क्या भक्ति के लिए श्रद्धा का होना जरुरी है?

Question

प्रश्न कुछ मित्रों ने पूछा है कि अगर श्रद्धा नहीं तब तो भक्ति के लिए भी कोई जगह नहीं रह जाएगी।
एक और मित्र ने अगस्तीन का एक उद्धरण दिया है और पूछा है: अगस्तीन ने कहा है, श्रद्धा का अर्थ है उन चीजों में विश्वास जो दिखाई नहीं पड़तीं, और जो आदमी ऐसा विश्वास कर लेता है, परिणाम में उसे वे चीजें फिर दिखाई पड़ने लगती हैं जो कि पहले दिखाई नहीं पड़ती थीं।

Answer ( 1 )

  1. सबसे पहली बात तो मैं आपसे यह कहूं, यह अगस्तीन का वाक्य बहुत सही है लेकिन उस अर्थों में नहीं जिसमें अगस्तीन ने कहा होगा, बल्कि और दूसरे अर्थों में। निश्चित ही जो चीजें नहीं दिखाई पड़तीं उनमें अगर विश्वास कर लें तो धीरे-धीरे वे दिखाई पड़ सकती हैं। लेकिन दिखाई पड़ने से यह मत समझ लेना कि वे हैं। आपके विश्वास ने यह भ्रम पैदा किया है उनके दिखाई पड़ने का। वे चित्त के प्रोजेक्शन हैं। खुद मन की ही कल्पनाएं हैं। जरूर दिखाई पड़ने लगेंगी विश्वास करने से, लेकिन दिखाई पड़ने से यह मत सोच लेना कि वे हैं। वे विश्वास के द्वारा पैदा हो गई हैं। बाहर पैदा नहीं हो गई हैं, केवल चित्त में पैदा हो गई हैं। थोड़ी इस बात को समझें तो ये खयाल में आ सकती हैं।
    जो लोग बहुत भावप्रवण हैं, बहुत इमोशनल हैं, उन्हें इस तरह की चीजें देख लेना बहुत आसान है। जो लोग चित्त से बहुत कमजोर हैं, उन्हें भी इस तरह की चीजें देख लेना बहुत आसान है। चित्त जितना कमजोर हो उतनी कल्पनाओं को साकार रूप में देख लेना आसान है। दुनिया के कवि, चित्रकार या इस तरह के भावप्रवण लोग ऐसी चीजें देखते रहते हैं जो आपको बिलकुल दिखाई नहीं पड़तीं।
    लियो टाल्सटाय का नाम आपने सुना होगा। रूस के बड़े विचारशील लेखकों में से एक, बहुत भावप्रवण। एक रात वोल्गा के किनारे दो बजे रात अंधेरे में पुलिस के द्वारा टाल्सटाय पकड़ा गया। वोल्गा के ऊपर एक ब्रिज पर हमेशा खतरा रहता था। वह आत्महत्या करने वालों का अड्डा था। वहां निराश और दुखी लोग जाकर कूद जाते और आत्महत्या कर लेते। तो वहां एक पुलिस के सिपाही का हमेशा पहरा रहता था। रात थी आधी, टाल्सटाय वहां घूमता हुआ देखा गया। उस पुलिस के आदमी ने दो-चार बार देखा फिर वह आया, उसने टाल्सटाय के कंधे पर हाथ रखा और कहा कि महानुभाव! इरादे ठीक नहीं मालूम पड़ते हैं, यहां किसलिए इतनी रात को आप मौजूद हैं?
    टाल्सटाय बोला, मेरे मित्र, तुम थोड़ी देर से आए जिसको कूदना था वह कूद चुका, मैं तो केवल उसको विदा करने आया था। वह कांस्टेबल तो घबड़ा गया। उसने कहा कि मैं मौजूद हूं, अभी तो मुझे कोई भी दिखाई नहीं पड़ा कि कूदा हो। कौन कूदा है? तो टाल्सटाय ने कहा, पावलोवना नाम की स्त्री, नहीं पहचानते हो? फलां-फलां आदमी की पत्नी थीं, नहीं पता है? फलां-फलां मोहल्ले में रहती थीं, नहीं खयाल है?
    उस आदमी ने कहा, भाई, मेरे साथ चलो थाने और वहां जाकर सब बात लिखा दो। वे दोनों थाने की तरफ चले। रास्ते में अचानक टाल्सटाय हंसने लगा, तो उसने पूछा, क्यों हंसते हैं? उसने कहा, बस अब रहने दो, मैं जाता हूं। असल में थोड़ी भूल हो गई। मैं एक उपन्यास लिख रहा हूं और उसमें एक पावलोवना नाम की स्त्री है, वह आज, जहां तक उपन्यास पहुंचा है वहां वोल्गा में कूद कर आत्महत्या कर लेती है। और मैं इतना अभिभूत हो गया उसकी आत्महत्या से कि घर से उठ कर ब्रिज पर चला आया। और मैं भूल गया तुमसे कहना, अब मुझे खयाल आता है कि वह किसी सच्चे आदमी की बात नहीं, मेरी ही कल्पना की बात है। मैं घर वापस जाता हूं।
    टाल्सटाय एक दफा सीढ़ियां चढ़ रहा था, एक छोटी सी लाइब्रेरी जा रहा था, ऊपर संकरी सीढ़ियां थीं, दो आदमी निकल सकते थे। वह खुद चढ़ रहा था और उसके साथ एक औरत और चढ़ रही थी, वह भी उसके उपन्यास की एक पात्र, जिससे वह बातचीत करता हुआ ऊपर चढ़ रहा था। कवि और पागल अक्सर यह करते रहते हैं। उन लोगों से बातें करते हैं जो कहीं भी नहीं हैं। ऊपर चढ़ रहा था। ऊपर से एक आदमी नीचे उतर रहा था। सीढ़ियां थीं संकरी और दो ही निकल सकते थे, तीन के लायक जगह न थी, बीच में थी औरत। और यह उन्नीस सौ सत्रह की क्रांति के पहले की बात है। अब तो रूस में औरत को धक्का दे सकते हैं, तब धक्का नहीं दे सकते थे। तो ऊपर से एक आदमी उतर रहा है, कहीं धक्का न लग जाए, बीच में औरत है, तो टाल्सटाय बचा जगह करने को और सीढ़ियों से नीचे गिर पड़ा और टांग तोड़ ली और तीन महीने अस्पताल में रहा। वह दूसरा आदमी नीचे उतरा, उसने कहा, बड़ी हैरानी की बात है, आप हटे क्यों? हम दो के लायक काफी जगह थी। टाल्सटाय ने कहा, दो होते थे तो ठीक था, वहां तीन थे, वहां एक औरत और थी। कोई औरत, कोई औरत दिखाई नहीं पड़ रही? टाल्सटाय हंसा और उसने कहा, तुम्हें दिखाई नहीं पड़ेगी और अब टांग टूट जाने से मुझको भी दिखाई नहीं पड़ रही। लेकिन जब तक मैं सरका तब मेरे साथ थी और भ्रम हो गया और मैं सरक गया उसको बचाने को और टांग टूट गई।
    अगर दुनिया के कवियों और साहित्यिकों का जीवन पढ़ेंगे, तो आपको दिखाई पड़ेगा कि उनमें से अधिक लोग अपने पात्रों से बातचीत करते रहे हैं। वे पात्र उन्हें मौजूद मालूम पड़ते हैं कि हैं। अगर इन कवियों को सनक सवार हो जाए और ये भक्त हो जाएं तो इनको भगवान के दर्शन करने में देर लगेगी? इनको कोई देर न लगेगी। ये जिस प्रकार के भगवान चाहेंगे उस प्रकार के भगवान के दर्शन कर लेंगे। बांसुरी बजाने वाले भगवान चाहेंगे तो वे मौजूद हो जाएंगे और धनुर्धारी भगवान चाहेंगे तो वे मौजूद हो जाएंगे और सूली पर लटके क्राइस्ट को देखना चाहेंगे तो वे मौजूद हो जाएंगे। लेकिन जिस तरह इनके पात्र कल्पना के हैं इनके भगवान भी कल्पना के होंगे। आज तक जितने भी भगवान देखे गए हैं वे सभी कल्पना के हैं। क्योंकि भगवान कोई व्यक्ति नहीं है कि देखा जा सके। भगवान एक अनुभूति है, व्यक्ति नहीं कि देखा जा सके। इसलिए जिस प्रकार का भी भगवान देखा जाएगा, वह भगवान मनुष्य की कल्पना की सृष्टि है, उसका मेंटल क्रिएशन है। फिर अपने हाथ में है, मुरलीवालों को देखना हो उनको देखें, और धनुर्धारी को देखना हो तो उनको देखें, और चतुर्मुखी भगवान को देखना हो तो उनको देखें।
    और नीग्रो देखता है जिस भगवान के उसके ओंठ नीग्रो जैसे होते हैं और बाल नीग्रो जैसे होते हैं। और चीनी देखता है जिस भगवान को उसकी हड्डियां उभरी होती हैं और रंग पीला होता है। और हिंदू जिस भगवान को देखता है वह भारतीय शक्ल में होता है। और दुनिया में जो अपने भगवान को देखना चाहता है अपनी शक्ल में देख लेता है। अगर गधे और घोड़े भी भगवान को देखते होंगे तो अपनी शक्ल में देखते होंगे आदमी की शक्ल में नहीं। अगर पशु-पक्षी भगवान को देखते होंगे तो अपनी शक्ल में देखते होंगे आपकी शक्ल में नहीं। हमारी कल्पनाएं, हमारा रूप, हमारा निर्मित है यह भगवान जिसको हम श्रद्धा और भक्ति में देख लेते हैं। यह कोई साक्षात नहीं है सत्य का।
    सचाई यह है कि जब तक कुछ भी दिखाई पड़ता है चित्त में, तब तक मन काम कर रहा है। और सत्य का या परमात्मा का, और स्मरण रखें, परमात्मा से मेरा अर्थ किसी रूप, किसी रंग से नहीं, किसी आकार से नहीं, बल्कि समस्त जीवन, समस्त अस्तित्व, यह जो टोटल एक्झिस्टेंस है, यह जो सारी चीजों के भीतर व्याप्त प्राण हैं इसके अनुभव से है। इसका कोई दर्शन नहीं हो सकता। इसका अनुभव हो सकता है।
    एक आदमी को प्रेम का अनुभव हो सकता है, लेकिन कोई आदमी आकर सूरत में खबर करे कि आज रात मुझे प्रेम का दर्शन हुआ है, तो गड़बड़ हो गई बात।
    प्रेम के दर्शन का क्या मतलब? प्रेम कोई आदमी है जिसका दर्शन हो जाएगा? कोई वस्तु है जिसका दर्शन हो जाएगा? प्रेम का अनुभव हो सकता है, दर्शन नहीं। प्रेम एक जीवंत अनुभूति है, एक एक्सपीरिएंस है। परमात्मा और भी गहरी अनुभूति है। परमात्मा का भी दर्शन नहीं हो सकता, अनुभव हो सकता है। परमात्मा दिखाई नहीं पड़ सकता। लेकिन परमात्मा को जाना जा सकता है। और जानने का रास्ता यह नहीं है कि आप कोई कल्पना करें। जानने का रास्ता यह है कि सब कल्पना छोड़ दें और शून्य हो जाएं। जब तक कोई कल्पना है तब तक उस कल्पना को जानने की कोशिश रहे, चेष्टा, श्रम, तो वह कल्पना जानी जा सकती है। और उसको जानने के उपाय हैं। कल्पना जानने के उपाय हैं।
    सारी दुनिया के बहुत बड़ा धार्मिक लोगों का हिस्सा, साधु-संतों का हिस्सा, गांजा, अफीम, चरस पीता रहा है। अभी अमेरिका में मैस्कलीन और लिसर्जिक एसिड की हवा है। और उसको पीने वाले हक्सले ने कहा, उसका इंजेक्शन लगवाने वाले लोगों ने कहा कि जो कबीर को, मीरा को जो अनुभव हुए होंगे, वे हमको मैस्कलीन का इंजेक्शन लगाने से होते हैं। हमको भगवान दिखाई पड़ता है।
    अगर हिंदू को मैस्कलीन का इंजेक्शन लगा दें तो कृष्ण दिखाई पड़ जाएंगे। और क्रिश्चियन को लगा दें तो क्राइस्ट दिखाई पड़ जाएंगे। जो कल्पना भीतर बैठी है, नशे की हालत में और जल्दी साकार हो जाती है। इसलिए दुनिया भर में साधु नशा करते रहे, यह आकस्मिक नहीं है, यह एक्सिडेंटल नहीं है। कल्पना को बल देने में नशा बड़ा सहयोगी है। जो लोग नशा नहीं करते रहे, वे लोग उपवास करते रहे हैं। और यह बात जान लेना जरूरी है। दो ही तरह के वर्ग हैं दुनिया में साधुओं के, या तो नशा करने वाला या उपवास करने वाला। और आप हैरान होंगे, जो काम नशे से होता है वही उपवास से भी हो जाता है।
    नशे से कुछ मादक द्रव्य शरीर में पहुंच जाते हैं, जो चित्त के होश को कम कर देते हैं। होश कम हो जाता है तो कल्पना जल्दी से साकार होने लगती है। बेहोशी में कल्पना साफ दिखाई पड़ने लगती है। बेहोशी में विचार बिलकुल नहीं रह जाता, इसलिए यह खयाल भी नहीं उठता कि जो मैं देख रहा हूं वह सच है या झूठ, यह विचार भी पैदा नहीं होता, जो दिखता है सच मालूम होता है।
    सपने में रोज आप देखते हैं, सपना कभी आपको सपने के भीतर झूठ मालूम पड़ता है? कभी आपको ऐसा लगा कि यह मैं सपना देख रहा हूं, यह झूठ है? जागने पर लगता होगा, लेकिन सपने के भीतर सभी सपने सच मालूम पड़ते हैं। क्योंकि विचार नहीं होता निद्रा में, इसलिए जो दिखाई पड़ता है सच मालूम पड़ता है। विचार पूछता है कि जो है वह सच है या झूठ? और विचार न हो तो पूछने वाली कोई चीज आपके भीतर न रहेगी, फिर जो है वह सच है। नींद में आपका विचार सोया हुआ है। तो जो भी सपना दिखाई पड़ता है वह मालूम होता है सच है। जागने पर जब विचार जग आता है तब यह शक पैदा होता है कि अरे यह सपना झूठ था, लेकिन सपने में कभी सपना झूठ नहीं होता। ऐसे ही नशे के भीतर कभी नशे में दिखाई पड़ने वाली चीजें झूठ नहीं होतीं। नशे के द्वारा कल्पना तीव्र हो जाती है विचार मंदा हो जाता है। तो जो सपने की स्थिति होती है वह वास्तविक जागते हुए हो जाती है। उपवास से भी यही हो जाता है। उपवास से शरीर की शक्ति क्षीण हो जाती है। आपको गहरा बुखार आया हो और बहुत दिन खाना न मिला हो, तो आपको पता होगा, कैसी-कैसी कल्पनाएं दिखाई पड़ने लगती हैं। खाट आसमान में उड़ती हुई मालूम पड़ सकती है। देवतागण हवा में घूमते हुए दिखाई पड़ सकते हैं। भूत-प्रेत छायाओं में दिखाई पड़ सकते हैं।
    शरीर हो जाता है कमजोर, चित्त हो जाता है कमजोर, कमजोर चित्त फिर विचार करने में असमर्थ हो जाता है कि जो है वह सच है या झूठ, फिर कल्पना साकार हो जाती है।
    तो अगर तीस वर्ष तक, बीस वर्ष तक कोई किसी भगवान के रूप को बना कर जपता रहे, जपता रहे, जपता रहे; आंख बंद करके भगवान को देखता रहे, देखता रहे, देखता रहे; नशा करे, उपवास करे, रोए-धोए, छाती पीटे, नाचे-गाए, तो दस-बीस वर्षों में अगर ये भगवान दिखाई पड़ने लगें तो यह मत समझ लेना कि ये भगवान हैं इसलिए दिखाई पड़ते हैं। यह आदमी बड़ा मेहनती है इसने भगवान पैदा कर लिए। यह इसका श्रम है, यह इसकी कल्पना को दिया गया बल है। सारे चित्त को लगाई गई चेष्टा है, इसमें कहीं कोई भगवान नहीं है।
    और इसलिए यह भी हो सकता है कि अगर तुलसीदास को, मीरा को और अगस्तीन को तीनों को इस कमरे में रात बंद कर दिया जाए, तो अगस्तीन को न राम दिखाई पड़ेंगे न कृष्ण, दिखाई पड़ेंगे क्राइस्ट। मीरा को न क्राइस्ट दिखाई पड़ेंगे न राम, दिखाई पड़ेंगे कृष्ण। तुलसीदास को न दिखाई पड़ेंगे क्राइस्ट, न दिखाई पड़ेंगे कृष्ण, दिखाई पड़ेंगे राम। उसी एक कमरे में तीनों को तीन भगवान दिखाई पड़ेंगे और बाकी के दो भगवान दिखाई नहीं पड़ेंगे और सुबह वे विवाद करेंगे आपस में कि तुम्हारे भगवान तो थे ही नहीं, मेरे ही भगवान थे।
    जो जिसने निर्मित कर लिया है वही दिखाई पड़ सकता है। आज तक धर्म के नाम पर बहुत तरह की कल्पनाएं प्रचलित रही हैं। और उन कल्पनाओं को अनुभव करने वाले लोग निश्चित इस खयाल में पड़ जाते हैं कि जो अनुभव हुआ वह सत्य का अनुभव है। और उनको कोई कसूर भी नहीं देता। जहां तक उनका संबंध है वे जो जानते हैं उनको बिलकुल ठीक मालूम पड़ता है, उसमें उनका कोई कसूर भी नहीं। कसूर है तो एक कि वे उस विचार की फैक्लिटी को सुला देते हैं, जो निर्णय कर सकती थी कि जो है वह सच है या झूठ।
    विश्वास इसीलिए इतने जोर से थोपा जाता है ताकि आपके भीतर का विचार सो जाए। अगर भीतर विचार है तो फिर इस तरह की कल्पनाओं को अनुभव करना संभव नहीं है। इसलिए विचार की हत्या की कोशिश की जाती है। जब विचार मर जाता है, सपने देखना आसान हो जाता है। और उन सपनों में आनंद भी मिलेगा, आनंद भी आएगा। क्योंकि वे सपने खुद के द्वारा निर्मित हैं इसलिए दुखद नहीं हो सकते, सुखद ही होंगे। और भगवान का दर्शन हो गया है, यह बड़े आनंद की बात है। इससे अहंकार की इतनी बड़ी तृप्ति होती है जितनी किसी और चीज से नहीं होती।
    मुझे भगवान का दर्शन हो गया, मैंने भगवान को पा लिया, मैं भगवान को जानने वाला हूं और कोई भी नहीं। इसलिए इन भगवान को जानने वाले लोगों से अगर पूछें कि वह दूसरा आदमी भी कहता है कि मैं भगवान को जानने वाला हूं, वे हंसेंगे, वे कहेंगे, गलती कहता है। जानने वाला तो मैं ही हूं और कोई नहीं जानने वाला है। इसलिए तो दुनिया भर के साधु-संत लड़ते हैं आपस में कि मैं जानने वाला हूं, दूसरा जानने वाला नहीं है।
    अगर दुनिया कभी अच्छी हुई तो इस तरह के मस्तिष्क का इलाज होना चाहिए। यह मस्तिष्क विकृत है। यह मस्तिष्क स्वस्थ नहीं है।
    तो न तो श्रद्धा और न भक्ति कहीं ले जाती है। ले जाता है सिर्फ ज्ञान। कोई और मार्ग नहीं है, और सारे मार्ग सिर्फ दिखाई पड़ने वाले मार्ग हैं। ज्ञान के अतिरिक्त, जागरण के अतिरिक्त, स्वयं की चेतना के पूरी तरह विकसित होने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। बाकी मार्ग सिर्फ दिखाई पड़ते हैं। सिर्फ दिखाई पड़ते हैं, है नहीं। और वे दिखाई पड़ने वाले मार्ग आसान हैं, क्योंकि उन पर चलना नहीं होता केवल सपना देखना होता है, केवल कल्पना करनी होती है।
    ज्ञान का मार्ग कठिन दिखाई पड़ता है, क्योंकि उस पर चलना होता है, जीवन को बदलना होता है, अग्नि से गुजरना होता है, प्राण को काट-काट कर विकसित करता होता है भीतर किसी चेतना को। न तो नींद काम दे सकती है, न नशा, न कोई सपने काम दे सकते हैं। इसलिए श्रद्धा के छूटने से अगर भक्ति छूटती हो तो बहुत अच्छा, वे दोनों जुड़े हैं। वह एक ही चीज का विकास है। विश्वास और श्रद्धा जाएगा तो भक्ति के खड़े होने के लिए कोई जगह नहीं है। नींद चली जाए तो सपने के खड़े होने को कोई जगह नहीं रह जाती। श्रद्धा की नींद में भक्ति के सपने आते हैं। श्रद्धा की नींद न हो तो भक्ति के सपनों की कोई जगह नहीं है। और उस भांति का जो जागरण है और उस जागरण में जो जाना और देखा गया है, वही सत्य है।
    स्मरण रखें, जहां मैं पूरी तरह प्रबुद्ध हूं, पूरी तरह विचार और विवेक से युक्त, और जहां मेरे मन पर कोई तंद्रा, कोई मादकता, कोई नशा, कोई कल्पना नहीं, उस परिपूर्ण जागरण में ही मैं जो जानूंगा वही सत्य हो सकता है और कुछ सत्य नहीं हो सकता। ऐसी परिपूर्ण जागरण की जो अवस्था है वही ज्ञान है।
    सोना चाहते हो, बात अलग; नींद लेना चाहते हो, बात अलग, तब भक्ति और श्रद्धा काम दे सकती है। तब भक्ति और श्रद्धा पुराने रास्ते हो गए। मैस्कलीन और लिसर्जिक एसिड भी काम दे सकते हैं। और भी ढंग के नशे हैं वे भी काम दे सकते हैं। नशा कर लें और सपने देखें।
    लेकिन सपनों से कोई जीवन नहीं बदलता। सपनों से कोई क्रांति नहीं आती। सपनों से कोई भीतर बुनियादी फर्क नहीं पड़ता। आप वही के वही आदमी बने रहते हैं। यह जो, यह जो चित्त का परिपूर्ण क्रांति है, दि टोटल म्यूटेशन जो है, पूरी बदलाहट जो है, वह बदलाहट तो सिर्फ जागरण से होती है। और उस जागरण का प्राथमिक सूत्र है, विवेक और प्राथमिक शत्रु है, विश्वास। इसलिए विश्वास नहीं विवेक; निद्रा नहीं जागरण; बेहोशी नहीं होश, ये जितने विकसित होंगे उतना जीवन सत्य के निकट पहुंचना आसान हो जाता है।

    — ओशो [अंतर की खोज-प्रवचन-05]

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