धार्मिक होने के लिए क्या करें? ज्यादा समय नहीं निकाल सकते, तो क्या करें -मंत्र-जाप करें, नाप जपें, पूजा करें, थोड़ा-बहुत समय दे सकते हैं उसमें क्या करें?
Question
प्रश्न – हम क्या करें, थोड़ी-बहुत देर के लिए समय निकाल सकते हैं, समय ज्यादा हमारे पास नहीं है, तो हम क्या करें -मंत्र-जाप करें, नाप जपें, पूजा करें, थोड़ा-बहुत समय दे सकते हैं उसमें हम क्या करें?
Answer ( 1 )
मैं निवेदन करना चाहूंगा, धर्म कोई ऐसी बात नहीं कि आप थोड़े से समय में कर लें और उससे निपट जाएं। धर्म चौबीस घंटे की साधना है। और इस बात से बहुत भ्रांति दुनिया में पैदा हुई है कि कोई सोचे कि हम थोड़ी देर को धार्मिक हो जाएं। धार्मिक होना चौबीस घंटे चलने वाली श्वासों की तरह है। ऐसा नहीं कि आप आधा घंटा श्वास ले लें, फिर साढ़े तेईस घंटा श्वास लेने की कोई जरूरत न रह जाए। धर्म एक अखंड चित्त की दशा है। खंडित नहीं। कोई कंपार्टमेंट नहीं बनाए जा सकते कि आधा घंटे को मंदिर में जाकर मैं धार्मिक हो जाऊंगा। यह असंभव है, यह बिलकुल इंपासिबल है। जो आदमी मंदिर के बाहर अधार्मिक था और मंदिर के बाहर फिर अधार्मिक हो जाएगा। आधा घंटे को मंदिर के भीतर धार्मिक हो सकता है?
चित्त एक अविच्छिन्न प्रवाह है, एक कंटीन्युटी है। कहीं ऐसा हो सकता है क्या कि गंगा काशी के घाट पर आकर पवित्र हो जाए, पहले अपवित्र रही हो? फिर काशी का घाट निकल जाए, फिर आगे अपवित्र हो जाए। सिर्फ बीच में पवित्र हो जाए? गंगा एक सातत्य, कंटीन्युटी है। अगर गंगा काशी के घाट पर पवित्र होगी तो तभी होगी जब पहले भी पवित्र हो। अगर गंगा काशी के घाट पर पवित्र हो गई, तो आगे भी पवित्र रहेगी।
मैंने सुना है, एक आदमी अपनी मृत्युशय्या पर था। अंतिम घड़ी थी उसकी। परिवार के मित्र, परिवार के लोग, पुत्र, पुत्रवधुएं, उसकी पत्नी, सब इकट्ठे थे। संध्या के करीब उसने आंख खोली, सूरज ढल गया था और अभी घर के दीये न जले थे, अंधेरा था, उसने आंख खोली और अपनी पत्नी से पूछा, मेरा बड़ा लड़का कहां है? उसकी पत्नी को बड़ा आनंद हुआ। जीवन में उसने कभी किसी को नहीं पूछा था। जीवन में पैसा और पैसा और पैसा। प्रेम की कभी कोई बात उससे न उठी थी। शायद मृत्यु के क्षण में प्रेम का स्मरण आया है। पत्नी बहुत प्रसन्न थी, उसने कहा, निश्चिंत रहें, आपका बड़ा लड़का बगल में बैठा हुआ है, अंधेरे में आपको दिखता नहीं, बड़ा लड़का मौजूद है, आप निश्चिंत आराम से लेटे रहें। लेकिन उसने पूछा, और उससे छोटा लड़का? पत्नी तो बहुत अनुगृहीत हो आई। कभी उसने पूछा नहीं था। जो पैसे के पीछे है, जो महत्वाकांक्षी है उसके जीवन में प्रेम की कभी भी कोई सुगंध नहीं होती, हो भी नहीं सकती। उसने कभी न पूछा था, कौन कहां है! उसे फुर्सत कहां थी! पत्नी ने कहा, छोटा लड़का भी मौजूद है। उसने पूछा, और उससे छोटा? पांच उसके लड़के थे। अंतिम पांचवां? उसकी पत्नी ने कहा, वह भी आपके पैरों के पास बैठा है। सब मौजूद हैं, आप निश्चिंत सो रहें। वह आदमी उठ कर बैठ गया, उसने कहा, इसका क्या मतलब, फिर दुकान पर कौन बैठा हुआ है?
वह पांच लड़कों की फिकर में नहीं था। पत्नी भूल में थी। जीवन भर जिसके मन में पैसा रहा हो, अंतिम क्षण में प्रेम आ सकता है? पत्नी गलत थी, भूल हो गई थी। वह इस चिंता में था कि दुकान पर कोई मौजूद है या कि सब यहीं बैठे हुए हैं? यह मरते क्षण में भी उसके चित्त में वही धारा चल रही थी जो जीवन भर चली थी। यह स्वाभाविक है। यह बिलकुल स्वाभाविक है। जीवन भर जो चला है वही तो चलेगा। तो इस भूल में कोई न रहे कि मैं थोड़ी देर मंदिर हो आता हूं तो धार्मिक हो जाऊंगा। जिसे धार्मिक होना है उसे अपने चित्त की पूरी धारा को बदलने के लिए तैयार होना होगा। ये धोखा देने के ढंग हैं, ये सब सेल्फ-डिसेप्शन हैं कि हम मंदिर हो आते हैं इसलिए धार्मिक हो गए, अपने को धोखा देने की तरकीबों से यह ज्यादा नहीं है। कि हम चंदन लगाते हैं तो धार्मिक हो गए। कि हम यज्ञोपवीत पहनते हैं तो हम धार्मिक हो गए। हद्द बेवकूफियां हैं। इस तरह कोई धार्मिक हो सकता तो हमने दुनिया को कभी का धार्मिक बना लिया होता। इस तरह कोई न कभी धार्मिक हुआ है और न हो सकता है। लेकिन जो अपने को धार्मिक होने का धोखा देना चाहता हो, इन तरकीबों से बड़ी आसानी से धोखा पैदा हो जाता है।
धार्मिक होना एक अखंड क्रांति है। पूरे जीवन को, चित्त को, टोटल माइंड को, समग्र मन को बदलना होगा। और उस बदलने के सूत्र समझने होंगे। एक-एक क्षण, एक-एक घड़ी सजग होकर मन को बदलने में संलग्न होना होगा। और इसके लिए अलग से समय की कोई भी जरूरत नहीं है।
आप जो भी करते हैं–उठते हैं, बैठते हैं, भोजन करते हैं, नौकरी करते हैं, रास्ते पर चलते हैं, रात सोते हैं, आप जो भी करते हैं, आपका जो भी व्यवहार है, आपका जो भी संबंध है, सारा जीवन एक इंटररिलेशनशिप, एक अंतर्संबंध है। चौबीस घंटे हम कुछ न कुछ कर रहे हैं–धर्म के लिए अलग से समय खोजने की जरूरत नहीं है। यह जो भी आप कर रहे हैं, अगर शांत, जागरूक चित्त से करने लगें तो आपके जीवन में धर्म का आगमन हो जाएगा। आप जो भी कर रहे हैं, अगर शांत, जागरूक करने लगें तो।
कैसे शांति से यह हो सकेगा? कैसे यह हो सकेगा?
यह भी बहुत मित्रों ने पूछा है: कैसे हम शांत हो जाएं?
तो कैसे मनुष्य का चित्त शांत हो सकता है?
मनुष्य के चित्त की अशांति क्या है इस समझ लें, तो शांत होना कठिन नहीं है। मनुष्य के चित्त की क्या है अशांति? कौन कर रहा है अशांत? कोई और कर रहा आपको या कि आप स्वयं? आप स्वयं ही चौबीस घंटे चित्त को अशांत करने की व्यवस्था कर रहे हैं और फिर पूछते-फिरते हैं कि शांत कैसे हो जाऊं? चौबीस घंटे आप ही कर रहे हैं योजना। जीवन को देखने का सारा ढंग गलत है इसलिए अशांति पैदा होती है। जीवन को देखने का हमारा ढंग क्या है? अगर आपका आधा छप्पर उड़ गया हो, तो क्या है आपके जीवन को देखने का ढंग? उड़े हुए छप्पर के लिए रोएगा या बचे हुए छप्पर के लिए धन्यवाद देंगे? उड़े हुए छप्पर के लिए रोएंगे, तो अशांत हो जाएंगे। बचे हुए छप्पर के लिए धन्यवाद देंगे, तो अपूर्व शांत उतर आएगी। कैसे हम जीवन को देखते हैं?
बुद्ध का एक भिक्षु था, पूर्ण। उसकी शिक्षा पूरी हो गई थी। उसने बुद्ध के पास जाकर आज्ञा मांगी कि अब मैं जाऊं और आपके अमृत संदेश को गांव-गांव पहुंचा दूं।
बुद्ध ने कहा, तू कहां जाना चाहेगा? किस तरफ?
उस पूर्ण ने कहा, बिहार में एक छोटा सा इलाका था, सूखा उसका नाम था। उस पूर्ण ने कहा कि अब तक सूखा की तरफ कोई भी भिक्षु नहीं गया, मैं सूखा जाना चाहता हूं।
बुद्ध ने कहा, छोड़ दे यह इरादा। अब तक कोई नहीं गया, इसी से तुझे सोचना था कि कोई बात जरूर होगी। उस इलाके के लोग बहुत अशिष्ट, बहुत असभ्य, अत्यंत कटु व्यवहार वाले लोग हैं, बहुत हिंसक, बहुत क्रोधी, इसीलिए कोई वहां नहीं गया।
पूर्ण ने कहा, तब तो मुझे वहां जाना ही पड़ेगा, उनके लिए ही फिर मेरी जरूरत है।
अगर दीये से कोई कहे कि उस तरफ मत जा जहां अंधेरा है, तो दीया क्या कहेगा? मैं न जाऊं उस तरफ जहां अंधेरा है? तो दीया कहेगा, फिर मेरी वहां क्या जरूरत जहां सूरज है? मैं वहीं जाऊंगा जहां अंधेरा है।
मुझे आज्ञा दें कि मैं सूखा जाऊं?
बुद्ध ने कहा, मैं आज्ञा तुझे एक ही शर्त पर दे सकता हूं कि तू मेरे तीन प्रश्नों के उत्तर दे दे।
पूर्ण ने कहा, आप पूछें?
बुद्ध ने कहा, वहां तू जाएगा, लोग गालियां देंगे, अपमान करेंगे, कटु वचन कहेंगे, तेरे मन को क्या होगा?
हंसने लगा वह पूर्ण, उसने सिर रख दिया बुद्ध के चरणों पर और कहा, आप पूछते हैं इतने दिन मुझे जानने के बाद क्या होगा मेरे मन को? यही होगा, कितने भले लोग हैं, सिर्फ गालियां देते हैं, अपमान करते हैं, मारते नहीं, मार भी सकते थे।
बुद्ध ने कहा, पूर्ण यह भी हो सकता है कि कोई तुझे वहां मारे भी, फिर क्या होगा?
पूर्ण ने कहा, जानते हैं फिर भी पूछते हैं आप? होगा यही, कितने भले लोग हैं, सिर्फ मारते हैं, मार ही नहीं डालते, मार भी डाल सकते थे।
बुद्ध ने कहा, अंतिम बात और पूछ लूं, अगर उन्होंने मार ही डाला, तो मरते क्षणों में तुझे क्या होगा?
सोच सकते हैं, क्या कहा होगा पूर्ण ने? आता है खयाल कोई? ठीक था कि गाली देते थे।
तो पूर्ण ने कहा, मार डालेंगे, मारते नहीं, मार डालते नहीं, यह बहुत, यही शुभ है।
लेकिन बुद्ध ने कहा, मार ही रहे हैं, तेरी हत्या कर रहे हैं, क्या होगा तेरे मन को?
पूर्ण ने कहा, जानते हैं भलीभांति आप, फिर भी पूछते हैं? यही होगा, कितने भले लोग हैं, उस जीवन से छुटकारा दिलाए देते, जिसमें कोई भूल-चूक हो सकती थी।
ऐसी दृष्टि का फल है शांति। इससे उलटी दृष्टि का फल है अशांति।
एक आदमी फूलों कि बगिया में जाए, गुलाब के फूल के पौधे के पास खड़ा हो–दो रास्ते हैं, या तो गुलाब के उस पौधे में खिले हुए एक फूल को देख ले। एक फूल बहुत कम है, पत्ते बहुत हैं, कांटे बहुत हैं। यह भी हो सकता है एक फूल न देखे, कांटों की गिनती करे और कहे कि इतने कांटे हैं इस पौधे में? कैसी बुरी है यह दुनिया? इतने कांटे हैं? मुश्किल से खिलता है एक फूल और कांटे ही कांटे, हजार-हजार कांटे हैं, कैसी है यह दुनिया? कैसी दुखपूर्ण? वह आदमी अशांत हो जाए, नहीं तो क्या होगा? कोई दूसरा आदमी यह भी देख सकता है: कैसी अदभुत है यह दुनिया, इतने कांटे हैं जहां वहां भी एक फूल खिल पाता है! इतने कांटे हैं जहां, इतने कांटों के बीच भी एक फूल खिलता है, कितनी अदभुत है यह दुनिया! कितनी रहस्यपूर्ण! कितने अनुग्रह के योग्य! कितना ग्रेटिटयूड! कितना धन्यवाद करें किसी का!
एक आदमी देखने जाए जीवन को, तो जीवन में जो-जो अंधेरा है उसे गिन सकता है। जीवन में जो-जो बुरा है उसकी गणना कर सकता है। जीवन में जो-जो दुख है उसकी संख्या का आंकड़ा बांध सकता है। और तब अगर अशांत हो जाए, तो जुम्मा किसका होगा? और फिर रोए और चिल्लाए और फिर ढूंढ़े गुरुओं को और पूछे कि मुझे शांति का रास्ता बताओ। और गुरु भी ऐसे नासमझ कि वे कहें कि राम-राम जप, तो सब ठीक हो जाएगा। जैसे राम-राम न जपने से यह अशांति पैदा हुई हो। यह अशांति पैदा की है इसके जीवन की दृष्टि ने। इसके जीवन की दृष्टि ही भ्रांत और गलत है। इसने गलत को ही चुनने का उपक्रम साध लिया है। इसने व्यर्थ को ही देखने की चेष्टा की है। इसने अंधकार के साथ ही मोह बांध लिया है। इसे प्रकाश दिखाई नहीं पड़ता। इसे फूल दिखाई नहीं पड़ते। इसे प्रेम दिखाई नहीं पड़ता। इसे तो जो भी दिखाई पड़ता है वही रुग्ण कर देता है इसे और, और अशांत कर देता है। कैसे धार्मिक चित्त को साधेंगे?
शांति में खिलता है धार्मिक चित्त। और शांति? शांति है जीवन का सम्यक दृष्टिकोण, राइट एटिटयूड। रोज-रोज चौबीस घंटे में, रोज-रोज प्रतिक्षण ठीक दृष्टि को, सम्यक दृष्टि को, उस सम्यक दर्शन को, वह ठीक-ठीक देखने को, निरंतर-निरंतर प्रतिक्षण साधना है। प्रतिक्षण, एक क्षण भी छुट्टी देने की सुविधा नहीं है। धार्मिक व्यक्ति को कोई छुट्टी नहीं, कोई हॉलिडे नहीं, कि आज छुट्टी दे दें, फिर कल साध लेंगे। एक क्षण भी छुट्टी का अवकाश नहीं है। एक-एक क्षण देखते, जागते, समझते, धीरे-धीरे वह दृष्टि जो भीतर छिपी है प्रकट होने लगती है। और तब, तब सब बदल जाता है, तब सब बदल जाता है। तब नहीं दिखाई पड़ते कांटे, बल्कि जब दृष्टि पूरी उपलब्ध होती है तो हर कांटा फूल में परिवर्तित हो जाता है। और हर अंधकार एक दीया बन जाता है। और हर बुरी घटना में किसी शुभ संकेत की सूचना मिल जाती है। फिर धीरे-धीरे तो सब कुरूपता विलीन हो जाती है, रह जाता है सिर्फ सौंदर्य। सिर्फ सौंदर्य रह जाता है, नहीं रह जाता जीवन में कुछ कुरूप। नहीं रह जाता जीवन में कुछ विकृत, सभी हो जाता है सभी स्वस्थ और संस्कृत। लेकिन वह दृष्टि पर निर्भर है। वह दृष्टि पर ही निर्भर है कि हम कैसे देखते हैं। तो बहुत जल्दी इस बात की न करें कि आप जल्दी से वस्त्र बदल लें, क्रिया बदल लें, उपवास कर लें। इस सबसे नहीं, खोजें अपनी दृष्टि को कि कहां-कहां घाव हैं मेरे? किन-किन घावों से में पीड़ित और परेशान हूं? और तब आपको दिखाई पड़ेगा, आपने ही अपनी छाती में छुरी मारी है रोज-रोज। ये घाव किसी और नहीं किए। जब दिख जाए कि मेरे ही हाथ छुरी मारते हैं, तो छुरी फेंक देना कठिन थोड़े ही है। या फिर छुरी से बहुत मोह हो और घाव में बहुत आनंद हो, तो आपकी मर्जी। फिर तो कोई सवाल नहीं है।
लेकिन मनुष्य स्वयं ही है आत्महंता, कोई और नहीं। और जब तक इस सत्य की स्पष्ट प्रतीति न हो तब तक आप स्वयं को बदल भी नहीं सकते।
— ओशो [अंतर की खोज-प्रवचन-08]