सोए लोगों को जगाने के लिए क्या करना चाहिए – शांति और क्षमा प्रकट करें, अहिंसक हो जाएं, या कुछ और?

Question

प्रश्न – यह पूछा है कि जो सोए लोग कर रहे हैं, अगर हम ठीक उनसे उलटा करने लगें, तब तो फिर ठीक हो जाएगा? जैसे सोए लोग क्रोध कर रहे हैं, तो हम शांति और क्षमा प्रकट करने लगें, सोए लोग हिंसा कर रहे हैं और वायलेंट हैं तो हम नॉन-वायलेंट हो जाएं, हम अहिंसक हो जाएं? सोए लोग हिंसा करते हैं, घृणा करते हैं, तो हम प्रेम करने लगें? हम उनसे उलटा चलने लगें!

Answer ( 1 )

  1. सारे संन्यासी और साधु और अच्छे लोग यही कर रहे हैं दुनिया में, वे उलटा चलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सोया हुआ सीधा चले तो खतरनाक, उलटा चले तो और भी खतरनाक हो जाता है, कम से कम सीधा चलता है तब भी ठीक है, उलटा चलता है तब और भी मुश्किल। क्योंकि पीठ पीछे हो जाती है, उलटा चलना और भी खतरनाक हो जाता है। पहली तो बात यह है कि जब हमारा क्रोध पर ही कोई वश नहीं है तो हम प्रेम कैसे कर सकेंगे? और करेंगेे तो वह प्रेम एकदम झूठा होगा, उस प्रेम में कोई प्राण न होंगे। उस प्रेम में कोई बल और शक्ति न होगी। और उस प्रेम के नीचे, भीतर घृणा बैठी ही रहेगी। क्योंकि वह घृणा कहां जाएगी, जिसको हमने दबा लिया? वह क्रोध कहां जाएगा, जिसको हमने पी लिया? वह सारा का सारा बुखार, वह सारी बीमारी, वह जहर जो हमारे भीतर था कहाँ जाएगा? वह भीतर बैठ जाएगा।
    कभी आप अहसास किए हैं ऐसे आदमी का प्रेम जिसने अपनी घृणा दबा ली हो? वह पहले तो प्रेम से आपकी तरफ हाथ बढ़ाएगा, थोड़ी देर में आप पाएंगे उसके हाथ आपके लिए पंजे हो गए, कसने वाले। जंजीरें हो गए। हम सारे लोग इस बात को भली-भांति जानते हैं। हम जिनकी तरफ प्रेम के हाथ बढ़ाते हैं, थोड़ी देर में हमारे हाथ जंजीरें हो जाते हैं, उनके लिए। उनके लिए प्रेम नहीं रह जाता, बल्कि कारागृह बन जाता है। जो भी आदमी…हम सब लोग जानते हैं, इसको अनुभव करते हैं रोज। जिसको हम प्रेम करते हैं, थोड़ी देर में हम पाते हैं कि उससे छुटकारा कैसे हो जाए? जिसको हम प्रेम करते हैं, वह हमसे चाहता है कि इससे छुटकारा कैसे हो जाए? हमारा सारा प्रेम बंधन बन जाता है, क्योंकि हमारे प्रेम के पीछे घृणा छिपी है। और प्रेम के पीछे से उसके सूत्र आने शुरू हो जाते हैं। जो लोग क्रोध को दबाकर क्षमा करना सीख जाते हैं, उनकी क्षमा भी एक अदभुत क्रोध का रूप ले लेती है। उनकी क्षमा में भी क्रोध मौजूद होता है। वह जाएगा कहां? अगर कोई आदमी बीमारी छुपा ले और कहने लगे कि मैं स्वस्थ हूं, तो उसके स्वास्थ्य में भी बीमारी मौजूद रहेगी, वह जाएगी कहां? कोई सप्रेशन, कोई दमन, कोई जबरदस्ती आदमी के जीवन में क्रांति नहीं लाती। इसलिए मैं नहीं कहता हूं कि आप उलटे चलना शुरू कर दें, मैं तो यह कहता हूं कि जागें, सोया हुआ आदमी पूरब जाए तो उतना ही गलत है, पश्चिम जाए तो उतना ही गलत है; सोया हुआ गृहस्थ अगर भूल में है, तो सोया हुआ संन्यासी भी भूल में है चाहे वह कितना ही उलटे चलने की कोशिश करे, जीवन का नियम, नींद का जो नियम है वह उसका पीछा नहीं छोड़ेगा।
    एक गांव में ऐसा हुआ, नदी पूर पर आई थी और एक संन्यासी का पैर फिसल गया,और वह नदी में गिर गया। नदी बड़े तेज पूर पर थी और उस गांव में केवल एक ही तैरने वाला था। जो उतने बड़ी, गहरी पूर पर आई हुई नदी में कूद सकता था। एक ही आदमी था, गांव में एक शेखचिल्ली था, जो हर काम जानता था। वह तैरना भी जानता था, तो गांव के लोग भागे गए और उस शेख चिल्ली को कहा कि जल्दी चलो, एक संन्यासी नदी में गिर पड़ा है, उसे बचाना जरूरी है और तुम्हारे अतिरिक्त सर्वज्ञ कोई भी नहीं है, गावं में तुम सब चीजें जानते हों। तैरना भी तुम्हीं जानते हो। वह शेखचिल्ली गया। उसने कपड़े उतारे और नदी में कूदा और ऊपर की तरफ उसने तैरना शुरू कर दिया। अप स्ट्रीम। तो गांव के लोग चिल्लाए, क्या पागलपन कर रहे हो, जो आदमी गिरा है, वह नीचे की तरफ बहा होगा, डाउन स्ट्रीम, और तुम ऊपर की तरफ तैर कर उसे खोजने जा रहे हो, उस शेखचिल्ली ने कहा तुमने मुझसे कहा था कि वह एक संन्यासी है, संन्यासी हमेशा उलटा चलता है, वह अपस्ट्रीम गया होगा। ऊ पर की तरफ गया होगा, नीचे की तरफ वह नहीं जा सकता। लेकिन गांव के लोगों ने कहा कि हे महात्मन! वह संन्यासी चाहे कितना ही ऊपर की तरफ जाने का आदी रहा हो, और उलटा चलने का, लेकिन नदी का अपना नियम है, वह नीचे ले गई होगी। आप कृपा करके ऊपर खोजना बंद करें। आप नीचे की तरफ खोज शुरू करें, लेकिन उस शेखचिल्ली ने बड़ी बढ़िया बात कही, उसने कहा कि मैं जानता हूं कि वह संन्यासी था उलटा चलने का आदी है, अगर नदी उसको बहा भी ले गई है, तो वह ऊ पर की तरफ गया होगा, नीचे वह नहीं जा सकता।
    लेकिन जिंदगी के नियम और नदी के नियम बदलते नहीं हैं। चाहे आप उलटे चलें, चाहे कहीं भी, जीवन की नदी आपको नीचे की तरफ ले जाएगी। वह जो सोया हुआ चित्त है वह कहीं भी कुछ भी करे, वह नीचे की तरफ जाएगा, सोया हुआ चित्त ऊपर की तरफ जा ही नहीं सकता है। नींद का नियम है। तो चाहे आप क्रोध करें और चाहे आप क्षमा दिखलाएं, आपका क्रोध भी आपको नीचे ले जाएगा और आपकी क्षमा भी, क्योंकि आपकी क्षमा झूठी होगी, उसके नीचे क्रोध छिपा होगा। आपका प्रेम झूठा होगा, उसके पीछे घृणा बैठी होगी। तभी तो जरा-जरा सी बात में प्रेम घृणा में बदल जाता है, जिनको हम मित्र कहते हैं, वे शत्रु हो जाते हैं जरा सी बात पर, अगर उनके भीतर घृणा न छिपी होती, इतनी जल्दी परिवर्तन हो सकता है?
    मैं अभी आपसे कहता हूं कि मैं आपके लिए जान दे दूंगा, और आप दो गालियां मुझे दे दें और मैं आपकी जान लेने को तैयार हो जाऊंगा। बड़ी हैरानी की बात है। यह जो आदमी कहता था मैं आपके लिए जान दे दूंगा, और ये जान लेने के लिए तैयार हो गया, एक सेकेंड में। इसके प्रेम के पीछे घृणा मौजूद थी। ऊपर प्रेम था, पीछे घृणा थी; आपने दो गालियां दीं, ऊपर का प्रेम फट गया, भीतर की घृणा ऊपर आ गई। आप थोड़ी देर बिलकुल शांत मालूम पड़ते हैं, और जरा सा कोई आपको चुभा दे और आप क्रोध में आ जाते हैं। तो आप सोचते हैं वह शांति थी? वह शांति बहुत पतली थी, स्किन-डीप जिसको कहते हैं, चमड़ी से भी कम पतली रही होगी। भीतर-भीतर अशांति बैठी थी, जरा ही मौका आया बाहर निकल आई। जो दबाएगा, दमन करेगा, उलटा चलने की कोशिश करेगा; वह कहीं पहुंचेगा नहीं। उसके भीतर सारी चीजें मौजूद हो जाएंगी, इकट्ठी हो जाएंगी। उनका विस्फोट होता रहेगा। और जिन चीजों को उसने दबाया है, उनको रोज-रोज दबाना पड़ेगा और जीवन एक संघर्ष, एक अंतद्र्वंद्व, एक कांफ्लिक्ट हो जाएगी, एक नरक हो जाएगा। उस जीवन में कोई शांति और आंनद संभव नहीं हो सकता है।
    दमन से नहीं, उलटा चलने से नहीं, जबरदस्ती चीजों को रोक लेने से नहीं, लेकिन नींद को तोड़ने से एक क्रांति आती है, वह नींद कैसे तोड़ी जा सकती है, उसकी बात तो कल की चर्चा में मैं आपसे करूंगा? नींद निश्चित ही तोड़ी जा सकती है। क्योंकि जो आदमी सोने में समर्थ है, वह जागने में भी समर्थ है। जो आदमी बीमार होने में समर्थ है, वह स्वस्थ होने में भी समर्थ है। जो आदमी क्रोध से भरा हुआ है, वह प्रेम से भर सकता है, लेकिन भरने का रास्ता क्रोध को दबाना नहीं है, बल्कि जिस नींद से क्रोध पैदा होता है, उस नींद को ही तोड़ डालना है। अगर चित्त जागा हुआ हो जाए, अवेकंड हो जाए, यह सोया-सोया हुआ स्थिति मिट जाए, तो नये लक्षण प्रकट होने शुरू हो जाएंगे, जिनको हम प्रेम कहते हैं, सौंदर्य कहते हैं, संगीत कहते हैं, सत्य कहते हैं। वे हमारे भीतर से प्रकट होने शुरू हो जाएंगे।
    अंत में दो छोटी सी बातें, सोए हुए आदमी के लक्षण हैं कुछ। हिंसा उसका लक्षण है, घृणा, क्रोध उसका लक्षण है। जागे हुए आदमी के कुछ लक्षण है, प्रेम, करुणा, दया उसका लक्षण है। कोई हिंसा, क्रोध को दया और प्रेम में नहीं बदल सकता। लेकिन अगर नींद टूट जाए तो अचानक पाता है कि जिस चित्त से घृणा निकलती थी, वहां से अब प्रेम निकलना शुरू हो गया है। और यह प्रेम वैसा प्रेम है, जिसे कोई भी तरकीब से घृणा में नहीं बदला जा सकता।
    आप क्राइस्ट को चाहे सूली पर लटका दें, तो भी आप क्राइस्ट के प्रेम को घृणा में नहीं बदल सकते। क्राइस्ट को हमने मार डाला सूली पर लटका कर, लेकिन हम क्राइस्ट के प्रेम को नहीं मार सके, मरते वक्त भी क्राइस्ट ने कहा कि हे परमात्मा! इन सबको माफ कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं। मंसूर के लोगों ने हाथ-पैर काट डाले, लेकिन मंसूर के प्रेम को चोट नहीं पहुंचाई जा सकी, जिन्होंने हाथ-पैर काटे होंगे, उन्होंने यही सोचा होगा कि देखे इसके प्रेम की स्थिति क्या है? मंसूर के लोग हाथ-पैर काट रहे थे, एक लाख लोग इकट्ठे थे, उसके पैर काट डाले, उसके हाथ काट डाले, उसकी आंखें फोड़ डालीं; लेकिन उसके होंठों पर जो प्रेम और मुस्कुराहट थी उसको नहीं छीना जा सका। और इसके पहले कि वह उसकी जबान काटते उन्होंने मंसूर से कहा कि तुम्हें कुछ कहना है? तो उसने कहा कि एक ही बात मुझे तुमसे कहनी है, मेरा शरीर कट रहा है, लेकिन मैं अपने प्रेम को देख रहा हूं कि वह अखंड है, इसलिए तुम शरीर पर विश्वास मत करना, उस प्रेम को खोजना जिसकी कोई मृत्यु नहीं है। मैं अपने शरीर को मरते देखता हूं, लेकिन उस प्रेम को मरते हुए नहीं देख रहा, जो मेरे भीतर है; तो मैं तुमसे कहता हूं, तुम शरीर पर विश्वास मत करना, तुम प्रेम को खोजना जो कि अमृत है, शरीर तो मर जाता है, लेकिन प्रेम अमर है।
    लेकिन उस प्रेम को तो केवल वे ही पा सकते हैं, जो जागे हुए हों। कुछ मामला ऐसा है, कि जाग्रत होते ही जीवन में कुछ नये फूल खिलने शुरू हो जाते हैं, जागरण के परिणाम स्वरूप। और सोते ही जीवन में कुछ फूल मुरझा जाते हैं, और कुछ कांटे निकलने शुरू हो जाते हैं, नींद के फल स्वरूप। नींद में चित्त एक तरह से काम करता है, वह जो काम की प्रक्रिया है, वही क्रोध है, वही वायलेंस है, वही हिंसा है, और जागरण में चित्त दूसरे रास्ते पर काम करता है, वही प्रेम है, वही करुणा है। लेकिन कोई घृणा को प्रेम में नहीं बदल सकता।
    नींद टूट जाए तो जहां से घृणा निकलती है, वहीं से प्रेम के फूल लगने शुरू हो जाते हैं। इसलिए सारा जोर जैसा कि आज तक रहा है, वह गलत सिद्ध हुआ है, आज तक यही समझाया गया है, अपने क्रोध को दबाओ और क्षमा को प्रकट करो। आज तक यही समझाया गया है, हिंसा छोड़ो और प्रेमपूर्ण हो जाओ; ये सिखावन कोई भी फल नहीं लाई। कोई अर्थ नहीं हुआ इससे। इससे कोई फर्क नहीं हुआ। आदमी की जाति वहीं की वहीं है, कोई बुनियादी भूल इस शिक्षा में थी। क्रोध को क्षमा नहीं बनाया जा सकता, घृणा को प्रेम नहीं बनाया जा सकता, वही इस शिक्षा में बात मान ली गई थी, जो बुनियादी गलत है। आदमी को सिखाया जाना जरूरी है कि तुम सोए हुए मत रहो, जागे हुए हो जाओ।
    तो मैं आपसे नहीं कहता कि घृणा छोड़ो, प्रेम छोड़ो, ये आपके बस की बातें नहीं हैं। मैं आपसे कहता हूं, आप नींद छोड़ो, आप यांत्रिकता छोड़ो। और इसे भी छोड़ना नहीं है, आप इसके प्रति जाग जाएं और आप पाएंगे कि ये छूटना शुरू हो जाती हैं। जैसे कोई आदमी दीया जला कर अपने घर में जाए अंधेरे को खोजने और दीया जला कर कोने-कोने में खोजे कि अंधेरा कहां हैं? तो क्या उसे अंधेरा मिलेगा? और आपसे कहूं, आपसे कहूं।।सुनो और पकड़ मत लो, मैं तो कुछ निवेदन कर रहा हूं हार्दिक, जो मुझे दिखाई पड़ता है, वह आपसे कह रहा हूं। इसलिए कि शायद आप भी सोचें और आपको भी दिखाई पड़ जाए। तो अंत में यही प्रार्थना करता हूं कि परमात्मा आपको विचार करने में समर्थ बनाए, परमात्मा आपको खुद के संबंध में सोचने में समर्थ बनाए, ताकि किसी दिन जीवन के वे सारे फूल आपको उपलब्ध हो सकें, जिनमें सौंदर्य है, सत्य है, सुगंध है, संगीत है; वे उपलब्ध हो सकते हैं।

    — ओशो. [क्या मनुष्य एक यंत्र है? प्रवचन-02 ]

     

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