परमात्मा को जानने, उसमे विलीन होने की क्या आवश्यकता है?

Question

प्रश्न – आत्मा को परमात्मा में विलीन होने की क्या आवश्यकता है?

Answer ( 1 )

  1. अच्छा होता, पूछा होता, आत्मा को आनंद में विलीन होने की क्या आवश्यकता है? अच्छा होता, पूछा होता, आत्मा को स्वस्थ होने की क्या आवश्यकता है? अच्छा होता, पूछा होता, आत्मा को अंधकार के बाहर प्रकाश में जाने की क्या आवश्यकता है?
    आत्मा को परमात्मा में विलीन होने की आवश्यकता इतनी ही है कि जीवन दुख और वेदना से तृप्त नहीं होता है। यानि किसी भी स्थिति में जीवन दुख को स्वीकार नहीं कर पाता है और आनंद का आकांक्षी होता है। परमात्मा से अलग होकर जीवन दुख है। परमात्मा में होकर वह आनंद हो जाता है। प्रश्न परमात्मा का नहीं, प्रश्न आपके भीतर दुख से आनंद में उठने का है। आपके भीतर, अंधकार से आलोक में उठने का है। और अगर आपको कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती, तो बिलकुल दुख में निश्चिंत रह सकते हैं।
    लेकिन कोई दुख में निश्चिंत नहीं रह सकता। दुख स्वरूपतः अपने से दूर हटाता है और आनंद स्वरूपतः अपने प्रति खींचता है। दुख हटाता है, आनंद खींचता है। संसार दुख है, परमात्मा आनंद है। परमात्मा से मिलन की आवश्यकता कोई धार्मिक आवश्यकता नहीं है। परमात्मा से मिलन की आवश्यकता स्वरूपगत आवश्यकता है।
    इसलिए दुनिया में यह हो सकता है कि कोई परमात्मा को इनकार करता हो, लेकिन आनंद को कोई इनकार नहीं करेगा। इसलिए मैं यह कहना शुरू किया हूं कि जगत में कोई भी नास्तिक नहीं है। नास्तिक केवल वही हो सकता है, जो आनंद को अस्वीकार करता हो। जगत में प्रत्येक व्यक्ति आस्तिक है। इस अर्थों में आस्तिक है कि प्रत्येक आनंद का प्यासा है।
    दो तरह के आस्तिक हैं, एक सांसारिक आस्तिक, एक आध्यात्मिक आस्तिक। एक, जिनकी आस्था संसार में है कि इसके द्वारा आनंद मिलेगा। एक, जिनकी आस्था इस बात में है कि आध्यात्मिक जीवन के विकास से आनंद मिलेगा। जिनको आप नास्तिक कहते हैं, वे संसार के प्रति आस्तिक हैं। पर उनकी तलाश भी आनंद की है। वे भी आनंद को खोज रहे हैं। और आज नहीं कल, उन्हें जब दिखायी पड़ेगा कि संसार में कोई आनंद नहीं है, तो सिवाय परमात्मा के प्रति उत्सुक होने के कोई रास्ता नहीं रह जाएगा।
    आपकी खोज आनंद की है। परमात्मा की खोज किसी की भी नहीं है। आपकी खोज आनंद की है। आनंद को ही हम परमात्मा कहते हैं। पूर्ण आनंद की स्थिति को हम परमात्मा कहते हैं। आप जिस घड़ी पूर्ण आनंद की स्थिति में होंगे, उस घड़ी परमात्मा हैं। यानि मतलब यह कि जिस घड़ी आपकी कोई आवश्यकता शेष न रह जाएगी, उस घड़ी आप परमात्मा हैं। पूर्ण आनंद का मतलब, जब कोई आवश्यकता शेष नहीं है। अगर कोई शेष है, तो दुख शेष रहेगा। जब आपकी कोई आवश्यकता शेष नहीं है, तब आप पूर्ण आनंद में हैं और तभी आप परमात्मा में हैं।
    पूछा है कि परमात्मा में होने की आवश्यकता क्या है?
    इसको मैं ऐसा कहूं, आवश्यकताएं हैं, इसलिए परमात्मा में होने की आवश्यकता है। जिस दिन कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी, उस दिन परमात्मा में होने की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी, आप परमात्मा हो जाएंगे। हर आदमी आवश्यकताओं से मुक्त होना चाहता है। तो अगर ऐसी स्वतंत्रता की घड़ी चाहता है, जहां कोई आवश्यकता का बंधन न हो, जहां वह हो, अखंड हो और पूर्ण हो और उसके पार पाने को कुछ शेष न रह जाए, कुछ हटाने को, छोड़ने को शेष न रह जाए, वैसी अखंड और पूर्ण स्थिति परमात्मा है।
    परमात्मा से मतलब नहीं है कि कहीं कोई ऊपर बैठे हुए हैं सज्जन, और उनके आपको दर्शन होंगे, और वे आप पर कृपा करेंगे। और आप उनके चरणों में बैठेंगे और जाकर वहां स्वर्ग में मजे करेंगे। ऐसा कोई परमात्मा कहीं नहीं है। और अगर ऐसे परमात्मा की तलाश में हों, तो भ्रम में हैं। ऐसा परमात्मा कभी नहीं मिलेगा। आज तक किसी को नहीं मिला है।
    परमात्मा चित्त की अंतिम आनंद की अवस्था है। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है, अनुभूति है। यानि परमात्मा का साक्षात नहीं होता। साक्षात इस अर्थों में नहीं होता कि एनकाउंटर हो जाए; कि आप गए और मुठभेड़ हो गयी उनसे! वे आपके सामने खड़े हैं और आप उनको देख रहे हैं, निहार रहे हैं।
    ये सब कल्पनाएं हैं, जो आप निहार रहे हैं। जब सारी कल्पनाएं चित्त छोड़ देता है और सारे विचार छोड़ देता है, तब वह अचानक उसे उदघाटन होता है कि इस सारे विश्व अखंड का, इस पूरे जगत का, ब्रह्मांड का, वह एक जीवित हिस्सा मात्र है। उसका स्पंदन इस सारे जगत के स्पंदन से एक हो जाता है। उसकी श्वास इस सारे जगत से एक हो जाती है। उसके प्राण इस सारे जगत के साथ आंदोलित होने लगते हैं। उनमें कोई भेद, कोई सीमा नहीं रह जाती।
    उस घड़ी वह जानता है, ‘अहं ब्रह्मास्मि।’ उस घड़ी वह जानता है कि जिसे मैंने ‘मैं’ करके जाना था, वह तो सारे ब्रह्मांड का अनिवार्य हिस्सा है। ‘मैं ब्रह्मांड हूं’, उस अनुभूति को हम परमात्मा कहते हैं।

    — ओशो (ध्‍यान सूत्र | प्रवचन–08)

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