भगवान की धारणा (Concept of God) का जन्म कैसे हो गया?
Question
प्रश्न – पूछा है, यह भगवान की धारणा का जन्म कैसे हो गया? भगवान की धारणा का जन्म, धारणा का कंसेप्ट ऑफ गॉड, इसका जन्म कैसे हो गया?
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प्रश्न – पूछा है, यह भगवान की धारणा का जन्म कैसे हो गया? भगवान की धारणा का जन्म, धारणा का कंसेप्ट ऑफ गॉड, इसका जन्म कैसे हो गया?
Answer ( 1 )
इसका जन्म भय के कारण हो गया है। धारणा का जन्म, अनुभव का जन्म नहीं। भगवान के अनुभव का जन्म भय के कारण नहीं होता। वह तो ज्ञान के कारण होता है। लेकिन भगवान की धारणा कंसेप्ट, भगवान के सिद्धांत का जन्म भय के कारण हो जाता है। एक गांव में एक फकीर यात्रा पर था। उस गांव के राजा ने उसे पकड़वा कर बुलवा लिया। और दरबार में उसे बुला कर कहा कि मैंने सुना है कि तुम बहुत बड़े मिस्टिक हो? बहुत बड़े रहस्यवादी संत हो? और मैंने सुना है कि तुम्हें परमात्मा के दर्शन होते हैं, और तुम्हें बहुत अदभुत, अलौकिक विजंस दिखाई पड़ते हैं, साक्षात्कार होते हैं? सिद्ध करो मेरे सामने कि तुम एक मिस्टिक संत हो? और अगर सिद्ध न कर सके तो गर्दन अलग करवा दूंगा।
उस फकीर ने यह सुना, यह बादशाह पागल था, जैसे कि अक्सर बादशाह होते हैं। और खतरा था कि वह गर्दन अलग न करवा दे। उसने एकदम आंखें बंद की और कहा कि देखो वे मुझे दिखाई पड़ रहे हैं आकाश में भगवान, अपने सिंहासन पर विराजमान हैं और देवता उनकी स्तुति कर रहे हैं। और वह नीचे देखो जमीन में, वहां मुझे राक्षस और नरक और सब दिखाई पड़ रहा है। उस राजा ने कहाः बड़ी हैरानी की बात है! क्या तुम्हें दीवालों के पार भी दिखाई पड़ता है? हमें तो कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा। कौन सी तरकीब है, जिसके कारण तुम्हें आकाश में बादलों के पार भगवान दिखाई पड़ जाता है? जमीन के नीचे नरक दिखाई पड़ जाता है? उसने कहा कोई तरकीब नहीं है, महानुभाव! ओनली फीयर इ.ज रिक्वायर्ड। कोई और ज्यादा चीज की जरूरत नहीं, भय होना चाहिए सब दिखाई पड़ने लगता है। जब आपने कहा कि गर्दन कटवा देंगे, तो मैंने आंख बंद की और मुझे भगवान दिखाई पड़ने लगे और नरक भी दिखाई पड़ने लगा।
सिर्फ भय की जरूरत है सब दिखाई पड़ने लगता है। और किसी चीज की कोई भी जरूरत नहीं है। आपको भय हो, आपको कुछ भी दिखाई पड़ने लगेगा, भूत भी और भगवान भी। लेकिन ऐसे दिखाई पड़े न तो भूत सच हैं, और न भगवान सच हैं। आपके भय पर जो भी अनुभव खड़ा होता है, वह व्यर्थ है, झूठा है। भगवान की धारणा तो मनुष्य के भय से पैदा हो गई है। जीवन में सब दुख है, पीड़ा है, भय भी है। जीवन में सब तरफ कहीं कोई सहारा नहीं, जीवन में कहीं कोई आसरा नहीं है, जीवन में कोई सिक्योरिटी का कोई पता नहीं है, सब इनसिक्योर, सब घबड़ाहट से भरने वाला है, इसलिए आदमी डरता है। और इस डर में एक आकाश में सहारा खोजता है कि हे भगवान! शायद तुम ही सहारे हो, शायद तुम्हारे ही पैर पकडूं और मुझे सहारा मिल जाए और सुरक्षा मिल जाए। इस जगत में तो कोई सहारा मिलता नहीं, कोई कूल-किनारा नहीं है, तुम ही मेरे किनारे हो!
वह घबड़ाहट में, भय में कल्पना करता है किसी भगवान की और उसके पैर पकड़ लेता है और प्रार्थनाएं करता है और हाथ जोड़ता है और स्तुतियां करता है। और भगवान को राजी करता है और प्रसन्न करने की कोशिश करता है कि शायद तुम प्रसन्न हो जाओ तो मुझ पर कृपा करो। और मेरे जीवन के सहारे और आधार बन जाओ। तो यह भगवान एकदम झूठा है। क्योंकि इसका जन्म हमारे भय से हुआ है। और भय हमारा बिलकुल यांत्रिक है। इसलिए तो हम कहते हैं, धार्मिक आदमी को हम कहते हैं, गॉड-फियरिंग, भगवान से डरा हुआ। भगवान के प्रति भीरु। बड़ी अजीब बात है, कोई आदमी गॉड-फियरिंग होकर धार्मिक हो सकता है? जिस आदमी के भीतर भय है भगवान का, वह तो कभी धार्मिक नहीं हो सकता।
धार्मिक होने के लिए तो अभय चाहिए, फीयरलेसनेस चाहिए। धार्मिक होने के लिए भगवान का भय नहीं चाहिए। धार्मिक होने के लिए अत्यंत अभय चित्त चाहिए। वह अभय चित्त ही उसको जान पाता है, जो भगवान है, जो सत्य है, जो परमात्मा है। जो भयभीत है वह अपने भय के अतिरिक्त कुछ नहीं जानता, और अपने भय के लिए उसने जो कल्पनाएं की हैं, उनको जानता है। उसके भय से निकली हुई सारी कल्पनाएं झूठी हैं।
भगवान की धारणा तो भय से निकलती है, लेकिन भगवान का अनुभव, भगवान का अनुभव जाग्रत चेतना से उपलब्ध होता है। और हम चूंकि सोए हुए हैं, यांत्रिक हैं; हम, हमारे सारे भगवान हमारे जैसे ही झूठे हैं। हमारे सब भगवान हमारे जैसे ही यांत्रिक हैं। क्योंकि हमारे भगवानों के बनाने वाले हम हैं, उनको हम निर्मित किए हैं। मंदिरों में जो मूर्तियां खड़ी की हैं वह हमने, मस्जिदें बनाई हैं और शिवालय बनाए हैं, वे हमने; धर्म खड़े किए हैं, वे हमने; शास्त्र रचे हैं, वे हमने। और हम जैसे हैं, वैसे ही हमारे शास्त्र होंगे स्वभावतः। वैसे ही हमारे भगवान होंगे स्वभावतः।
इसलिए आदमी बदलता जाता है, तो उसके भगवान की धारणा बदलती जाती है। पिछली सदी का भगवान और तरह का था, ज्यादा ऑटोक्रेट था। क्योंकि आदमी का दिमाग, आदमी का दिमाग राजतंत्र में था, तो भगवान एक राजा की शक्ल में था। आजकल का भगवान थोड़ा ज्यादा डेमोक्रेट है, क्योंकि आदमी डेमोक्रेसी में है। वह लोकतंत्र की बातें करता है, तो भगवान भी लोकतांत्रिक हो गया है उसका। अगर आप तीन हजार साल पहले की किताब पढ़ें तो आप घबड़ा जाएंगे, भगवान ऐसा मालूम पड़ेगा कि हमारी कल्पना में न आएगा कि भगवान ऐसा कैसे हो सकता है? अगर आप भगवान के खिलाफ एक शब्द बोल दें तो आपकी हत्या कर देगा, ऐसा भगवान है तीन हजार साल पुराना। वह आपके ऊपर गाज गिरा देगा, बिजली गिरा देगा, आपको तबाह कर देगा। आज हम सोच भी नहीं सकते। हम तो भले आदमी की बाबत भी नहीं सोच सकते कि कोई भले आदमी को अगर हम बुरा शब्द कह दें तो हमारे घर में आग लगा देगा; भले आदमी की धारणा बदल गई हमारी। आज हम भगवान के बाबत तो यह सोच ही नहीं सकते कि हम उसके बाबत कुछ कह दें बुरी बात, तो हमारे घर पर बिजली गिरा देगा। यह हम सोच ही नहीं सकते। लेकिन पुराना भगवान बिजली गिराता था, आग लगा देता था। नरक में डाल देता था। हमारे दिमाग जैसे थे, वैसा हमने भगवान बना लिया था। अब हमारे दिमाग बदले हैं, तो हमने थोड़ा लोकतांत्रिक भगवान बनाया है, वह क्षमा भी करता है, दया भी करता है, प्रेम भी करता है। और शायद हमारे दिमाग बदल जाएंगे, हम दूसरी तरह का भगवान निर्मित कर लेंगे।
ये सारे भगवानों की कल्पनाएं हमारी निर्मित हैं। हमारा क्रिएशन है। ये धारणाएं हमारी हैं, इनसे भगवान का कोई भी संबंध नहीं है। ये हमारे ही मन के खेल हैं, इससे ज्यादा नहीं। क्योंकि स्त्रियों ने कभी भगवान नहीं बनाए अब तक इसलिए सब भगवानों की शक्ल पुरुषों जैसी है। अगर स्त्रियां बनाएं तो वे स्त्रियों जैसे भगवान बनाएंगी। और अगर पक्षी और पशु बनाएं तो वे अपनी शक्ल में बनाएंगे। क्या आप सोच सकते हैं कि घोड़े और गधे अगर भगवान की कल्पना करें तो आदमी की शक्ल में करेंगे? कोई घोड़ा और गधा आदमी को इस योग्य नहीं समझेगा कि उसकी शक्ल में भगवान को बनाए। वह अपनी शक्ल में बनाएगा, आखिर नीग्रो अपनी शक्ल में बनाता है भगवान को, चीनी अपनी शक्ल में, भारतीय अपनी शक्ल में, तिब्बती अपनी शक्ल में; नीग्रो का जो भगवान है, वह कभी सफेद रंग का नहीं हो सकता, आपको पता है, वह काले रंग का होता है। और शैतान जो है, वह सफेद रंग का होता है। लेकिन अंग्रेज का भगवान कभी काले रंग का हो सकता है? अंग्रेज का भगवान तो सफेद रंग का होता है, शैतान काले रंग का होता है।
हिंदुओं से पूछिए कि काले रंग के कौन होते हैं? वे कहेंगे कि राक्षस। लेकिन नीग्रो से पूछिए तो वह कहेगा, काले रंग के राक्षस होते हैं? वह कहेगा, काले रंग के भगवान होते हैं। और जितना शुद्ध उनका काला रंग होता है उतना किसी का भी नहीं होता, प्योरेस्ट, जो शुद्धतम काला रंग है वही भगवान का होता है। और सफेद रंग का होता है शैतान। हमारी अपनी धारणाएं, हमारी अपनी शक्ल में हम निर्मित करते हैं। यह सारी हमारी कल्पनाएं हैं।
तो भगवान का कंसेप्ट जो है, धारणा जो है, वह तो हमारी बनाई हुई है, उसका कोई मूल्य नहीं है। लेकिन हां, सत्य का एक ऐसा अनुभव भी है, जहां हम मिट जाते हैं और हम उसे जानते हैं। वहां न हम मनुष्य रह जाते, न पुरुष, न स्त्री, न भारतीय, न हिंदु, न मुसलमान वहां केवल चेतना रह जाती है, जानने को। चेतना जिसका कोई रंग नहीं है, चेतना जिसका कोई आकार नहीं है, चेतना जो हिंदू नहीं है, मुसलमान नहीं है, हिंदुस्तान की नहीं है, पाकिस्तान की नहीं है; ईसाई की और यहूदी की नहीं है, पारसी की नहीं है; चेतना मात्र रह जाती है जहां, वहां वह जाना जाता है। जो चेतना का प्राण है और केंद्र है, उसका नाम है परमात्मा। लेकिन वह धारणा नहीं है, वह अनुभव है। वह कंसेप्ट नहीं है, वह एक एक्सपीरियंस है, रिएलाइजेशन है।
भगवान की धारणा तो भय से पैदा होती है, लेकिन भगवान का अनुभव जाग्रत चित्त से पैदा होता है। और भय का कोई स्थान जाग्रत चित्त में कभी नहीं होता है। इसलिए जिसे हम धर्म मान कर चलते हैं वह धर्म नहीं है, और जिसे भगवान मान कर चलते हैं, वह भगवान भी नहीं है। अभी तो हमें इसका ही पता नहीं है कि हम कौन हैं, और क्या हैं? और हम भगवान की खोज और यात्रा पर निकल जाते हैं। हर आदमी का अहंकार अदभुत है, और जब उसे फिर नहीं अहसास होता कि भगवान मिल रहा है, तो फिर वह कल्पनाएं करना शुरू कर देता है, और कल्पनाओं को अनुभव करना भी शुरू कर देता है। और फिर उसे जिस बात की शिक्षा दी गई हो, उसकी कल्पनाएं इतनी शक्तिशाली हैं कि वह उसका अनुभव भी कर सकता है। हमारी कल्पना इतनी बड़ी है, हमारे स्वप्न देखने की शक्ति इतनी बड़ी है, कि हम अनुभव कर सकते हैं। सोया हुआ आदमी कुछ भी देख सकता है। हम भी सोए हुए लोग हैं, यांत्रिक आदमी सोया हुआ आदमी है। यांत्रिकता और सोए हुए पन में कोई फर्क नहीं है। हमें पता भी नहीं कि हम क्या कर रहे हैं?
एक गांव में एक मां और उसकी बेटी थी। उस गांव में उन मां और बेटी को रात में उठ कर नींद में चलने की आदत थी। वे स्लीप वॉकर्स थीं, वे दोनों ही। एक रात वे दोनों नींद में उठी, मां भी और बेटी भी; और अपने पीछे के बगीचे में पहुंच गईं। नींद में उठने की कई लोगों को बीमारी होती है, उनको भी थी। बगीचे में पहुंचकर जैसे ही मां ने अपनी लड़की को देखा, और उसने जोर से कहा कि चांडाल, दुष्ट तूने ही मेरी सारी जवानी छीन ली है। तू जवान होती गई और मैं बूढ़ी होती गई, तू ही है, जिसने मेरी जवानी छीन ली। तू ही है मेरी शत्रु। जैसे ही उस लड़की ने अपनी मां को देखा, उसने जोर से कहा, ओ बूढ़ी चुड़ैल! तेरी वजह से ही मेरा जीवन एक परतंत्रता बना हुआ है। तू मेरे पैरों की जंजीर बन गई है। जैसे ही वह ये बातें कर रहीं थीं, मुर्गे ने बांग दी सुबह होने को हो गई, उन दोनों की नींद खुल गई, नींद खुलते ही उस बूढ़ी औरत ने कहाः ओ मेरी प्यारी बेटी, इतनी सुबह तू उठ आई, कहीं तुझे सर्दी न लग जाए, हवा ठंडी है। और उस लड़की ने अपनी मां के पैर पड़े जैसा कि रोज सुबह वह पड़ती थी। और उसने कहाः हे पूज्य मां, सुबह तुम्हारे दर्शन करके मेरा हृदय अत्यंत आनंदित हो गया।
नींद में उन्होंने क्या कहा? और जाग कर सब क्या हो गया? नींद में शायद उन्होंने अपने हृदय की सच्ची बातें कह दीं। शायद नींद में उनके भीतर जो चलता था, वह निकल आया था। नींद में कोई अपना मालिक नहीं होता। इसलिए जो भी निकल आए, जो भी निकल आए, निकलेगा और उसको कोई रोक नहीं सकता। लेकिन जागते से ही वे अपनी मालिक हो गईं, जागते से उन्होंने अपनी बात बदल दी। शायद उन्हें खयाल भी न रहा हो कि उन्होंने नींद में क्या कहा? आपको पता है कि आपने नींद में क्या-क्या सपने देखे हैं? क्या आपको पता है कि आप अपनी नींद में, अपने सपने में, अपने पिता की आपने हत्या भी कर दी होगी? क्या आपको पता है, नींद में, सपने में आपने अपने मित्र को मार भी डाला होगा? क्या आपको पता है कि नींद में आप पड़ोसी के घर में घुस गए होंगे, उसकी सम्पत्ति चुरा ली होगी? क्या आपको पता है कि आपने नींद में क्या-क्या किया है? क्योंकि नींद में आप अपने मालिक नहीं होते। जो होता है, जो भीतर चलता है, वह चलता है; आपका कोई वश नहीं होता, उसके ऊपर।
लेकिन जैसे ही आप जागते हैं, आपकी जिंदगी में फर्क पड़ जाता है। लेकिन यह जागरण भी हमारा झूठा है, इससे भी एक और बड़ा जागरण है। उस जागरण के लिहाज से हम सब अभी भी सोए हुए हैं। और अभी भी हम एक तरह के सपने में जी रहे हैं। और अगर चेतना उस बड़े जागरण को उपलब्ध हो जाए, उस जागरण का नाम ही समाधि है, धर्म है, योग है या कुछ। और जो कहना चाहें। अगर और बड़ी चेतना में हमारे जीवन का जागरण हो जाए, तो शायद हम पाएंगे कि हम जो कर रहे थे, वह वैसा ही झूठा, फिजूल, और गलत था, जैसा कि नींद से सुबह जागकर हम पाते हैं कि हमने कैसे सपने देखे? कैसे फिजूल, कैसे एब्सर्ड, कैसे गलत? और तब हमारा जीवन बिलकुल एक नये रास्ते पर बदल जाएगा, और परिवर्तित हो जाएगा।
इसलिए मैंने जोर दिया कि हम यांत्रिक हैं। यांत्रिक होने का अर्थ है, सोए हुए हैं, हमें कुछ होश नहीं कि क्या हो रहा है? क्या चल रहा है, हमें कुछ पता नहीं है? जीवन हमारा एक अंधी यात्रा है, अंधेरे में, सोए हुए लोग हैं, वे जो भी कर रहे हैं, उनसे जो भी हो रहा है; वे जहां भी जा रहे हैं, न उन्हें दिशा का कोई पता है, न उन्हें गंतव्य का कोई बोध है कि कहां पहुंचना चाहते हैं? उन्हें कुछ भी पता नहीं। और अगर कुछ लोग इन सोए हुए लोगों के बीच जिंदगी को बदलने की कोशिश करते हैं, बिना नींद को तोड़े हुए, तो ज्यादा से ज्यादा वे जाग तो नहीं पाते, बल्कि सोए हुए लोग जो कुछ करते हैं, इनके उल्टा करना शुरू कर देते हैं।
— ओशो. [क्या मनुष्य एक यंत्र है? प्रवचन-02 ]