क्या मंत्र दोहराने का कुछ लाभ/ benefit होता है? क्या मंत्र उच्चारण से भगवान के निकट पंहुचा जा सकता है?
प्रश्न – एक मित्र ने पूछा है कि मैंने कहा कि शब्दों को दोहराएं नहीं। दोहराने, रिपीटीशन से तो मन जड़ हो जाता है। तो उन्होंने पूछा है कि हमारे मंत्र–सभी धर्मों के मंत्र हैं और शास्त्रों ने उनका अनुमोदन किया है। सैकड़ों वर्षों से कहा जाता रहा है, उनको दोहराओ, दोहराओ। और जितना ज्यादा दोहराओगे, जितना ज्यादा रिपीट करोगे, उतना ही ज्यादा भगवान के निकट पहुंच जाओगे। तो उस संबंध में मेरा क्या खयाल है?
प्रश्न – क्या मंत्र दोहराने का कुछ लाभ/ benefit होता है?
प्रश्न – शास्त्रों में मंत्र का महत्व बताया गया है, क्या मंत्र उच्चारण से भगवान के निकट पंहुचा जा सकता है?
Answer ( 1 )
पहली बात, शांति दो प्रकार की होती है। एक तो शांति वह होती है, जो आदमी को नींद में मिलती है, जब वह रात सो जाता है और सुबह उठ कर कहता है, मैं बहुत गहरी नींद में सोया, बड़ा अच्छा लगा, बड़ा मन शांत है। बेहोशी की शांति है! पैर में दर्द है और डाक्टर एक इंजेक्शन लगा दे, जिससे स्नायु सो जाएं, तो एक तरह की शांति मिलती है, दर्द का पता होना बंद हो जाता है। जड़ता की शांति है! पैर जड़ हो गया, उसकी संवेदनशीलता कम हो गई, दर्द का अनुभव नहीं होता। जो आदमी जितना ज्यादा संवेदनशील है, जितना सेंसिटिव है, उतना ही पीड़ाओं को अनुभव करता है। जो आदमी जितना जड़ है, जितना ईडियट है, उतना ही कम पीड़ाओं को अनुभव करता है। क्योंकि पीड़ा के अनुभव के लिए संवेदनशीलता चाहिए। तो जितना संवेदनशील व्यक्ति होगा, उतनी पीड़ा अनुभव करेगा; जितना कम संवेदनशील होगा, उतनी कम पीड़ा अनुभव करेगा।
जमीन पर जो सर्वाधिक बुद्धिमान, सर्वाधिक संवेदनशील हृदय हैं, वे सर्वाधिक दुख पाते हैं। जमीन पर जो बहुत जड़बुद्धि हैं, उन्हें कोई भी दुख व्याप्त नहीं होता, उन्हें पता ही नहीं चलता, उन्हें खयाल भी नहीं होता कि यह दुख है। क्योंकि दुख के लिए बोध चाहिए, अवेयरनेस चाहिए, होश चाहिए दुख के अनुभव के लिए।
तो शांति दो प्रकार की हो सकती है। मन जड़ हो जाए, तो भी ऐसा लगेगा कि शांत हो गए। नशा कर लें, शराब पी लें, तो भी शांति मालूम पड़ेगी। लेकिन वह शांति झूठी है। उससे दुख मिटता नहीं, केवल दुख को अनुभव करने वाला यंत्र जड़ हो जाता है। दुख को अनुभव करने वाला यंत्र जड़ हो जाए इससे दुख नहीं मिटता, इससे केवल दुख भूल जाता है। कितनी देर भुलाइएगा?
भुलाने के कई रास्ते हैं। शारीरिक रास्ते हैं और मानसिक रास्ते हैं। शारीरिक रास्ते तो ये हैं–एक आदमी शराब पी लेता है, एक आदमी नाचने लगता है, नाचने में पागल हो जाता है। एक आदमी मैस्कलीन का इंजेक्शन लगवा लेता है, या और नये-नये नये ड्रग्स हैं, एल एस डी है और जमाने भर के ड्रग्स हैं, उनको ले लेता है। कुछ घंटों के लिए उसकी सारी, जो दुख को अनुभव की क्षमता है, वह विलीन हो जाती है। फिर वापस लौट आएगी। दुनिया में लोग शराब व्यर्थ ही नहीं पीते रहे हैं। सारी दुनिया पर नये-नये ढंग के इंटाक्सिकेंट ऐसे ही ईजाद नहीं होते रहे हैं। कोई मनुष्य की बहुत गहरी जरूरत है, जिसको वे पूरा करते रहे हैं। वह जरूरत यह है, दुख का पता न चले। तो जड़ता, कोई भी तरह की जड़ता और बेहोशी आ जाए, दुख का पता नहीं चलेगा।
जो लोग शराब नहीं पीना चाहते, इंजेक्शन नहीं लेना चाहते, उनके लिए और भी सरल रास्ते हैं। वे किसी शब्द को और मंत्र को निरंतर उच्चारण करें, रिपीट करें, उससे भी मन जड़ हो जाता है। कोई भी चीज की बार-बार पुनरुक्ति करने से चित्त पर बोर्डम पैदा होती है, डलनेस पैदा होती है। अगर मैं यहां बैठ कर बोल रहा हूं और एक ही बात घंटे भर तक बोले चला जाऊं, तो आपके मन पर क्या प्रतिक्रिया होगी? आपमें से बहुत से लोग तो सो जाएंगे। जैसा अधिकतर लोग सभाओं में सोते हैं–खास कर धार्मिक सभाओं में। क्योंकि वहां वे ही बातें दोहराई जाती हैं जो हजारों बार दोहराई गई हैं। तो लोग सो जाते हैं।
बोलने वाला सोचता होगा कि यह सोने वालों का कसूर है। यह बोलने वाले का कसूर है। वह इस तरह की बातें बोल रहा है, जिनसे बोर्डम पैदा होती है। रिपीट कर रहा है कुछ बातों को, उससे लोग ऊब जाते हैं, ऊब से नींद पैदा होती है। उसमें जो बहुत सचेतन लोग होंगे, वे उठ कर चले जाएंगे, क्योंकि यह तो जड़ता की बात हो गई। और इसीलिए जवान आदमी धार्मिक सभाओं में दिखाई नहीं पड़ते। अभी उन्हें जिंदगी है। बूढ़े आदमी दिखाई पड़ते हैं। बूढ़े आदमी मौत की तरफ सरक रहे हैं, वे जड़ता की तरफ सरक रहे हैं। उनको कोई भी जड़ता प्रीतिकर लगती है। जवान को जड़ता मुश्किल मालूम पड़ती है कि वहां बैठा रहे। और अगर बिलकुल छोटे बच्चे बिठाल दिए गए हों, तो वे तो बिलकुल ही नहीं बैठेंगे, अभी वे बहुत जीवंत हैं। अभी वे जड़ होने को राजी नहीं हैं। अभी जिंदगी उनमें बड़ा प्रवाह ले रही है; अभी जिंदगी उनमें खड़ी हो रही है, तो उन्हें जड़ता की कोई बात अपील नहीं करेगी। इसीलिए तो सारी दुनिया में धर्म से बच्चों और जवानों का संबंध टूट गया, सिर्फ बूढ़ों का संबंध रह गया।
यह इस बात की सूचना है कि जिस धर्म को हम बार-बार दोहरा रहे हैं, वह किसी न किसी रूप में जड़ता का पक्षपाती होगा। अगर वह जीवन का पक्षपाती होता, तो बच्चे और जवान उसमें निश्चित ही उत्सुक होते। लेकिन यह जो रिपीटीशन है, यह जो बार-बार दोहराना है किन्हीं बातों का, यह एक तरह की राहत, एक तरह की शांति लाता है। और वह शांति इस बात की है–अगर आप राम-राम, राम-राम घंटे भर तक कहते रहें, मन ऊब जाएगा जो कि मन का स्वभाव है। मन जागता है नये से, नई चीज हो तो जागता है। पुरानी-पुरानी बात तो मन को जागने का कोई कारण नहीं रह जाता, वह सो जाता है। उससे जो तंद्रा पैदा होती है, उसको लोग शांति समझते हैं। उससे जो निद्रा पैदा होती है, जिसको योग-निद्रा कहते हैं, वह शांति नहीं है। वह केवल सो जाना है। वह ऑटो-हिप्नोसिस है। वह आत्म-सम्मोहन है। वह एक तरह की नींद है, जो हम ईजाद कर रहे हैं।
अगर आपको नींद न आती हो, तो राम-राम का जप बड़ा लाभ पहुंचा सकता है। कोई भी मंत्र का जप लाभ पहुंचा सकता है। लेकिन नींद आ जाना सत्य को जान लेना नहीं है। नींद आ जाना शांति को पा लेना नहीं है। लिविंग साइलेंस बड़ी और बात है, डेड साइलेंस बड़ी और बात है। मरघट पर शांति होती है। वह भी एक शांति है। लेकिन हम यहां इतने लोग बैठे हैं और शांत हैं, यह बिलकुल दूसरी शांति है। यह मरघट की शांति नहीं है। यहां इतने जिंदा लोग बैठे हैं, जीवंत लोग बैठे हैं और यहां एक शांति है। यह शांति बात और है।
बुद्ध का वैशाली के पास आना हुआ। दस हजार भिक्षु उनके साथ थे। गांव के बाहर उन्होंने डेरा डाला। वैशाली का नरेश भी उत्सुक हुआ देखने जाने को कि बुद्ध आए हैं। दस हजार भिक्षु उनके साथ आए हैं। कैसा यह आदमी है? जिसने राज्य छोड़ दिया, जो सम्राट से सड़क पर भिखारी हो गया–कैसा यह आदमी है? तो उस नरेश ने भी अपने मंत्रियों को कहा कि मुझे दिखाने ले चलो, मैं चलना चाहूंगा। एक संध्या वह वैशाली के बाहर गया। उसने अपने मंत्रियों से पूछा, कितनी दूर है? रथ पास आ गया था, वृक्षों का घना झुरमुट था। मंत्रियों ने कहा: इन्हीं वृक्षों के उस पार, बस हम निकट ही हैं। दस कदम के बाद वह नरेश संदेह से भर गया, उसने कहा: तुम कहते थे, दस हजार भिक्षु उनके साथ हैं और यहां तो बिलकुल सन्नाटा है? उसने अपनी तलवार निकाल ली। उसने कहा: मालूम होता है कोई धोखा दिया गया है मुझे। तुम मुझे यहां कहां ले आए हो? दस हजार लोग जहां हों, वहां दस कदम के फासले पर इतना सन्नाटा!
उसके मंत्रियों ने कहा: आप परेशान न हों। उन लोगों को आप नहीं जानते। वे जीते जी शांत हो गए हैं। वहां कोई आवाज नहीं है। वहां कोई बातचीत नहीं हो रही।
नरेश गया, डरा हुआ, तलवार नंगी हाथ में लिए हुए। डर था उसे कि पता नहीं क्या खतरा हो जाए? दस हजार लोग जहां हों, वहां इतनी शांति कल्पनातीत थी। वहां जाकर उसने देखा, वहां तो पूरी बस्ती है दस हजार लोगों की। उसने बुद्ध से जाकर पूछा, बड़े अजीब मालूम होते हैं ये लोग। ये जिंदा हैं या मुर्दा? ये न कोई बात कर रहे हैं, न कोई चीत; न यहां कोई शोरगुल, न कोई आवाज। दस हजार लोग चुपचाप बैठे हैं!
बुद्ध ने कहा: तुमने केवल मुर्दा शांति को ही जाना है इसलिए तुम्हें शक पैदा होता है, कहीं ये लोग मुर्दा तो नहीं? तुमने केवल मरघटों पर जो शांति होती है, उसको जाना है। हम उस शांति की खोज में हैं, जो जिंदा आदमी को मिलती है, जीवित मन को मिलती है।
मैं उस शांति की बात कर रहा हूं, जो मन को मुर्दा न कर दे, डेड न कर दे, मन को डल न कर दे, शिथिल न कर दे, बल्कि मन को इतना सचेतना से भर दे, इतनी अवेयरनेस से, इतने होश से, इतने जीवंत शक्ति से कि वह जीवंत शक्ति के कारण शांत हो जाए। शक्ति की क्षीणता के कारण नहीं, सो जाने के कारण नहीं, बल्कि जागरण के कारण शांत हो जाए।
तो जागरण से जो शांति आती है, वह तो जीवित है। उस जीवित शांति में तो जाना जा सकता है सत्य। क्योंकि सत्य जानने के लिए जाग्रत होना जरूरी है। नहीं तो जानेगा कौन? लेकिन मंत्रों, नाम-जप और इस तरह की बातों से जो शांति पैदा होती है, वह झूठी, निद्रा की शांति है, जीवन की शांति नहीं। उससे कुछ होने वाला नहीं है।
और ये जो मंत्र हैं, यह भी उन्होंने पूछा है: इतने मंत्र हैं, इनकी शक्तियों का वर्णन है, इनसे यह हो सकता है, यह हो सकता है, यह हो सकता है।
बड़ा एक षडयंत्र आदमी के साथ चलता रहा है, एक बड़ी कांस्प्रेसी चलती रही है। और वह षडयंत्र यह है, जो मैं एक छोटी सी कहानी से आपको कहूं।
एक मस्जिद के बाहर एक मुल्ला सुबह खड़े होकर पत्थर फेंक रहा था। गांव का राजा वहां से निकला, उसने उस मुल्ला को पूछा कि मेरे मित्र, ये पत्थर किसलिए फेंक रहे हो? उस मुल्ला ने कहा: ताकि शेर, चीते, जंगली जानवर यहां राजधानी में न आ सकें, इसलिए पत्थर फेंक रहा हूं। वह राजा बहुत हैरान हुआ। उसने कहा कि मैंने आज तक न तो यहां शेर देखे, न चीते देखे, तुम फिजूल पत्थर फेंक रहे हो। वह मुल्ला क्या बोला? वह बोला कि तुम्हें पता ही नहीं है राजन, मेरे पत्थर फेंकने की वजह से ही तो शेर और चीते यहां नहीं आते हैं। तुम सोचते हो शेर-चीते नहीं हैं? और मेरे पत्थर फेंकने की वजह से वे नहीं आते हैं।
अभी कुछ समय पहले आठ ग्रह इकट्ठे हो गए थे और सारा मुल्क दीवाना हो गया सारी दुनिया को बचाने के लिए, और न मालूम किस-किस तरह की बेवकूफियां हमने कीं। और अगर कोई हमसे कहे कि देखो, कुछ तो हर्जा नहीं हुआ उन अष्टग्रह से। तो हम कहेंगे, तुम पागल हो। अरे, हमारे यज्ञ-हवन की वजह से कोई हर्जा नहीं हो पाया। नहीं तो हर्जा होता। वह तो हमने जो मंत्र उच्चार किए और हमने जो पवित्र अग्नियां जलाईं, उनकी वजह से सारी दुनिया बच गई। नहीं तो दुनिया डूब जाती। वह हमारे पत्थर फेंके इसलिए शेर-चीते नदारद हो गए। नहीं तो वे तो थे। अगर हमने यह नहीं किया होता तो दुनिया कभी भी डूब कर नष्ट हो गई होती, महाप्रलय हो गया होता।
ये सारे मंत्र उन भूत-प्रेतों को भगाते हैं, जो हैं ही नहीं। पहले हमें यह विश्वास दिला दिया जाता है कि भूत-प्रेत हैं। पहले हमें यह विश्वास दिला दिया जाता है कि ये-ये फियर, ये-ये घबड़ाहट हैं। जब हम उससे भयभीत हो जाते हैं, तो उसको दूर करने के लिए मंत्र बता दिया जाता है। निश्चित ही भय दूर हो जाएंगे उन मंत्रों से, क्योंकि भय थे ही नहीं।
कहावत है: फेथ कैन मूव माउंटेंस। कहावत है: विश्वास पहाड़ों को हटा सकता है। लेकिन केवल ऐसे पहाड़ों को जो काल्पनिक हों। सच्चे पहाड़ों को आज तक किसी विश्वास ने न हटाया है और न हटा सकता है। हां, झूठे पहाड़ हटाए जा सकते हैं। और झूठे पहाड़ समझाए जा सकते हैं कि हैं। हम इतने नासमझ हैं कि हम हजारों झूठी बातों पर हजारों वर्ष तक विश्वास करते रहे हैं, और आज भी हमारी नासमझी का कोई अंत नहीं हुआ, आज भी हम विश्वास करते हैं। उनको हटाया जा सकता है, क्योंकि वे हैं ही नहीं। जो बीमारियां नहीं हैं, वे मंत्रों से दूर की जा सकती हैं। जिन सांपों में जहर ही नहीं होता, वे मंत्रों से उतर जाते हैं।
हिंदुस्तान में सत्तानबे प्रतिशत सांपों में कोई जहर नहीं होता। केवल तीन प्रतिशत सांपों में जहर होता है। सौ आदमियों को सांप काटे, सत्तानबे के मरने का कोई भी कारण नहीं है, सिवाय इसके कि वे भय से न मर जाएं। तो सत्तानबे मौकों पर तो मंत्र काम कर ही जाएगा। यह हो सकता था कि मंत्र न होता तो वे आदमी मर जाते, क्योंकि दुनिया में बीमारी से कम लोग मरते हैं, भय से ज्यादा लोग मरते हैं। सांप ने काट खाया, यह बात मारने वाली हो जाती है, चाहे सांप में कोई जहर हो या न हो। हजारों सांप के काटे हुए लोग मर जाते हैं केवल इसलिए कि उनको सांप ने काट खाया। उस सांप में कोई जहर ही नहीं होता। सौ आदमियों को सांप काटे, सत्तानबे के मरने का कोई कारण नहीं है, लेकिन मर सकते हैं। मंत्र ऐसे आदमियों को बचा सकता है, क्योंकि जो जहर नहीं था वह उतर सकता है। और भय हमें बहुत जोर से पकड़ते हैं।
एक कहानी मैंने सुनी है।
एक राजधानी के बाहर एक फकीर रहता था। एक दिन सुबह-सुबह उसने देखा, एक बहुत बड़ी काली छाया नगर की तरफ भागी चली आ रही है। उसने उस काली छाया से पूछा, तुम कौन हो?
उस काली छाया ने कहा: मैं प्लेग हूं।
फकीर ने पूछा, किसलिए जा रही हो नगर में?
उसने कहा कि मुझे एक हजार लोगों के प्राण लेने हैं।
वह छाया नगर में चली गई। तीन महीने बीत गए। उस फकीर ने उस जगह को न छोड़ा, क्योंकि तीन महीने में कोई दस हजार आदमी मर गए उस गांव में। उसने कहा कि लौटते हुए प्लेग से पूछ लूं कि मुझसे झूठ बोलने की क्या वजह थी? तीन महीने बाद वह प्लेग की काली छाया वापस लौटी, तो उस फकीर ने टोका और उसने कहा कि हद हो गई, मुझसे झूठ बोलने का क्या कारण था? तुमने तो कहा था एक हजार लोगों के प्राण लेने हैं और दस हजार लोग मर गए?
उस प्लेग ने कहा: मैंने तो एक ही हजार मारे, बाकी भय से मर गए। मेरा उसमें कोई कसूर नहीं। बाकी नौ हजार आदमी अपने आप घबड़ाहट से मर गए, उनको मैंने नहीं मारा।
इन नौ हजार आदमियों पर मंत्रों का उपयोग हो सकता था, ये बच सकते थे। इनको कोई बीमारी ही नहीं थी।
ये जो सारे मंत्र हैं, जो हमें शक्तिशाली मालूम होते हैं। मंत्र शक्तिशाली नहीं हैं, हमारा मन कमजोर है, भयभीत है। इसलिए अगर मन को किसी भी बात से बल दिया जा सके, ताकत दी जा सके, तो फर्क पड़ जाता है। और अगर हमको किसी दिन यह बात ठीक-ठीक समझ में आ गई, तो मंत्रों को बीच में लेने की कोई जरूरत नहीं है। हम अपने आत्मबल को, अपने मन के बल को बिना किसी मंत्र के सहारे के नहीं खड़ा कर सकते हैं। मंत्र से उसका कोई संबंध नहीं है। संबंध है मेरे भीतर, मेरे अपने बल का। अगर वह है, अगर मेरा भय छूट जाए, अगर जीवन में मेरी चिंता छूट जाए, अगर जीवन में मेरी अशांति छूट जाए, तो इतनी बड़ी शक्ति का उदय होगा, किसी मंत्र की कोई जरूरत नहीं है। यह कमजोर आदमी का शोषण है। कमजोर है आदमी बहुत। और धर्मों ने, पुरोहितों ने उसे मजबूत तो नहीं बनाया, उलटे और कमजोर किया है, उलटे और भयभीत किया है। उसे ऐसे भय दे दिए हैं, जिनकी कोई जगह, कोई गुंजाइश नहीं है, जिनकी सच्चाई में कहीं कोई असलियत नहीं है। जमीन के भय हैं, नरक के भय हैं, स्वर्ग के भय हैं, और न मालूम कितने-कितने काल्पनिक भय हैं। और उन काल्पनिक भय के भीतर घिरा हुआ आदमी है। इस आदमी को बल चाहिए।
इसको कोई भी नासमझी पकड़ा दें। अगर इसे ऐसा लगे कि हां, मेरी थोड़ी हिम्मत बढ़ती है, तो हिम्मत तो अंधेरे में आप जा रहे हों, अगर जोर से फिल्म का गाना भी गाने लगें, तो बढ़ जाती है। अगर अंधेरी गली से निकल रहे हों और सीटी बजाने लगें तो भी हिम्मत बढ़ जाती है। कुछ भी करने लगें तो हिम्मत बढ़ जाती है, क्योंकि करने में आप भय को भूल जाते हैं। क्योंकि मन एक ही साथ दो काम नहीं कर सकता। या तो फिल्मी गाना गा सकता है या भयभीत हो सकता है। अगर अंधेरी गली से निकल रहे हों और जोर से फिल्म का गाना गाने लगें, तो मन फिल्म का गाना गाने लगा, भयभीत कौन होगा? उतनी देर के लिए भय बंद हो जाएगा। तो चाहे फिल्मी गाना गा लें, चाहे राम-राम जप लें, चाहे नमोकार जप लें, चाहे कुछ और कर लें। लेकिन उससे कोई जीवन में क्रांति नहीं होती और न परिवर्तन होता है, बल्कि जो कौमें और जो लोग इस तरह के झूठे, इस तरह के झूठे विज्ञानों में, इस तरह की शूडो साइंसिस में फंस जाते हैं, उन मुल्कों में असली विज्ञान का जन्म नहीं हो पाता।
हमारे मुल्क का दुर्भाग्य यही है। यही मंत्र, यही थोथे विश्वास और इन पर श्रद्धा। हमारे मुल्क में साइंस पैदा नहीं हो सकी। हम सारी जमीन पर पिछड़ गए हजारों साल के लिए। शायद अब हम किसी कौम के साथ कदम मिला कर नहीं चल सकेंगे। किसके ऊपर जिम्मा है? उन लोगों के ऊपर जो इन थोथी बातों को प्रचारित करते रहे, लोगों को समझाते रहे। इसकी वजह परिणाम यह हुआ कि जिंदगी के दुख को मिटाने का जो कॉज़ेलिटी थी, जो कारण था असली, वह तो हमने नहीं खोजा। हमने कहा: मंत्र पढ़ लो, राम-राम जप लो, मामला सब ठीक हो जाएगा। तो जिंदगी के दुख मिटाने के जो असली कारण थे, वे हमने नहीं खोजे। हमने ऊपरी तरकीबें खोजीं। न जीवन और पदार्थ के संबंध में सत्यों को खोजा–न उसकी ताकत बढ़ी, न उसकी समृद्धि बढ़ी, न उसका आत्मबल बढ़ा। सब तरह से हम दीन-हीन हो गए। और उस दीन-हीन हो जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण, हमारे ये थोथे मंत्र, ये थोथे खयाल कि हम इन बातों को करके सब कुछ कर लेंगे।
सोमनाथ पर हमला हुआ। सोमनाथ के हमले के वक्त सारे हिंदुस्तान से बहादुरों ने यह खबर भेजी कि मंदिर की रक्षा के लिए हम आ जाएं? तो मंदिर के गर्व से भरे हुए पुजारियों ने कहा: तुम्हारी जरूरत भगवान की रक्षा के लिए! भगवान अपनी रक्षा नहीं कर सकेंगे? भगवान सबके रक्षक हैं, तुम्हारी क्या जरूरत है? बात तो ठीक थी। भगवान, जो सबके रक्षक हैं, उनके लिए कोई तलवार की रक्षा की जरूरत है? मान गए वे लोग। तलवार लिए हुए सिपाही खड़े थे, लेकिन वे लड़े नहीं। जिसने हमला किया था, वह आदमी भीतर घुस गया। और पांच सौ पुजारी थे उस मंदिर में और वे अपने मंत्रों का जाप कर रहे थे और प्रार्थनाएं कर रहे थे। और गजनी ने मूर्ति पर चोट की और मूर्ति टुकड़े हो-हो कर गिर गई और उनके सारे मंत्र रखे रह गए और सारी प्रार्थनाएं रखी रह गईं। और तब उन पुजारियों ने क्या कहा? जब उन्होंने देखा कि मंत्र फिजूल हो गए, सब व्यर्थ हो गया, मूर्ति तोड़ दी गई, तो उन्होंने एक नई बात ईजाद की। उन्होंने कहा कि गजनी शिव का अवतार मालूम होता है। नहीं तो यह कैसे हो सकता है? और हम उन मूढ़ों में से हैं कि हमने पहली बात भी मान ली और दूसरी बात भी मान ली कि गजनी जो है भगवान शिव का अवतार होना चाहिए, तभी तो, तभी तो सारी बात हो गई।
यह जो हम इस भांति का जो चिंतन करते रहे हैं, यह चिंतन नहीं है, यह जड़ता है। और इसका परिणाम यह हुआ कि हम साइंस को जन्म नहीं दे पाए; हम खोज नहीं कर पाए। दूसरी कौमों के लोग, जो सभ्यता और विचार के रास्ते पर हमसे बहुत पीछे चले, बहुत पीछे; वे आज चांदत्तारों पर पहुंच रहे हैं। उन्होंने पदार्थ का अणु तोड़ लिया। वे आज आत्मा और मन की तलाश में भी बहुत गहरे जा रहे हैं। और हम, जिन्होंने यात्रा बहुत पहले शुरू की थी, आज जमीन पर सबसे पीछे खड़े हैं। कौन है जिम्मेवार? वे ही लोग, जो आज भी मंत्र और हवन की बातें कर रहे हैं।
जीवन बातचीत करने से हल नहीं होता और ऊपरी इलाज करने से चिकित्साएं नहीं होतीं। जीवन में कारण खोजने पड़ते हैं। कारण की खोज साइंस है और बिना कारण को खोजे शब्दों को दोहराने की आस्था, सुपरस्टीशन है, अंधविश्वास है।
मैं आपसे निवेदन करता हूं, कोई मूल्य इनका बहुत नहीं है। और जब तक हम यह बात स्पष्ट रूप से न समझ लेंगे और हमारे मुल्क की नई पीढ़ी इस जंजाल से नहीं छूट जाएगी, तब तक हम अपने मुल्क में सत्य के अनुसंधान में न तो पदार्थ को खोज सकेंगे और न परमात्मा को।
मंत्र न तो पदार्थ की खोज में अर्थपूर्ण है और न परमात्मा की खोज में। दोहराने वाली बातें और कोरे शब्दों को दोहराने वाली बातें ज्यादा से ज्यादा थोड़ी सी हिम्मत दे सकती हैं; लेकिन उनसे कोई जीवन में क्रांति नहीं होती। और जितने जल्दी हम इस बात को समझ लें, उतना अच्छा है। नहीं तो शायद हमारे दुर्भाग्य के मिटाने के रास्ते भी बंद हो जाएंगे; समय भी खो जाएगा और हम अपने दुर्भाग्य को पोंछने के सारे उपाय अपने हाथ से ही तोड़ देंगे। लेकिन हम आज भी यही किए चले जा रहे हैं।
आज भी पानी नहीं गिरता, तो हम मंत्र का सहारा लेते हैं। पांच हजार साल से हम यही करते रहे हैं। पांच हजार साल से हम यही करते रहे हैं कि जो हमसे न बन सके उसमें हम मंत्र का सहारा ले लेते हैं। बीमारी हो, तो मंत्र; पानी न गिरे, तो मंत्र; आदमी मरता हो, तो मंत्र; अनाज पैदा न हो, तो मंत्र। मंत्रों का कुल जमा परिणाम यह हुआ, जो हम आज हैं! और इसका फल यह हुआ कि हम मंत्रों में खोए रहे और अगर हम कारण खोजने में इतनी ताकत लगाते, तो कोई वजह न थी कि आकाश से पानी क्यों न गिर सके! कोई वजह न थी कि जमीन के भीतर से पानी क्यों न निकाला जा सके! जमीन के भीतर इतना पानी है कि अगर पांच सौ वर्षों तक भी बिलकुल वर्षा न हो, तो भी पानी की कोई कमी नहीं है। लेकिन हम उसे निकालने में समर्थ नहीं हो सके। हम बैठे रहे, मंत्र पढ़ते रहे।
बिहार में हर वर्ष, आए वर्ष अकाल पड़ता है। मंत्र वहां बहुत पढ़े जाते हैं। मुल्क भर से भीख मांगी जाती है। अब तो हम दुनिया भर में भिखारी की तरह जाहिर हो गए। हर जगह हाथ फैला कर खड़े हो जाते हैं। मंत्र घर में पढ़ते हैं, भीख जमाने भर में मांगते हैं। लेकिन बिहार में वह किसान हाथ पर हाथ रखे बैठा रहता है, जमीन में कुआं भी नहीं खोदता। बिहार के खेतों में कुएं नहीं हैं। जहां निरंतर अकाल पड़ रहा है, वहां हर वर्ष यज्ञ, महायज्ञ और न मालूम क्या-क्या बेवकूफियां हम करते हैं लेकिन कुआं खोदने की हम कोई फिक्र नहीं करते। कुआं हम क्यों खोदें? हम तो मंत्रों के धनी हैं और मंत्र हमारे पास हैं, तो सब पानी भी गिरेगा और फसलें भी उगेंगी और न मालूम हम क्या-क्या कर लेंगे। इस भ्रम में, इस इल्युजन में हमने बहुत गंवाया है।
वक्त आ गया है कि यह भ्रम टूट जाना चाहिए। नहीं तो मुल्क की रीढ़ हमेशा के लिए टूट जाएगी। इस कौम का बहुत भविष्य नहीं है। अगर हम इन्हीं पुरानी पिटी-पिटाई बातों को आगे भी दोहराते जाते हैं, तो इस कौम के आगे आने वाले दिन अच्छे नहीं हो सकते। हम एक भिखमंगे में परिवर्तित हो गए हैं। और मंत्रों की कृपा है और हमारे पुरोहितों की और हमारे पंडितों की। जरूर मंत्र उपयोगी हैं पंडितों और पुरोहितों के लिए, आपके लिए नहीं। उनका धंधा है, उनका व्यवसाय है, उनकी आजीविका है। वे उससे जी रहे हैं। और अगर ये बंद हो जाएंगी बातें और लोगों का खयाल इनसे हट जाएगा, तो उनकी आजीविका जरूर टूट जाएगी। इसका तो जरूर मन में दुख होता है कि उनकी आजीविका टूट जाएगी, लेकिन अब यह आजीविका तोड़नी पड़ेगी। अब उनकी आजीविका चलेगी, तो इस पूरे मुल्क का जीवन टूट जाएगा।
अब दो बातों में से कुछ न कुछ निर्णय करना होगा कि या तो ये मंत्र पढ़ने वाले पंडित और पुरोहित जीएं और हम मर जाएं, और या फिर अब इनको अपना व्यवसाय बदलना होगा। अच्छा होगा कि मंत्र और यज्ञ करवाने की बजाय ये कुएं खोदने लगें, कुछ और करने लगें, और मुल्क को जीने दें और खड़ा होने दें। कोई उपयोग नहीं है। जरा भी कोई उपयोग नहीं है। और इस बात को बहुत स्पष्ट दो और दो चार की भांति आपसे कह रहा हूं, कोई उपयोग नहीं है। सोचें और देखें, मुल्क की कथा। क्या हुआ इनके उपयोग का परिणाम? हम कहां खड़े हैं?
लेकिन हम विचार भी नहीं करते। हम शायद सोचते होंगे, हम ठीक से मंत्र नहीं पढ़ पाए इसलिए सब गड़बड़ हो गई। शायद हम सोचते होंगे, यज्ञ-हवन कम कर पाए इसलिए यह गड़बड़ हो गई। या मंत्र तो पढ़े लेकिन उच्चारण ठीक नहीं हो पाया, संस्कृत में कुछ भूल हो गई इसलिए यह गड़बड़ हो गई। या शायद हमने पंडित-पुरोहितों की बात पूरी-पूरी तरह नहीं मानी इसलिए यह सब गड़बड़ हो गई। यह समझाने वाले लोग भी हैं और हममें से बहुत से लोग इसको समझने के लिए भी तैयार हैं। क्योंकि हजारों साल की दासता में जिस कौम का दिमाग पल गया हो, उसकी सोचने-समझने की शक्ति समाप्त हो जाती है। उसे सोच-विचार पैदा नहीं होता। उसकी आदत विश्वास करने की हो जाती है, विचार करने की नहीं होती।
मैं आपसे निवेदन करूंगा, विश्वास बहुत किया जा चुका। विचार करिएगा या नहीं? बहुत हो चुका विश्वास। बिलीफ पर हम बहुत जी चुके। अब विचार करिएगा या नहीं? चहुंमुखी विचार की जरूरत है, सर्वांगीण विचार की जरूरत है। पदार्थ के संबंध में, जीवन के संबंध में, परमात्मा के संबंध में विवेक की जरूरत है, खोज की जरूरत है। अंधेपन की जरूरत नहीं है कि मान लें। मान लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। किसी बात को मानने की कोई जरूरत नहीं है। बहुत मान चुके और बहुत खो चुके। मुल्क बैंकक्रप्ट हो गया, दिवालिया हो गया, उसकी आत्मा नष्ट हो गई, उसके प्राण भटक गए, उसकी सारी दिशा खो गई, उसकी आंखें बंद हो गईं, लेकिन फिर भी, फिर भी हम दोहराए जा रहे हैं। हम दोहराए जा रहे हैं उन्हीं बातों को जो हमारे भटकाने का रास्ता बनी, हम आज भी कहे जा रहे हैं।
जरूरत आ गई है कि इस सारी थोथी परंपरा, इस सारी रूढ़ि, इस सारे अंधे चिंतन से देश मुक्त हो जाए। और मैं आपसे कहता हूं कि उस भांति होने से मुल्क अधार्मिक नहीं हो जाएगा। अधार्मिक अभी है। विश्वासी व्यक्ति अंधा होता है। अंधा आदमी कभी धार्मिक नहीं होता। धार्मिक तो बहुत खुली हुई आंखों वाला आदमी होता है। विचार अधर्म में नहीं ले जाता; विचार तो जितना तीव्र और गहरा और जितना प्रवेश करने वाला होता है, उतना ही ज्यादा धर्म में ले जाता है।
तो विचार की क्रांति अगर आए, तो इससे घबड़ाने की जरूरत नहीं कि अधार्मिक हो जाएंगे, लोग भटक जाएंगे। मैं आपसे कहता हूं, लोग भटके हुए हैं, अब और भटकने की कोई गुंजाइश नहीं है। और यह भी खयाल रखें कि जितना-जितना विचार की सामर्थ्य पैदा होती है, सोच पैदा होता है, जीवन को कसने और परखने की हिम्मत और विश्लेषण करने की हिम्मत पैदा होती है, संदेह करने की हिम्मत पैदा होती है, उतना ही उतना भीतर प्राणों का साहस बढ़ता है, आत्मा बलवान होती है। जो लोग कभी संदेह ही नहीं करते, उनकी आत्मा कमजोर न हो जाएगी तो और क्या होगा?
— ओशो [अंतर की खोज-प्रवचन-02]