सम्यक संकल्प को कैसे पहचाने?
Question
प्रश्न – कोई संकल्प सम्यक है या नहीं यह कैसे पहचाने?
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प्रश्न – कोई संकल्प सम्यक है या नहीं यह कैसे पहचाने?
Answer ( 1 )
बीज रूप में तो पहचानना थोड़ा कठिन है कि यह सम्यक है कि नहीं, फल रूप में पहचानना आसान है। मैं दोनों उपाय कहूँगा। फलरूप में पहचानना तो बहुत सरल है। यदि आप पाते हैं कि आपको संतोष मिला, शांति मिली, आनन्द मिला, आपके भीतर विकास हुआ, फैलाव हुआ, आपकी संकल्प शक्ति और प्रगाढ़ मजबूत हुई, आप एक प्रकार की स्वतन्त्रता महसूस कर रहे हैं, मुक्ति और प्रीति महसूस कर रहे हैं, बढ़ोतरी और विकास हुआ है हृदय का, समझ का, संकल्प का, तृप्ति का, तो आप जानें कि आपका संकल्प सम्यक था। यदि इसके विपरीत हुआ तो भली भांति जानें कि आपका संकल्प असम्यक था। तो ये तो हुए फल, परिणाम आने पर पता चलेगा। बीज रूप में कैसे पहचानें? जब हम शुरू कर रहे हैं, उस समय हमारे पास कौन सा क्राइटिरिया है जिससे हम जांच सकें कि हमारा संकल्प सम्यक है कि नहीं? बीज रूप में आप कुछ कसौटियों पर कसें।
पहला, मैं कहना चाहूगा सत्यम् शिवम् सुन्दरम्। पहले आप टटोल कर देखें कि जो आप करने जा रहे हैं क्या वह प्रमाणिक है? सत्य से सम्बन्धित है? सच्चाई है उसके भीतर? आप वास्तविकता के धरातल पर खड़े हैं या नहीं? कही आसमान के तारे तो तोड़ने नहीं चले?
दूसरा शिवम्- क्या वह शुभ संकल्प है? क्या आप बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय कुछ करने जा रहे हैं? इससे हित होगा कि अहित होगा? यदि अहित होगा- ऐसा आपको लगता है तो बीज रूप में ही आप पहचान सकते हैं कि यह संकल्प असम्यक है। याद रखना एक अच्छा संकल्प लेकर असफल हो जाना भी ज्यादा अच्छा है, बजाए इसके कि हम अशुभ संकल्प लेकर सफल हो जाएं। फिर से दोहरा दूं- एक शुभ संकल्प लेकर असफल हो जाना बजाए अशुभ संकल्प लेकर सफल हो जाने के। तुमने बुद्ध या महावीर जैसे होने का प्रयास किया और उस प्रयास में अगर तुम असफल भी हो गये तो यह भी ज्यादा अच्छी स्थिति है बजाए इसके कि तुमने हिटलर या मुसोलनी होना तय किया और उसमें सफल हो गये। तो संकल्प शुभ है कि नहीं इसे तो बीज रूप में तुम अपने भीतर पहचान सकते हो कि तुम्हारा इरादा क्या है।
तीसरी बात, जो तुम करने जा रहे हो क्या यह एथेंटिक है? क्या यह एक सुन्दर बात होगी? तुम कल्पना कर सकते हो कि जो तुम करने जा रहे हो अगर इसके परिणाम आयेंगे तो क्या इसको तुम सुन्दर बात मानोगे कि नहीं मानोगे? और तुम कल्पना करके ही जान सकते हो कि वस्तुतः यह काम करने जैसा भी है या नहीं है?
अगली कसौटी मैं कहना चाहूँगा- स्वांताय सुखाय- अपने सुख के लिए तुम करो, लेकिन बस इतना याद रखना कि इससे किसी और को दुख न मिले। तुम अपने आनन्द से जीना, तुम ऐसे निर्णय लेना जिसमें तुम्हारे जीवन का रस बहता हो, बस इतना ही ख्याल रखना कि किसी और को इससे कष्ट न मिलता हो। ये छोटी-छोटी सी कसौटियां हैं। तुम बीज रूप में ही देख पाओगे कि अगर इससे किसी को कष्ट मिलता है, अंततः यह बात तुमको भी कष्ट देने वाली सिद्ध होगी क्योंकि बहुत गहरे तल पर हम दूसरों से जुड़े हुए हैं। जो तुम दूसरो को दे रहे हो वही तुम्हें मिल जाएगा। तुम कुछ ऐसा काम करने चले जिससे दूसरों को कष्ट मिले, आज नहीं कल, कल नहीं परसों ये सारे कष्ट लौटकर कई गुना होकर तुम्हीं को झेलने पडं़ेगे। तुम बीज रूप में ही उसको देख लो यह जो तुम करने जा रहे हो वह तुम्हारा आनन्द हो, वह तुम्हारा रस हो जरूर, बस इतना ख्याल रखना- किसी और को इससे तकलीफ न पहुंचती हो, तो यह सम्यक संकल्प होगा।
फिर देखना कि तुम्हारा संकल्प सृजनात्मक हो, कुछ विधायक हो, विध्वंसात्मक न हो, हिंसात्मक न हो, प्रेमपूर्ण हो, अहिंसात्मक हो। निगेटिव संकल्प से बचना। एक मित्र ने पूछा है कि मैं चार-पांच बार सिगरेट छोड़ने का व्रत ले चुका हूँ। जो भी मैं संकल्प लेता हूँ वह टूट जाता है। यह सिगरेट मुझसे छूटती नहीं। मैं कहना चाहूँगा ये सिगरेट छोड़ने का संकल्प एक नकारात्मक संकल्प है, निगेटिव संकल्प है। नकारात्मक संकल्प से बचना। कुछ पाने की कोशिश करो तो वह विधायक संकल्प होता हैं। जब तुम कुछ छोड़ने की कोशिश करते हो वह नकरात्मक संकल्प होता है। नकारात्मक संकल्प से हार जाना बड़ी हार होती है। एक छोटी सी सिगरेट से तुम हार गये इससे तुम्हारी आत्मा और भी विनष्ट होगी। अगर तुम जीत गये तब तो ठीक अगर तुम हार गये तब तुम बुरी तरह से हारोगे। फिर तुम आत्महीनता की ग्रंथी से भर जाओगे। अपनी ही नजरों में नीचे गिर जाओगे। यह तो अच्छा न हुआ। यह परिणाम तो पहले ही देखा जा सकता है, संकल्प लेने से पहले कि मैं सिगरेट छोड़ने की कोशिश कर रहा हूँ क्या सम्भावना है। दो सम्भावनाएं हैं- या तो मैं छोड़ पाऊंगा या नहीं छोड़ पाऊंगा। यदि छोड़ पाऊंगा तब तो ठीक, यदि नहीं छोड़ पाऊँगा तो मैं भीतर टूट जाऊँगा। अपनी ही नजर में मेरा आत्मसम्मान गिर जायेगा। तब ये करने जैसा नहीं। विधायक, कुछ पाने के लिये करो। उदाहरण के लिये आप समाधि पाने को चले, परमात्मा को पाने को चले। दो सम्भावनायें हैं- या तो आप पाने में सफल हो जायेंगे या नहीं हो पायेंगे। पाने में सफल हो गये तब तो कहना ही क्या? यदि असफल भी हो गये तो भी आपको संतोष रहेगा कि आपने सम्यक दिशा में, प्रभु की दिशा में कदम उठाये थे। न चलो मंजिल तक पहुंचे, कुछ कदम तो चले, थोड़ी तो यात्रा हुई। परमात्मा की दिशा में हार जाना भी शुभ है। वह तुम्हें तोड़ेगा नहीं तुम्हें और इन्टीग्रेटेड कर जायेगा। आज नहीं कल, इस जन्म में नहीं अगले जन्म में, तुम यह यात्रा पूरी कर ही पाओगे। शुरूआत तो हो गयी। तो शुभ की दिशा में, विधायक दिशा में उठाया गया कदम हमेशा तुम्हें और मजबूत कर जाता है, चाहे जीतो चाहे हारो। और अशुभ दिशा में, नकारात्मक दिशा में उठाया गया कदम कुछ देकर नहीं जाता। अगर सिगरेट छूट भी गयी तो कुछ विशेष तुम्हें मिलने वाला नहीं। और अगर नहीं छूटी तब आत्मसम्मान टूट जायेगा। तो बीज रूप में ही इस बात को पहचाना जा सकता है।
अगला बिंदु मैं कहना चाहूँगा कि बीज रूप में पहचानने के लिये कि संकल्प शुभ है या नहीं, क्या वह तुम्हारे चैतन्य से उपज रहा है? क्या तुम्हारा अचेतन मन अनकॅान्शस माइन्ड डिमान्ड कर रहा है? तुम्हारी अचेतन आदतें तुम्हें पुकार रही हैं और तुम्हें उकसा रही हैं कुछ करने के लिये? या तुम चैतन्य से भरकर, होश से भरकर, जागरूकता से भरकर संकल्प ले रहे हो? यदि तुम अपनी पुरानी आदतों के वश, तुम्हारे अचेतन मन के कहने से कुछ निर्णय कर रहे हो वह अशुभ की दिशा में जायेगा। यदि तुम्हारी चेतना से पुकार उठती है क्फुछ करने की, वह शुभ की दिशा में जायेगी, सम्यक दिशा में जायेगी।
अगला बिंदु पहचानने के लिये क्या तुम शांति की अवस्था में निर्णय कर रहे हो कि अशांत और उत्तेजित होकर निर्णय कर रहे हो? शांति से उपजे निर्णय सुखदायी होंगे। अशांति से उपजे निर्णय दुःखदायी होंगे।
और अंतिम बिंदु मैं कहना चाहूँगा- क्या तुम प्रफुल्लता से, आनन्द से, आंतरिक उत्साह से यह निर्णय कर रहे हो कि किसी मजबूरी में, दूसरों के कहने से या दूसरों कि प्रेरणा लेकर यह कर रहे हो? अपने भीतर तौल लेना। यदि तुम्हारे आनंद से, तुम्हारी प्रफुल्लता से, आंतरिक उमंग और उत्साह से संकल्प आ रहा है तो वह शुभ दिशा में जायेगा। वह एक सम्यक संकल्प होगा।
~ स्वामी शैलेंद्र सरस्वती