ लें, गरमाहट से भर लें या दोनों हाथों को जोर-जोर से झटक लें ताकि आपके हाथों में ऊर्जा आ जाए। आपकी हथेलियां जीवंत हो उठें; तब सफलता की संभावना अधिक हो जाएगी। निरंतर स्मरण रखें कि आप केवल एक माध्यम हैं। दिव्य ऊर्जा आपके माध्यम से प्रवाहित हो रही है, बह रही है। जितनी देर तक आपका भाव हो हीलिंग की इस प्रक्रिया को करें उसके बाद उस व्यक्ति को धन्यवाद दें उसने आपको एक मौका दिया है। उसके प्रति अनुग्रह से भरें। परमात्मा के प्रति भी अनुग्रह से भरें, धन्यवाद से भरें कि आपको एक मौका मिला आप माध्यम बन सकें। यह न सोचें कि आपने उस व्यक्ति पर कोई उपकार किया है, उसकी कोई भलाई की है। बल्कि यही ख्याल आपके मन में हो कि उसने आपको एक खूबसूरत मौका दिया था, अपना प्रेम शेयर करने का, अपनी करुणा को बांटने का, परमात्मा की ऊर्जा का माध्यम बनने का।

    हीलिंग समाप्त करने के बाद अच्छा हो एक बार आप स्नान कर लें। अपनी दोनों हथेलियों को जोर-जोर से झटक लें या पूरे शरीर को कंपित कर लें। जैसा कि ऊर्जा ध्यान के प्रथम चरण में या कुंडलिनी ध्यान के प्रथम चरण में किया जाता है। दो-तीन मिनिट अपने पूरे शरीर को कंपा लें। ताकि उस बीमार व्यक्ति से कोई नकारात्मक ऊर्जा आपकी तरफ आ गई है तो वह साफ सुथरी हो जाए। उस कमरे को भी एक बार साफ कर लें ताजी हवा वहां आती रहे। अगरबत्ती या फूल वहां पर रखें उसकी खुशबू वहां फैले ताकि कोई नकारात्मक ऊर्जा तरंगें अगर वहां हो तो वह बाहर निकल जाए। इस प्रकार से हीलिंग का यह प्रयोग किया जाता है व्यक्तिगत रूप से।

    सामूहिक रूप से भी हीलिंग की जाती है। उसके दो तरीके हैं। एक तरीका रुग्ण व्यक्ति को लिटाकर तीन व्यक्ति उसकी सामूहिक चिकित्सा करें। एक व्यक्ति उसके सिर के पास हाथ रख कर बैठ जाए, दूसरा व्यक्ति उसके पैरों के दोनों तलवों के पास अपनी दोनों हथेलियां रखकर और तीसरा व्यक्ति या तो बीमार अंग पर अथवा उसके पेट पर नाभि के ऊपर अपनी दोनों हथेलियां रखकर बैठ जाए। ये तीनों व्यक्ति बैठकर एक मिनिट भस्त्रिका प्राणायाम करें। फिर शांत हो जाएं, शिथिल हो जाएं, साक्षी भाव में डूबे, बांस की पोली पोंगरी हो जाएं। ऊर्जा को प्रवाहित होने दें और यदि सुरति समाधि और निरति समाधि का उन्हें ज्ञान है तब प्रभु के संगीत और प्रभु के आलोक में डूबें और भाव करें कि आपकी हथेली के आभामंडल से होती हुई ऊर्जा उस व्यक्ति के शरीर में प्रवाहित हो रही है और वह स्वस्थ हो रहा है। प्रार्थना भाव के साथ अनुग्रह से भरे हुए पांच-सात मिनिट इस भाव दशा में डूबे रहें। इस विधि से बहुत से लोगों की चिकित्सा एक साथ की जा सकती है। पांच-सात मिनिट एक व्यक्ति को देना होगा। सामूहिक चिकित्सा की एक और विधि है जब ओशो स्वयं ध्यान शिविर लिया करते थे तब चिकित्सा की ये तीनों विधियां इंडिविज्युअल डिवाइन हीलिंग और ग्रुप डिवाइन हीलिंग के दोनों रूपों का ध्यान शिविरों में उपयोग किया जाता था।

    तीसरी विधि सामूहिक चिकित्सा की इस प्रकार है- एक मुख्य चिकित्सक बीच में एक टेबल या कुर्सी रखकर उस पर खड़ा हो जाता है। उसके चारों तरफ रुग्ण लोगों का समूह जिन्हें हीलिंग लेनी है वे बैठ जाते हैं और उनके चारों तरफ एक गोल घेरा बनाकर वे लोग जो हीलिंग में मदद पहुंचाना चाहते हैं वह सब खड़े हो जाते हैं। चारों तरफ कीर्तन होता है। कीर्तन में सब लोग नाचते हैं, झूमते हैं हीलिंग देने वाले भी और हीलिंग लेने वाले भी। खूब उत्सव प्रसन्नता के माहौल में नाचते, झूमते गोल-गोल घूमते हुए और यह भाव करते हैं कि इन मित्रों की हीलिंग हो जाए, इन मित्रों के शरीर, मन स्वस्थ हो जाएं। बीच में थोड़ी देर रुककर कीर्तन बंद कर दोनों हाथ आकाश की ओर उठाते हैं। भाव करते हैं ऊपर आकाश से ऊर्जा बरस रही है। स्वयं के शरीर को ऊर्जा से भरा हुआ महसूस करते हैं और फिर दोनों हाथ उन रुग्ण लोगों की तरफ हथेलियां नीची करके भाव करते हैं कि यह ऊर्जा उन लोगों की तरफ जा रही है और उनको स्वस्थ कर रही है। इस प्रक्रिया को दो-तीन बार दोहराते हैं। सामूहिक चिकित्सा की यह विधि भी बहुत कारगर है।

    चिकित्सा का चौथा प्रयोग भी होता है जिसको डिस्टेंट हीलिंग कहते हैं। इसमें उस व्यक्ति का फोटोग्राफ रखना या उसकी स्पर्श की हुई कोई चीज जैसे रूमाल या उसका कोई वस्त्र इस तरह की कोई चीज उपयोगी होगी उस व्यक्ति की ऊर्जा किसी भांति वहां मौजूद हो। इस व्यक्ति को आपने यदि कहीं पहले देखा है तो उसका फोटोग्राफ बहुत उपयोगी हो जाएगा। और कभी-कभी किसी व्यक्ति को आप नहीं भी जानते है तो उसको भी चित्र के द्वारा हीलिंग भेज सकते हैं। प्रक्रिया वही होगी स्नान करके सुबह-सुबह प्रार्थना भाव में डूबकर व्यायाम और प्राणायाम करने के उपरांत साक्षी भाव में, समाधि में स्थिर होकर उस व्यक्ति के फोटोग्राफ की तरफ देखें। आप चाहें तो अपने आज्ञा चक्र पर अपनी ऊर्जा को फोकस करके उस व्यक्ति के फोटोग्राफ के आज्ञा चक्र पर ऊर्जा को प्रेषित करें। या चाहें तो दोनों हथेलियों से भाव करें कि ऊर्जा जा रही है। उसके फोटोग्राफ के माध्यम से उस व्यक्ति तक पहुंच रही है और उसकी चिकित्सा हो रही है।

    इस चौथे प्रयोग के लिए एक विशेष समय नियुक्त किया जाए। उस व्यक्ति को भी पता हो कि आप इस समय उसकी हीलिंग कर रहे हैं। तो टेलीफोन से इस बात का समय पहले से तय होना चाहिए। वह व्यक्ति उस समय स्नान करके ताजे वस्त्र पहनकर ध्यानपूर्वक प्रार्थना भाव में डूबा हुआ शिथिल और शांत होकर ऊर्जा को ग्रहण करने की भावदशा में हो। पहले से समय तय कर लें कि 15 मिनिट यह प्रयेग चलेगा उस 15 मिनिट में वह बहुत ग्रहणशील हो जाए। वह यही कल्पना करें कि हीलर उसके पास बैठ कर ही उसको हीलिंग दे रहा है। यह डिस्टेंस हीलिंग दूर से दिव्य चिकित्सा का एक प्रयोग है।

    अंतिम बात, इसे केवल एक सहयोगी चिकित्सा के रूप में लें, मुख्य इलाज जो चल रहा है, उसे चलने दें। स्वास्थ्य में सुधार आने पर डॅाक्टर की सलाह के अनुसार दवा अथवा उसके डोज में परिवर्तन करें।

    ~ स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

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