क्या समाधि के अलावा भी किसी तरीके से परमात्मा का मिलन संभव है?
Question
प्रश्न – समाधि के सिवाय क्या परमात्मा का मिलन संभव है?
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प्रश्न – समाधि के सिवाय क्या परमात्मा का मिलन संभव है?
Answer ( 1 )
नहीं संभव है। समाधि तो केवल द्वार है। जैसे कोई कहे कि क्या बिना द्वार के इस मकान के अंदर आना संभव है? तो हम क्या कहेंगे? हम कहेंगे, नहीं संभव है। और अगर वह कहीं से दीवार तोड़कर भी आ जाए, तो हम कहेंगे, वह द्वार हो गया। तो द्वार क्या है? अगर हम कहें कि इस मकान में द्वार से आने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है और वह किसी दीवार को तोड़कर अंदर आ जाए, तो हम कहेंगे, वह रास्ता हो गया, वह द्वार हो गया। लेकिन इस मकान में बिना द्वार के आना संभव नहीं है। किसी भी भांति आएं, द्वार से आएंगे। समझदार होंगे, तो सीधे चले आएंगे। नासमझ होंगे, कहीं दीवार तोड़ेंगे।
समाधि के बिना कोई रास्ता नहीं है। समाधि तो द्वार है परमात्मा के प्रति, सत्य के प्रति। और बिना द्वार के मैं नहीं समझता कि कैसे जाएंगे! बिना द्वार के कभी कोई कहीं नहीं गया है।
इसे स्मरण रखें, ऐसा न सोचें कि बिना समाधि के भी संभव हो जाएगा। मन हमारा ऐसा होता है कि और भी कोई सस्ता रास्ता हो। यानि मतलब यह कि ऐसा रास्ता हो, जिसमें चलना ही न पड़े। लेकिन सब रास्तों पर चलना होता है। चलने का मतलब ही है, तब वे रास्ते होते हैं। लेकिन हम चाहते हैं, ऐसा द्वार हो, जिसमें प्रवेश ही न करना पड़े और पहुंच जाएं। ऐसा कोई द्वार नहीं होता, जिसमें प्रवेश बिना किए आप पहुंच जाएं।
पर हमारे मन की कमजोरियां हैं बहुत। और हमारे मन की कमजोरियां ये हैं कि हम कुछ भी नहीं करना चाहते और कुछ पाना चाहते हैं। विशेषतया परमात्मा के संबंध में तो हमारी धारणा यह ही है कि अगर वह बिना किए मिल जाए, तो विचारणीय है। बल्कि हो सकता है कि अगर कोई आपको बिना किए भी देने को राजी हो जाए, तो भी आप विचार करें कि लेना या नहीं लेना!
एक बार ऐसा हुआ, वहां श्रीलंका में एक साधु था। वह रोज मोक्ष की और निर्वाण की और समाधि की बातें करता। कुछ लोग उसे वर्षों से सुनते थे। एक आदमी ने एक दिन खड़े होकर पूछा कि ‘मैं यह पूछना चाहता हूं, आपको इतने लोग इतने दिन से सुनते हैं, इनमें से किसका निर्वाण हुआ और किसकी समाधि हुई?’ उस साधु ने कहा, ‘तुम्हारा विचार है, तो आज ही समाधि हो जाए। राजी हो? अगर तुम राजी हो, तो आज यह मेरा सच है कि तुम्हें समाधि लगवा दूंगा।’ वह आदमी बोला, ‘आज!’ उसने कहा, ‘थोड़ा विचार करें, किसी…। आज ही?’ उसने कहा, ‘थोड़ा विचार करें। मैं फिर आकर आपको बताऊं।’
और आपसे भी कोई कहे कि मैं आज ही इसी वक्त आपको परमात्मा से मिला सकता हूं, तो मैं नहीं समझता कि आपका दिल एकदम से कहेगा, हां। आपका दिल बहुत सोच-विचार करने लगेगा। मैं सच आपसे कह रहा हूं, आपका दिल बहुत सोच-विचार करने लगेगा कि मिलना या नहीं मिलना! मुफ्त में भी परमात्मा मिले, तो भी हम विचार करेंगे! तो कीमत देकर तो लेने में विचार करना बहुत स्वाभाविक है। मन यही होता है कि मुफ्त में मिल जाए।
हम मुफ्त में उस चीज को पाना चाहते हैं, जिसका हमारे मन में कोई मूल्य नहीं है। यानि हम निर्मूल्य उसे पाना चाहते हैं, जिसका हमारे मन में कोई मूल्य नहीं है। मूल्य से हम उसे पाना चाहते हैं, जिसका हमारे मन में मूल्य है।
अगर परमात्मा के प्रति थोड़ा भी खयाल पैदा होगा, तो आप पाएंगे कि आप अपना सब देने को राजी हैं। अपना सब देने को राजी हैं और सब देकर भी अगर उसकी एक झलक मिलती है, तो लेने को राजी हो जाएंगे।
यह जो पूछा है कि ‘समाधि के बिना हो सकता है?’ नहीं हो सकता है। श्रम के बिना नहीं हो सकता है। अध्यवसाय के बिना नहीं हो सकता है। आपके पूरे संकल्प और साधना के बिना नहीं हो सकता है।
लेकिन इस तरह के जो कमजोर लोग हैं, वे कमजोर लोग कुछ समझदार लोगों को शोषण का मौका देते हैं। सारी दुनिया में एक तरह का रिलीजस एक्सप्लायटेशन चलता है, एक तरह का धार्मिक शोषण चलता है। चूंकि आप बिना कुछ किए पाना चाहते हैं, इसलिए लोग खड़े हो जाते हैं, जो कहते हैं, हमारी कृपा से मिल जाएगा। हमें पूजो, हमारे पैर पड़ो, हमारा नाम स्मरण करो, हम पर श्रद्धा रखो, मिल जाएगा। और जो कमजोर लोग हैं, वे इस वजह से उनकी श्रद्धा करते हैं और पैर छूते हैं और जीवन गंवाते हैं।
कुछ भी नहीं मिलेगा, यह सिर्फ एक शोषण है। यह सिर्फ एक शोषण है। कोई गुरु परमात्मा नहीं दे सकता। परमात्मा तक जाने का मार्ग दे सकता है, लेकिन मार्ग पर खुद चलना होता है। कोई गुरु आपके लिए नहीं चल सकता है। इस दुनिया में कोई आदमी किसी दूसरे के लिए नहीं चल सकता है। अपने पैर ही चलाते हैं। अपने पैरों पर ही चलना होता है। और अगर कोई कहता हो, और ऐसे कहने वाले अनेक हैं, जो कहते हैं, ‘हम एक ही बात आपसे मांगते हैं कि हम पर श्रद्धा करो, और शेष सब हम कर देंगे।’ वे आपका शोषण कर रहे हैं। और आप चूंकि कमजोर हैं, आप शोषण का मौका देते हैं।
दुनिया में जितने धार्मिक पाखंड चलते हैं, उसका कारण पाखंडी कम हैं, आपकी कमजोरियां ज्यादा हैं। अगर आप कमजोर न हों, तो दुनिया में कोई धार्मिक पाखंड खड़ा नहीं होगा। क्योंकि अगर कोई आदमी थोड़ा भी पुरुषार्थवान है, अगर थोड़ा भी उसे अपने जीवन का गौरव और गरिमा है, और कोई उससे कहेगा कि मैं अपनी कृपा से तुमको परमात्मा दिलाए देता हूं! वह कहेगा, क्षमा करें; इससे बड़ा मेरा और क्या अपमान हो सकता है! यानि वह कहेगा, क्षमा करें; इससे बड़ा मेरा और क्या अपमान हो सकता है कि परमात्मा मैं आपकी कृपा से पाऊं!
और जो दूसरे की कृपा से मिलेगा, क्या वह दूसरे की नाराजगी से छीन नहीं लिया जा सकता है? क्या जो दूसरे की कृपा से मिलेगा, वह दूसरे की नाराजगी से छीना नहीं जा सकता? जो कृपा से मिलता है, वह कृपा के हटने से छिन भी सकता है। वह सिर्फ धोखा होगा, जो परमात्मा मिले और छीन लिया जाए और जिसे कोई दूसरा दे सके।
कोई दुनिया में किसी दूसरे को सत्य और परमात्मा नहीं दे सकता है। अपने ही श्रम से और अपनी ही साधना से उसे पाना होता है। इसलिए क्षणभर को भी, रत्तीभर को भी मन में कभी यह खयाल न देना, यह कमजोरी घातक साबित होती है। और इस कमजोरी की वजह से आप तो टूटते हैं, आप पाखंड को, धोखों को, झूठी गुरुडमों को फैलने का मौका देते हैं। वे असत्य हैं, उनका कोई मूल्य नहीं है। और वे घातक हैं और विषाक्त हैं।
— ओशो (ध्यान सूत्र | प्रवचन–08)
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