हिप्नोसिस के जरिए सबकांसस माइण्ड से सुपर कांसस माइण्ड में कैसे पहुंचा जाए?
प्रश्न- मैं डॅाक्टर हूं। मैंने हिप्नोसिस के बारे में पढ़ा है और रुचि भी है। ये जो कांसस माइण्ड, अनकांसस माइण्ड और सुपर कांससनेस हैं, इनके अनुभव करना है। वल्र्ड में जो साइकोसोमेटिक डिसीज़ फैल रही हैं और इसमें मेडिकल साइंसेस असफल हैं। तो क्या हम बिना मेडिसिन के जरिए सारी डिसीज़ जैसे हाइपरटेंशन, माइग्रेन, डायबिटीज़ जो कि बड़ी स्पीड से बढ़ रही हैं, इनको कैसे ठीक किया जाए। इसको पढ़ा तो है पर प्रैक्टिकल एक्सपीरियंस मुझे इस मामले में बिल्कुल नहीं है, यही लेने के लिए आया हूं। दूसरा, सबकांसस माइण्ड से सुपर कांसस माइण्ड में कैसे पहुंचा जाए, वो भी हिप्नोसिस के जरिए संभव है। तो इन सभी चीजों के प्रैक्टिकल के लिए मैं यहां पर आया हूं।
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आपका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है और आप निश्चित रूप से इसमें सफल होंगे। और जो कांसस माइण्ड से सबकांसस माइण्ड में जाने वाली बात है यह भी बिल्कुल ठीक है। ओशो कहते हैं कि वृक्ष की जड़ें जितनी गहरी जाएंगी आकाश में वृक्ष उतना ही ऊपर उठेगा। जिस पेड़ की जड़ों को आकाश को छूना हो उसे अपनी जड़ें पाताल में भेज देनी चाहिए। तो सबकांसस में डुबकी मारते हुए, यह पनडुब्बी वाली यात्रा है। लेकिन यहां तो पनडुब्बी नीचे डूबेगी और उतनी ही हमारी केपेसिटी फ्लाइट करने की, हवाई जहाज में जाने की आ जाएगी। दोनों केपेसिटी एक साथ विकसित होती हैं, इस बात को ओशो ने ‘अप्रमाद’ नामक प्रवचन में बहुत विस्तार से समझाया है। मैं चाहूंगा कि आप सभी लोग इस प्रवचन को सुनिएगा। और जैसा कि ई.ई.जी. के द्वारा हमारे मस्तिष्क की अलग – अलग वेव्स रिकार्ड होती हैं। तो सामान्य जो हमारा तल है, उसमें बीटा वेव्स बनती हैं हमारी जागृति की अवस्था में। इससे थोड़ा गहरा जाते हैं तो अल्फा वेव्स बनती हैं। अल्फा वेव्स हिप्नोसिस की अवस्था में बनती हैं। जब हम किसी काम में खूब तल्लीन होकर डूबते हैं जैसे कि कोई कविता लिख रहा है, कि पेंटिंग बना रहा है, कि फिल्म देखने में उसको बहुत रस आ रहा है या संगीत सुनने में, कि अपने गुरू की अमृतवाणी सुनने में, तब भी अल्फा वेव्स बनने लगती हैं। हिप्नोटिक असर आने लगता है। दिन भर में कम से कम हर व्यक्ति बीस बार अल्फा वेव्स की स्थिति से गुजरता है, ड्रीम में भी। डे ड्रीमिंग, दिवास्वप्न जिसको हम कहते हैं उसमें भी अल्फा वेव्स बनती हैं। और यह सब प्रकृति ने इंतजाम किया है कि दिन भर में दस-पंद्रह बार हम कुछ क्षणों के लिए ऐसी स्थितियों में चले जाते हैं, तभी जाकर हम दिनभर के तनावों को झेल पाते हैं, वरना हम पागल ही हो जाएं। तो हिप्नोसिस मेें जान बूझकर उस स्थिति को पैदा करते हैं, जो कि प्रकृति से वैसे भी अपने आप ही इंतजाम किया गया है, हमें रिलेक्स होने के लिए।
फिर अल्फा वेव्स से और गहरी वेव्स होती हैं, जो कि डीप अनकांसस में बनती हैं, उनको कहा जाता है थीटा वेव्स। गहन सपनों में इस प्रकार की वेव्स बनती हैं। उससे और गहरी वेव्स होती हैं डेल्टा वेव्स। ये बहुत ही गहरी सुषुप्ति में, ड्रीमलेसनेस अवस्था में बनती हैं। तो बीटा के नीचे ये जो तीन तल हैं इनको हम इनसे रिलेट कर सकते हैं- अनकांसस माइण्ड, कलेक्टिव अनकांसस और काजि़्मक अनकांसस में। इनमें क्रमश: अल्फा, थीटा और डेल्टा वेव्स बनती हैं।
आश्चर्य की बात है, कि जैसा डॅाक्टर साहब ने कहा, कि क्या इससे सुपर कांससनेस में जा सकते हैें? हां, सुपर कांससनेस में भी यही तीन प्रकार की वेव्स बनती हैं। जब हम ऊपर की तरु जाते हैं, जिसको हम ध्यान कहते हैं, साक्षीभाव कहते हैं, उसमें अल्फा वेव्स बनने लगती हैं। जिसको हम सब्जेक्टिव अवेयरनेस, हरि सुमिरन, आत्मस्मरण कहते हैं और जिसमें कभी-कभी फ्यूचर के विजन्स भी दिखाई देते हैं उसमें थीटा वेव्स बनती हैं। और डेल्टा वेव्स बनती हैें जिनको हम कहें शुद्ध बोध, समाधि की अवस्था में। तो हम बीच की मंजिल में, इसके बीटा लेवल पर हैं, जिसके नीचे भी तीन लेवल हैं और ऊपर भी तीन लेवल हैं और उनमें एक सिमिलरटी है, जो कि ई.ई.जी. के द्वारा नापी जा सकती है। तो जितना हम नीचे जाएंगे, उतना ही हमारे ऊपर जाने की क्षमता विकसित होती जाएगी। यहां जो हम प्रयोग करवा रहे हैं डॅाक्टर साहब वो सारे के सारे इसी पद्धति पर आधारित होंगे, आने वाले सत्र से जो हम शुरु करेंगे। पहले हम भीतर, नीचे जाएंगे, पनडुब्बी वाली यात्रा में गहराई को छुएंगे और बाद में क्रमश: आपको धीरे-धीरे सजेशन दिया जाएगा ऊपर की तरु जाने के लिए। तो पहले अवरोहण, नीचे जाना, फिर आरोहण, ऊपर आना और फिर ध्यान की अवस्था में लाकर, समाधि की अवस्था में लाकर आपको थोड़ी देर के लिए छोड़ दिया जाएगा। तो हमारा नीचे जाना, ऊपर जाना, क्योंकि यह जो मकान है सात मंजिल, यह पूरा हमारा है, हम क्यों अपने आपको लिमिटेड करे, ं कि यह हिस्सा बस हमारा है, पूरी बिल्डिंग ही हमारी है। हम अचेतन की गहराइयों में भी जाएंगे और सुपरकांसस में भी उठेंगे। तो यहां पर हम एक पूर्णता हासिल करेंगे।
कई मित्र मुझसे पूछा करते थे कि कितने लोग ध्यान कर रहे हैं, समाधि भी सीख रहे हैं। इनके जीवन में उतना बड़ा रूपांतरण दिखाई नहीं देता। ठीक है कुछ बदलाहट हुई है, लेकिन बहुत बड़ा रूपांतरण नहीं हुआ है। उसका कारण यही है कि अभी तक हम सब ऊपर-ऊपर की ही सफाई कर रहे थे और नीचे जो तलघरा है, हमारा जहां कूड़ा-कबाड़ा भरा हुआ है, निगेटिव चीजें डली हुई हैं उसकी हमने साफ-सफाई नहीं की। वहां रोशनी नहीं की, वहां बहुत अंधेरा है, वहां सांप-बिच्छू रेंग रहे हैं। वो ज्यों के त्यों हैं, तो हमने ऊपर की मंजिल बड़ी साफ-सुथरी कर ली, हमने रंग-रोगन, कर लिया, लेकिन नीचे की तीन मंजिल, हमारी वही पुरानी है, तो उनका असर बीच-बीच में होता रहता है। हम बैठे अपने ड्राइंगरूम में, चेतन मन के चैथी मंजिल पर, अचानक नीचे से क्रोध का एक सांप आता है और फुंफकार कर चला जाता है। वहां हमारा कोई कंट्रोल नहीं, वहां हमारा कोई वश नहीं।
पूर्ण रूपांतरण तभी होगा जब ये सातों मंजिल वेल कनेक्टेड हो जाएं, इस पूरे में हमारी गति संभव हो। हम नीचे भी जा सकें और वहां भी साफ-सुथरा कर सकें और ऊपर जाना तो हम जानते ही हैं, वह तो अब आसान है हमारे लिए। तो आपने जो कहा है, बिल्कुल ठीक ऐसा ही है। और बेसिकली जो साइकोसोमेटिक इलनेस हैं। उदाहरण के लिए कुछ आपको गिना दूं- स्किन प्राब्लम्स, इसमें से इनफेक्शन वाले छोड़कर, नानइनफेक्सस स्किन प्राब्लम्स, एलर्जिक बीमारियां, रूमेटिक प्राब्लम्स। खासकर जहां ब्लड टेस्ट में कोई खराबी नहीं आ रही, न कोई अन्य बीमारी पता चल रही कि क्या है, लेकिन दर्द बना हुआ है, दर्द वाली समस्याएं। विशेषकर क्रानिक दर्द की प्राब्लम, चाहे वो सिर दर्द हो, चाहे मसकुलर दर्द हो, चाहे ज्वाइंट दर्द हो, अनिद्रा की प्राब्लम, पेप्टिक अल्सर, हाइपर एसीडिटी, भूख कम लगना या भूख ज्यादा लगना, मोटापा या बहुत दुबले होना। फिर मोटापे से संबंधित उसके जो असर आते हैं, वह एज. ऐ बाई प्रोडक्ट हैं, एक बार आदमी मोटा हो गया तो अब उसका कोलेस्ट्राल बढ़ जाएगा, अब उसके ट्राइग्लिसराइड हाई होंगे, उसको ब्लडपे्रशर ज्यादा होगा, हार्ट पर लोड ज्यादा हो रहा है हार्ट फेलुअर होने लगेगा, ये उसके बाई प्रोडक्ट हैं। तो सीधे अगर हम मोटापे को ही कम कर सकें, यह सिर्फ एक आदत है उसकी ज्यादा खाना खाने की, इट इज जस्ट ए हैबिट। ये पुरानी आदत उसकी काम कर रही है, ये एक साइकिक प्राब्लम है। लेकिन इस साइकिक प्राब्लम की वजह से मोटा हो गया, ओवरवेट हो गया, अब ओवरवेट होने की वजह से बाकी की सारी प्राब्लम हो रही हैं। – स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती |