आज भारत के ऊपर पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव पड़ रहा है, क्या यह शुभ है?
Question
प्रश्न – पूरब के ऊपर पश्चिम का प्रभाव पड़ रहा है, क्या यह शुभ है? अध्यात्म के ऊपर भौतिकता का प्रभाव पड़ रहा है, क्या यह शुभ है?
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प्रश्न – पूरब के ऊपर पश्चिम का प्रभाव पड़ रहा है, क्या यह शुभ है? अध्यात्म के ऊपर भौतिकता का प्रभाव पड़ रहा है, क्या यह शुभ है?
Answer ( 1 )
एक छोटी सी कहानी है, मैं अपनी चर्चा पूरी कर दूंगा।
रोम में एक बादशाह बीमार पड़ा, उसकी चिकित्सा होनी कठिन हो गई। वह मरने के करीब आ गया। उसके चिकित्सकों ने अंततः कहा, किसी शांत और समृद्ध व्यक्ति का कोट लाकर यदि राजा को पहना दिया जाए, तो राजा ठीक हो सकता है। और तब तो हर घर यही बात सुनाई पड़ने लगी, वजीर घबड़ाया, साथ में भागते नौकर को उसने कहा, अब क्या होगा? उस नौकर ने कहाः मैंने तो पहले ही समझ लिया था कि यह इलाज बहुत कठिन मालूम होता है। क्योंकि जब आपने यह सुना, आप खुद अपना कोट लेकर नहीं आए, और दूसरे के घर कोट पूछने को गए, आप बड़े वजीर हो राजा के, तभी मैं समझ गया था कि यह कोट मिलना मुश्किल है। क्योंकि यह आदमी को खुद यह खयाल नहीं आता कि मेरा कोट काम आ जाए। वजीर ने कहाः कोट तो मेरे पास बहुत हैं, समृद्धि भी बहुत, लेकिन शांति कहां? फिर तो साफ था कि कोट नहीं मिला। लेकिन दिन के उजाले में कैसे जाए राजा के पास, क्या मुंह लेकर? रात हो गई, सूरज ढल गया, तो वजीर चला चुपके-चुपके अंधेरे में। जाकर राजा के पैरों में सिर रख कर रो लेगा कि यह इलाज नहीं हो सकता। नहीं कोई आदमी मिलता जो सुखी भी हो और शांत भी। समृद्ध लोग हैं, लेकिन वे शांत नहीं।
महल के पास नदी के किनारे धीरे-धीरे चलता था डरा हुआ, भयभीत, क्या मुंह लेकर जाएगा। तभी सुनाई पड़ी उस पार से बांसुरी की आवाज। कोई बहुत, बहुत मधुर स्वरों में गीत गाता था। बड़ी शांति थी उन स्वरों में। एक आशा बंधी, उसके पैर वापस लौट पड़े। वह भागा हुआ उस आदमी के पास पहुंचा, सोचा शायद यह आदमी शांत मालूम पड़ जाए। शांत हृदय से ही ऐसा संगीत पैदा हो सकता है। उसके पास गया, हाथ जोड़ कर अंधेरे में खड़ा हो गया, जैसे ही उसने बांसुरी बंद की, उसने कहा कि मेरे मित्र, कृपा करो, और देखो इनकार मत कर देना, मैं बहुत द्वारों से इनकार पा चुका हूं। राजा मरणासन्न है, बचा लो उसे। तुम्हारे कोट की जरूरत है। चिकित्सक ने कहा है किसी शांत और समृद्ध आदमी का कोट मिल जाए। तुम शांत हो न, देखो न मत करना। उस आदमी ने कहा कि मैं बिलकुल शांत हूं और मैं अपने प्राण भी दे सकता हूं बचाने के लिए, लेकिन अंधेरे में तुम देख नहीं रहे, मैं नंगा बैठा हुआ हूं, कोट मेरे पास नहीं है।
राजा उस रात मर गया। कुछ लोग मिले जिनके पास कोट थे, लेकिन शांति नहीं थी। एक आदमी मिला जिसके पास शांति थी, लेकिन वह नंगा था। राजा मर गया।
अब तक दुनिया में ऐसी ही हालत रही है। पूरब के मुल्कों ने शांति की खोज की, कोट खो दिया। पश्चिम के मुल्कों ने कोट के ढेर लगा लिए, शांति खो दी। और आदमी मरणासन्न है।
और मैं कहता हूं कि किसी ऐसे आदमी का कोट चाहिए जो शांत भी हो सुखी भी हो, तो आदमी बच सकेगा, नहीं तो अब आदमी मरेगा। और ये पूरब-पश्चिम के झगड़े मत खड़े करो, यह भौतिक और अध्यात्म का भेद मत खड़ा करो। एक ऐसा आदमी चाहिए जो सुखी भी हो और शांत भी। इसलिए आने वाली दुनिया में पूरब-पश्चिम दोनों मिट जाने चाहिए। आने वाली दुनिया में एक संस्कृति पैदा होनी चाहिए अखंड, पूरब और पश्चिम की एक, धर्म और विज्ञान की एक, शरीर और आत्मा की एक। सुख और शांति को एक साथ खोजनी वाली संस्कृति को जन्म देना है। वही संस्कृति पूर्ण संस्कृति होगी। अब तक की सब संस्कृतियां अधूरी रही हैं। और अब बड़ा खतरा हो गया है, आदमी बीमार पड़ा है, आदमी…वह राजा मर जाता तो हर्जा नहीं था, राजा पैदा होते हैं। वापस अब आदमी बीमार पड़ा है, पूरी आदमियत बीमार पड़ी है। अब पूरब और पश्चिम अगर न मिल पाए तो यह आदमी नहीं बच सकेगा।
अंत में मैं यही कहता हूं, अब तक हमने धर्म को और विज्ञान को अलग तोड़ कर देखा, शरीर और आत्मा को अलग तोड़ कर देखा, अब यह नहीं चलेगा, इनको जोड़ कर देखना पड़ेगा। आदमी अखंड है। और पूरे मनुष्य की तृप्ति चाहिए–उसके भीतर शांति होनी चाहिए, उसके बाहर सुख। उसके बाहर समृद्धि होनी चहिए और भीतर संगीत होना चाहिए। इसमें कोई दोनों में विरोध नहीं है।
— ओशो [अज्ञात की ओर-(प्रवचन-04) ]