शास्त्रों पर श्रद्धा न हो, महापुरुषों पर विश्वास न हो, तो आत्म-ज्ञान कैसे उपलब्ध होगा?
Question
प्रश्न – बहुत से मित्रों ने पूछा है कि यदि शास्त्रों पर श्रद्धा न हो, महापुरुषों पर विश्वास न हो, तब तो हम भटक जाएंगे, फिर तो कैसे ज्ञान उपलब्ध होगा?
Answer ( 1 )
ऐसा प्रश्न स्वाभाविक है। मन को यह खयाल आता है कि यदि महापुरुषों पर, शास्त्रों पर श्रद्धा न करेंगे तो भटक जाएंगे। मगर बड़े आश्चर्य की बात है, हम यह नहीं सोचते कि श्रद्धा करते हुए भी हम भटकने से कहां बच सके हैं। विश्वास करते हुए भी क्या हम भटक नहीं रहे हैं? भटक नहीं गए हैं? विश्वास हमें कहां ले जा सका है। विश्वास कहीं ले जा भी नहीं सकता। क्यों?
क्योंकि जो विश्वास दिखाई पड़ता है ऊपर से, भीतर उसके संदेह छिपा होता है। विश्वास संदेह को छिपाने के वस्त्रों से ज्यादा नहीं है। जब आप कहते हैं, मैं विश्वास करता हूं। उसका ही मतलब हुआ कि आपके भीतर संदेह मौजूद है, नहीं तो विश्वास कैसे करिएगा। जब कोई आदमी कहता है, मैं ईश्वर पर विश्वास करता हूं, उसका मतलब? उसका मतलब अगर वह थोड़ा भीतर झांक कर देखेगा तो पाएगा कि संदेह मौजूद है। उसी संदेह को छिपाने के लिए विश्वास किया गया है। जो आदमी जानता है वह विश्वास नहीं करता।
श्री अरविंद को किसी ने पूछा था: डू यू बिलीव इन गॉड? क्या आप विश्वास करते हैं ईश्वर में? तो श्री अरविंद ने कहा, नहीं, आइ डू नॉट बिलीव, आइ नो। मैं विश्वास नहीं करता हूं, मैं जानता हूं।
ज्ञान के अतिरिक्त संदेह कभी समाप्त नहीं होता। ज्ञान ही संदेह की मृत्यु बन सकता है। जैसे प्रकाश अंधकार की मृत्यु बनता है, वैसे ही ज्ञान संदेह की मृत्यु बनता है। विश्वास देकर हम अपने आपको धोखा दे लेते हैं। हम सोचते हैं कि हमने विश्वास कर लिया, बात समाप्त हो गई। विश्वास से बात समाप्त नहीं होती, भीतर संदेह मौजूद बना ही रहता है। भीतर संदेह होता है, ऊपर विश्वास होता है। जीवन भर संदेह नष्ट नहीं होता इस भांति। जिन्हें संदेह नष्ट करना हो, और संदेह नष्ट हो जाए तो ही जीवन में एक थिरता, तो ही जीवन में एक वास्तविक स्थिति उत्पन्न होती है। तो ही हम सत्य के साक्षात में समर्थ होते हैं। लेकिन संदेह जिसको मिटाना है उसे संदेह करना पड़ता है सम्यक रूप से। उसे राइट डाउट, उसे ठीक-ठीक संदेह की विधि सीखनी होती है। और अगर कोई मनुष्य ठीक से संदेह करना शुरू करे, तो एक दिन उस जगह पहुंच जाता है जहां संदेह नहीं किया जा सकता है। उस दिन जो उपलब्ध होता है वही ज्ञान जीवन को बदलता है।
क्या आप सोचते हैं ऐसा कोई सत्य नहीं होगा जीवन में जिस पर संदेह न किया जा सके? ऐसा सत्य है। लेकिन हम तो संदेह ही नहीं करते, इसलिए उसको खोज कैसे पाएंगे? सोने को आग में डालते हैं, स्वर्ण बच जाता है और जो व्यर्थ है वह जल जाता है। संदेह की आग में जो सत्य नहीं है वह जल जाएगा और जो सत्य है वह बच जाएगा। लेकिन संदेह की आग में जिसने सत्य के स्वर्ण को डाला ही नहीं, वह कभी जान भी नहीं पाएगा उसके पास स्वर्ण है या मिट्टी। संदेह की आग में डालना जरूरी है सारे विश्वासों को, ताकि जो कचरा है वह जल जाए। और जो न जल सके, अछूता निकल आए अग्नि के बाहर, वह आपके जीवन को बदल देगा, वह होगा सत्य। सत्य को संदेह से डरने की जरूरत नहीं है। जो डर रहा है, उसके पास सत्य नहीं होगा, उसके पास होगा, थोथा विश्वास। इसलिए भय मालूम पड़ता है कि मैं कहीं भटक न जाऊं। कहीं मैं जिस विश्वास को पकड़े हूं, वह जल कर राख न हो जाए। जो जल सकता है, वह जल ही जाना चाहिए, उस सोने के भ्रम में रहने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन ऐसा सत्य है जीवन में, जो कोई भी संदेह जिसे नहीं जला पाते हैं? जो संदेह की अग्नि से सुरक्षित बाहर निकल आता है?
एक व्यक्ति था, दैप्यान। उसने संदेह करना शुरू किया–ईश्वर पर, जगत पर, शास्त्रों पर, सब पर। उसने तय किया कि मैं उस समय तक संदेह किए चला जाऊंगा जब तक मुझे कोई ऐसी चीज उपलब्ध न हो जाए जिस पर मैं संदेह करना भी चाहूं तो न कर सकूं। जहां जाकर मेरी संदेह की नौका जिस चट्टान से जाकर टकरा कर चूर-चूर हो जाएगी, उसी चट्टान को मैं नमस्कार करूंगा और कहूंगा यह सत्य है।
संदेह किया उसने तो ईश्वर भी चला गया संदेह में। शास्त्र भी चले गए। महापुरुष भी चले गए। गुरु भी चले गए। सिद्धांत, संप्रदाय, धर्म भी चला गया। सब चला गया। लेकिन एक जगह आकर वह चट्टान उपलब्ध हो गई जिस पर संदेह नहीं किया जा सकता था। वह चट्टान थी, स्वयं की चट्टान। अंत में उसने चाहा कि मैं अपने पर भी संदेह करूं कि मैं हूं या नहीं? लेकिन उसे पता चला, अगर मैं यह भी कहूं कि मैं नहीं हूं, तो भी यह मेरे होने का ही प्रमाण बनता है। अगर मैं संदेह करूं अपने पर, तो मेरा संदेह भी मेरे होने को सिद्ध करता है। इस जगह आकर संदेह टूट गया। स्वयं पर संदेह नहीं किया जा सकता।
एक फकीर था, नसरुद्दीन। एक सांझ मित्रों के साथ बातचीत में संलग्न रहा और नसरुद्दीन की बातें इतनी मीठी और इतनी प्रीतिपूर्ण थीं कि रात के कब बारह बज गए मित्रों को भी पता न चला। रात के भोजन का समय चूक गया। फिर नसरुद्दीन बोला, अब मैं जाता हूं। तो उसके मित्रों ने कहा, तुमने हमारे रात्रि का भोजन भी चूका दिया है। और अब तो घर लोग सो चुके होंगे, हमें भूखे ही सोना पड़ेगा आज। नसरुद्दीन ने कहा, घबड़ाओ मत, मेरे साथ चलो, आज मेरे घर ही भोजन कर लेना।
बीस मित्रों को लेकर आधी रात नसरुद्दीन घर पहुंचा। जोश में निमंत्रण तो दे दिया। जैसे-जैसे घर के पास पहुंचा और पत्नी की याद आई, वैसे-वैसे डरा। रात आधी हो गई थी, बिना खबर दिए बीस लोगों को भोजन के लिए लाना। पत्नी क्या कहेगी? और फिर आज दिन भर से वह घर लौटा भी नहीं था। और वह तो फकीर था। सुबह आटा मांग लाता था, उसी से सांझ भोजन बनता था। आज आटा भी नहीं ला पाया था। मुश्किल होगी, द्वार पर जाकर उसे लगा, कठिनाई होगी खड़ी। उसने मित्रों से कहा, तुम रुको, जरा मैं भीतर जाऊं, अपनी पत्नी को समझा लूं। मित्र भी समझ गए, पत्नियों को बिना समझाए बड़ी कठिनाई है ऐसी स्थिति में।
मित्र बाहर रुक गए। नसरुद्दीन भीतर गया। पत्नी तो आगबबूला होकर बैठी थी। दिन भर से उसका कोई पता न था। घर में चूल्हा भी नहीं जला था। मांग कर आटा ही नहीं लाया गया था। और जब उसने जाकर कहा कि बीस मित्रों को भोजन के लिए निमंत्रण देकर ले आया हूं।
तो उसकी पत्नी ने कहा, तुम पागल हो गए हो, कहां थे दिन भर? भोजन का सवाल कहां है, हमारे लिए भी आटा नहीं भोजन का, मित्रों का तो कोई सवाल उठता नहीं। जाओ, उन्हें वापस लौटा दो।
नसरुद्दीन ने कहा, मैं कैसे वापस लौटाऊं? एक काम कर, तू जाकर उनसे कह दे कि नसरुद्दीन घर पर नहीं है।
उसकी पत्नी ने कहा, यह और अजीब बात आप मुझे समझा रहे हैं। आप उन्हें लेकर आए हैं और मैं उनसे जाकर कहूं कि नसरुद्दीन घर पर नहीं है!
नसरुद्दीन ने कहा, अब इसके सिवाय कोई रास्ता नहीं। जाकर कह, समझाने की कोशिश कर।
वह स्त्री बाहर गई, उसने मित्रों से पूछा, आप कैसे आए हैं?
उन मित्रों ने कहा, आए नहीं, लाए गए हैं, निमंत्रित हैं। आपके पति भोजन का निमंत्रण देकर ले आए हैं।
उसने कहा, मेरे पति? वे तो दिन भर से आज घर में नहीं हैं, उनका कोई पता नहीं हैं।
मित्र हंसने लगे, उन्होंने कहा, खूब मजाक हो गई यह तो। वे ही हमें लिवा कर लाए हैं, ऐसा कैसा हो सकता है कि वे घर पर न हों। वे भीतर मौजूद हैं। मित्र विवाद करने लगे। और आखिर में उनकी पत्नी से बोले कि आप हट जाओ, हम भीतर जाकर देख लेते हैं अगर नहीं है तो।
नसरुद्दीन को भी क्रोध आ गया। वह बाहर निकल कर आ गया और उसने कहा, क्यों विवाद किए चले जा रहे हो। यह भी तो हो सकता कि नसरुद्दीन आपके साथ आए हों फिर पीछे के दरवाजे से निकल गए हों।
नसरुद्दीन खुद ही आकर यह कहने लगे कि यह भी तो हो सकता कि नसरुद्दीन आपके साथ आए हों फिर पीछे के दरवाजे से निकल गए हों।
मित्रों ने कहा, पागल हो गए हो! क्रोध में तुम्हें समझ नहीं आ रहा। तुम खुद ही यह कह रहे हो कि मैं नहीं हूं। यह कैसे हो सकता है। यह तो तुम्हारे होने का प्रमाण हो गया।
एक जगह है केवल जहां संदेह खंडित हो जाते हैं, गिर जाते हैं, वह है स्वयं का अस्तित्व, वह है स्वयं की आत्मा। लेकिन हम संदेह करते ही नहीं, तो इस बिंदु तक हम कभी पहुंच ही नहीं पाते। संदेह की यात्रा किए बिना कोई सत्य की मंजिल पर न कभी पहुंचा है न पहुंच सकता है। हम तो विश्वास कर लेते हैं। इसलिए निःसंदिग्ध सत्य का कभी कोई अनुभव नहीं हो पाता। और जब हमें कोई ऐसा सत्य ही न मिलता हो, जो निःसंदिग्ध है, जो इनडूबिटेबल, जिस पर शक नहीं किया जा सकता, तो हम सत्य की खोज भी कैसे करें। जब कोई स्वयं की चेतना के पास आकर यह अनुभव करता है कि नहीं, इस पर संदेह असंभव है, तब, तब इसकी खोज में और गहरे उतर सकता है।
इसलिए मैंने कहा, घबड़ाएं न विश्वास को छोड़ने से। विश्वास को पकड़ने के कारण ही आप सत्य को नहीं पकड़ पा रहे हैं। जिन हाथों में विश्वास की राख है उन हाथों में कभी सत्य का अंगार नहीं हो सकता है। सत्य को जो छोड़ता है, सत्य को जो छोड़े हुए है, वही सब्स्टीटयूट की तरह, पूरक की तरह विश्वास को पकड़े हुए है। और जब तक इस विश्वास के पूरक को पकड़े रहेगा, तब तक सत्य की आकांक्षा और प्यास भी पैदा नहीं होती।
इसलिए जीवन की खोज में विश्वासों की राख को झड़ा देना स्वयं से, अदभुत, अदभुत अर्थ, बहुत महत्वपूर्ण अर्थ रखता है। लेकिन हमें यह समझाया जाता रहा है कि विश्वास के कारण ही हम जीवन में कहीं पहुंच सकते हैं।
झूठी है यह बात, सत-प्रतिशत झूठी है। आज तक जो भी व्यक्ति कहीं पहुंचे हैं, उनमें से कोई भी विश्वास के कारण नहीं पहुंचा है। जो भी पहुंचे हैं वे खोज के कारण पहुंचे हैं। और खोज कौन करता है? खोज वही करता है जो संदेह करता है। जो संदेह ही नहीं करता, वह खोज कैसे करेगा? न तो आस्तिक खोज करते हैं और न नास्तिक। आस्तिक मान लेते हैं बिना जाने कि ईश्वर है, नास्तिक मान लेते हैं बिना जाने कि ईश्वर नहीं है। ये दोनों विश्वास हैं। ये दोनों ही रुक जाते हैं।
धार्मिक आदमी तीसरे तरह का आदमी है। धार्मिक आदमी न तो आस्तिक होता, न नास्तिक होता। धार्मिक आदमी तो यह कहता है कि मुझे पता नहीं है मैं कैसे मान लूं? मैं अज्ञान में हूं, मैं नहीं जानता हूं। मैं खोजूंगा और अगर किसी दिन कोई सत्य मिला, तो फिर तो मान ही लूंगा। मिलने पर मानने का कोई सवाल ही नहीं रह जाता। लेकिन जब तक नहीं मिला है तब तक मैं कैसे मान लूं? अगर मैं मानता हूं तो क्या यह मान्यता असत्य की स्वीकृति नहीं है? और ऐसे असत्य पर खड़ा हुआ जीवन धार्मिक हो सकता है?
दुनिया में सभी लोग तो धार्मिक मालूम पड़ते हैं। निश्चित ही उनके जीवन का आधार कहीं कुछ असत्य होगा। अन्यथा दुनिया कभी की स्वर्ग बन गई होती। कोई मंदिर में मानता, कोई मस्जिद में, कोई बाइबिल में, कोई कुरान में, कोई गीता में, कोई महावीर में, कोई बुद्ध में, सभी तो मानते हैं। इतनी मान्यता के बावजूद भी पृथ्वी नरक बनी हुई है। इतनी मान्यता और विश्वासों के बाद भी जीवन में कौनसे आनंद की ध्वनि उत्पन्न हो हुई! कौनसे सुगंध के फूल लग गए! हजारों साल से विश्वास में दीक्षित मनुष्य को खूब भटकाया गया। इसलिए मत कहें यह कि विश्वास न होता तो हम भटक जाएंगे। विश्वास के कारण ही आप भटक गए हैं। विश्वास न होगा तो पहुंच सकते हैं, भटकाव समाप्त हो सकता है। क्योंकि जिसके चित्त पर विश्वास नहीं होता…विश्वास के न होने का मतलब नास्तिक हो जाना नहीं है, नास्तिक का भी अपना विश्वास होता है–ईश्वर नहीं है, आत्मा नहीं है, बिना जाने इन बातों को वह पकड़े हुए रहता है। आस्तिक का भी विश्वास होता है, नास्तिक का भी। धार्मिक व्यक्ति का, खोज करने वाले व्यक्ति का, जिसके जीवन में इंक्वायरी है सत्य की उसका कोई विश्वास नहीं होता, उसके अनुभव होते हैं। और जब अनुभव आ जाता है तो ज्ञान उत्पन्न होता है। ज्ञान विश्वास नहीं है। ज्ञान तो प्रत्यक्ष साक्षात है।
विवेकानंद खोज में थे सत्य की। रवींद्रनाथ के पिता थे, महर्षि देवेंद्रनाथ। विवेकानंद देवेंद्रनाथ के पास एक रात गए। देवेंद्रनाथ जब चांदनी रातें होती थीं तो एक नाव पर एक बजरे में ही नदी में निवास करते थे। विवेकानंद सर रात्रि को तैर कर आधी रात में बजरे पर पहुंचे, जाकर दरवाजा धकाया, अटका था द्वार खुल गया। देवेंद्रनाथ आंख बंद किए ध्यान करने को बैठे थे। विवेकानंद ने जाकर हिला दिया और कहा कि मैं एक प्रश्न पूछने आया हूं। ईश्वर को जानते हैं आप? अजीब आदमी मालूम पड़ा यह युवक, आधी रात में पानी से लथपथ नदी को पार करके चला आता है। धका कर किसी को जबरदस्ती उठा कर पूछता है, ईश्वर को जानते हैं आप? देवेंद्रनाथ झिझक गए एक क्षण को, और कहा, बैठो, फिर मैं बताऊं। विवेकानंद ने कहा, आपकी झिझक ने सब कुछ कह दिया। वे नदी वापस कूद गए और चले गए।
यही विवेकानंद कुछ दिनों के बाद रामकृष्ण के पास पहुंचे। रामकृष्ण से भी जाकर यही पूछा, ईश्वर को जानते हैं आप? रामकृष्ण ने नहीं कहा कि ठहरो समझाता हूं। रामकृष्ण ने कहा, तुझे जानना है तो बोल? तू जानना चाहता है तो बोल? मैं जानता हूं या नहीं जानता इसे पूछने से क्या फायदा? तुझे जानना है तो बोल?
विवेकानंद बाद में कहते, देवेंद्रनाथ की श्रद्धा थी कि ईश्वर है, रामकृष्ण का अनुभव था। श्रद्धा झिझक गई, क्योंकि पीछे संदेह था, कहूं, कैसे कहूं कि मैं जानता हूं? मानता हूं, सिद्ध कर सकता हूं, प्रमाण दे सकता हूं, शास्त्र के उल्लेख दे सकता हूं, उपनिषद, गीता से समर्थन दे सकता हूं, लेकिन जानता हूं? हजार प्रमाण भी, हजार अनुमान भी, हजार तर्क भी एक छोटे से अनुभव को भी पूरा कर सकते हैं? हजार शास्त्र भी एक छोटे से अनुभव के बराबर तोले जा सकते हैं? एक कण भर अनुभव हजारों शास्त्र से ज्यादा मूल्यवान है। धर्म है अनुभव, विश्वास नहीं। और पृथ्वी धार्मिक नहीं हो सकी, क्योंकि हमने भूल से धर्म का संबंध विश्वास से जोड़ दिया है। और जब तक यह संबंध जुड़ा हुआ है पृथ्वी धार्मिक नहीं हो सकेगी।
आप देखते हैं, रोज धर्म हारता जा रहा है, रोज। रोज विज्ञान बढ़ता जा रहा है धर्म हारता जा रहा है। क्या आपको पता है कि विज्ञान की ताकत क्या है? विज्ञान की ताकत है संदेह। और धर्म की कमजोरी क्या है? धर्म की कमजोरी है विश्वास। विज्ञान कर रहा है संदेह। संदेह के माध्यम से कर रहा है खोज। खोज से उपलब्ध हो रहा है किन्हीं निःसंदिग्ध तत्वों को। और धर्म? धर्म कर रहा है आंख बंद करके विश्वास। विश्वास से खोज हो जाती बंद, उपलब्धि नहीं होती कुछ भी, सिर्फ बैठे रह जाते हैं लोग। धर्म हार रहा है विज्ञान के समक्ष। इसे ऐसा भी कह सकते हैं विश्वास हार रहा है संदेह के समक्ष। और जब तक धर्म भी संदेह कि शक्ति को नहीं उपलब्ध होगा, तब तक विज्ञान के समक्ष धर्म के जीतने की कोई संभावना नहीं है। अगर चाहते हैं कि कभी धर्म जीत जाए इस बड़े संघर्ष में, अगर चाहते हैं कि कभी धर्म लोगों के जीवन में प्रतिष्ठित हो जाए, तो समझ लें ठीक से इस बात को कि संदेह के बिना, खोज के बिना, अनुभव के बिना धर्म कभी भी प्रतिष्ठित नहीं हो सकेगा। लेकिन हम धर्म को प्रतिष्ठित करने के खयाल से विश्वास की शिक्षाओं को और जोर से चिल्लाने लगते हैं कि विश्वास करो, विश्वास करो। और हमें पता नहीं कि यही शिक्षा धर्म को डूबा रही है। जिसको आप समझ रहे हैं धर्म का आधार, वही धर्म की बीमारी है, आधार नहीं।
सोचें, आने वाली पीढ़ियों को और बच्चों को आप विश्वास नहीं करवा पा रहे हैं। इसलिए आप बच्चों को गाली दे रहे हैं कि अविश्वासी पैदा हो गए हैं, और ये धर्म को डूबा देंगे। गलती है आपकी। आपकी पीढ़ियों ने पहली दफे ठीक से संदेह पैदा करना शुरू किया है। गलती नई पीढ़ी की नहीं है जो संदेह कर रही है, गलती आपकी है कि आप उनके संदेह को धार्मिक नहीं बना पा रहे हैं। आप तो संदेह के दुश्मन हैं। तो आप संदेह को धार्मिक बना ही नहीं सकेंगे कभी। और अगर आप संदेह को धार्मिक नहीं बना सकते, तो इसको भविष्यवाणी समझ ले सकते हैं कि धर्म के सूरज का अस्त हो चुका है, अब यह धर्म जिंदा नहीं रह सकेगा। अगर आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी में धर्म को देखना है आपको, तो ठीक से समझ लें, विश्वास के द्वारा उन पीढ़ियों को नहीं समझाया जा सकता। विश्वास से केवल उनको समझाया जा सकता था जो अशिक्षित थे, बुद्धिहीन थे, जिनके जीवन में तर्क और विचार नहीं था। आने वाली पीढ़ियां विचार और तर्क में प्रतिष्ठित हो रही हैं, विज्ञान में दीक्षित हो रही हैं, विज्ञान से परिचित हो रही हैं। वे संदेह के बल को समझ रही हैं। वे विश्वास की कमजोरी के लिए राजी नहीं हो सकतीं। आप जिम्मेवार हैं अगर नये बच्चे अधार्मिक हो जाएंगे, तो यह पाप आप पर होगा, नये बच्चों पर नहीं। यह बहुत सीधी और साफ बात है।
संदेह पर खड़ा होना चाहिए धर्म। तब धर्म स्वस्थ होता है। तब धर्म एक जबरदस्ती नहीं होता। तब हम उसे किसी के ऊपर थोप नहीं देते हैं, बल्कि हम उस व्यक्ति को सहारा देते हैं–उसका संदेह, उसका विचार विकसित हो और एक दिन उस जगह पहुंच जाए जहां सब संदेह निर्सन हो जाते हैं, सब संदेह गिर जाते हैं। फिर जो अनुभव होता है वही धार्मिक है।
इसलिए मैंने सुबह आपसे कहा, विश्वास जहर है। और विश्वास के जहर में ही धर्म बेहोश है। उससे धर्म को मुक्त हो जाना चाहिए और मनुष्य को भी। यह मनुष्य की मुक्ति की दिशा में पहला प्रयत्न, पहला सूत्र, पहली सीढ़ी।
— ओशो [अंतर की खोज-प्रवचन-10]