क्या धार्मिक होने के लिए श्रद्धा और विश्वास का होना जरुरी है?
Question
प्रश्न – क्या धर्म विश्वास है? क्या धर्म में श्रद्धा करना जरुरी है?
प्रश्न – यदि हम धर्म में श्रद्धा न रखेंगे, यदि हम विश्वास न रखेंगे, तब तो क्या हमारा मार्ग भटक जाएगा?
Answer ( 1 )
यह वैसा ही है जैसे एक अंधे आदमी को हम कहें कि तुम अपने हाथ में जो लकड़ी लिए घूमता है, अपनी आंखों का इलाज करवा ले और इस लकड़ी को फेंक दे, तो वह अंधा आदमी कहे, माना मैंने कि आंखों का इलाज तो मुझे करवा लेना है लेकिन लकड़ी को अगर मैं फेंक दूंगा तो भटक जाऊंगा। बिना लकड़ी के तो मैं चल ही नहीं पाता हूं। निश्चित ही अंधा आदमी बिना लकड़ी के नहीं चल पाता है लेकिन आंख वाले आदमी को लकड़ी की कोई भी जरूरत नहीं है।
और जो अंधा आदमी यह आग्रह करेगा कि मैं तो लकड़ी के बिना चलूंगा ही नहीं, वह इस बात को भूल ही जाएगा कि आंख की जगह लकड़ी कोई सब्स्टीटयूट नहीं है, कोई परिपूर्ति नहीं है। लेकिन यह सीधी सी बात भी हमें दिखाई नहीं पड़ती है।
एक छोटी सी कहानी कहूं, उससे शायद मेरी बात समझ में आए।
एक बूढ़ा आदमी था, उसकी उम्र कोई सत्तर पार कर गई थी तब उसकी दोनों आंखें चली गईं। उसके आठ लड़के थे, पत्नी थी, आठ लड़कों की बहुएं थीं। उन सबने उसे समझाया, चिकित्सक कहते थे कि आंखें ठीक हो सकती हैं, लेकिन उस बूढ़े आदमी ने कहा, मुझे आंखों की जरूरत क्या है? आठ मेरे लड़के हैं, उनकी सोलह आंखें; आठ मेरी बहुएं हैं, उनकी सोलह आंखें; मेरी पत्नी है, उसकी दो आंखें, ऐसे मेरे घर में चौंतीस आंखें हैं। तो जिसके घर में चौंतीस आंखें हों उसके पास अगर दो आंखें न भी हुईं तो फर्क क्या पड़ता है? ये चौंतीस आंखें क्या मेरा काम न कर सकेंगी? और अब मैं मैं बूढ़ा हुआ, अब मुझे आंखों की जरूरत भी क्या है?
वह अपनी बात पर अड?ा रहा। आखिर समझाने वाले हार गए और बात बंद हो गई। लेकिन इसके कोई दो महीने बाद ही उस बूढ़े आदमी के भवन में आग लग गई और तब वे चौंतीस आंखें बाहर निकल गईं। जब आग लगी तो उनमें से किसी को भी यह खयाल न आया कि एक बूढ़ा आदमी भी घर में है जिसके पास आंखें नहीं हैं। जब आग लगी तो अपने प्राण बचाने जरूरी हो गए। और अपनी आंखें अपने प्राण बचाने के काम में आ गईं। जब वे सब बाहर पहुंच गए सुरक्षित तब उन्हें खयाल आया कि घर में बूढ़ा आदमी भी है जो भीतर रह गया, लेकिन तब तक देर हो गई थी, लपटों ने मकान घेर लिया था, धू-धू करके मकान जल रहा था, अब भीतर जाना कठिन था। वहां भीतर वह बूढ़ा आदमी जब जलने लगा, तब उसे भी यह खयाल आया, लेकिन तब बहुत देर हो गई थी। कि जब मकान में आग लगी हो तो अपनी आंखों के अतिरिक्त और किसी की आंखें काम नहीं आ सकतीं। लेकिन तब बहुत देर हो गई थी। तब मकान जल रहा था और उस बूढ़े आदमी को उसी मकान में जल जाना पड़ा।
जीवन के मकान में तो रोज ही आग लगी है। जीवन का मकान तो प्रतिक्षण, प्रतिपल जल रहा है, उसमें किसी दूसरे की आंख काम नहीं आ सकती। अपनी आंख ही काम आ सकती हैं इस जीवन के जलते हुए मकान से बाहर ले जाने के लिए। लेकिन फिर भी वह बूढ़ा आदमी तो जिन चौंतीस आंखों पर विश्वास किया था वे उसके सामने थीं, मौजूद थीं। हम तो उन आंखों पर विश्वास किए हैं, कोई आंखें दो हजार साल पहले समाप्त हो गईं, कोई ढाई हजार साल पहले, कोई पांच हजार साल पहले। कोई राम की आंखों पर विश्वास किए हुए है, कोई कृष्ण की आंखों पर, कोई महावीर की, कोई बुद्ध की, कोई क्राइस्ट की, कोई मोहम्मद की, वे कोई भी आंखें मौजूद नहीं हैं। उन आंखों ने जरूर उन लोगों को बचा लिया होगा जिनकी वे आंखें थीं। लेकिन इस भूल में कोई न पड़े की वे आंखें मेरे काम आ सकती हैं। मेरे काम मेरी आंखें आ सकती हैं। मेरी जिंदगी है, मेरी मौत है, मेरा दुख है, मेरा अज्ञान है, मेरा ही प्रकाश भी चाहिए जो उसे मिटा दे।
आपके लिए कोई मर सकता है? आपकी जगह कोई मर सकता है? और कोई दूसरा मर भी जाए तो मृत्यु का आपको अनुभव हो सकता है? आपकी जगह कोई प्रेम कर सकता है? आप किसी को अपनी जगह प्रेम करने दें और आपको प्रेम का अनुभव हो जाए? हम जानते हैं यह नहीं हो सकता। लेकिन जहां तक परमात्मा का संबंध है हम इस खयाल में होते हैं कि दूसरे की आंखों से उसे देखा जा सकता है। प्रेम भी दूसरे की आंखों से नहीं किया जा सकता, तो परमात्मा कैसे दूसरे की आंखों से देखा जा सकेगा?
अपनी आंख चाहिए। लेकिन सच्चाई यह है कि चूंकि परमात्मा का हमारे मन में कोई मूल्य नहीं है। इसलिए हम सोचते हैं कि दूसरे की आंख से भी काम चल जाएगा। जिंदगी में हम भलीभांति जानते हैं, अपने पैर चलाते हैं, अपनी आंखें दिखलाती हैं। लेकिन चूंकि परमात्मा का हमारे मन में कोई बहुत मूल्य नहीं है, इसलिए हम सोचते हैं, दूसरे की आंख से भी काम चल जाएगा। सच यह है कि शायद हमारे भीतर गहरी प्यास नहीं है परमात्मा को जानने की। नहीं तो यह असंभव था कि हम दूसरे पर विश्वास करके बैठे रहें। अगर प्यास गहरी होती तो हम अपनी आंख खोजते। और जो मैंने कल आपसे कहा है उसका केवल इतना ही मतलब है। विचार आपकी आंख है, विवेक आपकी आंख है। विश्वास आपकी आंख नहीं किसी और की है।
जो मेरा जोर था वह इस बात पर था कि विश्वास के द्वारा आप किसी और के माध्यम से सत्य को देखते हैं। यह प्रक्रिया गलत है। सत्य को सीधा देखा जा सकता है। सीधा और प्रत्यक्ष, किसी और के माध्यम से नहीं। विश्वास किसी और का सहारा लेता है, किसी और के माध्यम से देखता है। और क्या परिणाम होता है ऐसे विश्वास का? और ऐसे विश्वास और अंधेपन में लिए गए निष्कर्ष कैसे होते हैं?
रामकृष्ण एक कहानी कहते थे। रामकृष्ण कहते थे, एक अंधा आदमी था एक गांव में और उस अंधे आदमी के मित्रों ने एक बार उसे दावत दी और बहुत ही स्वादिष्ट खीर बनाई। उस अंधे ने उसे खाया और उसने पूछा, मेरे मित्रो, यह किस चीज से बनी है? उसके मित्रों ने कहा, यह दूध से बनी है। वह अंधा आदमी पूछने लगा, दूध कैसा होता है? वे मित्र उसी तरह के नासमझ रहे होंगे जिस तरह के उपदेशक अक्सर होते हैं। वे उसे समझाने बैठ गए कि दूध कैसा होता है। एक मित्र ने कहा, दूध होता है शुभ्र, सफेद। उस अंधे आदमी ने कहा, मैं समझा नहीं कि यह शुभ्र और सफेद क्या है। यह शब्द तो मैंने सुना है, लेकिन क्या है यह शुभ्रता? यह सफेदी क्या है? कैसी होती है? तो उन मित्रों ने कहा, तुमने बगुला देखा है? बगुले के सफेद पंख देखे हैं? ठीक बगुले के पंखों जैसी सफेदी होती है शुभ्र।
वह अंधा आदमी बोला, यह और मुश्किल हो गई। अभी मैं यह नहीं समझ पाया था कि दूध कैसा होता है, अभी यह नहीं समझ पाया था कि सफेदी कैसी होती है और एक नया प्रश्न तुमने खड़ा कर दिया यह बगुला कैसा होता है? मैं तो जानता नहीं बगुला। कुछ इस भांति बताओ कि पहेली हल हो जाए, तुम तो मेरी पहेली को और उलझाते चले जाते हो। पुराने प्रश्न तो पुरानी जगह खड़े हैं और नये प्रश्न खड़े हो जाते हैं। तुम्हारा उत्तर नया प्रश्न बन जाता है। कुछ ऐसा समझाओ कि मैं समझ सकूं।
वे चिंता में पड़े। और एक मित्र उसके पास गया, उस अंधे मित्र के पास सरका, उसने अपना हाथ उसके बगल में ले गया और कहा, मेरे हाथ पर हाथ फेरो, बगुले की गर्दन इसी की भांति होती है, झुके हुए हाथ की तरह। उस अंधे आदमी ने उस मित्र के हाथ पर हाथ फेरा, वह खुशी से प्रसन्न हो उठा और उसने कहा, मैं समझ गया, मैं समझ गया, दूध झुके हुए हाथ की भांति होता है।
वे मित्र हैरान हो गए इस नतीजे पर! लेकिन जहां तक अंधे का सवाल है क्या उसके लॉजिक में कोई भूल है? उसके तर्क में कोई गलती है? उसने पूछा था, दूध कैसा होता है? कहा, सफेद। उसने पूछा था, सफेद कैसा होता है? कहा, बगुले की भांति। उसने पूछा, बगुला कैसा होता है? बताया उसकी गर्दन होती है झुके हाथ की भांति। उसने नतीजा लिया कि दूध झुके हुए हाथ की भांति होता है।
अंधे आदमी को रंग समझाने का यही मतलब हो सकता है और क्या मतलब होगा? उसके पास अपनी तो कोई आंख नहीं कि वह देख सके। वह तो अंधा है केवल विश्वास कर सकता है। और जो शब्द उसे बताए जाएंगे उनका अर्थ वह क्या लेगा? उनका अर्थ भी वह अपने अंधेपन के अनुसार ही ले सकता है।
तो इस भ्रम में न रहें कि कृष्ण ने जो कहा है वही आपने सुन लिया होगा। इस भ्रम में भी न रहें कि क्राइस्ट ने जो कहा है वही आप समझ गए होंगे। इस भ्रम में भी न रहें कि महावीर को आप पहचान गए होंगे कि उन्होंने क्या कहा है। उन्होंने जो आंख से देख कर कहा है वह हमने अपने अंधेपन में वैसा ही सुना होगा जैसा उस अंधे ने दूध के संबंध में सुना है। और वे ही हमारे विश्वास बन गए हैं।
वे विश्वास हमारे जीवन को कहां ले जाएंगे? अगर यह अंधा आदमी दूध की तलाश में निकल जाए और लोगों से पूछे कि झुके हुए हाथ जैसा दूध मुझे चाहिए, तो इस जमीन पर यह कहीं खोज पाएगा? इसका सारा जीवन इसके इस विश्वास के कारण गलत हो जाएगा। लेकिन इसमें भूल अंधे आदमी की नहीं थी, इसमें भूल उन मित्रों की थी जिन्होंने उसे समझाया।
अगर वे मित्र थोड़े भी समझदार होते तो उन्होंने यह समझाने की कोशिश न की होती। बल्कि उन्होंने कोशिश की होती कि इस अंधे आदमी की आंख ठीक हो जाए। उन्होंने इसके आंख के इलाज का उपाय किया होता। वे इसे किसी चिकित्सक के पास ले गए होते और कहते कि दूध को हम न समझाएंगे क्योंकि समझाने का कोई रास्ता नहीं है। और दूध को हम समझा भी देंगे तो तुम जान न सकोगे, केवल विश्वास कर सकोगे, और विश्वास बहुत गलत हो जाता है। तो हम तुम्हारी आंख की चिकित्सा के लिए ले चलते हैं। अगर वे मित्र उसके साथी होते और उससे प्रेम करते होते और समझदार होते तो उन्होंने उसका उपचार किया होता, उसे उपदेश न दिया होता।
इस जमीन पर जो लोग जानते हैं उनके लिए धर्म एक उपदेश नहीं एक उपचार है, एक चिकित्सा है, आंखों का खोलना है। विश्वास करना नहीं विवेक का जगाना है। वह जो भीतर सोया हुआ विवेक है अगर वह जाग जाए तो आप देख सकेंगे कि परमात्मा क्या है और कैसा है, सत्य क्या है और कैसा है, जीवन का अर्थ क्या है, वह आप देख सकेंगे। और आप देख सकें इसीलिए मैं कह रहा हूं कि आप माने नहीं, क्योंकि जो मान लेता है उसकी खोज बंद हो जाती है।
जो नहीं मानता और जो इस बात पर अडिग रहता है कि जब तक मैं न जान लूंगा तब तक मैं नहीं मानूंगा, उसके प्राण आंदोलित रहते हैं, उसकी चेतना बेचैन रहती है, उसके भीतर एक अतृप्ति, एक डिस्कंटेंट निरंतर उसे धक्के देता रहता है कि मैं खोजूं और जानूं। लेकिन जो आदमी मान कर बैठ जाता है उसकी यात्रा बंद हो जाती है। उसके भीतर की अतृप्ति समाप्त हो जाती है। वह संतुष्ट हो जाता है। वह मान लेता है, ईश्वर है। वह मान लेता है, आत्मा है। वह सब मान लेता है और चुप हो जाता है।
जो मान लेता है उसके भीतर की खोज का अंत हो जाता है। लेकिन जो यह समझता रहता है कि मैं अभी नहीं जानता, मैं अज्ञान में हूं, मुझे कुछ भी पता नहीं है, जो इस स्थिति को ताजा रखता है कि मैं नहीं जानता हूं, मैं अज्ञान में हूं, उसका अज्ञान उसके भीतर एक क्रांति बन जाता है, उसकी एक पीड़ा बन जाती है, उसका अज्ञान उसे धक्के देता है, उसकी आत्मा को जगाता है। क्योंकि कोई भी आदमी अज्ञान से तृप्त नहीं हो सकता, सहमत नहीं हो सकता, उसे बदलना चाहता है।
उसी बदलाहट की चेष्टा में से निकलती है साधना। उसी अतृप्ति से निकलता है अन्वेषण। उसी बेचैनी और अशांति में से पैदा होती है खोज। और वही खोज एक दिन पहुंचा देती है। वही प्यास एक दिन प्राप्ति तक ले जाने का मार्ग बन जाती है।
इसलिए मैं कहता हूं: विश्वास न करें, विचार करें; श्रद्धा न करें, सोचें, जीवन की समस्या को सोचें। अपनी तरफ से खुद, निजी खोज को जारी करें, वही खोज, वही खोज आपको व्यक्तित्व देगी, आत्मा देगी, वही खोज आपको कहीं ले जाने वाली बन सकती है। इसलिए मैंने कल आपसे कहा कि विश्वास नहीं, विचार।
विश्वास में तो हम सब हैं, हजारों वर्ष से हैं। और जमीन की क्या हालत हो गई है? आदमी के समाज की क्या हालत हो गई है? विश्वास में तो हम पाले गए हैं। दस हजार साल से आदमी विश्वास में ही पाला-पोसा गया है। परिणाम क्या है? परिणाम आदमी की तरफ देखिए क्या है? इससे ज्यादा और कोई विकृति हो सकती है? इससे ज्यादा और कुछ, और कुछ विनष्ट हो सकता है? इससे ज्यादा और कोई नारकीय जिंदगी हो सकती है जो हमने बना ली है।
पृथ्वी को हमने एक नरक में परिवर्तित कर दिया है। घृणा और हिंसा और असत्य और बेईमानी, वे सब हमारे जीवन में घर कर गए हैं। और इन सबकी शुरुआत किस बात से होती है? शायद लोग आपको कहें कि इसकी शुरुआत नास्तिकों ने करवा दी; शायद वे आपसे कहें कि ये भौतिकवादी, ये मैटीरियलिस्ट, वैज्ञानिक, इन सबने यह सब खराबी करवा दी है।
गलत कहते हैं ऐसे लोग, झूठ, सरासर झूठ कहते हैं। यह तो वैसे ही है जैसे मेरे घर का दीया बुझ जाए और मैं जाकर कहूं कि अंधेरा आ गया और उसने मेरे दीये को बुझा दिया। नहीं साहब, अंधेरा आकर दीये को नहीं बुझाता है, दीया जब बुझ जाता है तभी अंधेरा आता है।
दुनिया में जो मैटीरियलिज्म है, उसके कारण धर्म का दीया नहीं बुझ गया है, धर्म का दीया बुझ चुका है इसलिए मैटीरियलिज्म है, इसलिए इतनी भौतिकता है। यह भौतिकवाद का परिणाम नहीं है कि धर्म मिट गया है, धर्म नहीं है इसलिए भौतिकवाद है। यह तो इतनी गड़बड़ और बेचैनी और दुख भरी बात है। कोई अगर यह कहता है कि भौतिकवादियों के कारण, नास्तिकों के कारण, वैज्ञानिकों के कारण, कम्युनिस्टों के कारण दुनिया से धर्म मिट गया, इससे ज्यादा झूठी और बेहूदी बात नहीं हो सकती। इसका मतलब यह है कि धर्म बहुत कमजोर है और भौतिकवाद बहुत ताकतवर है। यह बिलकुल उलटी बात है।
भौतिकवाद क्या धर्म के दीये को बुझाएगा? वह तो आता ही तब है जब धर्म का दीया मौजूद नहीं होता है। वह तो अंधेरे की तरह है। घर का दीया बुझ जाए और हम अंधेरे को गालियां देते रहें कि अंधेरा बहुत बुरा है, इसने आकर दीया बुझा दिया। तब तो फिर दीया जलाने की कोई आशा न रह जाएगी। क्योंकि दीया जलाने के लिए जरूरी होगा कि अंधेरे को निकाल कर हम बाहर कर दें, तब दीया जल सकता है, नहीं तो दीया नहीं जलेगा। और अगर हम अंधेरे को निकालने में लग गए, तो हम तो मिट जाएंगे अंधेरा नहीं निकल सकता। अंधेरे को निकालने का कोई भी उपाय नहीं है। या अंधेरा बढ़ जाए और हम धक्के दें, तो अंधेरा निकलेगा?
अंधेरा न तो लाया जा सकता है और न निकाला जा सकता है। क्यों? क्योंकि वस्तुतः अंधेरा है ही नहीं। अगर होता तो हम उसे ला भी सकते थे और निकाल भी सकते थे। वह है ही नहीं, वह केवल प्रकाश की गैर-मौजूदगी है, एब्सेंस है। उसका अपना कोई होना नहीं, उसका अपना कोई एक्झिस्टेंस नहीं, उसकी अपनी कोई सत्ता नहीं।
प्रकाश हो तो अंधेरा नहीं है और प्रकाश न हो तो उस न होने का नाम ही अंधेरा है, अंधेरे की अपनी कोई सत्ता नहीं है। इसलिए हम प्रकाश जला सकते हैं, प्रकाश बुझा सकते हैं लेकिन न तो अंधेरा जला सकते हैं और न अंधेरा बुझा सकते हैं। अंधेरे के साथ कुछ भी नहीं किया जा सकता।
तो भौतिकवादियों के कारण और नास्तिकों के कारण दुनिया में यह विकृति नहीं आ गई। यह विकृति आ गई है धर्म का दीया बुझा हुआ है इसलिए। और धर्म का दीया क्यों बुझा हुआ है? धर्म का दीया इसलिए बुझा हुआ है कि उसमें तेल की जगह पानी भर दिया है। उसमें विचार और विवेक की जगह श्रद्धा भर दी है। विवेक का तेल होता तो दीये की ज्योति जलती। श्रद्धा का पानी भर दिया है। असल में श्रद्धा का पानी भरना आसान है, मुफ्त मिल जाता है, गली-कूचे में हर जगह मिल जाता है। तेल में तो कुछ मूल्य चुकाना पड़ता है। विवेक में तो जीवन का मूल्य चुकाना पड़ता है, श्रम करना पड़ता है। श्रद्धा मुफ्त मिल जाती है। विश्वास मुफ्त मिल जाता है। विचार में तो श्रम और सामर्थ्य लगानी पड़ती है। इसलिए श्रद्धा और विश्वास का पानी भर दिया है डबरों से लाकर। अब दीया बुझ न जाए तो क्या हो? विश्वास के पानी ने धर्म का दीया बुझा दिया है। विवेक का तेल हो तो धर्म का दीया जल सकता है।
इसलिए मैंने कल आपसे कहा, छोड़ें विश्वास को और जगाएं विवेक को। और ठीक से स्मरण रखें कि जो विश्वास को छोड़ता है केवल उसका ही विवेक जग सकता है। जो विश्वास को पकड़ता है, उसका विवेक नहीं जग सकता। क्योंकि विश्वास को पकड़ने का मतलब यह है, अगर इसे ठीक से पहचानेंगे, विश्वास पकड़ने का अर्थ है कि मुझे स्वयं पर विश्वास नहीं है। विश्वास आत्म-अविश्वास का नाम है। जब मैं दूसरे पर विश्वास करता हूं, उसका मतलब है मुझे अपने पर विश्वास नहीं है। अगर मैं राम पर विश्वास करता हूं और कृष्ण पर और महावीर पर और बुद्ध पर, उसका मतलब क्या है? उसका मतलब है मुझे अपने पर विश्वास नहीं है।
बुद्ध जिस दिन मरे, उनका एक शिष्य और प्यारा भिक्षु आनंद रोने लगा, उसकी आंखों में आंसू भर गए, बुद्ध को विदा का क्षण आ गया था और बुद्ध ने कहा था अंतिम बात पूछनी हो तो पूछ लो। आनंद रोने लगा। तो बुद्ध ने कहा, आनंद अपनी आंख से आंसू पोंछ ले। क्योंकि अगर तू यह सोचता हो कि मेरे रहने से तेरे जीवन में प्रकाश था तो तू भूल में है। अपना दीया खुद बन। अपना प्रकाश खुद बन। दूसरे का प्रकाश किसी को प्रकाशित नहीं करता है। इसलिए मेरे विदा होने से कोई अंतर नहीं आता। तू दुखी मत हो। क्योंकि आनंद रोने लगा और कहने लगा, अब आप चले जाएंगे तो अंधकार हो जाएगा। बुद्ध ने कहा, तू भूल में है। अगर अंधकार है तेरे लिए तो मेरे होने से भी अंधकार होगा और अगर प्रकाश है तेरे भीतर तो मेरे न हो जाने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। और मेरी ज्योति को अपनी ज्योति समझने के भ्रम में मत रहना। खुद का दीया जला, खुद की ज्योति जला। वही साथी है, वही है साथी। किसी और का दीया साथी नहीं हो सकता है। इसलिए मैंने कहा कि विवेक और विचार, विश्वास नहीं।
— ओशो [अंतर की खोज-प्रवचन-05]