लेट कर ध्यान करने पर नींद आ जाती है, क्या करें? क्या बैठ कर ध्यान करना ज्यादा उपयोगी है?
Question
प्रश्न- कई बार लेट जाने से नींद आ जाती है। यदि ध्यान में शिथिलीकरण के समय लेटने की बजाय हम बैठे ही रहें तो क्या यह भी उतना ही लाभदायक होगा?
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प्रश्न- कई बार लेट जाने से नींद आ जाती है। यदि ध्यान में शिथिलीकरण के समय लेटने की बजाय हम बैठे ही रहें तो क्या यह भी उतना ही लाभदायक होगा?
Answer ( 1 )
व्यक्तिगत तौर पर जैसा उचित जान पड़े, वैसा करें। नींद की चिंता न करें। नींद आ जाए तो उसे भी स्वीकार कर लें। उससे लड़ें नहीं, उसका प्रतिरोध न करें। बैठकर या खड़े होकर जब आप ध्यान करेंगे- खासकर ऊर्जा ध्यान, तो थोड़ा कठिन होगा- क्योंकि यह ग्राहकता पर आधारित है। खड़े होकर या बैठकर हमारी ग्रहणशीलता कम हो जाती है। एक प्रकार का तनाव बना रहता है, सूक्ष्म तल पर अस्तित्व से लड़ाई-सी चलती रहती है। लेटने में शरीर पूर्णतः शिथिल हो जाता है। इसलिए लेटना उपयोगी होगा। आप ज्यादा संवेदनशील हो पाते हैं। ज्यादा ग्रहण कर पाते हैं। बैठकर उतनी संवेदनशील ग्राहकता संभव नहीं है। आप करके देखना, कोई अपवाद भी हो सकता है।
आप बैठकर सो तो नहीं पाएंगे लेकिन याद रखना आप ऊर्जा को ग्रहण भी ठीक ढंग से न कर पाएंगे। क्योंकि रिलैक्स नहीं हो पाएंगे। एक प्रकार का प्रतिरोध ऊर्जा के साथ निरंतर चलता रहेगा। इसलिए तो लेटने पर नींद आ जाती है क्योंकि हमारा प्रतिरोध समाप्त हो जाता है। बैठकर सोना मुश्किल है खड़े होकर सोना तो और भी ज्यादा मुश्किल। इसलिए ऊर्जा ध्यान में उपचार के पश्चात लेटकर शिथिलीकरण और आत्मस्मरण में जाएं। भले ही नींद आ जाए, कोई बात नहीं, वह नींद भी स्वास्थ्यदायी होगी।
सामान्यतः नींद भी हीलिंग में मददगार हाती है। ऊर्जा ध्यान के बाद साधारण नींद न आएगी। वह एक प्रकार की सम्मोहन की दशा, ‘योग निद्रा’ बड़ी लाभदायक होगी। बैठकर या खड़े होकर हमारा चित्त आक्रामक बना रहता है। इसलिए लेटना ही ज्यादा उपयोगी है।
~ स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती