साधना में, ध्यान में आनन्द का अनुभव थोड़ी देर के लिये होता है, फिर चला जाता है; इसके लिए क्या करें? वह आनन्द और अधिक देर तक कैसे रहे?

Question

प्रश्न – आनन्द थोड़ी देर के लिये अनुभव होता है और फिर वह आनन्द चला जाता है। वह आनन्द और अधिक देर तक कैसे रहे?

Answer ( 1 )

  1. यह बहुत महत्त्वपूर्ण है पूछना, क्योंकि आज नहीं कल, जो लोग भी आनन्द की साधना में लगेंगे, उनके सामने यह प्रश्न खड़ा होगा। आनन्द एक झलक की भाँति उपलब्ध होता है-एक छोटी-सी झलक, जैसे किसी ने द्वार खोला हो और बन्द कर दिया हो। हम देख ही नहीं पाते उसके पार कि द्वार खुलता है और बन्द हो जाता है। वह आनन्द बजाय आनन्द देने के और पीड़ा का कारण बन जाता है, क्योंकि जो कुछ दिखता है, वह आकर्षित करता है, लेकिन द्वार बन्द हो जाता है। उसके बाबत चाह और भी घनी पैदा होती है, फिर द्वार खुलता नहीं, बल्कि फिर हम जितना उसे चाहने लगते हैं, उतना ही उससे वंचित हो जाते हैं।
    अगर मैं किसी व्यक्ति से चाहूँ कि उसने इतना प्रेम दिया है मुझे और प्रेम दे तो जितना मैं चाहूँगा उतना ही मैं पाऊँगा कि प्रेम उससे आना कम हो गया। प्रेम उससे आना बन्द हो जायेगा। ये चीजे छीनी नहीं जा सकतीं, ये जबरदस्ती पजेस नहीं की जा सकती। जो आदमी इनको जितना कम चाहेगा, जितना शान्त होगा, उतनी अधिक उसे उपलब्धि होगी।
    एक बहुत पुरानी कथा है-एक हिन्दू कथा है, कहानी काल्पनिक है। नारद एक गांव के करीब से निकले। एक वृद्ध साधु ने उनसे कह कि तुम भगवान के पास जाओ तो उनसे पूछ लेना कि मेरी मुक्ति कब तक होगी, मुझे मोक्ष कब तक मिलेगा? मुझे साधना करते हुए बहुत समय बीत गया। नारद ने कहा-मैं जरूर पूछ लूंगा। वह आगे बढ़े तो बरगद के दरख्त के नीचे एक नया-नया फकीर, जो उसी दिन फकीर हुआ था, तम्बूरा लेकर नाच रहा था। नारद ने उससे मजाक में पूछा-तुमको भी पूछना है भगवान से कब तक तुम्हारी मुक्ति होगी? वह कुछ बोला नहीं।
    जब नारद वापस लौटे तो उस वृद्ध साधु से उन्होंने जाकर कहा-मैंने पूछा था- भगवान बोले कि अभी तीन जन्म और लिये जायेंगे। वह अपनी माला फेरता था, उसने गुस्से में अपनी माला नीचे पटक दी। उसने कहा-तीन जन्म और! यह तो बड़ा अन्याय है, यह तो हद हो गयी। नारद आगे बढ़ गये। वह फकीर नाच रहा था, उस वृक्ष के नीचे। उससे कहा-सुनते हैं! आपे बाबात भी पूछा था। लेकिन बड़े खेद की बात है, उन्होंने कहा कि जिस दरख्त के नीचे वह नाच रहा है, उसमें जितने पत्ते हैं, उतने जन्म उसे लग जायेंगे। वह फकीर बोला-तब तो पा लिया और वापस नाचने लगा। वह बोला-तब तो पा लिया, क्योंकि दरख्त पर कितने पत्तें हैं, इतने पत्ते, इतने जन्म न-तब जो जीत ही लिया, पा ही लिया। वह पुनः नाचने लगा। और कहानी कहती है, वह उसी क्षण मुक्ति को उपलब्ध हो गया-उसी क्षण।
    यह जो नानटेंस, यह जो रिलेक्स्ड माइण्ड है, जो कहता है कि पा ही लिया, इतने जन्मों के बाद की वजह से भी परेशान नहीं है और जो इसको भी अनुग्रह मान रहा है प्रभु का, इसको भी उसका प्रसाद मान रहा है कि इतनी जल्दी मिल जायेगा, वह उसी क्षण सब पा लेता है। हमारे मन की दो स्थितियां है। एक टेंस स्थिति होती है। जब हम कुछ चाहते हैं कि मिल जाये और दूसरी नानटेंस स्थिति होती है, जब कि हम चुपचाप जो मिल रहा है, उसको रिसीव करते हैं, कुछ झपटते नहीं हैं। टेंस स्थिति एग्रेसिव होती हे, वह झपटती है। नानटेंस स्थिति रिसेप्टिव है, वह छीनती नहीं, वह चुपचाप ग्रहण करती है। ध्यान जो है, वह एग्रेशन नहीं है, रिसेप्शन है। वह आक्रमण नहीं है, वह आमन्त्रण है। वह छपटना नहीं कुछ, जो आ जाता है, उसे स्वीकार कर लेता है।
    तो आनन्द के क्षणों को, शान्ति के क्षणों को झपटने की, पजेस करने की कोशिश न करें। वे ऐसी चीजें नहीं है कि पजेस की जा सकें। वह कोई फर्नीचर नहीं है। जो हम बाहर से उठाकर कमरे में रख लें। वह तो उस प्रकाश की तरह है कि द्वार हमने खोल दिया, सूरज उगेगा तो प्रकाश अपने-आप भीतर आयेगा। हमारे लिए प्रकाश को बांधकर भीतर लाना नहीं पड़ता है। सिर्फ द्वार खोलकर प्रतीक्षा करनी होगी, वह आयेगा। वैसे ही मन को शान्त करे, हम चुपचाप प्रतीक्षा करें और जो मिल जाये, उसके लिए धन्यवाद करें और जो नहीं मिला, उसका हिसाब न करें तो आप पायेंगे कि रोज-रोज आनन्द बढ़ता चला जायेगा। बिना मांगे कोई चीज मिलती चली जायेगी, बिना मांगे कोई चीज गहरी होती चली जायेगी और अगर मांगना शुरू किया, जबरदस्ती चाहना शुरू किया तो पायेंगे कि जो मिला था, वह भी मिलना बन्द हो गया।
    समस्त साधकों के लिए जो आत्मिक आनन्द की तलाशें चलती हैं, उसमें सबसे बड़े खतरे के क्षण तब आते हैं, जब उनको थोड़ा-थोड़ा आनन्द मिलने लगता है। बस, अक्सर वहीं रुकना हो जाता है। वह मिला कि उनका मन होता है और मिल जाये। और जहाँ उनका मन यह हुआ कि मिल जाये, वह जहाँ एग्रेसिव हुए पाने के लिए, वह जो मिलता है, उसके दरवाजें भी बन्द हो जायेंगे। तो इतना स्मरण रखें, जो मिलता है उसके लिए भगवान को धन्यवाद करें और जो नहीं मिलता है, उसकी फिक्र न करें और अपने भीतर शान्त होने के प्रयास में सलंग्न रहें। क्या मिलता है, इसकी चिन्ता छोड़ दें। हम क्या बन रहे हैं, शान्त कैसे बन रहे हैं, इसकी चिन्ता करें। जिस मात्रा में आप शान्त हो जायेंगे, उस मात्रा में आनन्द मिलना अनिवार्य है। उसकी फिक्र छोड़ दें। यानी इसकी बिल्कुल फिक्र छोड़ दें कि क्या मिला, क्योंकि जो भी मिलने की आपकी क्षमता पैदा हो जायेगी, उसके आप हकदार हैं, वह आपको मिलेगी ही।

    — ओशो [आनन्द गंगा-(प्रवचन-02)]

    *For more articles by Osho Click Here.
    *To read Q&A by Osho Click Here.

    Best answer

Leave an answer