जीवन बहुत यांत्रिक, मैकेनिकल हो गया है..इस से निराशा होती है, क्या करें?

Question

प्रश्नअगर हमें यह खयाल हो जाए कि हम बिलकुल एक मशीन हैं, तब तो हमारे जीवन में निराशा छा जाएगी। फिर तो हम निराश हो जाएंगे कि अब तो कुछ भी नहीं हो सकता?

Answer ( 1 )

  1. ऐसा लगेगा कि अगर हम यह समझ गए कि हम एक मशीन हैं, फिर तो कुछ भी नहीं हो सकता। लेकिन यह अभी आप बौद्धिक रूप से विचार कर रहे हैं, अगर यह आपको अहसास हो जाए कि मैं एक मशीन हूं तो इतना कुछ हो सकता है, जिसका कोई हिसाब नहीं। यह बात कि फिर कुछ नहीं हो सकता, एकदम ही गलत है, सच तो यह है कि जब तक इस बात का अहसास न हो कि मैं मशीन हूं, तब तक कुछ भी नहीं हो सकता। तब तक आप जो कुछ भी करेंगे, वह सब व्यर्थ होगा। वह नींद में किया गया होगा। वह जाग कर किया गया नहीं होगा। लेकिन एक बार यह समझ में आ जाए कि मैं मशीन हूं, तो यह समझ जिसके भीतर पैदा होती है कि मैं मशीन हूं, जिस चेतना को यह अनुभव होता है, यह एक्सपीरियंस होता है कि मैं मशीन हूं, यह सारा जीवन मैकेनिकल है, वह चेतना का बिंदु इस मशीन के बाहर हो जाता है, अलग हो जाता है। किसी भी चीज को जानने के लिए, जानते ही हम उससे दूर हो जाते हैं। अगर मैं आपको देख रहा हूं कि आप वहां हैं, तो मैं आपसे अलग हो गया। क्योंकि देखने वाला उससे अलग हो जाता है, जिसे देखता है। दोनों के बीच फासला हो जाता है। अगर मैं अपने इस हाथ को देख रहा हूं तो मैं इस हाथ से अलग हो गया। वह देखने वाला हाथ से अलग हो जाता है।
    मेरे एक मित्र बीमार पड़े थे। वे सीढ़ियों पर से गिर पड़े थे और उनके पैरों में बड़ी चोट आ गई थी। बहुत असह पीड़ा थी उन्हें। मैं उन्हें देखने गया। उन्होंने मुझसे कहाः इससे तो बेहतर होता कि मैं मर जाता। बहुत असह पीड़ा, बहुत दुख है। और डाक्टर कहते हैं कोई तीन महीने तक बिस्तर पर बंधे रहना होगा, यह तो और भी दुख है। क्या मेरे मरने की कोई तरकीब नहीं खोजी जा सकती? क्या मैं मर नहीं सकता हूं?
    मैंने उनसे कहाः इसके पहले कि आप मरें क्या आपको पक्का भरोसा है कि आप जिंदा हैं? क्योंकि मर वही सकता है, जो जिंदा हो? मुझे शक है कि आप जिंदा भी हैं, क्योंकि मुझे शक है कि आपको उस जीवन का पता है, जो आपके भीतर है? और अगर उस जीवन का पता ही नहीं, तो आपको जिंदा मैं कैसे कहूं? तो मैंने कहा अभी मरने की योजना छोड़िए, अभी पहले आपको यह भी पता नहीं कि आप जिंदा हैं! जिंदा आदमी मर सकता है। लेकिन आप जिंदा कहां हैं? और मैंने उनसे कहाः आप घबड़ाइए मत इतने, एक छोटा सा प्रयोग करिए। मैं यहां बैठा हूं आपके पास, आप आंख बंद कर लीजिए। और उस दर्द को, उस पीड़ा को देखने की कोशिश करिए कि वह कहां है, और क्या है जो आपको अहसास हो रही है? वह किस जगह शरीर में आपको पीड़ा मालूम हो रही है? वे मुझसे बोले, मेरे पूरे पैर में तकलीफ है।
    मैंने कहाः आप आंख बंद करिए और ठीक से खोजिए, पिन पॉइंट करिए कि कहां आपको तकलीफ हो रही है? उन्होंने आंख बंद की, और कोई पंद्रह मिनट बाद आंख खोली और मुझसे बोले कि यह तो बड़ी हैरानी की बात है, जैसे-जैसे मैं खोजने लगा, पीड़ा सिकुड़ती गई, छोटी होती गई। पहले मुझे लग रहा था कि मेरे पूरे पैर में दर्द है, लेकिन जैसे मैंने खोज की तो मैंने पाया कि पूरे पैर में दर्द नहीं है। दर्द तो शायद छोटी सी जगह है, मुझे अहसास भर हो रहा है। और जैसे-जैसे मैंने खोजने की कोशिश की कि मैं एक जगह उस दर्द को अहसास करूं कि कहां है, तो मुझे दो अदभुत बातें खयाल में आई हैं, जिनका मुझे पता भी नहीं था। एक तो यह कि दर्द उतना नहीं था जितना मुझे मालूम पड़ रहा था। जब मैंने खोजने की कोशिश की, दर्द उतना बिलकुल नहीं था, जितना मैं अहसास कर रहा था। जितना मैं भोग रहा था, उतना दर्द था ही नहीं। और दूसरी बात, जैसे ही दर्द एक जगह मुझे मालूम पड़ा कि पैर की फलां जगह दर्द हो रहा है, वैसे ही मुझे एक और बात पता चली, जो और भी हैरानी की है, वह यह कि दर्द वहां हो रहा था और मैं यहां दूर खड़ा हुआ उसे देख रहा था। मैं अलग था, और दर्द अलग था। दर्द कहीं हो रहा था और मैं उसे जान रहा था। तो मुझे एक क्षण में ऐसा लगा है कि मैं अलग हूं, जान रहा हूं, और दर्द अलग है, कहीं हो रहा है।
    तो अगर हमारे जीवन की यांत्रिकता हमें पता चल जाए, तो हमें यह भी पता चल जाएगा कि यांत्रिकता का घेरा कहीं है, और मैं कहीं और हूं। मैं यांत्रिकता के बीच में हूं, मैं खुद यंत्र नहीं हूं। और अगर यह एहसास हो जाए कि सारी यांत्रिकता के बीच में मेरी कांशसनेस अलग है, तो फिर कुछ हो सकता है। मैं इस यंत्र का मालिक बन सकता हूं। फिर इस यंत्र के साथ मैं कुछ कर सकता हूं। क्योंकि मैं इससे अलग हूं। और इससे बाहर हूं। लेकिन जो आदमी यंत्र के साथ एक ही हो जाता है, वह कुछ भी नहीं कर सकता। और वह आदमी एक है, जिसको यह पता नहीं है कि मेरा सारा जीवन यांत्रिक है।
    इसलिए निराश होने का कोई कारण नहीं है। बल्कि आशा से भर जाने का कारण है। लेकिन यह केवल बौद्धिक विचारणा नहीं है, इसे तो जीवन में खोजेंगे तो ही इसके क्रांतिकारी परिणाम परिलक्षित हो सकते हैं, दिखाई पड़ सकते हैं। ऐसा मत सोचें कि क्या होगा, अगर मैंने समझ लिया कि मैं यंत्र हूं? समझने की जरूरत नहीं है, आप यंत्र हैं। यह एक फेक्ट है, यह एक तथ्य है, यह कोई सिद्धांत नहीं है। आपको समझने की जरूरत नहीं है। समझने की जरूरत तो वहां होती है, जहां कोई आपको समझाता है कि आप भगवान हैं, वहां समझने की जरूरत होती है कि आप भगवान हैं। यह तो एक तथ्य है कि आप यंत्र हैं।
    इसे मानने की और विश्वास करने की जरूरत नहीं है, इसे तो खोज लेने की जरूरत है। और जैसे ही इसे खोजेंगे, वैसे ही वह दूसरी चीज जो आपके भीतर यंत्र नहीं है, आपके अनुभव में आनी शुरू हो जाएगी। और धीरे-धीरे आप जानेंगे आपके चारों तरफ यांत्रिकता है लेकिन आप यंत्र नहीं हैं। आप एक कांशसनेस हैं, आप एक चेतना हैं, आप एक आत्मा हैं, लेकिन यह सिद्धांत दोहराने से पता नहीं चलेगा कि मैं एक आत्मा हूं, यह तो जानने से पता चलेगा, यांत्रिकता खोजने से। और क्यों मैं इस बात पर जोर देता हूं कि आत्मा जानने के लिए यांत्रिकता को खोजना जरूरी है, कोई वजह है। अगर आप एक काले तख्ते पर एक सफेद लकीर खींचे, तो सफेद लकीर दिखाई पड़ेगी, और अगर सफेद तख्ते पर सफेद लकीर खींचें, लकीर आपको कभी दिखाई नहीं पड़ेगी। अगर आपको यह पूरी तरह अहसास हो जाए कि आपका जीवन यांत्रिक है तो उसी के बीच में, इसी काले बोर्ड पर चेतना की सफेद लकीर आपको दिखाई पड़नी शुरू होगी, नहीं तो नहीं दिखाई पड़नी शुरू होगी। यांत्रिकता के विरोध में ही आपको चेतना का अनुभव होगा, नहीं तो नहीं अनुभव होगा।
    जीवन में हमारे सारे अनुभव विरोध के कारण होते हैं, नहीं तो नहीं होते हैं। अभी आकाश काले बादलों से छा जाए, और एक बिजली चमके, वह बिजली दिखाई पड़ेगी, अभी यह बल्ब जल रहा है यहां, थोड़ी देर पहले भी जल रहा था, लेकिन तब इसकी रोशनी पता नहीं चल रही थी, क्योंकि चारों तरफ रोशनी थी, अब रात उतरने को शुरू हो गई है, और आपके चेहरों पर बल्ब की चमक आनी शुरू हो गई है। रात गहरी होती जाएगी और बल्ब प्रगाढ़ होकर दिखाई पड़ने लगेगा। रात जब पूरी अंधेरी हो जाएगी, तो बल्ब अपनी पूरी रोशनी में दिखाई पड़ेगा। तो आपको मैं जो जोर दे रहा हूं इस बात को कि वह जो मैकेनिकल लाइफ है हमारी, वह जो यांत्रिक जीवन है मशीन की तरह, अगर उसका पूरा अनुभव हो जाए तो उसके विरोध में, उसके कंट्रास्ट में ही आपको वह चेतना की लकीर और बिजली दिखाई पड़नी शुरू होगी, जिसका नाम आत्मा है। उस आत्मा को आपको मानने की जरूरत नहीं है, वह आपको दिखाई पड़नी शुरू हो जाएगी। लेकिन वह दिखाई पड़ सके इसके लिए जरूरी है कि यांत्रिकता का बोध जितना इंटेंस, जितना गहरा होगा उतना ही आसान है आपको आत्मा का अनुभव।
    इसलिए निराश होने की बात नहीं, बल्कि आशा से भरने की बात है। उसे खोजें, और देखें, और पहचानें ; आत्मा को मत खोजें, आत्मा को आप नहीं खोज सकते हैं अभी। आप तो अपनी यांत्रिकता को खोजें, उसी यांत्रिकता की खोज से आत्मा की लकीर स्पष्ट होनी शुरू होगी। उसी के बीच आपको वह बिजली की चमक दिखाई पड़नी शुरू हो जाएगी, जो कि परमात्मा का इशारा है। लेकिन उसके पहले परमात्मा के संबंध में कुछ भी कहना कुछ भी सोचना एकदम नासमझी और गलत और खतरनाक बात है।

    — ओशो. [क्या मनुष्य एक यंत्र है? प्रवचन-02 ]

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