क्या छोटे बच्चों को विश्वास सिखाना गलत है? क्या हम बच्चे को न बताएं कि कौन तुम्हारा पिता है? कौन तुम्हारी मां है?
Question
प्रश्न – पूछा है कि विश्वास तो सिखाना ही पड़ेगा बच्चे को। छोटे बच्चों को अगर हम विश्वास न सिखाएंगे तो उनको कुछ भी नहीं सिखा सकेंगे।
पूछा है कि अगर हम बच्चे को न बताएं कि कौन तुम्हारा पिता है? कौन तुम्हारी मां है?
Answer ( 1 )
मैंने यह नहीं कहा है कि बच्चे को आप यह न सिखाएं कि रास्ते पर बाएं चलना चाहिए, यह मैंने नहीं कहा है। यह मैंने नहीं कहा है कि स्वतंत्रता का यह अर्थ है कि रास्ते पर जहां चलना हो वहां चलो, यह मैंने नहीं कहा है। रास्ते पर बाएं चलना बिलकुल कामचलाऊ बात है, सत्य का उससे कोई संबंध नहीं है, हम जीवन के व्यवहार मात्र की बात है। हिंदुस्तान में हम बाएं चलते हैं और अमेरिका में दाएं चलते हैं, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वहां की सड़कों पर लिखा है, दाएं चलो, यहां की सड़कों की पर लिखा है, बाएं चलो। ये कामचलाऊ बातें हैं, ये कोई सत्य नहीं है। ये जीवन के लिए उपयोगी हैं।
पूछा है कि अगर हम बच्चे को न बताएं कि कौन तुम्हारा पिता है? कौन तुम्हारी मां है?
ये भी कामचलाऊ बातें हैं। ये भी बाएं और दाएं चलने से ज्यादा इनका मूल्य नहीं है। अगर एक बच्चे को बचपन से ही उसका झूठा पिता बता दिया जाए कि वह तुम्हारा पिता है, तो उससे भी काम चल जाएगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। जीवन भर काम चल सकता है। ऐसे तो कौन किसका पिता है, सारी बातें कामचलाऊ हैं।
बुद्ध बारह वर्षों के बाद अपने घर वापस लौटे थे। तो उनके पिता क्रुद्ध थे, गुस्से में थे। बारह साल पहले वह लड़का उन्हें छोड़ कर चला गया। एक ही लड़का था। बारह साल बाद उनके लड़के की कीर्ति सब तरफ फैल गई थी। लेकिन पिता का क्रोध समाप्त नहीं हुआ था। दूर-दूर से खबरें आने लगी थीं कि उनका लड़का कुछ और हो गया, ज्योतिर्मय हो गया, प्रबुद्ध हो गया। लाखों लोग उसे स्वीकार किए हैं। हजारों भिक्षु उसके पीछे चल पड़े हैं। उसने एक नया रास्ता तोड़ दिया है परमात्मा तक जाने का। लेकिन ये खबरें बुद्ध के पिता के क्रोध को न तोड़ सकीं।
आखिर बुद्ध का आगमन फिर उस गांव में हुआ जिसमें वे पैदा हुए थे। बारह साल बाद पिता उनके गांव के बाहर उन्हें लेने गए। पूरा गांव लेने गया। पिता ने जाते से ही पहली बात यही कही कि सिद्धार्थ तू वापस लौट आ, मेरे दरवाजे अभी भी खुले हैं, पिता का प्रेम बहुत बड़ा है, तूने चोट तो बहुत पहुंचाई कि तू घर छोड़ कर चला गया, मेरे बुढ़ापे में अकेला लड़का है तू, लेकिन अभी भी वापस लौट आ, मैं तेरी प्रतीक्षा करता हूं, आखिर मैं तेरा पिता हूं और तुझे माफ कर दूंगा, मेरे द्वार खुले हैं, तू वापस लौट चल। यह शोभा नहीं देता कि मेरा लड़का भिक्षा का पात्र लिए हुए सड़कों पर चले।
बुद्ध ने क्या कहा? बुद्ध ने अपने पिता से कहा, मुझे ठीक से तो देखें, जो लड़का आपके घर से गया था वही वापस लौटा है या मैं दूसरा मनुष्य होकर आया हूं? मुझे एक बार ठीक से तो देख लें। इन बारह वर्षों में गंगा में बहुत पानी बह गया। मैं वही नहीं हूं। लेकिन पिता तो, क्रोध से उनकी आंखें धुंधली हो रही थीं, उन्होंने कहा, क्या तू मुझे यह भी सिखाएगा कि मैं अपने लड़के को नहीं पहचानता? मैंने ही तुझे पैदा किया, मेरा ही खून तेरी नसों में है।
बुद्ध ने कहा, भूलते हैं आप। गलती में हैं आप। मैं आपके द्वारा पैदा तो हुआ, लेकिन आप मेरे बनाने वाले नहीं हैं। मैं आपके रास्ते से दुनिया में तो आया, लेकिन रास्ता निर्माता नहीं होता है।
मैं जिस रास्ते से चल कर अभी इस गांव तक आया हूं अगर वह रास्ता कहने लगे कि तुम मेरे ऊपर चले थे, मैं तुम्हें भलीभांति जानता हूं, तो जैसी भूल हो जाएगी वैसी पिता और मां भी भूल कर जाते हैं। बच्चे उनसे होकर आते हैं लेकिन उनसे पैदा नहीं होते। पैदा होने का सूत्र बहुत गहरा है। मां-बाप उसमें उपकरण से ज्यादा नहीं, इंस्ट्रूमेंट से ज्यादा नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ये कोई बड़ी सच्चाइयों की खोजें नहीं हैं। तो आप कह दें कि कौन पिता है, कौन मां। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जिंदगी की कामचलाऊ बातों के लिए विश्वास काम दे सकता है, क्योंकि जिंदगी खुद एक सपना है, उसमें झूठे विश्वास काम दे सकते हैं। लेकिन जो जीवन के सत्य को खोजने निकला हो, सत्य को खोजने निकला हो, उसके आधार विश्वास पर नहीं रखे जा सकते, क्योंकि विश्वास असत्य है। और सत्य की खोज असत्य से शुरू नहीं की जा सकती। सत्य की खोज तो सत्य से ही शुरू करनी होगी। और पहला सत्य यही है कि हम नहीं जानते जीवन को, हम नहीं जानते परमात्मा को, हम नहीं जानते आत्मा को, सुनी हुई बातें हैं ये लेकिन हमारा जानना नहीं है। यह पहला सत्य है। इस अज्ञान का बोध पहला सत्य है। और विश्वास इस बोध को मिटा देते हैं, जो सबसे बड़ी खतरनाक बात है। वे इस बोध को मिटा देते हैं कि मैं नहीं जानता हूं, बल्कि इस अहंकार को पैदा कर देते हैं कि मैं जानता हूं। पंडित में यही अहंकार तो प्रगाढ़ हो जाता है कि मैं जानता हूं।
मैं जानता हूं। क्या जानते हैं हम? राह पर पैर के नीचे जो कंकड़-पत्थर पड़े हैं उनको भी नहीं जानते। द्वार पर जो वृक्ष लगे हैं उनको भी नहीं जानते। आकाश में जो तारे निकलते हैं उनको भी नहीं जानते। पास-पड़ोस में जो लोग बैठे हैं उनको भी नहीं जानते। एक पिता अपने पुत्र को नहीं जानता। एक पति अपनी पत्नी को नहीं जानता। एक मां अपने बेटे को नहीं जानती। एक भाई अपने भाई को नहीं जानता। क्या जानते हैं हम? जीवन है इतना रहस्यपूर्ण, कुछ भी नहीं जानते हैं हम। लेकिन विश्वास इस भ्रम को पैदा कर देते हैं कि हम जानते हैं।
एक आदमी ईश्वर तक के संबंध में दावे से बोलने लगता है कि मैं जानता हूं–कि उसके चार मुंह हैं, कि दो मुंह हैं, कि कितने हाथ हैं, कहां रहता है, कहां नहीं रहता, यह सब मैं जानता हूं। एक कंकड़ को भी हम जानते नहीं। एक पत्ते को भी हम जानते नहीं। हवा के एक झोंके को भी हम जानते नहीं। जीवन बिलकुल रहस्यपूर्ण है और हमारा अज्ञान है गहन। लेकिन विश्वास के द्वारा, किताबों से सीखे गए शब्दों के द्वारा यह इल्युजन पैदा हो जाता है, यह भ्रम पैदा हो जाता है कि मैं जानता हूं। और धर्म की खोज में, सत्य की खोज में यह भ्रम सबसे बड़ी बाधा है। क्योंकि जिसे यह खयाल पैदा हो गया कि मैं जानता हूं, उसका सीखना बंद हो गया, उसकी लघनग बंद हो गई। अब वह सीखेगा नहीं, क्योंकि वह जानता है।
इसलिए तथाकथित पंडित जो तोतों की भांति सारे ग्रंथों को रट लेते हैं उनका सीखना हमेशा के लिए बंद हो जाता है। वे मर गए। अब उनकी जिंदगी में कोई सीखना नहीं है, कोई गति नहीं है।
इसलिए मैंने कहा कि विश्वास नहीं, विचार। विचार करेगा मुक्त, खोलेगा द्वार, सीखने के द्वार खोल देगा, रास्ते उन्मुक्त करेगा। इस अहंकार को तोड़ देगा कि मैं जानता हूं और इस विनम्रता को, इस ह्यूमिलिटी को पैदा करेगा कि मैं नहीं जानता हूं।
जिस दिन आपको यह सच में दिखाई पड़ जाए कि मैं नहीं जानता हूं, उस दिन आपके भीतर एक धार्मिक आदमी का जन्म हो गया। क्योंकि न जानने का भाव आपको विनम्र कर देगा। न जानने का भाव आपको निर-अहंकारी कर देगा। न जानने का भाव आपके आग्रह, पंथ, संप्रदाय तोड़ देगा, आप खड़े हो जाएंगे और कहेंगे कि मैं तो नहीं जानता हूं। छोटे बच्चे की तरह एक सरलता, एक इनोसेंस इस भाव के साथ पैदा होगी। और वह सरलता इतनी बहुमूल्य है कि उसके समक्ष दूसरों के द्वारा सीखे गए विश्वास दो कौड़ी के भी नहीं है। उस निर्दोष स्थिति में ही, उस इनोसेंस में ही, जीवन सत्य की तरफ आंखें उठ सकती हैं। इसलिए मैंने कहा कि विश्वास नहीं, विचार।
— ओशो [अंतर की खोज-प्रवचन-05]