धार्मिक होना क्या है? (Religious Mind) रिलीजस माइंड क्या है? किस मन को, किस चित्त को हम धार्मिक कह सकते है?

Question

प्रश्न – धार्मिक व्यक्तित्व क्या है? (Religious Mind) रिलीजस माइंड क्या है? किस व्यक्ति को आप धार्मिक कह रहे हैं?

Answer ( 1 )

  1. शायद इसलिए यह प्रश्न उनके मन में पैदा हुआ क्योंकि मैंने कहा: मंदिर जो जाता है उतने से ही कोई धार्मिक नहीं हो जाता। शास्त्र जो पढ़ता है उतने से ही कोई धार्मिक नहीं हो जाता। संन्यास भी कोई ले ले, वस्त्र कोई बदल ले, घर-द्वार छोड़ दे, उतने से भी कोई धार्मिक नहीं हो जाता है।
    धार्मिक होना फिर क्या है?
    इसलिए ठीक ही पूछा है कि किस मन को, किस चित्त को मैं धार्मिक कहता हूं? कौन है रिलीजस माइंड?
    एक छोटी से कहानी से समझाऊं।
    वर्षा निकट आ गई थी और आकाश में बादल घिरने लगे थे। आज ही कल में गर्मी में तपी हुई धरती पर वर्षा आ जाएगी। दो भिखारी, दो भिक्षु अपने झोपड़े पर कई दिनों की यात्रा के बाद वापस लौटते थे। एक गांव की झील के पास उनका छोटा सा झोपड़ा था। हर वर्षा में वे वापस लौट आते थे, फिर आठ महीने के लिए घूमते-फिरते थे। वर्षा करीब थी, वे भागे हुए अपने झोपड़े के करीब पहुंचे। झोपड़े के पास जाते ही देखा: आधा झोपड़ा हवाएं उड़ा कर ले गई हैं, आधा ही झोपड़ा बचा है। छप्पर आधा है, आधा छप्पर कहीं उड़ गया। आगे जो भिखारी था, युवा था, पीछे उसका गुरु था, वृद्ध। उस युवा भिक्षु ने अत्यंत दुख से अपने बूढ़े गुरु को कहा, ऐसी ही बातों को देख कर तो ईश्वर पर अविश्वास पैदा हो जाता है। गांव में महल खड़े हैं पापियों के, उनके महलों में कुछ भी विकृति न आई, कोई महल न गिरा, और हम गरीबों के झोपड़े पर, हमारे गरीबों के झोपड़े के आधे छप्पर को भी उड़ा दिया। ऐसी ही बातों से तो मन क्रोध से भर जाता है, ऐसी ही बातों से तो परमात्मा के प्रति विरोध पैदा हो जाता है। हम गरीबों का झोपड़ा ही था उड़ाने को? तोड़ने को? यह वह बड़े क्रोध से कहा, लेकिन देख कर हैरान हुआ, उसके गुरु की आंखों से आंसू बहे जा रहे हैं। और वे आंसू दुख के नहीं किसी अपूर्व आनंद के हैं। और उस गुरु के हाथ जुड़े हैं आकाश की तरफ और वह गुनगुना रहा है कोई गीत। वह चुपचाप खड़े होकर सुनने लगा। उस बूढ़े ने कहा, हे परमात्मा! ऐसी ही बातों से तुझ पर विश्वास आ जाता है, हवाओं का क्या भरोसा, पूरा झोपड़ा भी उड़ा कर ले जा सकती थीं। आधा रोका है, तो तूने ही रोका होगा। हवाओं का क्या भरोसा, पूरा झोपड़ा भी जा सकता था। आधा रोका है, तो तूने ही रोका होगा। धन्यवाद! हम दरिद्रों का भी तुझे खयाल है।
    फिर उस रात वे दोनों उस झोपड़े में सोए। जिस युवक भिक्षु ने क्रोध प्रकट किया था वह रात भर नहीं सो सका। रात भर उसके मन में बड़ी बेचैनी, बड़ी अशांति, बार-बार यही खयाल कि गरीब के झोपड़े को तोड़ने की बात क्या उचित है? हमने क्या बुरा किया? दिन-रात जिसकी प्रार्थना करते हैं वही हमारा साथी नहीं? तो हम और क्या आशा करें प्रार्थनाओं से? और क्या आशा करें? रात भर बेचैन वह करवट बदलता रहा। क्योंकि सांझ दुख में सोया था तो रात भर दुख सरकता रहा। सांझ जिस भाव को लेकर हम सोते हैं पूरी नींद उसी भाव में परिवर्तित हो जाती है। लेकिन बूढ़ा रात भर सोया बड़े आनंद से। सुबह उठ कर उसने एक गीत लिखा, और उस गीत में फिर परमात्मा को धन्यवाद दिया और कहा, हे पिता! हे परमपिता! हे प्रभु! हमें क्या पता था, आधा झोपड़े का भी आनंद होता है? कल रात हम सोए भी रहे आधे छप्पर में, और जब भी आंख खुली, तो तेरे चांद, तेरे तारों को भी देखा। बड़ी खुशी है, अब वर्षा आएगी; हम आधे में सोएंगे भी, आधे में वर्षा का गीत, टप-टप बूंदें, वे भी सुनेंगे। हमें क्या पता था, अगर पहले से पता होता हम आधा झोपड़ा खुद भी तोड़ देते, तेरी हवाओं को तकलीफ भी न देते।
    इस आदमी को मैं धार्मिक आदमी कहता हूं। यह रिलीजस माइंड है। यह चाहे किसी मंदिर और मस्जिद में जाता हो या न जाता हो; यह किसी शास्त्र को पूजता हो, न पूजता हो; इसके वस्त्र गेरुए रंगे हों, न रंगे हों; यह घर में हो, घर के बाहर हो, ऐसा जो चित्त है वह धार्मिक है।
    धर्म कोई बाहरी क्रियाकांड नहीं, दृष्टि का परिवर्तन है। धर्म कोई बाहरी परिवर्तन नहीं, अंतस का बदल जाना है। दृष्टि का, देखने के ढंग का। इतना आसान मत समझ लेना कि हम मंदिर चले जाते हैं तो धार्मिक हो जाएंगे। इतना सस्ती बात होती तो पृथ्वी पर बहुत मंदिर हैं, बहुत मस्जिदें, बहुत चर्च, पृथ्वी धार्मिक कभी की हो गई होती। लेकिन मंदिर-मस्जिद बढ़ते गए हैं और धर्म? धर्म का कोई कहीं पता नहीं। धर्म कहीं भी नहीं है। धर्म को हमने एक बाह्य उपचार बनाया इसीलिए पृथ्वी पर धर्म पैदा नहीं हो सका। धर्म है आंतरिक चित्त की दशा। धर्म है मनःस्थिति। धर्म है एटिटयूड, धर्म है भीतर के देखने का ढंग। इसलिए कोई मंदिर में पहुंच जाए तो धार्मिक नहीं हो जाता। लेकिन जो आदमी धार्मिक है वह कहीं भी पहुंच जाए वहीं मंदिर जरूर हो जाता है। इसे मैं फिर से दोहराऊं, धार्मिक आदमी वह नहीं जो मंदिर में पहुंच जाता है, धार्मिक आदमी वह है कि जहां पहुंच जाए वहीं मंदिर हो जाए।
    धार्मिकता चित्त एक दशा है। यह चित्त की दशा निरंतर जागरूक, होश से भरे रह कर जीने से पैदा होती है। न तो यह प्रार्थनाओं से पैदा होती है, न पूजाओं से, यह तो चित्त की सरलतम भावनाओं से उपलब्ध होती है।
    चित्त की चाहिए सरलता, ह्यूमिलिटी। चित्त का चाहिए बिना जटिल होना, अजटिलता। चित्त की चाहिए इतनी सरलता कि वह चित्त की सरलता ही जीवन बन जाए। तो, तो व्यक्ति के जगत में उसका अवतरण होता है जिसे हम धर्म कहें। लेकिन यह कोई ऐसी बात नहीं है कि कोई आधा घंटे को धार्मिक हो जाए और साढ़े तेईस घंटे को अधार्मिक हो जाए।

    — ओशो [अंतर की खोज-प्रवचन-08]

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