हठयोग क्या है? हठयोग से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदु क्या है?

Question

प्रश्न – हठयोग क्या है? हठयोग से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदु क्या है?

Answer ( 1 )

  1. हठयोग समझने के लिए थोड़ी सी भूमिका की बातें पहले कर लें।
    मनुष्य की चेतना बहिर्मुखी अथवा अंतर्मुखी दो दिशाओं में गतिमान हो सकती है। पुनः बहिर्मुखी चेतना दो प्रकार की हो सकती हैं- चंचलता वाली या एकाग्रता वाली। यदि हम एक बिन्दु पर स्थिर हैं, हमारी बाहर जाने वाली चेतना का तीर एक बिन्दु पर एकाग्र है तो उसे कहते हैं एकाग्र चेतना- (फोकस्ड कॅान्शसनेस) और इसका विपरीत-चंचल चित्त जब हमारा मन यहाँ-वहाँ डोल रहा वह जो चेतना का तीर बाहर की ओर जा रहा है उसकी दिशा सुनिश्चित नहीं है, बार बार विषय बदलता है। एकाग्रता में विषय स्थिर है, चंचलता में विषय बदल रहा है। हठयोगी यदि अपने आप को एकाग्र कर रहे हैं किसी बिन्दु पर, तब वह योग नहीं हुआ क्योंकि एकाग्रता का वह बिन्दु स्वयं से बाहर है। समझें कि कोई त्राटक कर रहा है या दीवाल पर एक निश्चित बिन्दु बनाकर उसकी तरफ देख रहा है या श्वासों को एकाग्र होकर देख रहा है, यह भी योग नही हुआ क्योंकि चेतना अभी भी बाहर की ओर ही जा रही है, स्वयं की ओर नहीं आ रही। तो चंचलता और एकाग्रता दोनो ही बहिर्मुखी चेतना की दो दिशाएं हैं जबकि ध्यान की शुरूआत ही दृश्यभाव से होती है। मध्य में आता है साक्षीभाव और अंततः समाधि की अवस्था बनती है- योग उसकी प्रक्रिया है। तो जब तक दृश्यभाव, साक्षीभाव और समाधि न आए तब तक जानना कि योग नहीं हुआ, ध्यान नहीं हुआ। तो सिर्फ एकाग्र होकर आसन साधना, मुद्रा बांधना कि बंध लगाना या प्राणयाम साधना, ज्यादा से ज्यादा दृश्यभाव तक ले जा सकेगा इसके आगे नहीं। अक्सर तो लोग दृश्यभाव में भी नहीं जाते, चेतना पूरी की पूरी बहिर्मुखी रही जाती है। इसलिये इस बात को खूब अच्छे से समझ लें कि एकाग्रता ध्यान नहीं है- कनसन्ट्रेशन इज नॅाट मेडिटेशन। वे जो हठयोगी जबरदस्ती अपने चित्त को इन्द्रियों से हटाकरे कहीं और लगाने की कोशिश कर रहा है उसमें सफलता उसे नहीं मिलने वाली। बहिर्गामी चेतना चाहे एकाग्र भी हो जाय तब भी वह बहिर्गामी ही है, वापिस लौटना नहीं हुआ प्रत्याहार या प्रतिक्रमण।
    दो शब्द समझने जैसे हैं- एक अतिक्रमण दूसरा प्रतिक्रमण। अतिक्रमण का अर्थ होता है अपनी सीमा के बाहर, दूसरे पर आक्रमण- हम अपनी सीमा के बाहर चले गये, हम अपनी रेखा लांघ गये। आपने सुना होगा न शहर में अतिक्रमण कर लिया लोगों ने, म्यूनिसपैल्टी ने मकान गिरा दिये अतिक्रमण वाले। अतिक्रमण का क्या अर्थ है वहां। लोगों ने अपने मकान की सीमा के आगे मकान बना लिया, सरकारी जमीन पर बिलि्ंडग खड़ी कर ली। और प्रतिक्रमण का क्या अर्थ हुआ- इसके विपरीत अपनी सीमा में वापिस लौटना। पतंजलि ने उसे प्रत्याहार कहा है। महावीर ने प्रतिक्रमण कहा है। जापान के झेन फकीरों ने उसे नाम दिया है रिटर्निंग टू द सोर्स- मूल उद्गम की ओर वापसी। तो जब तक हमारी चेतना प्रत्याहार न करे, प्रतिक्रमण न करे, चेतना का प्रकाश मूल उद्गम-उस दीपक की तरफ न चले जहां से वह आया है तब तक योग नहीं हुआ। चेतना का प्रकाश अगर केवल बाहर की ओर जा रहा है भले ही वह एकाग्र है- टार्च की तरह तब भी वह ध्यान नहीं हुआ। तो एकाग्रता को ध्यान मत समझना। एक स्टुडेंट जो क्लास मे पढ़ रहा है, चित्त उसका एकाग्र है, शिक्षक जो कह रहे हैं वह सुन रहा है, ब्लैक बोर्ड पर जो लिखा जा रहा है वह देख रहा है, इससे उसकी कोई आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो जाएगी। हां, वह अपने कार्य में सफलता पाएगा, परीक्षा में अच्छे नम्बर ला सकेगा क्योंकि वह एकाग्र होकर पढ़ रहा था। लेकिन यह एकाग्रता बहिर्मुखी है, इससे कोई आत्मज्ञान घटित नहीं हो जाएगा। एक वैज्ञानिक एकाग्र है, माइक्रोस्कोप में देख रहा है, कुछ अन्वेष्ण कर रहा है, वह पदार्थ के बारे में जान लेगा, कि वह दूरबीन लगा के दूर ग्रह नक्षत्रों का अध्ययन कर रहा है चेतना उसकी अभी भी बहिर्गामी है। यद्यपि वह बड़ा एकाग्र है अंतरिक्ष का अध्ययन कर रहा है, खगोलविद् है, बड़ी जानकारी प्राप्त कर लेगा वह। लेकिन आत्मज्ञान घटित नहीं हो जाएगा। तो बाहर हमारा चित्त चंचल हो कि एकाग्र अंततः वह बहिर्गामी ही है। तो जब तक पहले प्रतिक्रमण न करे अपनी ही ओर वापिस न लौटे तब तक आत्मज्ञान के निकट वह नहीं आएगा। तो कनसन्ट्रेशन इज नॅाट मेडिटेशन- ध्यान समग्रता है। एकाग्रता नहीं- अवेयरनेस इन टोटलिटि। और फिर उस टोटल अवेयरनेस के भी पार हम जाते हैं योग की दिशा में, जब हम स्वयं के भीतर निमज्जित हो जाते हैं।
    तो कुछ टर्म्स बड़े महत्वपूर्ण हैं- एकाग्रता, चंचलता, तल्लीनता। तल्लीनता का अर्थ है एक विषय में डूब जाना, लेकिन वह विषय हम से बाहर ही है। एक कवि कविता के विषय मे डूबा हुआ है, एक चित्रकार चित्र बना रहा है और पूरी तरह तल्लीन है, लेकिन इसकी तल्लीनता की कोई आध्यात्मिक कीमत नहीं है। क्योंकि तल्लीनता का विषय भी स्वयं से बाहर ही है। तो तल्लीनता भी ध्यान नहीं है। सामान्य भाषा में हम कह सकते हैं कि वह बड़े ध्यानपूर्वक चित्र बना रहा है। तो सामान्य भाषा में तो ठीक, लेकिन आध्यात्मिक भाषा में यह ध्यान नहीं हुआ। महावीर ने एक नया शब्द प्रयोग किया है संल्लीनता। संल्लीनता का अर्थ है- स्वयं के भीतर तल्लीन होना। वह विषय जिसमें हम तल्लीन हो रहे हैं, हमसे बाहर नहीं बल्कि हमारा स्वयं का होना है। अपने होने में जो डूबा उसका नाम है संल्लीनता।
    समग्रता बीच में हुई। समग्रता में दोनों बातें हैं- बहिर्मुखी चेतना और अंतर्मुखी चेतना इकट्ठी। ऐसा समझें कि किसी मकान की देहरी पर हम खड़े हैं- एक पैर घर के बाहर और एक पैर घर के भीतर; बाहर का दृश्य भी दिखाई दे रहा, भीतर का दृश्य भी दिखाई दे रहा- यह हुई समग्रता (अवेयरनेस इन टोटैल्टि) तो जिसको हम साक्षीभाव या ध्यान कह रहे हैं वह है मध्य की अवस्था, देहरी पर खड़े हुए। बहिर्मुखी व्यक्ति घर के बिल्कुल बाहर है उसे घर के भीतर का कुछ पता नहीं और समाधिस्थ व्यक्ति अपने घर के भीतर पहुँच गया, भीतर के शून्य आकाश में संल्लीन हो गया, स्वयं में डूब गया। तो ये कुछ पारिभाषिक शब्द हमारे काम के होंगे समझने के लिये।
    अब हठयोग पर आते हैं- हठयोग का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है श्वास। श्वास और प्रश्वास को पान और अपान भी कहा जाता है। पतंजलि की भाषा में इसको पूरक और रेचक कहते हैं। भीतर जाती श्वास अर्थात पूरक और बाहर जाती श्वास अर्थात रेचक, जिसको हम अंग्रेजी में कह सकते हैं- इन्हेलेशन एण्ड एग्जेलेशन। बुद्ध पाली भाषा का प्रयोग करते थे। उनकी भाषा में इसे पान और अपान कहा जाता है, दोनों को मिलाकर इकट्ठा अनापान कहते हैं। पाली भाषा में सती शब्द का अर्थ होता है स्मृति, जैसे सम्मासती यानि सम्यक स्मृति; तो अनापानसती का अर्थ है आती जाती श्वासों की स्मृति अर्थात होशपूर्वक आती जाती श्वासों को देखना। योग का अर्थ तो आप जानते हैं। अनापासती योग का अर्थ है आती जाती श्वासों का स्मरण रखते हुए आत्म स्मरण में डूबना, योग की अवस्था में पहुंचना, यह अनापानसती योग हुआ। विपस्सना शब्द धीरे-धीरे अनपानसती योग का पर्यायवाची हो गया यद्यपि इसका अर्थ थोड़ा सा भिन्न है। विपस्सना का अर्थ होता है देखना, जिसे हम द्रष्टाभाव या साक्षीभाव कह रहे थे। संस्कृत का शब्द है पश्य, पश्य यानि देखना। उससे बना है विपस्सना। बुद्ध कहते थे भिक्षुओ, इहि पश्यिको- आओ, और देखो, पलट कर देखो। पलटकर देखो का अर्थ प्रतिक्रमण कर, वापिस लौटकर अपने भीतर देखो। देखने के लिये बुद्ध ने तीन सहारे कहे थे, तीन आलम्बन। पहला- अपने शरीर की क्रियाओं को देखना। दूसरा- मन की क्रियाओं अर्थात विचारों को देखना और तीसरा- श्वास को देखना। बुद्ध ने श्वास पर बहुत जोर दिया। बुद्ध मध्यम मार्ग के प्रर्वतक हैं। कर्म है बाहर परिधि पर, मन है भीतर, मध्य में है श्वास। बुद्ध कहते हैं मध्य को पकड़ लो। न तो कर्म पर उनका जोर है न विचारों पर उनका जोर है; कर्म स्थूल शरीर करता है विचार मानस शरीर करता है, दोनों के बीच का जोड़ने वाला सेतु है।
    बुद्ध कहते हैं तुम तो श्वास के प्रति होश को साध लो। यहां से बड़ा आसान रास्ता बन जाएगा आत्म स्मरण का।
    तो तीन प्रकार की विपस्सना उन्होंने कहीं- शरीर की क्रियाओं को देखना, आती-जाती श्वास को देखना, मन मे चल रहे विचारों को देखना- ये तीनों ही विपस्सना कहलाते हैं। तो अनापानसती योग विपस्सना का एक प्रकार हुआ, लेकिन कालान्तर में अनापापसती योग इतना ज्यादा प्रचलित हुआ क्योंकि बुद्ध ने उस पर बहुत जोर दिया था, इसलिए विपस्सना और अनापानसती आपस में पर्यायवाची ही हो गये, समानार्थी हो गये। तो आज जब हम कहते हैं विपस्सना तो हमारा सामान्य अर्थ अनापानसती योग ही होता है। लेकिन मूल अर्थ विपस्सना का दृश्यभाव, साक्षीभाव ही है। बुद्ध कहते थे भिक्षुओं से कि बैठकर अपनी श्वास देखना, अगर तुम्हें लगे कि मूर्छा घेरने लगी, तमस और प्रमाद बढ़ने लगा तो उठ के खड़े हो जाना, धीरे-धीरे चलने लगना; चलने की इस क्रिया को देखना, इसका नाम उन्होंने रखा चक्रमण। चलते हुए अपने पैरों की गति को देखना और सांसों को भी देखना और अपना होश रखना कि मैं देखने वाला दृश्य हूँ तो चक्रमण ध्यान। कभी चुपचाप बैठे अपने मन के भीतर विचारों को देखना विचार आ जा रहे हैं।
    ओशो ने कहा है कि आज तक जितने भी लोग बुद्धत्व को उपलब्ध हुए हैं उनमें से सबसे ज्यादा लोग विपस्सना के प्रयोग से हुए हैं। तो तीन प्रकार की विपस्सनाओं में सबसे सरल विधि है- अनापानसती योग। और सारे योग के रास्ते कोई खास प्रकार के व्यक्ति के काम आएंगे। समझो कोई व्यक्ति भावुक है तो वह भक्त बन सकेगा, हर कोई भक्त न बन सकेगा। काई व्यक्ति बड़ा कर्मठ किस्म का है तो वह कर्मयोगी बन सकेगा, सभी लोग तो कर्मयोगी न बन सकेंगे। कोई बड़ा विचारक है वह ज्ञानयोगी बन सकेगा, सारे लोग ज्ञानयोगी नहीं बन सकते। सबके लिमिटेशनस हैं, सीमाएं हैं लेकिन अनापानसती योग ऐसा है।
    हठयोग ऐसा है कि सभी लोग इसमें गति कर सकते हैं। तो ओशो का यह वक्तव्य बड़ा महत्वपूर्ण है कि आज तक जितने लोग भी बुद्धत्व को प्राप्त हुए हैं, सबसे ज्यादा लोग श्वास की विधि के द्वारा उपलब्ध हुए हैं। हठयोग का जोर श्वास पर है।
    पतंजलि कहते हैं- पूरक, रेचक और कुम्भक। कुम्भक अर्थात श्वास को रोकना। कुम्भक के दो प्रकार हैं- अंतर्कुम्भक और बहिर्कुम्भक। बहिर्कुम्भक का अर्थ है- रेचक के बाद श्वास को बाहर रोकना और अंतर्कुम्भक का अर्थ है पूरक श्वास के बाद श्वास को भीतर रोकना। कुम्भक शब्द बना है कुम्भ से, कुम्भ यानि घड़ा। जब हम भीतर श्वास लेते हैं और पेट को फुला के श्वास को रोक लेते हैं, हमारा पेट घड़े की भांति फूल गया, कुम्भ जैसा दिखाई देने लगा इसीलिये इसका नाम कुम्भक पड़ा। तो अंतर्कुम्भक और बहिर्कुम्भक और तीसरे प्रकार का कुम्भक पतंजलि कहते हैं कि कहीं पर भी श्वास को रोकना, उसे सिर्फ कुम्भक कहा है। तो अंतर्कुम्भक और बहिर्कुम्भक में तो एक खास अवस्था में श्वास रोकी गई और जिसे सामान्य कुम्भक कहा गया है उसमें कहीं पर भी जब याद आई तभी श्वास रोक ली, किसी विशेष अवस्था में नहीं। आ रही थी तो आती हुई रोक ली, जा रही थी तो जाती हुई रोक ली, ठहरी हुई थी, मुड़ रही थी, जहां याद आयी वहीं रोक ली, उसका नाम है सामान्य कुम्भक। तो अंतर्कुम्भक और बहिर्कुम्भक विशेष अवस्थाएं हुई कुम्भक की, एक अवस्था हुई सामान्य कुम्भक। ऑल ऑफ सडन, अचानक जहां थे वहीं रोक लिया।
    कुम्भक इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी श्वासों के विशेष ढांचे से हमारे मन की, हमारी चेतना की विविध अवस्थाएं जुड़ी हुई हैं। उदाहरण के लिये, जब हमें क्रोध आता है एक विशेष प्रकार से श्वास चलती है, जब हम शांत होते हैं अलग ढंग की श्वास चलती है। एक विशेष प्रकार की श्वास चलती है, जब हम शांत होते हैं अलग ढंग की श्वास चलती है। आप गौर करना जब कामवासना चित्त को पकड़ती है श्वास का पैटर्न बदल जाता है, जब प्रेम से भरे हुए होते हैं श्वास अलग तरीके से चलती है, जब आप बेचैन होते हैं श्वास का ढंग बदल जाता है, जब आप प्रसन्न होते हैं श्वास का ढंग बदल जाता है, जब आप उदास होते हैं श्वास अलग तरीके से चलती है। हमारे चित्त की अवस्थाएं, हमारी भाव दशाएं विविध प्रकार के श्वास के पैर्टन से जुड़ी हुई हैं। चित्त की दशाओं को बदलना तो कठिन है। अगर आप उदास हैं और मैं आपसे कहूँ कि प्रसन्न हो जाओ तो आप कैसे प्रसन्न होओगे। वह उदासी जाने में समय लेगी। हो सकता है घन्टा लगे, दो घन्टे लगें, चार दिन लग जाएं। आपके वश में नहीं है चित्त की दशा को बदलना। लेकिन योगियों ने खोज लिया है कि उदासी के साथ एक विशेष प्रकार की श्वास की पैर्टन जुड़ी हुई है। यदि आप श्वास की उस पैर्टन को बदल दो तो उदासी विदा हो जायेगी। यदि आप श्वास ऐसी लेने लगो जैसी आप प्रसन्न भाव में लेते हो, प्रफुल्लता मे लेते हो, पांच मिनिट का प्रयोग और अचानक आप पाओगे कि आपकी भावदशा परिवर्तित हो गई। यह तो बड़ा जादुई असर हो जाएगा। इसका मतलब यदि आप दुखी हो तो एक खास प्रकार की श्वास उसमें चल रही है, आप श्वास के उस पैटर्न को तोड़ दो। आप ऐसी श्वास लेने लगो जैसी आप खुशी के क्षणों में लेते हो, उत्सव के क्षणों मे लेते हो तो दुख की वह भावदशा मिट गई। वह कहां वाष्पीभूत हो गई पता भी न चलेगा।
    यह तो बड़ी अद्भुत तरकीब हाथ में आ गई। श्वास को बदल के हम अपने भीतर की भावदशा को रूपांतरित कर सकते हैं। कामवासना ने चित्त को पकड़ा है, वासना से लड़ने की कोई जरूरत नहीं है, आप केवल श्वास का पैटर्न बदल लो। आप शांतचित्त दशा मे जैसी श्वास लेते हो, निर्वासना की अवस्था में जैसी श्वास लेते हो वैसी ही श्वास लेना शुरू कर दो और पांच मिनट भी नहीं लगेंगे कामवासना तिरोहित हो जाएगी। क्रोध की अग्नि भीतर जल रही है, इस अग्नि से उलझने की जरूरत नहीं। अब चुपचाप ऐसी श्वास लेने लगो जैसी आप शान्ति के क्षणों में लेते हो, प्रेम के क्षणों में, करुणा के क्षणों में, दया के क्षणों में, सहानभूति के क्षणों में जैसी श्वास आप लेते हो वैसी शुरू कर दो, आप पाओगे कि क्रोध की अग्नि ठंडी हो गई, न केवल ठंडी हो गई उसकी ऊर्जा प्रेम और करुणा में संलग्न हो गई, रूपांतरित हो गई। आपने दमन नहीं किया किसी चीज का, आपने उस ऊर्जा का उपयोग कर लिया किसी और चीज में। वह क्रोध की ऊर्जा, वह शक्ति जो क्रोध के द्वारा पैदा हुई थी, आपने श्वास को बदलकर उसे एक नई दिशा दे दी। आप उत्सव मनाने लगे, नाचने लगे, झूमने लगे, क्रोध की शक्ति उत्सव में रूपांतरित हो गई। तो श्वास को बदलकर हम अपने भीतर की चेतना की अवस्था को भी बदल सकते हैं। योगियों ने बड़े पुराने समय में इस रहस्य को सीख लिया।
    तो हठयोग की मुख्य जो आधारशिला है वह श्वास का प्रयोग है। प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ होता है प्राणों का फैलाव- एक्सप्रैशन ऑफ वाईटैलिटी- वह जो हमारी प्राण ऊर्जा है उसे फैलाना। हमारी जो एस्ट्रल बॅाडी है, हमारा जो सूक्ष्म शरीर है जिसे हम तीसरा शरीर कहते हैं वह हमारे तीसरे चक्र मणिपुर से जुड़ा हुआ है। जब हम गहरी श्वास लेते हैं, गहरी श्वास छोड़ते हैं, जब हम अंतर्कुम्भक या बहिर्कुम्भक करते हैं, तो हमारी एस्ट्रल बॅाडी, हमारा सूक्ष्म फैलता है। अब तो इसके वैज्ञानिक प्रमाण भी उपलब्ध हैं। किरलियान की फोटोग्राफी के द्वारा फैले हुए आभामंडल के चित्र लिये जा सकते हैं। जब हम उदास होते हैं, दुखी होते हैं, चिंतित होते हैं अथवा भयभीत होते हैं या किसी नकारात्मक भावना से भरे होते हैं, हमारा आभामंडल सिकुड़ जाता है। सबसे ज्यादा सिकुड़ता है भय की अवस्था में, और सबसे ज्यादा फैलता है प्रेम और करूणा की अवस्था में। आभा मंडल विस्तीर्ण हो जाता है। जब हम वास्तव में प्रेम, करूणा से भरे होते हैं तो हम एक प्रकार से उत्सव की भावदशा में हैं- ओवर फ्लोइंग ऑफ इनर्जी। हम अपनी ऊर्जा शेयर कर रहे हैं दूसरे के साथ, प्रेम का वही तो अर्थ होता है। हम अपनी प्राण शक्ति दूसरे पर उलीच रहे हैं, करूणा का वही तो अर्थ होता है। हम अपने आपको अर्पित कर रहे हैं, हम दूसरे के साथ बाँट रहे हैं अपने होने को, अपनी ऊर्जा को, अपनी जीवन शक्ति को। तो प्रेम में हमारा आभामंडल फैल जाता है, डर में हमारा आभामंडल सिकुड़ जाता है। डर प्रेम की उल्टी अवस्था है। साधारणतः हम सोचते हैं प्रेम का उल्टा है घृणा। नहीं, हम गलती में हैं, प्रेम का उल्टा घृणा नहीं होता। वे उल्टे नहीं हैं, वे तो संग साथ चलते हैं। जिससे आप प्रेम करते हो उसी से आप घृणा भी करते हो। इसलिये उनको विपरीत कहना ठीक नहीं है। रोज सुबह पति-पत्नी का झगड़ा होता है शाम को फिर प्रेम हो जाता है। अगर ये विपरीत होते तो एक साथ कैसे घटते। आप अपने माता-पिता से थोड़ी बहुत नफरत भी करते हो और उनका आदर भी करते हो। तो इनमें आपस में कुछ विपरीत नहीं है। प्रेम और घृणा तो संग साथ चलते हैं। विपरीत क्या हैं? प्रेम और भय। जिससे आप भयभीत हो उससे आप कभी प्रेम नहीं करते और जिससे आप प्रेम करते हो उससे आप डरते नहीं हो, यही प्रेम का लक्षण है। जिससे आपको डर न लगे जानना कि सच्चा प्रेम है। इसलिये जिसे हम प्रेम करते हैं, जिससे हमारा मैत्रीभाव है उसके सामने हम अपने को पूरा उघाड़ पाते हैं, अपने हृदय को पूरा खोल पाते हैं अर्थात हमें उससे डर नहीं है। हम भयभीत नहीं हैं कि हम अपने हृदय की सारी बात इससे कह देंगे तो यह कोई नाजायज फायदा उठा लेगा। अब हमारा भय मिट गया, यह प्रेम का लक्षण है। इसलिये प्रेम और भय एक दूसरे के विपरीत हैं। किरलियान की फोटोग्राफी से भी यही सिद्ध होता है कि प्रेम में हमारा आभामंडल विर्स्तीण हो जाता है, भय में हमारा आभामंडल बिल्कुल सिकुड़ जाता है। प्राणायाम के द्वारा हम अपने आभामंडल को, अपने सूक्ष्म शरीर को फैला सकते हैं, यही प्राणायाम का महत्व है। इसमें रोचक पूरक श्वास बहुत महत्वपूर्ण है। कुम्भक का भी बड़ा गहरा इसमें उपयोग किया जा सकता है। पतंजलि अपने योग सूत्र में लिखते हैं कि एक चौथे प्रकार का प्राणायाम और है, उसका उन्होंने विस्तार से वर्णन नहीं किया। ओशो ने पतंजलि योग सूत्र प्रवचनमाला ‘योगा दी अल्फा एण्ड दी ओमेगा’ में चौथे प्राणायाम को समझाते हुए बताया है कि बुद्ध के अनापानसती योग को पतंजलि ने चौथा प्राणायाम कहा है। बुद्ध कहते हैं कि न तो रेचक पर जोर दो, न पूरक पर जोर दो, न कोई कुम्भक करो। वह जो प्राकृतिक श्वास का आना-जाना है, जो अपने आप चल ही रही है, तुम चुपचाप बस उसके दृश्य बन जाओ। धीरे-धीरे दृश्य से साक्षीभाव में चलो और साक्षी से समाधि की अवस्था में गति करो।
    योग का जो प्रणायाम है वह है एक विशेष प्रकार की श्वास, एक खास प्रकार का पैटर्न श्वास का कि इतनी बार श्वास लो, इतनी बार छोड़ो, कि बायें तरफ से श्वास लो, कि दाहिनी तरफ से छोड़ो, अलग-अलग प्रकार के प्राणायाम योगियों ने खोजे। बुद्ध ने कहा है कि इन सब विधियों में पड़ने की कोई जरूरत नहीं। वह जो सहज स्वाभाविक श्वास अपने आप चल ही रही है तुम तो उसके दृश्य बन जाओ। किसी विधि में न उलझो क्योंकि ऐसा न हो कि हम विधि में ही अटक जायें और साक्षीभाव को भूल ही जायें। यही हुआ योगियों के साथ। विधि तो उन्होंने ठीक-ठीक कर ली लेकिन जो मूल तत्व था साक्षीभाव उसको भूल ही गये विधि के चक्कर में। तो बुद्ध ने कहा कि विधि-विधान छोड़ो, सांस जैसी चल रही है उसे चलने दो, चुपचाप देखो। तुम देखने वाले बनो और देखते-देखते आत्म स्मरण से भरो कि कौन है देखने वाला। अपनी याद आ जाए। तो एक तीर तुम्हारा श्वास की तरु, दूसरा स्वयं की ओर- डबल ऐरोड कॅान्शसनेस हो जाए। फिर धीरे-धीरे बाहर वाले तीर को भी समेट लेना। जब भीतर खूब होश सध जाए, आत्म स्मरण प्रगाढ़ होने लगे, फिर श्वास को भी भूल जाओ और चेतना को पूरा का पूरा अन्तर्मुखी कर लो। स्वयं के प्रति पूरा होश, अपने आप में संल्लीन हो जाओ। तब हम समाधि की अवस्था में पहुँच गये।
    इस प्रकार हमने शुरूआत की श्वास से, साक्षीभाव में आए और साक्षी से फिर समाधि की अवस्था मे चले। फिर श्वास को भी भूल गये, शुद्ध आत्म स्मरण में डूब गये। तो अनापानसती योग पतंजलि के द्वारा कहा गया प्रणायाम का चौथा प्रकार समझें। बुद्ध ने जब स्वयं साधना की, उस समय उन्होंने आती जाती श्वास को अपनी नासिका पर केन्द्रित करके देखा था। स्वयं साधना काल के दौरान उन्होंने नाक पर एकाग्रता साधी थी। श्वास आ रही नासपुटों को छू रही ठंडी हवा, श्वास बाहर जा रही उसकी गरमाहट नाक पर महसूस हो रही, ऐसा महसूस करते-करते उन्होंने अनापानसती योग साधा था। जब बौध धर्म भारत से चीन गया, चीन से जापान और अन्य एशिया के देशों में फैला, वहाँ पर इस विधि में परिवर्तन हो गया। बुद्ध की बात चीन पहुँचने के पूर्व ताओवादी संतों की परंपरा का बहुत प्रभाव चीन के लोगों पर पड़ चुका था। उन लोगों का जोर नाभि केन्द्र पर था। बुद्ध की विपस्सना और नाभि केन्द्र पर जोर ये दोनों चीजें आपस में जुड़ गईं। तो चीन, जापान, थाइलैंड, कोरिया में जो प्रकार विपस्सना का था वह था अपनी नाभि को उठते गिरते देखना। नाक पर जोर नहीं था, पेट पर जोर चला गया। विपस्सना विधि परिवर्तित हो गई और पहले से भी ज्यादा प्रीतिकर हो गई। नाक पर जब हम ध्यान लगाकर देखते हैं तो एक सूक्ष्म सा तनाव भीतर बना रहता है। यदि हम पेट पर ध्यान लगाएं, श्वास के साथ फूलते, पिचकते पेट को देखें, नाभि केन्द्र पर हमारी दृष्टि हो भीतर से, तब हम पाते हैं कि एक बड़ा गहरा रिलैक्सेशन, एक गहन विश्राम भीतर घट गया, जो कि नाक को देखते हुए कभी भी नहीं हो सकता। तो चीन और जापान में एक नया ही रूप विपस्सना का पैदा हुआ। लाओत्सु पर प्रवचन देते हुए ‘ताओ उपनिषद’ नामक प्रवचनमाला के चौबीसवें प्रवचन में ओशो ने ‘तांन्देन’ की विधि समझाई है। यह प्रवचन बहुत महत्वपूर्ण है, हर साधक को सुनने और करने जैसा। तो मैं ‘तांन्देन’ की विधि को हठयोग का ही एक प्रकार कहूँगा। मणिपुर चक्र को ही वे तांन्देन कहते हैं। इसी को जापान में हारा केन्द्र भी कहते हैं। वे कहते हैं लम्बी गहरी श्वास और पेट का निचला हिस्सा, जो नाभि के भी दो इंच नीचे है जहाँ तक हमारी श्वास जाती है गहरी से गहरी, उस हिस्से पर नजर रखो। ‘तांन्देन’ विधि में वे कहते हैं- बाहर छूटती हुई श्वास पर हल्का सा जोर दो। पूरक श्वास पर जोर मत दो, रेचक श्वास पर जरा सा जोर दो। बहुत हल्का सा, इतना हल्का कि बाहर से किसी को पता भी न चले कि आप कोई विश्ेष प्रकार की श्वास ले रहे हैं। सामान्य से बस पाँच-दस प्रतिशत ज्यादा जोर देना, तो नाभि से करीब दो इंच नीचे आपको एक हल्का सा झटका महसूस होगा- जाती हुई श्वास के अन्तिम हिस्से में हल्का सा झटका। यह ‘तांन्देन’ की विधि है जो लाओत्सु ने अपने शिष्यों को सिखाई। भारतीय योग पद्धति से मैं इसे और भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानता हूँ, यह ज्यादा सूक्ष्म है। हम दिन भर कभी भी इसका अभ्यास कर सकते हैं। भारतीय योग पद्धति के लिये तो हमें विशेष समय निकालना होगा, किसी खास आसन में बैठ के खास ढंग से करनी होगी साधना। लाओत्सु की ‘तांन्देन’ पद्धति हम चलते-फिरते, उठते-बैठते कभी भी कर सकते हैं, जब याद आ जाए तभी शुरू कर दी। हमारे किसी बाह्य कार्य में कोई हस्तक्षेप भी न होगा। हमारे दैनिक क्रिया-कलाप ज्यों के त्यों चलते रहेंगे और भीतर हम ‘तांन्देन’ विधि करते-करते अपने साक्षीभाव में रमने लगेंगे। जापान में उन्होंने और भी विशेष प्रकार की श्वास की पद्धतियां ज्यादा विकसित कीं। सामान्यतः श्वास भीतर लेने में हमारा पेट फूलता है, श्वास छोड़ने में हमारा पेट पिचकता है, जापान में झेन फकीरों ने इस विधि को बिल्कुल उल्टा कर दिया। जापान के झेन फकीरों ने ध्यान के साथ युद्ध कला को जोड़ा। तीर चलाना, तलवार चलाना और मल्ल युद्ध के विशेष प्रकार- जूडो कराटें इत्यादि उन्होंने विकसित किये। ध्यान के साथ- साक्षीभाव रखते हुए लड़ना। भारत में ऐसा प्रयोग कभी कोई किया नहीं गया, युद्ध के साथ ध्यान को कभी नहीं जोड़ा गया। जापान मे एक नया प्रयोग उन्होंने किया और उसके लिये जरूरी था कि हमारी प्राण शक्ति बहुत सघन हो तभी हम युद्ध कर पायेंगे। तो श्वास के कुछ प्रकार झेन परम्परा ने खोजे, वे युद्ध के काम के हैं। श्वास बाहर छोड़ के पेट को फुलाना- यह क्रिया हमारी प्राण ऊर्जा को अचानक कई गुना कर देगी, अद्भुत रूप से शक्ति का संचार शरीर में हो जायेगा कि व्यक्ति कुशल क्षत्रिय की भांति युद्ध में उतर सकेगा। तो ये खास खास प्रयोग हैं और चूँकि हम यहाँ कोई युद्ध कला नहीं सिखा रहे हैं, इसलिये मैं सिर्फ मैन्शन कर रहा हूँ कि ऐसा भी हठयोग का प्रकार विकसित हुआ है। फिलहाल हमारे लिये तो इसका कोई महत्व नहीं है लेकिन जापान मे इसका खूब प्रयोग किया गया है।
    प्राणायाम के साथ आसन आते हैं। आसन की परिभाषा पतंजलि ने कही है कि शरीर की वह सुखद अवस्था जिसमें हम आराम से देर तक स्थिर रह सकें। कई प्रकार के आसन योगियों ने खोजे, इनमें से थोड़े से हमारे लिये महत्वपूर्ण हैं। इन चौरासी आसनों में से बाकी सब ध्यान की दृष्टि से व्यर्थ हैं। वह हठी और जिद्दी हठयोगियों की खोज है। पतंजलि की परिभाषा में तो वो फिट ही नहीं आते। पतंजलि तो कह रहे हैं कि सुखद अवस्था हो शरीर की, जिसमें कोई कष्ट न हो। तो पद्मासन में बैठना, या सिद्धासन में बैठना, या सुखासन में बैठना, या शवासन में आराम से लेट जाना, या कुर्सी पर आराम से बैठ जाना, या दीवार से टिक के बैठ जाना- हम स्वयं अपना आसन खोज लें कि हमें किसमें आराम मिलता है। हमारे शरीर अलग-अलग हैं, हमारी बनावट थोड़ी भिन्न-भिन्न है। अब किसी को कमर दर्द की बीमारी है वह बैठ नहीं सकता तो वह लेट के ध्यान करे। अगर वह जबरदस्ती हठपूर्वक, जिद्द करके बैठने की कोशिश करेगा तो उसका ध्यान लगेगा ही नहीं, उसकी चेतना बहिर्मुखी हो जायेगी। वह जो कमर में दर्द हो रहा है वहीं पर जाके चेतना अटक जायेगी, साक्षीभाव निर्मित ही नहीं हो पाएगा। नहीं, कोई जरूरत नहीं है जबरदस्ती आसन साधने की। जो तुम्हारे लिये सहज, स्वभाविक, सरल हो उसी को साधना। ओशो का एक वचन है-‘द इजी इज राइट’ जो सरल है वही सही है। खोजना तुम्हारे लिये क्या सही है, दूसरे की नकल करने की जरूरत नहीं है। अब हो सकता है कि बचपन से आप कभी पालथी मारकर बैठे ही नहीं। पाश्चात्य संस्कृति में कोई जन्मा है, सदा कुर्सी पर ही बैठा है, अचानक उससे कहो कि पद्मासन लगाके बैठो, तो वह बेचारा बड़ी मुश्किल मे फंस जायेगा। उसकी पूरी चेतना पैरों मे ही लगी रहेगी। आत्म स्मरण हो ही नहीं पाएगा, पैर स्मरण ही चलता रहेगा। इसका तो कोई मतलब न हुआ, यह तो व्यर्थ की कवायद हुई।
    कुर्सी पर बैठने के यदि तुम आदि हो और कुर्सी पर बैठकर आराम मिलता है तो तुम कुर्सी पर बैठना। कोई ऐसा थोड़ी कि बुद्ध के समान पद्मासन लगा कर बैठोगे तो ही ध्यान लगेगा। तुम्हारे लिये जो सहज है वही तुम्हारे लिये सही है। तुम्हें स्वयं प्रयोग कर-करके खोजना होगा कि तुम्हारे लिये क्या सरल है। तो आसन के बारे में मैं विस्तार से कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि हजारों प्रकार के आसन किताबों में वर्णित हैं। उन्हें पढ़के सिर्फ अहंकार को चैलेन्ज मिलता है कि यह कठिन आसन है हम भी करके देखें। अब शीर्षासन कोई करने बैठ जाए, अपनी मुसीबत ही खड़ी कर लेगा वह। शीर्षासन कोई सहज आसन तो नहीं हो सकता, यह तो पतंजलि की परिभाषा में फिट भी नहीं बैठता।
    शीर्षासन में तुम कैसे सुखपूर्वक स्थिर में रहोगे? यह तो बड़ी कठिन प्रक्रिया हो गई। नहीं, कोई जरूरत नहीं शीर्षासन लगाने की। तुम तो सुखासन में, आरामदायी आसन में ध्यान को लगाना। आसन का उपयोग क्या है? ऐसी सुखद अवस्था जिसमें तुम शरीर को विस्मृत कर पाओ। शरीर में अगर कहीं कष्ट नहीं होगा, तुम्हारी चेतना अपने आप अन्तर्मुखी हो पाएगी। कहीं कष्ट होगा तो चेतना वहीं एकाग्र हो जायेगी। इसलिये सुखपूर्वक स्थिर आसन चुनना, वह ध्यान में उपयोगी होगा। इस परिभाषा के अनुसार अधिकांश हठयोगी जो कर रहे हैं वे सब सर्कस के खेल हैं, उसका योग से कुछ लेना देना नहीं है। वे अहंकार की लीलाएं हैं, दूसरों के सामने सिद्ध करना कि मैं कोई ऐसा काम कर रहा हूँ जिसे और कोई नहीं कर सकता। ऐसी उटपटांग हरकत में जाने की कोई जरूरत नहीं। उन व्ययामों का हो सकता है शारीरिक स्वास्थ्य के लिये कुछ महत्व हो, लेकिन ध्यान की दृष्टि से उनका कोई महत्व नहीं है।
    प्राणायाम और आसन के बाद तीसरा महत्वपूर्ण बिन्दु आता है ‘बन्ध’। बन्ध कई प्रकार के कहे गये हैं जिसमें एक-दो प्रकार बहुत महत्वपूर्ण हैं। मूलबन्ध की प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है। मूलबन्ध का अर्थ है हमारे जो नीचे के चक्र हैं- मूलाधार, स्वाधिष्ठान एवं मणिपुर, इन तीनों पर बन्ध लगाना। बन्ध का अर्थ है बांध- जैसे हम नदी पर बांध (डैम) बनाते हैं, बांध के पीछे विशाल जल भंडार एकत्रित हो जाता है। इस जल भंडार को हम नहर के द्वारा कहीं और ले जाकर उपयोग करते हैं- जैसे खेतों की सिंचाई अथवा विद्युत उत्पादन के लिए। ठीक ऐसे ही अपनी प्राण ऊर्जा पर भी हम बंध लगा सकते हैं। यदि हम श्वास बाहर फेंक कर पेट को, गुदाद्वार को तथा जननेन्द्री को सिकोड़ लें, नीचे के तीनों चक्रों को सिकोड़ लें और बाह्य कुम्भक की अवस्था में कुछ सेकन्ड को रुक जायें तो इसका नाम है मूलबंध। यह प्रक्रिया बड़ी उपयोगी है। यदि कोई व्यक्ति दिन भर में तीन सौ बार, चार सौ बार मूलबंध करता रहे, तो ऐसे व्यक्ति की जीवन ऊर्जा धीरे-धीरे नाभि पर इकट्ठी होने लगती है। फिर क्रमशः यह ऊर्ध्वगामी होने लगती है, अनाहद चक्र की ओर बढ़ने लगती है। जैसे-जैसे ऊर्जा का विशाल भंडार एकत्रित होने लगेगा, ऊर्जा ऊपर और ऊपर विशुद्ध और आज्ञाचक्र पर और अंततः सहस्रार चक्र पर पहुंचने लगेगी। तब समाधि में डूबना बड़ा आसन हो जाता है। मूलबंध के द्वारा सहज रूप से ब्रह्मचर्य फलित हो जाता है। ब्रह्मचर्य की इतनी महिमा जो ग्रंथों में कही गई है वह निश्चित रूप से ठीक है। लेकिन ब्रह्मचर्य कैसा हो? जो अपने आप आये। अपने आप कैसे आये? मूलबंध की क्रिया द्वारा आ सकता है। इसमें हमने अपनी सेक्सुअलिटी से अपनी कामवासना से कोई लड़ाई नहीं की, हमनें उसे दबाया भी नहीं, हमनें उसे मिटाने की कोशिश भी न की। सच पूछो तो हमने कामवासना के साथ कुछ भी न किया। हमने तो अपनी ऊर्जा को बांधा और उसे धीर-धीरे ऊर्ध्वगामी किया। बंधने के बाद वह ऊर्ध्वगामी स्वतः ही होने लगती है। तब हमारी ऊर्जा समाधि में केन्द्रित होने लगती है- काम से राम की ओर बहने लगती है। तो ऊर्जा का दिशा रूपांतरण हुआ, दमन नहीं हुआ। सामान्यतः जो लोग ब्रह्मचर्य साधने की कोशिश करते हैं वे अपनी ऊर्जा को दबाते हैं। वह दबाई हुई वासना बड़ी खतरनाक हो जाती है, वह कभी भी विस्फोट करेगी। कब तक दबाओगे, कितना दबाओगे? उसका भंडार इकट्ठा होता जायेगा और उसको कोई नई दिशा तो तुमने दी नहीं। वह अचानक एक दिन बांध तोड़कर निकल जायेगी। नहीं, ब्रह्मचर्य के लिये उसे एक नई दिशा देनी होगी। यह वासना अनाहद चक्र तक पहुँचे, प्रेम में रूपांतरित हो, करूणा में रूपांतरित हो। यह ऊर्जा और ऊपर जाये विशुद्ध और आज्ञाचक्र तक पहुँचे, संकल्प की शक्ति बने। और ऊपर जाये बोध और विवेक बने, परम चैतन्य बने, तब हम खतरे के बाहर हैं। तो बंध का उपयोग ऊर्जा को इकट्ठा करना और उसे नई दिशा देना है।

    ~ स्वामी शैलेंद्र सरस्वती

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