ध्यान प्रयोगों में व्यायाम का क्या महत्त्व है? व्यायाम से थकावट होती है; ऐसे में आध्यात्मिक अनुभूति कैसे संभव है?

Question

प्रश्न – ध्यान प्रयोगों में सुझाव देते हैं कि समग्रता से टोटलिटी से श्रम करें पूरी निष्ठा के साथ। उससे बड़ी थकान पैदा हो जाती है तो ऊर्जा की अनुभूति थकावट में कैसे होगी?

Answer ( 1 )

  1. तुम्हारी परिधि थक जाएगी और उस कंट्रास्ट में ऊर्जामय केंद्र स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ने लगेगा। तुम्हारा शरीर थक जाएगा और भीतर की स्प्रीच्युअल एनर्जी, जो आत्मिक ऊर्जा है वह थके हुए शरीर के कंट्रास्ट में साफ दिखाई पड़ेगी।

    तुम्हारी आंखें जवाब दे देंगी कि अब नहीं देखना बाहर। आधा घंटा हो गया त्राटक करते-करते आंखें थक गईं। लेकिन इससे यह होगा कि तुम्हारी आंखें बंद हो जाएंगी। बाहर देखने की कोई आकांक्षा अब तुम्हारे भीतर नहीं रह गई। तुम थक गये एक ज्योति की लौ देखते-देखते। अब अंतस का आलोक देखा जा सकेगा क्योंकि आंख बाहर नहीं जाएगी। बाहरी इंद्रियों ने जवाब दे दिया। अंतस इंद्रियां सक्रिय हो सकेंगी।

    ऐसा समझें घोड़े पर एक घुड़सवार है, घोड़े को वह दौड़ा रहा है और स्वयं के होने को भूल गया कि मै सवार हूं और अपने आपको घोड़ा ही मानने लगा। हम उससे कह रहे हैं दौड़ाओ घोड़े को, तेज दौड़ाओ… और तेज दौड़ाओ। एक क्षण आएगा जब घोड़ा थक के चकनाचूर होकर गिर पड़ेगा। और उस समय उसको स्पष्ट अहसास होगा कि मैं अलग हूं। घोड़े से तादात्म्य टूटेगा।

    शरीर और आत्मा के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है।

    इस शरीर पर सवार हमारी चेतना भूल ही गई कि मैं चैतन्य हूं। वह अपने आप को शरीर ही मानने लगे। इसलिए ध्यान के प्रयोग में शरीर जितना थक जाए, जितनी शीघ्रता से थक जाए उतनी ही जल्दी भीतर की चैतन्यता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है।

    जैसे ब्लैक बोर्ड पर सफेद चाक से लिखा हुआ उभरकर दिखाई पड़ता है। थका हुई देह, थकी हुई इंद्रियां; मगर भीतर की चैतन्य-ऊर्जा पूरी तरह तरोताजा, स्व-स्फूर्त। एक कंट्रास्ट पैदा हो गया, तब पता चलता है यह पड़ा है शरीर नीचे, मैं तो अभी भी ज्यों का त्यों हूं भीतर। इसलिए ध्यान प्रयोगों में थकावट का भी एक मकसद है। तादात्म्य तोड़ने में उपयोगी है।

    ~ स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

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