क्या समर्पण का मार्ग संकल्प के मार्ग से विपरीत है?
Question
प्रश्न – क्या समर्पण का मार्ग संकल्प के मार्ग से विपरीत है?
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प्रश्न – क्या समर्पण का मार्ग संकल्प के मार्ग से विपरीत है?
Answer ( 1 )
जरा भी नहीं। केवल सुनने में ऐसा लगता है कि दो विपरीत बातें हैं। बिल्कुल एक ही हैं। संकल्प का अर्थ क्या हुआ? संकल्प का अर्थ हुआ कि अपने किसी एक लक्ष्य के प्रति समर्पित, सिर्फ भाषा का ही तो डिफ्रेन्स है; आप जिसको समर्पण कह रहे हैं। संकल्प का अर्थ हुआ कि अपने निर्णय के प्रति समर्पित तो समर्पण तो इसमें भी आ गया। और समर्पण अपने आप में एक महासंकल्प है, याद रखना। संकल्पवान व्यक्ति ही समर्पण कर सकता है। जो डांवाडोल चित्त का है, संशय में डोलने वाला है वह कैसे समर्पण करेगा। आज वह कह रहा है कि आपके चरणों में सब छोड़ता हूँ कल को वह फिर पलट जाएगा, क्योंकि उसके अन्दर तो टुकड़े-टुकड़े हैं। एक हिस्से ने समर्पण किया, दूसरा हिस्सा उसके विपरीत संदेह से भरा हुआ होगा, अश्रद्धा से भरा हुआ होगा। तो श्रद्धा, समर्पण और भक्ति का मार्ग भी महासंकल्पवान व्यक्ति ही पूरा कर सकता है। जिसने कहा कि झुक गया यह सिर, तो फिर झुक ही गया अब न उठेगा। यह तो महासंकल्पवान व्यक्ति ही कर सकता है। इसलिए सुनने में जरूर लगता है कि समर्पण और संकल्प के मार्ग भिन्न हैं। लेकिन ऐसा जरा भी नहीं क्योंकि समर्पण संकल्पवान व्यक्ति ही कर सकता है। और संकल्प का मतलब ही होता है अपने निर्णय के प्रति पूरी तरह समर्पित। कमिटमेन्ट का क्या अर्थ हुआ? कमिटमेन्ट का अर्थ है समर्पित।
अतीत में दो प्रकार की संस्कृतियां इस देश में पैदा हुई; एक ब्राह्मण संस्कृति- समर्पण के मार्ग वाली, भक्ति के मार्ग वाली और दूसरी श्रवण संस्कृति- बुद्ध और महावीर की श्रम और संकल्प वाली। लेकिन मैं इन दोनों में कोई विरोध नहीं देखता और ओशो के सन्यासी को एक पूर्ण संस्कृति का निर्माता होना चाहिए। श्रवण संस्कृति भी अधूरी है और ब्राह्मण संस्कृति भी अधूरी है। एक पूर्ण संस्कृति में दोनों का समन्वय होगा। शुरूआत करो संकल्प से और अंततः तुम पाओगे तुम्हारे भीतर समर्पण घटित होने लगा।
~ स्वामी शैलेंद्र सरस्वती