क्या ‘धर्म की खोज’ ऊर्जा, पदार्थ या बिग बैंग थ्योरी की वैज्ञानिक धारणा से कोई तालमेल रखती है?
Question
प्रश्न- विज्ञान ने खोजा कि पदार्थ एवं ऊर्जा एक ही सत्य के दो पहलू हैं तथा आपस में परिवर्तनशील हैं। पदार्थ ऊर्जा में और ऊर्जा पदार्थ में रूपांतरित हो सकता है। आधुनिक विज्ञान ने बिग बैंग थ्योरी खोजी है जो कहती है कि एक महाशून्य से सारे जगत का निर्माण हुआ। क्या धर्म की खोज इस वैज्ञानिक धारणा से कोई तालमेल रखती है?
Answer ( 1 )
हां; बहुत दूर तक तालमेल रखती है। संतों ने सदा से यही कहा है जो आज बिग बैंग थ्योरी कह रही है। एक जोर की बैंग हुई… जोर की ध्वनि और सारे जगत का निर्माण महाशून्य से हुआ। ईसाई कहते हैं- लोगोस, दि वर्ड। भारतीय संत कहते हैं, शबद, प्रणव, ओंकार, सतनाम से सारे जगत का सृजन हुआ। सर्वप्रथम ओंकार, उसके बाद ऊर्जा के विविध रूप, फिर समस्त पदार्थ, एवं सारे जगत का विस्तार आया। विज्ञान ने पदार्थ के तल पर खोजा- पदार्थ व ऊर्जा, इसी प्रकार अध्यात्म की भाषा में हम कह लें देह और परमात्मा, शरीर और चेतना, ये वही दो बातें हैं और ये परिवर्तनशील हैं।
जैसा मैंने थोड़ी देर पहले कहा- चेतना ही संघनित होकर मन बन जाती है और मन संघनित होकर शरीर का रूप धारण कर लेता है। इसलिए हमारे मन में जैसी वासनाएं होती हैं, जैसी कामनाएं होती हैं- वैसे-वैसे हमारा शरीर विकसित होता चला जाता है। समझें, आज से कुछ हजार साल पहले मनुष्यों को सुगंध का अहसास नहीं होता था। ऋग्वेद को पढ़ें- उसमें फूलों का तो वर्णन है सुगंध का कहीं भी कोई वर्णन नहीं है। ऐसा लगता है कि ऋग्वेद के काल में गंध का अहसास नहीं होता था। सुगंध की इंद्रियां विकसित नहीं हुई थीं। पहले चित्त में कामना पैदा हुई कि सूंघा जाए और तब शरीर में वह इंद्रियां विकसित होनी शुरू हुई जो सूंघने में सक्षम हैं। आज से पांच हजार साल पहले संभवतः केवल तीन रंग ही देखे जाते थे प्राचीन ग्रंथों में तीन रंगों से ज्यादा का वर्णन नहीं है। आज हम सात रंग देखने में सक्षम हैं। शायद भविष्य में हम इंद्रधनुष से भी अधिक रंगों को देख सकेंगे। आज भी हमारे बीच में जो कलाकार, पेंटर्स, कवि हैं वे शायद हमसे ज्यादा मनमोहक रंगों को देख पाते हैं जो हमें नहीं दिखते। अब भी करीब 3-4 प्रतिशत कलर ब्लाइंड लोगों की आंखों में वह क्षमता नहीं है कि सातों रंगों को देख सकें।
धीरे-धीरे मनुष्य का विकास होता जा रहा है। इंद्रियां विकसित हो रही हैं। पहले मन में कामनाएं पैदा होती हैं फिर वैसा शरीर निर्मित होना शुरू हो जाता है- चेतन से मन, मन से तन। विज्ञान की इस खोज से बात मिलती जुलती है कि पदार्थ और ऊर्जा आपस में रूपांतरर्णीय हैं। बिग बैंग थ्योरी से भी यह बात सामंजस्य रखती है कि संसार की शुरुआत एक महाध्वनि-ओम् से हुई और जगत का प्रलय भी उसी महाध्वनि में होगा, उसी में फिर सब विलीन हो जाएगा। विज्ञान कहता है कि पहले महाशून्य था वह दो में विभाजित हो गया- पॅाजिटिव और निगेटिव; सकारात्मक और नकारात्मक। निश्चित रूप से प्रलय में फिर वे विपरीत ऊर्जाएं आपस में मिलकर शून्य हो जाएंगी और सारी लीला समाप्त हो जाएगी। यह शक्ति का नृत्य, खेल ही है।
ऐसे समझो पानी, भाप, बर्फ; एच.टूओ. के तीन रूप हैं- ठोस, तरल, और गैस। ऐसे ही हमारा शरीर ठोस रूप है। मन बहुत तरल, चंचल है। चेतना वाष्परूप है। और ये आपस में परिवर्तनशील हैं। इसलिए इनमें कोई विरोध नहीं है। शरीर और आत्मा एक दूसरे के विपरीत नहीं हैं। जैसे हिमालय पर जमी शाश्वत बर्फ और हवा में उड़ते बादल, एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं। एक ही जल दोनों में मौजूद हैं अलग-अलग रूपों में। कहां कोहरा, कहां ओसकण, कहां ओले व हिमपात, कहां मानसूनी वर्षा… यद्यपि सबने होने के बड़े अलग-अलग रंग-ढंग चुने हैं। किंतु यथार्थ एक है। जीवन इंद्रधनुष जैसा है।
हमारी ऊर्जा या चेतना के इस स्पैक्ट्रम को समझें। प्रथम, सबसे स्थूल हमारा शरीर, भौतिक देह है। उससे सूक्ष्म एथरिक बॅाडी या भाव शरीर या आकाशीय शरीर है। तीसरा- एस्ट्रल बॅाडी या सूक्ष्म शरीर। चौथा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म जिसे हम कहते हैं मनस शरीर, साइकिक बॅाडी। फिर पांचवां आत्म शरीर या स्प्रीच्युअल बॅाडी। छटवां कॅास्मिक बॅाडी ब्रह्म शरीर, और सातवां निर्वाण काया या शून्य शरीर। शुरुआत शून्य से हुई, वह स्थूल होते-होते स्थूल शरीर तक पहुंच गया। तो सूक्ष्म से स्थूल तक का यह पूरा स्पैक्ट्रम इंद्रधनुष जैसा है। इसमें विपरीत कुछ भी नहीं है। विज्ञान की यह बात ठीक है कि पदार्थ और ऊर्जा आपस में एक-दूसरे में बदल सकते हैं। इंद्रधनुष का हरा रंग ही धीरे-धीरे नीला हो जाता है एक तरफ, वही दूसरी तरफ पीला हो जाता है। या ऐसा कह लें कि नीले और पीले जहां मिल जाते हैं- वहां हरा रंग दिखने लगता है। इंद्रधनुष में क्लीयर कट डिस्टिंक्शन हम नहीं कर सकते कि कहां पर एक रंग समाप्त होता है और कहां से दूसरा रंग शुरू होता है। एक रंग दूसरे में परिवर्तित होता जाता है।
शून्य शरीर या निर्वाण काया से ही कॅास्मिक बॅाडी, ब्रह्म शरीर का निर्माण हुआ। वह ब्रह्म शरीर ही स्प्रीच्युअल बॅाडी, आत्मा बन गई। एक इंडीविज्युअल चेतना के भीतर धीरे-धीरे मनस शरीर बना। मनस शरीर से एस्ट्रल बॅाडी बनी। उस सूक्ष्म शरीर से भाव शरीर और भाव शरीर के बाद स्थूल शरीर। यह पूरा एक स्पैक्ट्रम है। चीजें आपस में बदल रही हैं। कहने के लिए हमने सात खंडों में बांट दिया लेकिन ऐसे सुस्पष्ट खंड कहीं हैं नहीं। कहीं कोई विभाजन नहीं हैं। एक रंग दूसरे रंग पर ओवरलैप कर रहा हैं। एक दूजे में बदल रहा है। कुछ लोगों की यह धारणा सरासर गलत है कि शरीर और परमात्मा एक दूसरे के विपरीत हैं। वस्तुतः वे एक दूसरे के परिपूरक हैं। आत्मा का ही स्थूल रूप शरीर है। शरीर का ही बहुत सूक्ष्म रूप आत्मा है। दोनों में वैमनस्य नहीं है। प्रभु का प्रगट रूप संसार है। संसार का ही अतीन्द्रिय सूक्ष्म रूप परमात्मा है।
~ स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती