बुरे कर्मों से हमें नफरत करनी चाहिए या उस इन्सान से जो बुरे कर्म करता है?
Question
प्रश्न – बुरे कर्मों से हमें नफरत करनी चाहिए या उस इन्सान से जो बुरे कर्म करता है?
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प्रश्न – बुरे कर्मों से हमें नफरत करनी चाहिए या उस इन्सान से जो बुरे कर्म करता है?
Answer ( 1 )
इन्होंने एक बात तो मान ही ली कि नफरत तो करनी ही है। अब किससे करनी है यह भर पूछना है। नफरत की तो ठान ही ली कि पक्का करना है। अब बुरे इन्सान से करें या बुरे इन्सान के कर्मों से करें।
मैं आपको एक ही बात सिखा रहा हूं कि कैसे प्रेम पूर्ण बनो, कैसे जागृत बनो। आप ने भी खूब प्रश्न पूछा। जीसस के पास एक बार कुछ लोग आए। एक स्त्री को पकड़कर साथ में लाये थे। वे लोग उसको मार रहे थे, पीट रहे थे। और उन्होंने जीसस से पूछा कि शास्त्रों में लिखा है कि व्यभिचारिणी स्त्री को पत्थर मार-मार कर मार डाला जाए। अब बोलो आप क्या कहते हो? असल में वे लोग बड़े चालाक थे। वे आए ही इसलिये थे कि लगे हाथ इस बहाने जीसस को भी मारेंगे। जीसस से भी उनकी दुश्मनी थी कि बहुत प्रेम का पाठ सिखाते हैं कि सबको प्रेम करो, प्रेम ही परमात्मा है।
अब शास्त्र का उदाहरण देकर, पुराने शास्त्रों का वचन उद्यृत करके कहेंगे कि यह स्त्री व्यभिचारिणी है और शास्त्रों में लिखा है कि व्यभिचारिणी स्त्री को पत्थर मार-मार कर मार डालो। अब अगर जीसस कहेंगे कि इसको क्षमा कर दो, इसके प्रति भी प्रेम पूर्ण व्यवहार करो तो लगे हाथ जीसस को भी पत्थर मार-मार कर मार डालेंगे कि यह तो तुम शास्त्र के खिलाफ, धर्म के खिलाफ बोलते हो तो तुम भी पापी हो। और अगर वे कहेंगे कि हां इस स्त्री को मार डालो शास्त्रों के अनुसार, तो उनसे पूछेंगे कि तुम्हारे वचनों का क्या हुआ कि सब को प्रेम करो और इस बात पर उनको पत्थरों से मारेंगे। जीसस ने देखा कि इनका प्रश्न बड़ी चालाकी से भरा हुआ है। जीसस ने कहा कि शास्त्रों में जो लिखा है बिल्कुल ठीक लिखा है। लेकिन एक शर्त है कि वही व्यक्ति पहला पत्थर उठाए मारने के लिये जिसके मन में कभी व्यभिचार का ख्याल नहीं आया। धीरे-धीरे करके भीड़ खिसकने लगी, एक-एक करके लोग जाने लगे। अंत मे रह गई केवल वह स्त्री और जीसस। उसने जीसस के चरण पकड़ लिए और कहा कि आपने मेरे जीवन को बचाया, आपकी बड़ी करूणा।
तुम कह रहे हो कि बुरे इंसान से नफरत करें या उसके बुरे कर्म से। तुम मेरी बात समझे ही नहीं। जीसस का एक बड़ा प्यारा और अद्भुत वचन है ‘रिजिस्ट नॅाट इविल’ बुराई के साथ प्रतिरोध न करो। कोई ईसाई पादरी इसका अर्थ नहीं समझता। वे समझ भी नहीं सकते उनकी बुद्धि के बाहर है। केवल ओशो ने पहली बार इस पर प्रकाश डाला। बड़ा प्यारा बचन है। जीसस कह रहे हैं अशुभ के साथ प्रतिरोध मत करो- ‘रिजिस्ट नॅाट इविल’ क्योंकि प्रतिरोध करना स्वयं ही एक बुराई है। आप मुझसे पूछ रहे हैं कि बुरे आदमी से नफरत करें या उसके कर्मों से। मैं आपसे कहना चाहूंगा नफरत करना स्वयं ही एक बुराई है। किससे करें का सवाल नहीं है। इस विधि से आप बुराई को नष्ट नहीं कर रहें बल्कि आप भी बुरे हो गये। एक बुरे आदमी की गिनती और बढ़ जाएगी। यह तो कोई उपाय न हुआ।
नहीं, न तो बुरे आदमी से नफरत करना, न बुरे कर्मों से नफरत करना। हाँ, उस व्यक्ति को चेताने की कोशिश करना, उसे जगाने की कोशिश करना; उससे भूल-चूक हो रही है मूर्छा में। कारण है उसकी मूर्छा, उसका व्यवहार नहीं। उस मूर्छा को तोड़ने की कोशिश करना दया से भरके, करूणा से भरके। घृणा करने का सवाल नहीं, वह दया का पात्र है। बेचारा स्वयं मूर्छित है तभी वह बुरे कृत्य कर रहा है। खुद भी कष्ट भोग रहा है औरों को भी भुगता रहा है।
मैंने बुद्ध की कहानी कही कि वे लोग जो अपमान करने आए थे बुद्ध ने बड़े करुणा भाव से उनकी तरफ देखा और कहा मुझे बड़ी दया आती है। यह जहर और अपमान जो तुम मुझे देने आए थे तुम खुद ही इसे पीओगे, बांटोगे किसी और को। बड़ी दया तुम पर आती है। नफरत का तो सवाल ही नहीं। वे लोग दया के पात्र हैं, बहुत मूर्छा में हैं। एक आदमी ने शराब के नशे में बेहोश होकर सम्राट अकबर को बहुत गालियां दीं। सम्राट अकबर की सवारी निकल रही थी। वह रास्ते में खड़ा हो गया और गालियां देने लगा, पत्थर फेंकने लगा। सिपाहियों ने उसको पकड़ लिया। रात भर जेल में रखा, सुबह दरबार में पेश किया। अकबर ने कहा कल शाम को तुम मुझे गालियां क्यों दे रहे थे? वह आदमी बोला- हुजूर, कैसी बात कर रहे हैं? मैं और आपको गालियां दूंगा? मैं तो आपका प्रशंसक हूँ। मैंने तो आपकी प्रशंसा में गीत लिखे हैं। कल शाम को मैंने शराब पी ली थी। अब शराब के नशे में मैंने जो किया उसके लिए तो मैं जिम्मेदार नहीं हूं। उसके लिए शराब जिम्मेदार है।
अकबर को हंसी आ गयी और उसने अपने सिपाहियों से कहा इसे छोड़ दो। अब इसके कृत्यों के लिए हम इसको जिम्मेवार नहीं ठहरा सकते। उसने होश हवास में नहीं किए। एक पागल व्यक्ति कुछ कर दे, क्या आप उस पर नाराज होंगे या दया करेंगे? पागल को क्या सज़ा देना? वह तो बेचारा वैसे ही पागल है, कष्ट में है। अब और उस पर उसके कृत्यों के लिए सजा दोगे क्या? अदालत भी माफ कर देती है छोटे बच्चों को अगर उनसे कोई अपराध हो जाए तो। छोटे बच्चे हैं, उन्हें पता ही नहीं है। उन्होंने तो खिलौना समझ कर पिस्तौल उठा ली और दबा दी और उसमें से गोली निकल गयी। उनको थोड़ा ही पता है कि मरना-मारना क्या होता है। वे तो रोज टीवी में देखते हैं कि लोग पिस्तौल चलाते हैं, गोलियां चलाते हैं। तो उन्होंने भी शौक-शौक में गोली चला दी। एक बच्चे को सजा नहीं दी जा सकती। यह अज्ञान है। कोई पागलपन में कुछ कर जाए अदालत उसे कड़ी सजा नहीं देगी। बेचारा दया का पात्र है। कोई बेहोशी में कुछ कर जाए अदालत उसे कनसिडर करेगी।
जो भी लोग बुरे कामों में संलग्न हैं वे कहीं न कहीं थोड़े से तो विक्षिप्त हैं ही। कुछ तो पागलपन का उनमें असर है। कुछ तो शराब पी ही ली है। माना कि बोतल से नहीं पी, भीतर क्रोध की ही पी है। है तो वह भी एक प्रकार का रसायन ही। भीतर ही भीतर कुछ रसायन छूट गए हैं। अब क्रोध ने उनको अंधा कर दिया है या काम वासना ने उनको अंधा कर दिया है। उस अंधेपन में अगर वे कुछ कर गुजरते हैं तो वे दया के पात्र हैं, सजा के नहीं। और नफरत का तो सवाल ही नहीं। जीसस का वचन याद रखना ‘रेसिस्ट नोट एविल’ बुराई से लड़ाई स्वयं ही अपने आप में एक बुराई है।
~ स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती