मृत्यु के बाद चेतना कहां जाती है? क्या हमारी चेतना भी ऊर्जा का ही एक रूप है?
Question
प्रश्न- क्या हमारी चेतना भी ऊर्जा का ही एक रूप है और चेतना मृत्यु के बाद कहां जाती है? मेडिकल साईंस में माना जाता है कि मृत्यु होने के पश्चात् ब्रेन सबसे आखिरी में काम करना बंद करता है। कृपया इस बारे में थोड़ा समझाएं।
Answer ( 1 )
शरीर के तल से देखें, मेडिकल साईंस के हिसाब से, तो हम अपनी ऊर्जा को तीन हिस्सों में वैज्ञानिक तरीकों से समझ सकते हैं। एक तो ब्रेन है जहां पर इलैक्ट्रिक वेव्स विद्युत ऊर्जा के रूप में, जीवन शक्ति काम कर रही है। मस्तिष्क से विद्युत ऊर्जा चलती है दो रूपों में; पहलाः नर्वस सिस्टम के माध्यम से न्यूरो ट्रांसमीटर्स नामक केमिकल्स के द्वारा मसल्स तक पहुंचती है। शरीर की परिधि तक पहुंचती है। दूसराः हाइपो थेल्मस और पिट्यूरी ग्लैंड्स के माध्यम से शरीर की सभी एंडोक्राइन ग्लैंड्स को, अन्तःस्रावी ग्रंथियों को वह संचालित करती है, रासायनिक रूप में परिवर्तित होकर। नर्वस सिस्टम में भी बहुत से न्यूरो ट्रांसमीटर्स रूपी रसायन हैं। विद्युत ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित होती हैं- या तो नर्वस सिस्टम के माध्यम से अथवा एंडोक्राइन सिस्टम के माध्यम से, पहले रासायनिक, फिर फिजिकल ऊर्जा में परिवर्तित होती है। तो विज्ञान इन तीन तलों से राजी है। एक तो भौतिक तल है, दूसरा रासायनिक तल है, तीसरा एक विद्युतीय तल है।
जब मृत्यु घटित होती है तो सबसे पहले स्थूल फिजिकल एनर्जी वापस खींच ली जाती है, फिर सूक्ष्म तल पर रासायनिक परिवर्तन होते हैं। और सबसे अंत में विद्युतीय परिवर्तन होते हैं। अंततः जो इलैक्ट्रिक फंक्शन्स चल रहे हैं वे भी काम करना बंद कर देते हैं और तब मृत्यु घटित होती है। यहां तक विज्ञान की पकड़ में आता है।
आज से 150 वर्ष पहले तक केवल भौतिक घटनाओं को ही मृत्यु का पर्यायवाची माना जाता था। हृदय ने धड़कना बंद कर दिया, नब्ज चलनी बंद हो गई, श्वास खत्म हो गई। इसको ही मृत्यु माना जाता था। आज मृत्यु की परिभाषा बदल गई। जब मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है वहां की विद्युतीय गतिविधियां बंद हो जाती हैं, अब उसे मृत्यु कहा जाता है। यदि मस्तिष्क सक्रिय है, विद्युत ऊर्जा वहां पर मौजूद है केवल हृदय बंद हो गया है अथवा श्वास बंद हो गई है या किसी शरीर के अन्य हिस्से ने काम करना बंद कर दिया है; तो उसे पुनः संचालित किया जाना संभव है। हृदय धड़कना-बंद होने के 6 मिनट बाद भी अगर हृदय को फिर से धड़का लिया जाए किसी कृत्रिम उपाय से तो जीवन पुनः वापस लौट आएगा। तो मृत्यु की परिभाषा अब बदल गई है।
शायद भविष्य में मृत्यु की परिभाषा फिर बदलेगी। यदि हमें विद्युत ऊर्जा से और सूक्ष्म तरंगों का अहसास होना शुरू हुआ तो, शायद वह संभव है और सूक्ष्म उपकरण जब बन जाएंगे जो विद्युत ऊर्जा से भी सूक्ष्म ऊर्जा को माप सकेंगे, पकड़ सकेंगे तब हम जानेंगे कि मस्तिष्क ने जब काम करना बंद कर दिया तब भी कहीं किसी सूक्ष्मतर तल पर अभी जीवन मौजूद है। हिंदुओं की मान्यता है कि पूरी-पूरी मृत्यु लगभग तीन दिन के बाद घटित होती है। जब हमारा सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर से पूरी तरह विदा हो जाता है, उसमें करीब-करीब तीन दिन लग जाते हैं। हो सकता है भविष्य में ऐसा कोई उपाय हो जाए कि मस्तिष्क की विद्युतीय गतिविधियां बंद होने के बावजूद भी फिर से सूक्ष्म शरीर को मस्तिष्क से जोड़ा जा सके और पुनः सक्रिय किया जा सके। यह भावी संभावना कह रहा हूं।
आप पूछते हैं कि क्या चेतना भी ऊर्जा का ही एक रूप है? मैं कहना चाहूंगा, ठीक इससे उल्टी बात कि ऊर्जा चेतना का एक रूप है, चेतना ऊर्जा से भी ज्यादा सूक्ष्म है। आज जिसे हम ऊर्जा की तरह जान रहे हैं ज्यादा अच्छा होगा कहना कि वह चेतना का सघन रूप है। जैसा विज्ञान कहता है कि ऊर्जा का सघन रूप पदार्थ है, तो बेहतर होगा कि इस क्रम में चीजों को जमाएं- सर्वाधिक सूक्ष्म है चेतना। जब वह संगठित होती है, कनडैंस होती है तो वह विद्युत ऊर्जा का रूप लेती है। फिर विद्युत ऊर्जा रसायन ऊर्जा का रूप लेती है। अंततः रसायन ऊर्जा और घनी होकर भौतिक ऊर्जा का रूप लेती है। तो आज मेडिकल साईंस की भाषा में इस बात को हम तीन स्टेप तक तो आसानी से समझ सकते हैं- विद्युत ऊर्जा, रसायन ऊर्जा, और भौतिक ऊर्जा।
संभवतः भविष्य में हम इसके और सूक्ष्म आयाम में प्रवेश कर सकेंगे। यह मुमकिन है कि चेतना का और सूक्ष्म आयाम भी वैज्ञानिक उपकरणों की पकड़ में आ सकेगा। तब हम और सूक्ष्म तल पर पहुंच जाएंगे। चेतना को हम जान सकेंगे। सच पूछो तो भौतिक विज्ञान बहुत नजदीक पहुंच गया है चैतन्यता की तरफ। धार्मिक लोग तो सदा से कहते रहे कि सारा जगत चेतना से निर्मित है, परमात्म-मय है। अब धीरे-धीरे विज्ञान की पकड़ में भी बात आ रही है लेकिन उनकी शब्दावली थोड़ी भिन्न है। समझो कि भौतिक विज्ञान ने खोज लिया है ‘दि लॅा ऑफ अनसरटेनिटी’, अनिश्चय का सिद्धांत।
बड़ी अजीब बात है सारे नियम तो निश्चितता के नियम होते हैं। अनिश्चितता का नियम कहकर तो विज्ञान खुद ही अपनी बात को कनट्राडिक्ट कर रहा है। इसके पहले तक विज्ञान बिल्कुल सुनिश्चित था लेकिन जैसे-जैसे परमाणु से भी छोटे कणों की खोज हुई तब पता चला कि वह कण भी है और तरंग भी हैं। किन्हीं प्रयोगों में वे कण के रूप में सिद्ध होते हैं। किन्हीं अन्य प्रयेगों में वे तरंग की भांति पकड़ में आते हैं। पदार्थ धीरे-धीरे खो गया ऊर्जा के जगत में प्रवेश मिल गया। सिर्फ तरंगें हैं। आज भौतिकी ने अनसरटेनिटी प्रिंसिपल खोज लिया कि उन तरंग-कणों (क्वान्टा) का व्यवहार अति सूक्ष्म तल पर बहुत अनिश्चित है। इसका मतलब हुआ कि उनके अपने मूड्स हैं, अपनी भावदशाएं हैं, उनके व्यवहार करने का तरीका सुनिश्चित नहीं है। उनका संवेग (मोमेन्टम) नापो तो स्थिति पता नहीं चलती। पोजीसन पता लगाओ तो संवेग का ज्ञान नहीं हो पाता। चैतन्यता का यही तो अर्थ है कि चीजें जड़ या मुर्दा नहीं हैं; उनकी अपनी भावदशाएं हैं, उनके अपने मूड्स हैं, उनके अपने विचार हैं। उनका व्यवहार वे स्वयं ही तय करती हैं। बहुत सूक्ष्म तल पर जाकर यह बात पकड़ में आई है कि स्थूल तल पर चीजें सुनिश्चित जान पड़ती थीं। लेकिन सूक्ष्म तल पर अनिश्चितता का नियम समझ में आया। दूसरी शब्दावली में कहें कि विज्ञान धीरे-धीरे राजी हो रहा है कि पदार्थ के जो सूक्ष्मतम कण-तरंग हैं, उनकी अपनी चेतना है। वे स्वयं निर्णायक हैं।
इस छोटे से चुटकुले से समझें। मुल्ला नसरुद्दीन एक नए गांव में गया। वह कहीं हलवाई की दुकान पर मिठाई खरीदने गया। हलवाई को उसने पैसे दिये, हलवाई के पास चिल्लर नहीं थी वापिस करने के लिए, चार आने वापिस करने थे। उसने कहा, कल ले जाइये या शाम को यहां से गुजरें तब ले जाइये। नसरुद्दीन ने कहा ठीक। मुल्ला को दो-चार दिन उस गांव में रहना था उसने सोचा कि कुछ पहचान बना लूं कि हलवाई की दुकान कौन सी है? उसने देखा कि हलवाई की दुकान के सामने एक भैंस बैठी हुई है। उसने कहा कि ठीक भैंस जिस दुकान के सामने बैठी है, वही दुकान है। दूसरे दिन नसरुद्दीन वहां पहुंचा। उसने भैंस तलाश की। भैंस कहां है? एक नाई की दुकान के सामने भैंस बैठी थी। मुल्ला गया भीतर… उस नाई की गरदन पकड़ ली और कहा कि हद करते हो हलवाई जी, तुमने चार आने के पीछे अपना काम-धंधा बदल लिया, जाति बदल ली। हलवाई से नाई बन गये। मेरे चार आने लौटाओ।
हमें हंसी आएगी। क्योंकि मुल्ला जिस चीज से नापने चला है, जिस चीज से पहचान बना रहा है वह चीज स्वयं ही अनिश्चित है। भैंस कल कहां बैठेगी यह पहले से तय नहीं हो सकता। भैंस का अपना मूड है। आज हलवाई के सामने बैठी है, कल नाई के सामने बैठ जाएगी, परसों कहीं बैठे ही न, उसका क्या ठिकाना! जब तक विज्ञान स्थूल पदार्थ की खोज कर रहा था तब तक बड़ी सुनिश्चितता व सरटेंनटी पाई गई। जैसे ही सूक्ष्म तल पर विश्लेषण शुरू हुआ अनिश्चितता होने लगी। इसका अर्थ हुआ कि पदार्थ का भी जो सूक्ष्म रूप है उसकी अपनी जीवन्तता है, उसकी अपनी चेतना है… भैंस कहां बैठेगी कल यह पक्का नहीं हो सकता। ये सब-एटोमिक पार्टिकल्स, अति सूक्ष्म तरंगें कैसा व्यवहार करेंगी; मामला इतना सुनिश्चित नहीं है।
इस तरह दूसरी तरफ से विज्ञान ने भी वही बात खोज ली जो धार्मिक लोग सदा-सदा से जानते थे। तो मैं कहना चाहूंगा कि चेतना का संघनित रूप ऊर्जा है। ऊर्जा का संघनित रूप पदार्थ है और मृत्यु में जो घटना घटती है वह रिर्वस डाइरैक्शन में स्थूल से सूक्ष्म की ओर धीरे-धीरे मृत्यु घटित होती है। जब जन्म घटित होता है तब सूक्ष्म से स्थूल की तरफ सबसे पहले चेतना, फिर वह गर्भ में आती एक छोटा सा सेल विकसित होना शुरू होता है। फिर धीरे-धीरे उसका विकास होता है और मस्तिष्क बनता। धीरे-धीरे शरीर के दूसरे हिस्से बनते और क्रमशः शरीर बड़ा होता। जब जन्म हुआ था तब सूक्ष्म से स्थूल की तरफ विकास हुआ था। मृत्यु घटती है तो स्थूल से सूक्ष्म की ओर विपरीत दिशा में जीवन ऊर्जा खिसकना प्रारंभ करती है।
~ स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती