इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले समझ लो। समाधि का जो उल्टा होता है व्याधि। व्याधि क्या है? व्याधि यानि बीमारी। हमारी बीमारी है – शरीर और मन के साथ हमारा तादात्म। आइडेन्टिफिकेशन विद् द बॉडी एंड माइंड। यह हमारी स्प्रीचुअल डिसीज है। एक ही बीमारी है अध्यात्म के इस रास्ते पर, कि हम अपनी आत्मा को भूल गए और शरीर को और मन को स्वयं का होना समझ रहे हैं। यह है हमारी व्याधि। अगर इसको आपने समझ लिया तो समाधि को समझना बड़ा आसान है। इस व्याधि से जो मुक्त हुए, तन और मन से तादात्म टूटा और चेतन में स्थित हुए, उसका नाम है समाधि। तन और मन से हमारा जो तादात्म है, इसमें थोड़ा सा भेद है। स्त्री-पुरुषों में थोड़ा-सा फर्क, उसको भी थोड़ा समझ लें। पुरूषों का तादात्म मन से ज्यादा होता है। विचारों से। इसलिए पुरूषों में ज्यादा बु(जीवी होते हैं। प्रोफेसर बनते हैं। वैज्ञानिक बनते हैं। कवि, लेखक बनते हैं। सम्पादक और पत्राकार बनते हैं। महिलाओं को ये सब चीजें पसन्द नहीं आतीं। उनका तादात्म शरीर से ज्यादा है। पुरुषों का तादात्म मन से ज्यादा है।
सुबह से पतिदेव उठकर अपना अखबार फैलाकर बैठ जाते हैं। पत्नियों को समझ नहीं आता है कि इनको क्या हो गया है। क्या ढूँढ रहे हैं ये अखबार में। स्त्रियों को कोई उत्सुकता नहीं है। मैं अक्सर देखता हूँ घरों में पति-पत्नी में झगड़ा होता है। पत्नी सास-बहू का चैनल लगा रही है। घर-घर की कहानी और पति कह रहे हैं न्यूज आ रही है न्यूज सुनेंगे। स्त्रियों को कोई इंटरैस्ट नहीं है कि क्या हो रहा है दुनिया में। भाड़ में जाए दुनिया। घर-घर की कहानी देखना है उनको। यद्यपि उनके घर में भी हो रही है। देखने की जरूरत नहीं। स्त्रियों का रस अलग है। उनको यह देखना है कि हीरोइन ने कौन-सी साड़ी पहनी है। बालों की कौन सी फैशन चल रही है। नए प्रकार के बाल कैसे कटिंग करें। उनको वह देखना है सीरियल में। कहानी-वहानी नहीं सुननी है। उनकी नजर कपड़ों पे, आभूषण पे, बालों के डिजाइन पे लगी हुई है। मेरे पास कई बार फोन आते हैं आस्था चैनल पर शाम को 7.00 बजे प्रोग्राम आता है। अक्सर मेरे पास 7. 30 बजे एक-दो फोन जरूर आते हैं। अगर किसी पुरूष का फोन आता है तो वह कहता है कि स्वामी जी आज आपने जो समझाया, जो फिफलास्फी समझाई बहुत अच्छी लगी। बड़े अच्छे विचार थे। महिलाओं का जब फोन आता है तो वह कहती हैं स्वामी जी आज आपके गाउन और टोपी की मैंचिग बहुत ही अच्छी थी। मैं कहता हूँ आज मैं किस विषय पर बोला? वे कहती हैं वह तो नहीं पता। उनको विषय से कुछ लेना देना नहीं। अगर टोपी की डिजाइन अच्छी है तो अच्छा है, प्रोग्राम अच्छा है। अगर टोपी का डिजाइन बेकार है तो बेकार है। विचारों में क्या रखा है?स्त्रियों को विचारों से कुछ लेना देना नहीं।
अधिकांश महिलाएं जो स्कूल कालेज में पढ़ती भी हैं। सिर्फ इसलिए कि पढ़ी-लिखी स्त्री को एक पढ़ा-लिखा कमाऊ पति मिल जाएगा। उनको पढ़ने लिखने से कुछ मतलब नहीं है। इसलिए अक्सर ऐसा मैंने देखा है कि कोई लड़की बी. ए. सैकिण्ड इअर में ही है और उसकी सगाई हो गई। बस किताबें बन्द। अब कागज कलम में हाथ नहीं लगने वाला। उसकी महीने भर में शादी होने वाली है। अब वह न बी. ए. सैकिण्ड इअर की परीक्षा देगी और न ही वह बी. ए. फाइनल इअर में जाएंगी। छुट्टी पढ़ाई की। क्योंकि बी. ए. तो इसलिए कर रहे थे कि पति मिल जाए। पति ऐसे ही मिल गया। अब क्या करना है। पढ़ाई का अब क्या करना। विचार में कोई उत्सुकता नहीं है। अधिकांश महिलाएं स्कूल कालेज से जिस दिन छोड़ कर आती हैं। उसके बाद कभी किसी किताब में हाथ नहीं लगातीं। अब जो पढ़ती हैं वे फिल्मी पत्रिकाएं, गृह शोभा वगैरहा…। उसका ज्ञान से कुछ लेना देना नहीं होता।
पुरूषों का तादात्म मन से है। स्त्रियों का तादात्म तन से है। इस फर्क को थोड़ा सा समझना। किसी पुरुष को अगर कह दो कि तुम्हारे विचार गलत हैं, तो वह लड़ने को तैयार हो जाएगा। किसी महिला से कहो कि विचार गलत है। उसको कोई फर्क नहीं पड़ता। होंगें गलत। महिला को कब बुरा लगेगा जब तुम कहो कि तुम बदसूरत हो। आग बबूला हो जाएगी कि मुझे बदसूरत कहा। किसी पुरुष को कहो कि तुम्हारी शक्ल अच्छी नहीं है, उसको बुरा नहीं लगता। वह कहेगा कि क्या करें पिता जी की भी ऐसी ही शक्ल थी। कुछ खास बात नहीं! हमारे पिता जी भी गंजे थे, हमारे बड़े भाई भी गंजे थे, हम भी गंजे हैं। सो वॉट। कुछ फर्क नहीं पड़ता। स्त्री के लिए बड़ा फर्क पड़ जाएगा।
मैंने सुना है चार लफंगे लड़के एक ब्यूटी पार्लर के सामने खड़े थे। एक पुलिस हवलदार वहाँ से निकला और उसने कहा कि तुम लोग यहाँ क्या बदमाशी कर रहे हो हटो। उन्होंने कहा कि कैसे हटें हमारी नौकरी है। हम सर्विस कर रहे हैं। पुलिस वाले ने कहा कैसी सर्विस हम तो तुमको दिन भर यहीं खड़ा देखते हैं। उन्होंने कहा हमारी नौकरी है, हमको इसी की तन्ख्वाह मिलती है। तो पुलिस वाले ने पूछा तुम्हारी नौकरी है क्या? ब्यूटी पार्लर वालों ने हमको रखा है। जब महिलाएँ यहाँ आएं ब्यूटीपार्लर की तरफ हम उनकी तरफ देखते भी नहीं। हम बिल्कुल उपेक्षा इनडिफरैन्ट। जैसे कि वे हैं ही नहीं। जब वे भीतर से साज सज्जा करवा कर बाहर निकलती हैं तब हम उनको देखकर एकदम से सीटी बजाते हैं और फिल्मी गीत गाते हैं। यही हमारी ड्यूटी है। हमको इसी की तन्ख्वाह मिलती है।
महिलाओं का तादात्म शरीर से ज्यादा है, विचारों से नहीं है। पुरुषों का तादात्म विचारों से ज्यादा है, शरीर से नहीं है। जब मैं कम और ज्यादा कह रहा हूँ तो ऐसा समझना साठ प्रतिशत, चालीस प्रतिशत। है तो दोनों का ही दोनां से। गृह सज्जा में थोड़ा-सा फर्क है। यह है हमारी मूल आध्यात्मिक भ्रंति। हम हैं चैतन्य स्वरूप। आत्मा को तो हम भूल ही गए और हम समझने लगे कि मैं शरीर हूँ, मन हूँ। अब इसके कन्ट्रास्ट में आप समझें। यह है व्याधि। तो समाधि क्या होगी?इसका ठीक उल्टा। नेति-नेति। नाइदर दिस नॉर दैट। न तो मैं देह हूँ, न ही मैं मन के विचार हूँ। मैं इन दोनों को जानने वाला साक्षी चैतन्य हूँ। उसे जानना ध्यान है, उसे जानना समाधि है। – स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती
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इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले समझ लो। समाधि का जो उल्टा होता है व्याधि। व्याधि क्या है? व्याधि यानि बीमारी। हमारी बीमारी है – शरीर और मन के साथ हमारा तादात्म। आइडेन्टिफिकेशन विद् द बॉडी एंड माइंड। यह हमारी स्प्रीचुअल डिसीज है। एक ही बीमारी है अध्यात्म के इस रास्ते पर, कि हम अपनी आत्मा को भूल गए और शरीर को और मन को स्वयं का होना समझ रहे हैं। यह है हमारी व्याधि। अगर इसको आपने समझ लिया तो समाधि को समझना बड़ा आसान है। इस व्याधि से जो मुक्त हुए, तन और मन से तादात्म टूटा और चेतन में स्थित हुए, उसका नाम है समाधि। तन और मन से हमारा जो तादात्म है, इसमें थोड़ा सा भेद है। स्त्री-पुरुषों में थोड़ा-सा फर्क, उसको भी थोड़ा समझ लें। पुरूषों का तादात्म मन से ज्यादा होता है। विचारों से। इसलिए पुरूषों में ज्यादा बु(जीवी होते हैं। प्रोफेसर बनते हैं। वैज्ञानिक बनते हैं। कवि, लेखक बनते हैं। सम्पादक और पत्राकार बनते हैं। महिलाओं को ये सब चीजें पसन्द नहीं आतीं। उनका तादात्म शरीर से ज्यादा है। पुरुषों का तादात्म मन से ज्यादा है।
सुबह से पतिदेव उठकर अपना अखबार फैलाकर बैठ जाते हैं। पत्नियों को समझ नहीं आता है कि इनको क्या हो गया है। क्या ढूँढ रहे हैं ये अखबार में। स्त्रियों को कोई उत्सुकता नहीं है। मैं अक्सर देखता हूँ घरों में पति-पत्नी में झगड़ा होता है। पत्नी सास-बहू का चैनल लगा रही है। घर-घर की कहानी और पति कह रहे हैं न्यूज आ रही है न्यूज सुनेंगे। स्त्रियों को कोई इंटरैस्ट नहीं है कि क्या हो रहा है दुनिया में। भाड़ में जाए दुनिया। घर-घर की कहानी देखना है उनको। यद्यपि उनके घर में भी हो रही है। देखने की जरूरत नहीं। स्त्रियों का रस अलग है। उनको यह देखना है कि हीरोइन ने कौन-सी साड़ी पहनी है। बालों की कौन सी फैशन चल रही है। नए प्रकार के बाल कैसे कटिंग करें। उनको वह देखना है सीरियल में। कहानी-वहानी नहीं सुननी है। उनकी नजर कपड़ों पे, आभूषण पे, बालों के डिजाइन पे लगी हुई है। मेरे पास कई बार फोन आते हैं आस्था चैनल पर शाम को 7.00 बजे प्रोग्राम आता है। अक्सर मेरे पास 7. 30 बजे एक-दो फोन जरूर आते हैं। अगर किसी पुरूष का फोन आता है तो वह कहता है कि स्वामी जी आज आपने जो समझाया, जो फिफलास्फी समझाई बहुत अच्छी लगी। बड़े अच्छे विचार थे। महिलाओं का जब फोन आता है तो वह कहती हैं स्वामी जी आज आपके गाउन और टोपी की मैंचिग बहुत ही अच्छी थी। मैं कहता हूँ आज मैं किस विषय पर बोला? वे कहती हैं वह तो नहीं पता। उनको विषय से कुछ लेना देना नहीं। अगर टोपी की डिजाइन अच्छी है तो अच्छा है, प्रोग्राम अच्छा है। अगर टोपी का डिजाइन बेकार है तो बेकार है। विचारों में क्या रखा है?स्त्रियों को विचारों से कुछ लेना देना नहीं।
अधिकांश महिलाएं जो स्कूल कालेज में पढ़ती भी हैं। सिर्फ इसलिए कि पढ़ी-लिखी स्त्री को एक पढ़ा-लिखा कमाऊ पति मिल जाएगा। उनको पढ़ने लिखने से कुछ मतलब नहीं है। इसलिए अक्सर ऐसा मैंने देखा है कि कोई लड़की बी. ए. सैकिण्ड इअर में ही है और उसकी सगाई हो गई। बस किताबें बन्द। अब कागज कलम में हाथ नहीं लगने वाला। उसकी महीने भर में शादी होने वाली है। अब वह न बी. ए. सैकिण्ड इअर की परीक्षा देगी और न ही वह बी. ए. फाइनल इअर में जाएंगी। छुट्टी पढ़ाई की। क्योंकि बी. ए. तो इसलिए कर रहे थे कि पति मिल जाए। पति ऐसे ही मिल गया। अब क्या करना है। पढ़ाई का अब क्या करना। विचार में कोई उत्सुकता नहीं है। अधिकांश महिलाएं स्कूल कालेज से जिस दिन छोड़ कर आती हैं। उसके बाद कभी किसी किताब में हाथ नहीं लगातीं। अब जो पढ़ती हैं वे फिल्मी पत्रिकाएं, गृह शोभा वगैरहा…। उसका ज्ञान से कुछ लेना देना नहीं होता।
पुरूषों का तादात्म मन से है। स्त्रियों का तादात्म तन से है। इस फर्क को थोड़ा सा समझना। किसी पुरुष को अगर कह दो कि तुम्हारे विचार गलत हैं, तो वह लड़ने को तैयार हो जाएगा। किसी महिला से कहो कि विचार गलत है। उसको कोई फर्क नहीं पड़ता। होंगें गलत। महिला को कब बुरा लगेगा जब तुम कहो कि तुम बदसूरत हो। आग बबूला हो जाएगी कि मुझे बदसूरत कहा। किसी पुरुष को कहो कि तुम्हारी शक्ल अच्छी नहीं है, उसको बुरा नहीं लगता। वह कहेगा कि क्या करें पिता जी की भी ऐसी ही शक्ल थी। कुछ खास बात नहीं! हमारे पिता जी भी गंजे थे, हमारे बड़े भाई भी गंजे थे, हम भी गंजे हैं। सो वॉट। कुछ फर्क नहीं पड़ता। स्त्री के लिए बड़ा फर्क पड़ जाएगा।
मैंने सुना है चार लफंगे लड़के एक ब्यूटी पार्लर के सामने खड़े थे। एक पुलिस हवलदार वहाँ से निकला और उसने कहा कि तुम लोग यहाँ क्या बदमाशी कर रहे हो हटो। उन्होंने कहा कि कैसे हटें हमारी नौकरी है। हम सर्विस कर रहे हैं। पुलिस वाले ने कहा कैसी सर्विस हम तो तुमको दिन भर यहीं खड़ा देखते हैं। उन्होंने कहा हमारी नौकरी है, हमको इसी की तन्ख्वाह मिलती है। तो पुलिस वाले ने पूछा तुम्हारी नौकरी है क्या? ब्यूटी पार्लर वालों ने हमको रखा है। जब महिलाएँ यहाँ आएं ब्यूटीपार्लर की तरफ हम उनकी तरफ देखते भी नहीं। हम बिल्कुल उपेक्षा इनडिफरैन्ट। जैसे कि वे हैं ही नहीं। जब वे भीतर से साज सज्जा करवा कर बाहर निकलती हैं तब हम उनको देखकर एकदम से सीटी बजाते हैं और फिल्मी गीत गाते हैं। यही हमारी ड्यूटी है। हमको इसी की तन्ख्वाह मिलती है।
महिलाओं का तादात्म शरीर से ज्यादा है, विचारों से नहीं है। पुरुषों का तादात्म विचारों से ज्यादा है, शरीर से नहीं है। जब मैं कम और ज्यादा कह रहा हूँ तो ऐसा समझना साठ प्रतिशत, चालीस प्रतिशत। है तो दोनों का ही दोनां से। गृह सज्जा में थोड़ा-सा फर्क है। यह है हमारी मूल आध्यात्मिक भ्रंति। हम हैं चैतन्य स्वरूप। आत्मा को तो हम भूल ही गए और हम समझने लगे कि मैं शरीर हूँ, मन हूँ। अब इसके कन्ट्रास्ट में आप समझें। यह है व्याधि। तो समाधि क्या होगी?इसका ठीक उल्टा। नेति-नेति। नाइदर दिस नॉर दैट। न तो मैं देह हूँ, न ही मैं मन के विचार हूँ। मैं इन दोनों को जानने वाला साक्षी चैतन्य हूँ। उसे जानना ध्यान है, उसे जानना समाधि है।
– स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती