क्या मां-बाप, गुरु की बात पर शक, संदेह करना गलत है? क्या इनकी बात को हमेशा प्रमाणिक मानना चाहिए?

Question

प्रश्न – एक मित्र ने पूछा है: हमसे तो कहा जाता है कि हम मां-बाप, गुरु को आदर दें, सम्मान दें और उनकी बात को हमेशा प्रमाणिक मानें, उस पर शक न करें, उस पर संदेह न करें। तो आपका क्या विचार है इस संबंध में?

Answer ( 1 )

  1. पहली बात, अगर कोई भी आपसे कहता हो मुझे आदर दो, तो उसे आदर कभी मत देना; क्योंकि यह मांग उस आदमी के भीतर आदर-योग्य होने की कमी का सूचक है। अगर कोई कहता हो; अगर गुरु यह कहता हो, मुझे आदर दो, उसे कभी आदर मत देना, क्योंकि यह आदमी गुरु होने के योग्य ही नहीं रहा। गुरु कभी आदर नहीं मांगता। जो आदर मांगता है, वह गुरु नहीं रह जाता। आदर की मांग बड़े क्षुद्र मन की सूचना है। आदर मांगा नहीं जाता; आदर मिलता है।
    मैं यह नहीं कहता कि मां-बाप को आदर दो। मैं यह कहता हूं, मां-बाप ऐसे होने चाहिए कि उन्हें आदर मिले। आदर मांगा नहीं जा सकता। और मांगा हुआ आदर एकदम झूठा होगा। अगर कोई देगा भी, वह झूठा होगा। अगर बच्चे आदर देंगे इसलिए कि मां-बाप मांगते हैं कि आदर दो, क्योंकि हम बुजुर्ग हैं, हमने जिंदगी देखी है और हमने यह किया और हमने वह किया। अगर इस वजह से वे आदर मांगते हैं, तो वे पक्का समझ लें, वे बच्चे में आदर नहीं, अनादर के बीज बो रहे हैं। हां, आज तो बच्चा कमजोर है इसलिए डर की वजह से आदर देगा। लेकिन कल आप कमजोर हो जाएंगे और बच्चा ताकतवर हो जाएगा; आप बूढ़े हो जाएंगे और बच्चा जवान हो जाएगा, तब? तब पासा बदल जाएगा। बच्चा सताएगा और अनादर देगा। ये जो जवान बच्चे अपने मां-बाप को अनादर दे रहे हैं, यह अकारण नहीं है। इनसे बचपन में जबरदस्ती आदर मांगा गया, उसका रिएक्शन है, उसकी प्रतिक्रिया है। जब इनके हाथ में ताकत आएगी, तो ये इसका बदला चुकाएंगे। आपके हाथ में ताकत थी, तो आपने आदर मांग लिया। अब इनके हाथ में ताकत है, तो अब ये उसका बदला चुकाएंगे कि जो आदर दिया था, उसको एक-एक रत्ती-रत्ती पाई चुकता कर लेंगे।
    सारी दुनिया में बच्चों की जो बगावत है, वह मां-बाप के प्रति नहीं है, मां-बाप के जबरदस्ती मांगे गए आदर के प्रति है। मां-बाप को कौन अनादर देगा? कोई कल्पना भी नहीं कर सकता उनको अनादर देने की। लेकिन मां-बाप होने तो चाहिए, वे हैं कहां? गुरु होने तो चाहिए, वे हैं कहां? इसलिए मैं यह नहीं कहता कि गुरु को आदर दो। मैं तो यह कहता हूं, जिसके प्रति तुम्हारा आदर खिंचा हुआ चला जाए, उसे गुरु समझ लो। मां-बाप को आदर मिलना नहीं चाहिए; दिया नहीं जाना चाहिए; मांगा नहीं जाना चाहिए। यह तो हद्द हो गई। अगर एक मां अपने बेटे से कहे कि तुम मुझे आदर दो, यह किस बात की खबर हुई? यह इस बात की खबर हुई कि वह मां मां होने में समर्थ नहीं हो सकीं। नहीं तो आदर तो मिलता। एक पिता अपने बेटे से कहे, मुझे आदर दो, क्योंकि मैं तुम्हारा पिता हूं। यह बात भी अगर कहनी पड़े और समझानी पड़े, तो बात खत्म हो गई। यह पिता पिता होने के योग्य नहीं था।
    जब भी आदर मांगा जाता है तो समझ लेना चाहिए, समाज में आदर पाने योग्य लोग समाप्त हो गए। सचमुच योग्य व्यक्ति कभी आदर नहीं मांगता, सम्मान नहीं मांगता। और जिस व्यक्ति को इस बात का अहसास है कि वह जो कह रहा है, सच है, वह कभी यह नहीं कहता कि मेरी बात को प्रमाण मान लेना। जिस आदमी को अपनी बात पर शक होता है, वह हमेशा जोर देकर कहता है कि मेरी बात प्रमाण है, मैं जो कह रहा हूं, वह सत्य है। जिस आदमी को शक होता है अपनी बात पर, वह यह कहता है कि मैं जो कह रहा हूं, वह प्रमाणित है, इस पर शक करोगे, गर्दन काट देंगे। लेकिन जिसको अपनी सच्चाई पर, अनुभव पर, जिसे सीधा बोध होता है कि मैं जो कह रहा हूं, वह सच है, वह कभी ऐसा नहीं कहता। वह कहता है कि मुझे दिखाई पड़ता है कि यह सच है, तुम भी सोचना और खोजना। क्योंकि उसे इस बात का पता है कि अगर दूसरे व्यक्ति ने सोचा और खोजा, तो वह निश्चित ही इस नतीजे पर आ जाएगा, जो मैं उससे कह रहा हूं। लेकिन जिसको यह डर होता है कि मैं जो कह रहा हूं, पता नहीं, वह सच है या झूठ, वह कहता है, यह प्रमाणिक है। और मेरी बात को इसलिए मान लेना कि मैं तुम्हारा पिता हूं; इसलिए मान लेना कि मैं गुरु हूं; इसलिए मान लेना कि मेरी उम्र तुमसे ज्यादा है। ये बातें सब कमजोरी के लक्षण हैं और झूठ के लक्षण हैं, सत्य के लक्षण नहीं हैं।
    इसलिए कोई गुरु कभी नहीं कहता कि मेरी बात को प्रमाण मान लेना। वह कहता है, खोजना, अन्वेषण करना। वह यह नहीं कहता कि मेरी बात मान लो कि यही सच है। जो आदमी ऐसा कहता है, वह गुरु नहीं है, वह तो शत्रु है, क्योंकि वह आपके भीतर सोच-विचार के पैदा होने के बीज को नष्ट कर रहा है। वह आपको विश्वास की तरफ ले जा रहा है। विश्वास आपको अंधेपन की तरफ ले जाएगा। कल कोई दूसरा आदमी कहेगा कि मेरी बात मान लो, क्योंकि मेरी उम्र भी ज्यादा है, फिर आप उसकी बात भी मान लेना। परसों कोई तीसरा आदमी कहेगा कि मेरी बात मान लो, तो उसकी बात भी मान लेना।
    सोवियत रूस में उन्नीस सौ सत्रह में क्रांति हुई। वहां के लोग मानते थे कि ईश्वर है, विश्वास करते थे कि ईश्वर है। पुरोहित कहते थे, पादरी कहते थे, ईश्वर है; तो वे मानते थे। पुरोहित बड़ा आदमी था। गांव में उसकी इज्जत थी। उसके तगमे चमकते थे; उसके कपड़े चमकते थे। चर्च, उसका बड़ा मकान। पुरोहित की बड़ी इज्जत थी। खुद बादशाह भी आता तो पुरोहित के पैर छूता था। तो पुरोहित के हाथ में शक्ति थी, पॉवर था। तो पुरोहित कहता था, जो मैं कहता हूं, वही सत्य है। मैं कहता हूं कि क्राइस्ट कुंआरी लड़की से पैदा हुए, तो लोग मानते थे कि हुए। जब हुकूमत बदल गई और कम्युनिस्ट हुकूमत में आ गए और उन्होंने पुरोहितों को निकाल कर बाहर कर दिया और पुरोहित दीन-हीन हो गए, तो पॉवर बदल गया। पॉवर आ गया कम्युनिस्टों के हाथ में और कम्युनिस्टों ने कहा: कोई ईश्वर नहीं है, और उन्होंने कहा: कोई आत्मा नहीं है, कोई परमात्मा नहीं है। लोग इसको मान लिए। कोई आत्मा नहीं, कोई परमात्मा नहीं; ठीक है।
    कल मानते थे पुरोहित को, क्योंकि वह ताकत में था। आज कम्युनिस्ट ताकत में आ गए, उन्होंने उसकी बात मान ली कि ठीक है, ये जो कहते हैं वही ठीक है। बीस साल के दोहराने के बाद रूस के लोग कहने लगे, कोई आत्मा नहीं, कोई परमात्मा नहीं, कोई पुनर्जन्म नहीं। ये वे ही लोग हैं, जो कल कहते थे ईश्वर है। और जो कहते थे, कुंआरी मरियम से क्राइस्ट पैदा हुआ। अब वे सब हंसने लगे और कहने लगे, वे सब बेवकूफी की बातें थीं। क्योंकि अब जो ताकत में आ गए, उन्होंने कहा कि वे बेवकूफी की बातें थीं। ये वे ही लोग; इनमें कोई फर्क नहीं पड़ा। ये विश्वास के परिणाम हुआ यह। अगर इन लोगों ने विचार किया होता और अगर इन्होंने क्राइस्ट को या परमात्मा की खोज को विचार से अंगीकार किया होता, तो कोई कम्युनिस्ट इनको यह समझाने में समर्थ नहीं हो सकता था कि ईश्वर नहीं है। इनके भीतर विचार का अनुभव होता। कोई दुनिया की ताकत उसको तोड़ नहीं सकती थी।
    दुनिया में बड़ा खतरा है विश्वास के कारण। क्योंकि जो लोग विश्वास करते हैं, वे किसी भी चीज पर विश्वास कर सकते हैं। उन्हें कोई भी चीज समझाई जा सकती है, क्योंकि विश्वास करने वाला आदमी कभी विचार नहीं करता। इसलिए दुनिया की हुकूमतें, दुनिया के पोलिटिशियंस, दुनिया के धर्म-पुरोहित, दुनिया के शोषण करने वाले लोग, कोई भी यह नहीं चाहते कि आप विचार करो। वे सब चाहते हैं, विश्वास करो। क्योंकि आप विश्वास करोगे, तो दुनिया में कोई क्रांति नहीं होगी, कोई बगावत नहीं होगी। आपका शोषण मजे से होता रहेगा, आपको मूढ़ बनाया जाता रहेगा और आप चुपचाप चलते रहोगे। विचार से वे सब घबड़ाए हुए हैं। और विचार के न होने का यह परिणाम है कि पांच हजार साल से आदमी कष्ट उठा रहा है, न मालूम कितने प्रकार के, जिनका कोई हिसाब नहीं है। विचार पैदा होना चाहिए। क्योंकि विचार बगावत है, विचार रिबेलियन है। विचार पैदा होना चाहिए, तो शायद बगावत भी पैदा हो और हम एक नई दुनिया बनाने में समर्थ हो जाएं।
    निश्चित ही पुरानी दुनिया तोड़नी पड़ेगी, नई दुनिया बनाने के लिए; पुराने ढांचे मिटाने होंगे, नये आदमी को जन्म देने के लिए।
    पुरानी दुनिया भली नहीं थी। क्या आपको पता है, पांच हजार सालों में पंद्रह हजार युद्ध लड़े हैं पुरानी दुनिया ने। इस दुनिया को कोई भला कहेगा? यह दुनिया पागल रही होगी। जहां पांच हजार साल में पंद्रह हजार युद्ध लड़ने पड़े हों, जहां रोज युद्ध करने पड़े हों, जहां रोज हत्या करनी पड़ी हो, यह दुनिया अच्छी दुनिया रही होगी? यह पागलों की दुनिया रही होगी। इस दुनिया को बदल देना जरूरी है। और बदलने के लिए पहला सूत्र है, विश्वास करना नहीं, विचार करना, खोजना विवेक से, अपने प्राणों की पूरी ताकत से, जो ठीक लगे उसको स्वीकार करना। निश्चित ही जो मां-बाप अपने बच्चों को विचार करने में सहयोगी बनेंगे, बच्चे उनके लिए सदा के लिए आदर से भर जाएंगे। जो मां-बाप अपने बच्चों के लिए विचार और विवेक की शक्ति जगाने में सहयोगी होंगे, वे बच्चे आजीवन उन मां-बाप के प्रति सम्मान का अनुभव करेंगे। जो गुरु आदर नहीं मांगेगा, बल्कि इस तरह का जीवन जीएगा, जो कि बच्चे के भीतर स्वतंत्रता लाए, बच्चे के भीतर विचार और विवेक लाए, उस गुरु के प्रति उन बच्चों के माथे हमेशा के लिए झुक जाएंगे।
    आदर तो मिलता है; मांगा नहीं जाता। प्रेम मिलता है; मांगा नहीं जाता। सम्मान मिलता है; खरीदा नहीं जाता। न भय दिखा कर पाया जाता है, न झपटा जाता है। लेकिन वह तभी मिलता है जब हम किसी की आत्मा को विकसित होने में सहयोगी बनते हैं। तो निश्चित ही वह आत्मा सदा के लिए ऋणी हो जाती है, वह आत्मा हमेशा के लिए अनुगृहीत हो जाती है, एक ग्रेटिटयूड उसके भीतर पैदा हो जाता है। क्या आप अपने बच्चों को स्वतंत्र करने में सहयोगी हो रहे हैं? अगर हो रहे हैं, तो ये बच्चे आपको सम्मान देंगे। जितने ये स्वतंत्र होंगे, उतना सम्मान देंगे। क्या इन बच्चों में विचार पैदा कर रहे हैं? अगर इनमें विचार पैदा किया, तो ये अनुगृहीत होंगे। क्योंकि विचार इन्हें जीवन की बड़ी ऊंचाइयों पर ले जाएगा, जीवन के शिखरों पर ले जाएगा, जीवन की गहराइयों में ले जाएगा। विचारपूर्वक ये सत्य को किसी दिन जानने में समर्थ हो सकेंगे। ये आनंदित हो सकेंगे किसी दिन। और जिस क्षण इनके जीवन में आनंद उतरेगा, उस दिन आपके प्रति इनका ऋण, उस दिन आपके प्रति इनकी कृतज्ञता, उस दिन आपके प्रति इनकी धन्यता का कोई पारावार न होगा, कोई सीमा न होगी।
    दुनिया से कृतज्ञता उठ गई है क्योंकि हम अपने बच्चों को परतंत्र कर रहे हैं, स्वतंत्र नहीं। हम अपने बच्चों को गुलाम बना रहे हैं, मुक्त नहीं; हम अपने बच्चों को दासता सिखा रहे हैं, विद्रोह नहीं। सच्चे मां-बाप और सच्चे गुरु बच्चों को विद्रोह सिखाते हैं, ताकि जो गलत है उसे वे तोड़ सकें; और साहस सिखाते हैं, ताकि जो सही है उसे वे निर्मित कर सकें। और बच्चे अगर गलत को तोड़ने में समर्थ हो जाएं और सही को सृजन करने में, तो निश्चित ही, निश्चित ही वे बच्चे सदा-सदा के लिए अपनी पुरानी पीढ़ी के चरणों में सिर को टेक देंगे।
    लेकिन अभी जो हो रहा है और आज तक जो होता रहा है, उसने बच्चों को घबड़ा दिया है और एक क्लाइमेक्स पर बात पहुंच गई है जैसे। और सारी दुनिया में युवक पुरानी पीढ़ी के शत्रु हुए जा रहे हैं। इसमें जिम्मा किसका है? इसमें पुरानी पीढ़ी जिम्मेवार है। और अगर पुरानी पीढ़ी ने यह गलती की कि जिम्मेवारी नई पीढ़ी पर सौंपी, तो कोई फर्क न हो सकेगा। लेकिन अगर पुरानी पीढ़ी ने यह समझा कि कुछ बुनियादी भूलें हैं, जिनकी वजह से नई पीढ़ी भटक रही है; जिनकी वजह से नई पीढ़ी के मन में कोई कृतज्ञता का भाव नहीं है, कोई ग्रेटिटयूड नहीं है, कोई सम्मान नहीं है, कोई आदर नहीं है, तो शायद हम नई पीढ़ी में वह भाव पैदा कर सकें, जो कि उसमें होना चाहिए। लेकिन वह मांगा नहीं जा सकता; वह बुलाया नहीं जा सकता; वह कहा नहीं जा सकता कि हमें दो। वह तो हमारे भीतर कुछ होगा परिवर्तन, तो अपने आप मिलता है। अपने आप मिलता है। सुबह सूरज निकलता है और हमारी आंखें उसकी तरफ उठ जाती हैं। बगीचे में फूल खिलते हैं और उनकी सुगंध से हम भर जाते हैं। अगर पुरानी पीढ़ी किसी सूरज को अपने भीतर जन्म दे सके और किसी सुगंध को, तो नई पीढ़ियां, नई पीढ़ियां तो हमेशा अनुगृहीत होने को हैं।
    इतनी थोड़ी सी बातें मैंने आपसे कहीं। और कुछ प्रश्न हैं, लेकिन उनका तो उत्तर आज संभव नहीं हो पाएगा। और सभी प्रश्नों के उत्तर जरूरी भी नहीं हैं। इसलिए नहीं कि वे प्रश्न कम महत्वपूर्ण हैं; बल्कि इसलिए कि जो बातें थोड़ी सी मैंने कहीं, अगर वे आपके खयाल में, समझ में आ जाएं, तो उनके आधार पर आप उन प्रश्नों के उत्तर भी पा सकेंगे, जिनके बाबत मैंने कुछ भी नहीं कहा।
    मेरा दृष्टिकोण आपके सामने मैंने रख दिया। यह दृष्टिकोण विश्वास कर लेने के लिए नहीं है। मैंने जो भी बातें कहीं, उन पर विश्वास कर लेने की कोई भी जरूरत नहीं है। मैं न तो गुरु हूं, न उपदेशक हूं, न मुझे यह भ्रम है कि जो बात मैं कहूं, उसे आप मान लें। मैंने ये बातें आपके सामने रखीं ताकि आप इन पर सोचें, विचार करें। जरूरी नहीं है कि विचार करने के बाद मेरी बातें आपको सही ही मालूम पड़ें। लेकिन एक बात है, अगर आपने विचार किया, तो मेरी बातें चाहे आपको गलत मालूम पड़ें लेकिन जितना आप विचार करेंगे, उससे आपके भीतर विवेक की शक्ति विकसित होगी और बड़ी होगी। मेरी बातों का कोई मूल्य नहीं है। लेकिन उन पर विचार करने में आपके भीतर विचार की शक्ति विकसित होगी। और वह विचार की शक्ति विकसित हो जाए, तो आप खुद ही अपने प्रश्नों के उत्तर पा लेने में समर्थ हो जाएंगे।
    कोई दूसरा आदमी किसी के प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकता। कोई दूसरा आदमी किसी की प्यास नहीं बुझा सकता। हर आदमी की प्यास अद्वितीय है, यूनीक है। हर आदमी अलग है। हर आदमी बेजोड़ है, उस जैसा कोई दूसरा आदमी नहीं है। हर आदमी का प्रश्न भी बेजोड़ है, उसका उत्तर मेरे पास कैसे हो सकता है? आपका प्रश्न है, इस जमीन पर किसी के पास आपका उत्तर नहीं हो सकता। फिर मैं किसलिए बोल रहा हूं? मैं इसलिए नहीं बोल रहा हूं कि आपको मैं उत्तर दे दूं। मैं इसलिए बोल रहा हूं, ताकि आपको अपने भीतर उत्तर खोजने की विधि, मेथड मिल जाए, सोच-विचार मिल जाए, आप चीजों को सोचने-विचारने लगें, तो आपके भीतर जहां से प्रश्न पैदा हुआ है, वहीं उत्तर भी सदा मौजूद है। और जब अपने भीतर का उत्तर आता है, तो वह उत्तर मुक्त कर देता है। वह उत्तर ही जीवन-दर्शन बन जाता है; वह उत्तर ही जीवन का सत्य बन जाता है; वह उत्तर ही हमारे प्राणों की प्यास को बुझाने वाला जल बन जाता है। उसको खोजें। मुझ पर या किसी पर विश्वास करने से वह नहीं मिलेगा, बल्कि संदेह करने से मिलेगा।
    तो मैंने जो बातें कहीं उन पर खूब संदेह करें, उनका खूब विश्लेषण करें, उनको तोड़ें-फोड़ें, उनको बजाएं और परखें। हो सकता है वे सारी बातें गलत हों, तो उन सारी बातों के गलत होने में भी आपको सही की झलक मिलनी शुरू हो जाएगी। और हो सकता है कोई बात उसमें सही हो, तो आपकी खोज-बीन से वह सही आपको दिखाई पड़ जाएगा। और तब उससे मेरा कोई संबंध नहीं होगा; वह सत्य आपका हो जाएगा। और जो सत्य आपका है, वही सत्य है। दूसरों के सब सत्य असत्य हैं। आपका सत्य ही सत्य हो सकता है।

    मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उससे बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं, मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

    — ओशो [अंतर की खोज-प्रवचन-02]

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