जीवन में ध्यान की क्या आवश्यकता है? हमें ध्यान क्यों करना चाहिए?

Question

प्रश्न – ध्यान की जीवन में क्या आवश्यकता है?

Answer ( 1 )

  1. आवश्यकता तो कोई भी नहीं है। ध्यान, समाधि ये जीवन की आवश्यकताएं नहीं हैं। विलासताएं हैं, लग्जरीज हैं। आवश्यकता अलग चीज है। जैसे भोजन में रोटी, दाल, चावल खाना आवश्यकता है, उसके बिना हम न जी सकेंगे। परन्तु रसगुल्ला खाना कोई आवश्यकता नहीं। उसके बिना हम जी सकेंगे। यह लग्जरी की बात है। आवश्यकता नहीं है। चाकेलेट कोई आवश्कता नहीं है, लग्जरी है। ठीक इसी प्रकार धर्म भी जीवन की आवश्यकता नहीं है। धर्म जीवन की लग्जरी है। तो आप पूछते हैं ध्यान की जीवन में क्या आवश्यकता है? मैं आप से कहना चाहता हूं कि ध्यान की कोई भी आवश्यकता नहीं। आखिर 6 अरब लोग बिना ध्यान के जी रहे हैं। इतना ही नहीं अरबों-खरबों पशु-पक्षी, पौधे, मछलियां सब बिना ध्यान के जी ही रहे हैं। अगर यह जीवन की बुनियादी आवश्यकता होती तो इसके बिना जीवन नहीं चल सकता था। हां, सांस लेना आवश्यकता है, भोजन खाना, पानी पीना जीवन की आवश्यकता है। इनके बिना जीवन न चल सकेगा। ध्यान करना समधि में डूबना, परमात्मा को पाना, मैं कौन हूं का उत्तर खोजना ये कोई जीवन की आवश्यकतायें नहीं हैं। इसलिए जब किसी समाज में बुनियादी आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं तब उस समाज में धर्म की आवश्यकता पैदा होने लगती है। यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाते है कि मैं कौन हूं। तब अचानक ये प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि परम सत्य क्या है? परमात्मा कौन है? आनन्द को कैसे जानें? कोई भूखा व्यक्ति जिसको अभी रोटी भी खाने को नहीं मिली है वह नहीं पूछता कि आनन्द क्या है? वह तो कहता है कि कैसे रोटी मिले और भूख मिटे। भूख कैसे मिटे यह उसका सवाल है। मैं कौन हूं? यह उसका सवाल नहीं है। किसी भिखारी को जाकर उपदेश मत देने लगना कि आओ हम तुम्हें बताते हैं कि तुम कौन हो। कि सुनो रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह प्यारा गीत। वह अपना माथा फोड़ लेगा कि मैं भूखा हूं और ये चले अपना गीत सुनाने। क्या मैं गीत को खाऊंगा पीऊंगा कि क्या करूंगा? नहीं, गीत उसकी बुनियादी आवश्यकता नहीं है। जिसको रहने को घर-वार नहीं है, जो सड़क पर है तुम उसे कहो कि देखो कितनी सुन्दर पेटिंग किसी चित्रकार ने बनायी है। पूर्णिमा की रात चित्रित की है। वह आदमी आप पर नाराज़ हो जाएगा। ये सब लग्जरी की बाते हैं। जब पेट भरा हो, जब रहने के लिए घर हो, जब जीवन सब सुख-सुविधाओं से सम्पन्न हो, तब संगीत में रस आता है, चित्रकला में रस आता है। तब अभिनय में और नृत्य में रूचि उत्पन्न होती है। तब जीवन की अन्य चीजों की तरफ नज़र जाती है। एक भूखे, प्यासे, बेरोजगार व्यक्ति को हम कहें कि लो सुनों यह प्यारा संगीत। तो हम उसके साथ अन्याय कर रहे हैं। अभी उसे रोटी की जरूरत है, नौकरी की जरूरत है, उसे संगीत की जरूरत नहीं है। अभी संगीत उसे न आएगा। ये सब लग्जरी को बाते हैं।
    तो तीन तरह की आवश्यकताएं हैं। पहला शरीरिक जरूरतें, दूसरा मानसिक जरूरतें फिर एक आत्मा की जरूरतें। शारीरिक जरूरतें तो हम सब जानते हैं, भोजन, कपड़ा, सुरक्षा की जरूरत है, स्वास्थ्य की औषधि की जरूरत है। जब ये सब पूरी हो जाती हैं तो हम दूसरी सीढ़ी पर पहुंचाते हैं-मानसिक जरूरतें। जहां संगीत सुनना अच्छा लगता है, चित्रकला में रस आने लगता है, नृत्य और अभिनय में रूचि पैदा होने लगती है ये मन की जरूरते हैं। शरीर को इनकी कोई आवश्यकता नहीं है जानवरों के लिए ये चीजें कोई मायने नहीं रखतीं। एक कहावत है न भैंस के आगे बीन बजाओ, भैंस खड़ी पगलाए। भैंस को क्या लेना-देना तुम्हारी बीन से। रविशंकर सितार बजाते हों, भैंसे क्या करेगी? ज्यादा से ज्यादा गोबर कर देगी। गुलाम अली साहब कितनी ही सुन्दर गज़ल सुना रहे हो, एक बकरे को बांध दें और कहें कि सुनो यह गज़ल। वह बीच-बीच में अपनी मैं-मैं करता रहेगा। लगेगा यह भी कोई आलाप ले रहा है। नहीं, बकरे को कोई आवश्यकता नहीं है गजल की। सभी मनुष्यों को भी कोई आवश्यकता नहीं हैं गज़ल की। केवल जिनकी सभी शरीरिक आवश्यकताएं पूरी हो गयी हैं। फिर एक और आवश्यकता है उनके लिए जिनकी सभी शारीरिक और मानसिक आवश्यकताएं पूरी हो गयी हैं, जो सब भांति स्वस्थ व प्रसन्न हैं। जिन्होंने सुन्दरता का भी रस ले लिया, कला का भी रस ले लिया, संगीत का भी रस ले लिया, उनके जीवन में फिर कुछ सवाल पैदा होते हैं- मैं कौन हूं? यह जीवन क्या है? जीवन का मूल स्रोत क्या है? जीवन का परम लक्ष्य क्या है? मैं जीवित क्यों हूं? यह तो बड़े गहरे प्रश्न है। ये आवश्यकताएं नहीं हैं। इन्हें हम आध्यात्मिक बातें कह सकते हैं आत्मा के तल की बातें। गरीब आदमी के लिए इन बातों का कोई अर्थ नहीं। तो जब कोई समाज गरीब होता है तो उसके आध्यत्मिक होने की संभावना कम हो जाती है, उसके समाजवादी और साम्यवादी होने की संभावना बढ़ जाती है। छीना-झपटी में रस होता है, राजनीति में रस होता है, ध्यान में रस नहीं होता। जब कोई समाज उन्नत होता है, सब भांति प्रगतिशील होता है, तब धर्म का उदय होता है। दार्शनिक प्रश्न अचानक बड़े महत्वपूर्ण हो जाते हैं। उनके उत्तरों की खोज शुरू हो जाती है। तो जरूरतों का एक क्रम है। सामान्यतः जब हम कहते हैं जरूरत, तो हमारा मतलब शरीरिक जरूरत से होता है। तो उस अर्थ में तो ध्यान की कोई जरूरत नहीं है। परन्तु यदि हम जरूरतों को तीन भागों में बांटे, तो आध्यात्मिक जरूरत भी एक जरूरत है। आज से ढ़ाई हजार साल पहले जब भारत सोने की चिड़िया था, दुनिया का सबसे सम्पन्न देश था तो भारत ने धर्म के शिखर छुए। यहां बुद्ध और महावीर जैसे सैकड़ों लोग पैदा हुए। वह समय था जब भारत ने धर्म के महाशिखरों को छुआ। फिर धीरे-धीरे सोने की चिड़िया लुटती पिटती गयी।
    हर देश का उत्थान और पतन होता है। जैसे हमारे व्यक्तित्व में जवानी आती है फिर बुढ़ापा आता है, ऐसे ही देश भी जवान होते हैं और फिर बूढ़े हो जाते हैं, सभ्यताओं पर यौवन आता है फिर वृद्ध हो जाती हैं। आज हमारा देश एक तरह की वृद्धावस्था में है। हम बड़ी दीन-हीन अवस्था में हैं। सारी दुनिया के सामने भिखमंगों जैसी स्थिति है। आज यह सवाल उठता है कि ज्ञान की क्या जरूरत है? निश्चित रूप से उन अर्थों में तो कोई जरूरत नहीं है। यह तो बड़ी गहरी बात है। तो गरीब समाज धार्मिक नहीं हो पाता या गरीब समाज मैं फैलता भी है जो वह झूठा धर्म होता है, पूजा और प्रार्थना वाला धर्म, स्तुति और भोज वाला धर्म। गरीब आदमी मन्दिर भी जाता है तो वहां कुछ मांगने जाता है। वहां भी भीख मंगाना। प्रार्थना का अर्थ ही होता है मांगना। मांगने वाले को हम कहते हैं प्रार्थी। तो मन्दिरों, मस्जिदों में जो प्रार्थना करने जाते हैं वे मांगें करने ही जाते हैं कि हे प्रभु! हमें यह दे दे, कि वह दे दे, कि पत्नी बीमार है ठीक हो जाए, कि बेटे की नौकरी नहीं लगी कि बेटी की शादी हो जाए। यह तो प्रार्थना नहीं है। इसे तुम धार्मिक प्रार्थना मत समझना। यह तो किसी लाचार व्यक्ति की बड़ी ही मजबूर स्थिति से निकली हुईर् कि बेचारा कुछ कर नहीं पा रहा। लाचार है, मजबूर है कि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। यह प्रार्थना कोई प्रार्थना नहीं है। यह धर्म कोई धर्म नहीं है। जब कोई समाज संपन्न होता है, स्वस्थ, प्रसन्न सब भांति प्रफुल्लित होता है तब जाकर आध्यात्मिक प्रश्न खड़े होते हैं। हां, इसका अपवाद हो सकता है। गरीब आदमी धार्मिक हो सकता है। बशर्ते उसकी प्रतिभा अत्यंत प्रगाढ़ हो। गरीब समाज तो धार्मिक नहीं हो सकता। हां अगर वह व्यक्ति अत्यंत प्रतिभाशाली है, प्रखर बुद्धि है, विवेक है, वह अपवाद है कोई कबीर जुलाहा, गोरा कुम्हार, कोई रैदास चमार, बुद्ध, महावीर, राम और कृष्ण जैसी ऊंचाईया छू सकता है- यह कोई आश्यर्च नहीं है कि भारत में जितने भी अवतार हुए चाहे राम, कृष्ण, या बुद्ध या महावीर थे सब राजाओं के बेटे थे। जरूर संपन्नता और धार्मिकता का कोई है लेकिन अपवाद भी हुए हैं। परन्तु उनकी संपन्नता दूसरी प्रकार की है। माना कबीर, गोरा, रैदास बाहर से सम्पन्न नहीं हैं परन्तु उनकी सम्पन्नता भीतरी है। अति मेधावी हैं। उसी मेधा के कारण वे बिना राज-पाट के भी यह देख पाए कि अगर यह सब मिल भी जाए तो भी कुछ मिलने वाला नहीं। इसके लिए बड़ी मेधा चाहिए। हमारे पास तो सब है फिर भी यह दिखायी नहीं देता और न होते हुए भी देख लेना कि इन सब में कुछ नहीं है, बड़ी प्रतिभा का लक्षण है। गरीब रहकर भी जिसे पता चल जाए कि महलों में भी कुछ मिलने वाला नहीं, कोई शांति मिलने वाली नहीं, झोपड़े में रहकर भी जिसे यह पता चल रहा है, निश्चित ही वह अत्यंत प्रतिभाशाली है। बुद्ध और महावीर को अगर पता चल गया तो कोई खास बात नहीं है। क्योंकि महल था, उसी में जीए थे, भलीभांति पता था कि इसमें कुछ मिलने वाला नहीं है। बुद्ध और महावीर यदि ज्ञान को उपलब्ध हो जाते हैं तो कोई खास बात नहीं है। लेकिन कबीर जब हो जाते हैं, दादू दयाल जब हो जाते हैं, दरिया साहब जब हो जाते हैं तो निश्चित यह आश्चर्य की बात है। इनके पास कुछ नहीं था फिर भी ये देख पाए कि सब मिल जाए तो भी आनन्द नहीं आएगा, शांति नहीं आएगी। तो जब आप पूछते हैं कि शांति की क्या आवश्यकता है? तो मैं कहूंगा कि उन अर्थों में तो कोई आवश्यकता नहीं है, इतने लोग, पशु-पक्षी, पौधे ऐसे ही जी रहे हैं। अगर आप मेरे तरीके से तीन खंडों में बांटे- शारीरिक, मानसिक और आत्मिक आवश्यकता तब यह भी एक आवश्यकता है। बाकि की दो पूरी हो जाने पर तीसरी आवश्यकता पैदा होती है।

    ~ स्वामी शैलेंद्र सरस्वती

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