मुझे संगीत से बहुत प्रेम है, जब मैं संगीत सुनता हूं तो तल्लीन हो जाता हूं; क्या यह ध्यान के लिए हानिकारक तो न होगा?

Question

प्रश्न – मुझे संगीत से बहुत प्रेम है जैसे ओशो से प्रेम है। अब मैं संगीत सुनता हूं तो तल्लीन हो जाता हूं क्या यह मेरा डूबना हानिकारक तो न होगा?

Answer ( 1 )

  1. जरा भी नहीं। उपयोगी रहेगा। क्योकि हमारे भीतर भी एक संगीत गूंज रहा है हमारी चेतना में। जब तुम खूब जागरूक हो जाओगे, बिल्कुल निष्क्रिय और निर्विचार, शांत और मौन, तब अचानक तुम्हें भीतर एक संगीत सुनाई पड़ेगा। तो बाहर के संगीत को सुनकर अगर तुम तल्लीन हो रहे हो तो चलो अभी बाहर के संगीत में आयी। एक दिन भीतर के संगीत को भी पकड़ लोगे। तो संगीत में डूबना उपयोगी है। ओशो ने संगीत को बहुत महत्व दिया। उन्होंने हर ध्यान विधि में संगीत को जोड़ा। यह अकारण नहीं है। इसका बहुत गहरा कारण है। बाहर के संगीत में डूबते-डूबते हम उस भीतर के संगीत को पा सकते हैं। संतो ने उस संगीत को ही कहा है ‘ओंकार’। गुरु नानक देव जी कहते हैं- एक ओंकार सतनाम। उस संगीत में डूबना है, मौन के संगीत में, शून्य के संगीत में। ध्यान उसकी भूमिका है। प्यारे मित्रों, इन दिनों में एक भूमिका निर्मित हो रही है। ताकि आप उस महासंगीत में, दिव्य संगीत में डूब सकें। वहां से समाधि की शुरूआत है।

    ध्यान और समाधि में यही अंतर है। ध्यान का अर्थ है- एक निष्क्रिय शून्य, शांत जागरूकता। और समाधि का अर्थ है- उस शांति में अब संगीत सुनाई पड़ने लगा। उस शून्यता में अब शून्यता न रही, एक भराव पैदा हो गया। ध्वनि की तरंगों से हुई है वह शून्यता। तो यहां से समाधि की शुरूआत होती है। तो  हम सब परमात्मा की उस ध्वनि को सुन पाएंगे, उसमें डूब पाएंगे। तो आप पूछते हैं कि बाहर के संगीत में डूबना हानिकारक तो नहीं? जरा भी नहीं। बस इतना ही ध्यान रखना कि वहां अटक मत जाना। माना यह संगीत प्यारा है, पर वह जो परमात्मा का दिव्य संगीत है, वह इससे करोड़ों-करोड़ों गुना ज्यादा प्यारा है। तो बाहर के संगीत में अटक कर मत रह जाना। उसे एक Step एक सीढ़ी की तरह लेना। और आगे बहुत कुछ होने को है। चले-चलो उस दिशा में।

    ~ स्वामी शैलेंद्र सरस्वती

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