जीवन में धन, पद, प्रतिष्ठा आदि में और-और की मांग से कैसे बचें?

Question

प्रश्न – मैं हमेशा और-और की ही मांग करता रहा हूं धन, पद, प्रतिष्ठा, स्वास्थ्य, संबंध, प्रेम। जिन्दगी में ऐसे पल भी थे जब मैं भौतिक उपलब्धियों के शिखर पर था। किन्तु और-और की मांग की वजह से मैं उन पलों का आनन्द नहीं ले पाया?

Answer ( 1 )

  1. चलो इस घटना से एक सबक सीखें- अभी और यहीं (हियर एण्ड नाऊ)– उसका आनन्द लेना शुरू करो। पीछे जो बीत गयी वह बात गई, उसके लिए रोने की कोई जरूरत नहीं। नहीं तो तुम फिर आज का दिन भी गंवा दोगे। पहले तुमने और-और की मांग करके, भविष्य की भोजनायें बना-बना के सुख के पलों को गंवा दिया।

    अब तुम पीछे का रोना रोओगे कि अरे वे उपलिब्धयों के दिन बीत गए और मैं सुख न ले पाया। अब तुम फिर आज का दिन चूक रहे हो। ऐसा आदमी का मन है। या तो वह भविष्य के कारण वर्तमान को चूकता है और या अतीत की स्मृतियों के कारण वर्तमान को चूकता है। इन दोनों अतियों से बचना। मध्य में है मार्ग। एक अति है अतीत। दूसरी अति है भविष्य। ठीक मध्य में है यह बीच का क्षण। ओशो की प्रमुख देशनाओं में है- क्षण-क्षण जीओ। (लाईफ मुमेन्ट टू मुमेन्ट) सारे धर्मों का सारसूत्र इसी छोटी सी देशना में आ गया। जिसने यह कर लिया उसने सब कर लिया। परम आनन्द का खजाना इसी सूत्र में से खुलता है।

    मैंने सुना एक नास्तिक था। घनघोर नास्तिक था। उसने अपने आफिस के बाहर बोर्ड लगा रखा था। घोषणा कर रखी थी ईश्वर न होने की। बोर्ड पर लिखा था- गौड इज नोवियर परमात्मा कहीं नहीं है। बोर्ड लगा रखा था। एक दिन उसका छोटा बच्चा जो के.जी. में पढ़ता था ऑफिस आया। उसने बोर्ड पढ़ा। इतना लंबा शब्द वह पढ़ नहीं पा रहा था नोवियर उसने दो टुकड़ो में तोड़कर पढ़ा कि- ‘गौड इज नो वियर’ वह नास्तिक भी सुनकर चौंका कि परमात्मा अभी और यहीं है। गौड इज नोवियर परमात्मा अभी और यहीं है। वह इसी में मौजूद है। वह सच्चिदानन्द वर्तमान क्षण में हैं।

    लेकिन हमारा मन आगे और पीछे डोलता रहता है। या तो हम अतीत की स्मृति में रहते हैं या भविष्य की योजना बनाते रहते हैं। ये दो विधियां हैं चूकने की। तो स्वामी चेतन जब समझ में आ गयी तभी जागो। अब फिर से पुराने दिनों की याद में मत जीओ। मैं फिर से पढ़ता हूं तुम्हारा प्रश्न ताकि तुम्हें ठीक से स्पष्ट हो सके। पहले और-और की मांग करके वर्तमान को चूकते रहे, अब याद करके चूक रहे हो। मैं फिर-फिर पढ़ता हूं तुम्हारा प्रश्न। तुम लिखते हो कि ‘‘मैं हमेशा और-और की मांग करता रहा। जब मैं उपलब्धियों के शिखर पर था तब भी और-और की मांग करके उन आनन्द के पलों को चूकता रहा। ऐसा ही होता है। इसलिए तो जागृत पुरुषों के वचनों का इतना महत्व है। कि वे उनकी मुक्ति के वचन हैं। मुक्ति का ही परम रूप है मोक्ष। वे उनके मोक्ष से आ रहे हैं। और इसीलिए वे दूसरों के लिए भी मुक्तिदायी होंगे। सदगुरु और दूसरे गुरु में फर्क बड़ा असान है। गुरु तुम्हें बाध लेगा। तुम्हें रटे-रटाए उत्तर और धारणाएं पकड़ा देगा। उसकी मंशा तुम्हें बांधने की है। खास फिलोस्फी, खास सिद्धांत में बांधने की है। वह तुम्हारी मुक्ति में उत्सुक नहीं है। वह तुम्हारे चारों तरफ से घेर लेना चाहेगा, बांध लेना चाहेगा ताकि तुम छोड़कर न जाओ उसे। सदगुरु ऐसा कभी भी न करेगा। जाग जाओ और अभी और यहीं में आ जाओ।

    ~ स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

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