क्या ओशो आत्म-ज्ञानी व आत्म-द्रष्टा हैं? Was Osho an Enlightened Soul?
Question
प्रश्न – एक मित्र ने चिंता व्यक्त की है कि किसी मेरी किताब पर किन्हीं मित्रों ने छाप दिया है कि मैं आत्म-ज्ञानी हूं, आत्म-द्रष्टा हूं। एक मित्र ने लिखा है कि हमें तो शक होता है कि आप आत्म-ज्ञानी हैं, आत्म-द्रष्टा हैं।
Answer ( 1 )
जिन्होंने लिखा है वह और जिनको शक हुआ है, एक ही कोटि के लोग होंगे, दोनों में कोई फर्क नहीं है। क्योंकि किसको कैसे पता चल गया कि मैं आत्म-द्रष्टा हूं और किसी को कैसे शक हो गया कि मैं आत्म-द्रष्टा नहीं हूं। बड़े मजे की बात यह है कि मेरे बाबत चिंता करने की जरूरत ही क्या है। मैं आत्म-द्रष्टा हूं, यह चिंता करने की भी कोई जरूरत नहीं, इस बात को सिद्ध करने के लिए प्रयास करने की भी कोई जरूरत नहीं, इस पर शक करने की भी कोई जरूरत नहीं है। दोनों बातें फिजूल हैं। असल में मेरे बाबत चिंता करना फिजूल है।
सोया हुआ आदमी दूसरों के बाबत चिंता करता है, जागा हुआ आदमी अपने बाबत। ये सोए हुए आदमी के सब लक्षण हैं। जब वह विचार भी करता है तो दूसरों के बाबत। और दूसरों के संबंध में क्यों विचार करता है, अपने से बचना चाहता है, कहीं अपने बाबत विचार न करना पड़े, इससे बचने की एक तरकीब, एक रास्ता दूसरों के बाबत सोचने लगो कि कौन कैसा है, कौन क्या है? मैं कौन हूं, मैं कहां आता हूं आपके बीच में? मैं अगर निपट अज्ञानी हूं, तो कहां आपको तकलीफ होने की जरूरत है। मैं किस जगह आपके बीच में आता हूं। मेरे संबंध में सोचने की आवश्यकता क्या है। बड़ी कृपा होगी, अपने संबंध में सोचें। बड़ी कृपा होगी अपने संबंध में संदेह करें, बड़ी कृपा होगी अपने संबंध में चिंतन करें। क्योंकि जो अपने संबंध में सोचेगा उसका सोच-विचार उसे बताएगा कि वह बिलकुल मशीन की भांति जी रहा है। उसका विचार उसे बताएगा कि वह सोया हुआ है, उसका विचार उसे बताएगा कि वह एक यंत्र से ज्यादा नहीं है। और यह विचार अगर उसे खयाल में आ जाए तो इससे इतनी पीड़ा होगी, इस विचार से कि इस स्थिति को बदलने का एक उपक्रम पैदा हो जाएगा, एक क्रांति उसके भीतर पैदा हो जाएगी। लेकिन मेरे संबंध में निर्णय करने से क्या होगा?
मेरे पास लोग आते हैं, वे पूछते हैं कि क्राइस्ट को ज्ञान मिला था या नहीं? महावीर सर्वज्ञ थे या नहीं? रामकृष्ण परमहंस परमहंस थे या नहीं?
मैं बड़ा हैरान हूं! आपने किस भांति और कब यह ठेका ले लिया है, इन सारे लोगों पर विचार करने का? और किसने आपको यह ठेका दिया है? और आप कैसे निर्णायक बन सकेंगे? जिन्हें अपना कोई होश भी नहीं, वे भी क्राइस्ट और कृष्ण का निर्णायक बनने की हिम्मत करते हैं, कि वे निर्णय करें कि उनको मिला कि नहीं। इसी पागलपन ने तो सारी दुनिया में उपद्रव पैदा किए हैं।
जिन लोगों ने क्राइस्ट को सूली लगाई उनको शक हो गया कि इस आदमी को ज्ञान हुआ है कि नहीं। फांसी पर लटका दिया। निर्णायक बन गए लोग, और निर्णय लेने में हम इतनी जल्दी करते हैं, दूसरे के बाबत निर्णय लेने में, अपने बाबत निर्णय तो हम कभी लेते ही नहीं, जल्दी का कोई सवाल ही नहीं।
पूरी जिंदगी बीत जाती है, कोई अपने बाबत निर्णय नहीं लेता कि मैं क्या हूं, और कहां हूं? लेकिन दूसरे के संबंध में एक क्षण नहीं खोते हम। और भी एक मजा है, अगर मैं आपसे कहूं कि फलां आदमी बहुत अच्छा है, तो आप पच्चीस दलीलें करेंगे मुझसे कि नहीं मुझे तो शक है, क्योंकि उस पर एक दफा मुकदमा चला था। और मुझे तो शक है, वह पड़ोसी की स्त्री से बातें करता हुआ देखा गया था। और मुझे तो शक है कि उसने नया मकान बनाया है, उसमें ब्लैक का रुपया जरूर लगाया होगा। लेकिन अगर मैं आपसे कहूं कि फलां आदमी चोर है, आप कहेंगे बिलकुल निश्चित, कोई शक आप नहीं करेंगे। बड़ी हैरानी की बात, अगर किसी की बुराई हम करें तो हम कभी शक नहीं करते। लेकिन हम किसी के बाबत बताएं, उसकी कोई भलाई की चर्चा करें; हम फौरन शक करते हैं, क्यों? यह ऐसा क्यों होता है? किसी की निंदा पर आपने कभी शक किया है? किसी ने किसी की बुराई बताई तो आपने खोज-बीन की है कि यह कहां तक सच है? नहीं, आपने बड़े सरल मन से विश्वास कर लिया है कि बिलकुल ठीक कह रहे हैं, क्यों?
असल में हम जब भी किसी के बाबत सुनते हैं कि वह आदमी गलत है, तो हमें दो फायदे होते हैं। एक फायदा तो यह कि हमें खुद गलत होने की छूट मिल जाती है कि जब सभी लोग गलत हैं तो फिर खुद गलत होने में क्या अड़चन? इसलिए हम बिलकुल चुपचाप मान लेते हैं कि दूसरे आदमी के बाबत जो गलत बात कही गई है, वह ठीक होगी। कोई के भी बाबत हम मान लेते हैं कि ठीक होगी। हमें सुविधा मिल जाती है गलत होने की। फिर हमें बेचैनी नहीं रह जाती, जब सभी लोग गलत हैं तो खुद के गलत होने में कोई बेचैनी, कोई परेशानी नहीं रह जाती।
दूसरी बात दूसरे को गलत जान कर हमें खुद को बड़ा रस आता है कि हम, हम तो इन सबसे बेहतर हैं, अच्छे हैं। एक अहंकार की तृप्ति होती है। लेकिन अगर कोई किसी की प्रशंसा करता हो, तो हमें अड़चन होती है क्योंकि किसी दूसरे का बेहतर होना हमारे अहंकार को चोट लगती है, तो हम पच्चीस छान-बीन करते हैं, खोज-बीन करते हैं। और जिंदगी इतनी अदभुत है कि क्राइस्ट और कृष्ण को जानना तो दूर, आपके पड़ोस में जो आदमी रहता है, उसको जानना भी आसान नहीं है। क्योंकि वह आदमी आपसे बहुत दूर है, खुद को जानना ही कठिन है, जो आप अपने बिलकुल निकट हैं। जिंदगी इतनी मिस्टीरियस है, जिंदगी इतनी रहस्यपूर्ण है कि जो आदमी समझदार है, वह कभी किसी दूसरे के बाबत कोई निर्णय नहीं लेता।
एक रात एक घटना घटी। एक शादी में कोई दो सौ, उस नगर के सारे प्रतिष्ठित लोग इकट्ठे थे। और एक मित्र आया और उसने अपनी जेब से एक सिक्का निकाला जो कोई तीन हजार वर्ष पुराना इजिप्त का सिक्का था। और उसने कहा कि इस तरह के दो ही सिक्के हैं दुनिया में, एक यह है और एक और किसी आदमी के पास। इस सिक्के को मैंने बीस हजार रुपये खर्च करके खरीदा है। तीन हजार वर्ष पुराना सिक्का है, बस ऐसे दो ही सिक्के हैं इतने पुराने। तो मैंने सोचा कि आप शायद देख कर खुश होंगे इसलिए मैं ले आया, कोई दो सौ लोग थे, सिक्का एक हाथ से दूसरे हाथ में चला गया, लोग देखने लगे। और अनेक लोगों ने उसे घेर लिया। और लोग पूछने लगे बीस हजार में खरीदा है, ऐसी इसमें क्या खूबी है? कितना पुराना है, किस राजा के वक्त का है? और किस सन् का है? ये सारी बातें होने लगीं। आधा घंटे बाद उसने फिकर की कि वह सिक्का कहां है? सिक्का मिलना मुश्किल हो गया। जिससे भी पूछा गया, उसने कहा, मैंने देखा तो जरूर, मैंने किसी और को दे दिया। वह सिक्का भीड़ में भटक कर खो गया और मिलना कठिन हो गया। अब सिवाय…परेशानी खड़ी हो गई। शादी का काम तो स्थगित हो गया और सिक्के को खोजना जरूरी हो गया। लोगों ने सलाह दी कि सारे लोग अपनी जेबों की तलाशी दे दें, अब तो और कोई रास्ता नहीं है। सभी लोग राजी हो गए कि हमारी जेबें देख ली जाएं, हमने तो लिया नहीं। लेकिन एक आदमी ने इनकार कर दिया। उसने कहा कि मैं चोर नहीं हूं यह मैं कहे देता हूं, मैंने सिक्का नहीं लिया, यह मैं बता देता हूं, मैं यहां शादी में सम्मिलित होने आया हूं, अपनी जेबों की तलाशी देने नहीं। मैंने आपसे कहा भी नहीं था कि सिक्का दिखलाइए, तो मैं चोर नहीं हूं, यह मैं कहे देता हूं, लेकिन मेरी जेब में हाथ डालने की कोई कोशिश न करें।
अगर आप वहां मौजूद होते तो क्या करते? क्या सोचते? जो लोग मौजूद होते थे, वहां उन्होंने भी यही सोचा कि इस आदमी में जरूर कोई गड़बड़ है। सिक्का अगर इसने नहीं चुराया है तो इतनी जिद्द की क्या बात है कि मैं अपनी जेब नहीं दिखलाऊंगा। आखिर लोगों ने तय किया कि जबरदस्ती करनी पड़ेगी। उस आदमी ने अपनी जेब से पिस्तोल निकाल ली और उसने कहा कि क्षमा करिए, जबरदस्ती का परिणाम खतरनाक हो सकता है।
अब बात बहुत बिगड़ गई। सिवाय इसके कि पुलिस को खबर की जाए, कोई मार्ग न रहा। पुलिस को फोन करके खबर की गई। दरवाजे मकान के बंद कर दिए गए ताकि कोई निकल न सके, और सबसे कहा गया कि जो जहां है, वह वहीं खड़ा रहे। पुलिस आने को ही थी एक नौकर ने मेज पर से कोई बर्तन उठाया और हैरानी हुई वह सिक्का उस बर्तन के नीचे रखा हुआ था। वह सिक्का मिल गया तो सारे लागों ने उस सज्जन को कहा कि तुम कैसे पागल हो? जब तुमने सिक्का नहीं लिया था, तो इनकार करने और पिस्तोल निकालने की क्या जरूरत थी? उसने अपने खीसे में हाथ डाला और दूसरा सिक्का निकाल कर बाहर रख दिया और उसने कहा कि दूसरे सिक्के का मालिक मैं हूं, जिसकी ये चर्चा कर रहे थे। मैं भी यह सोच कर आया था कि दिखा दूंगा अपना सिक्का, लेकिन उन्होंने पहले दिखा दिया, तो फिर मैंने सोचा, अब कोई मतलब नहीं है, मैं चुप रह गया। लेकिन पांच मिनट पहले कौन मेरा विश्वास कर सकता था कि मैं इस सिक्के का मालिक मैं हूं। मैं चोर था। पांच मिनट पहले कौन विश्वास कर सकता था कि मैं इसका मालिक हूं। आपमें से कोई विश्वास कर सकता था पांच मिनट पहले? आपमें से कोई पांच मिनट पहले संदेह करने से बच सकता था कि यह आदमी चोर है?
अगर ऐसा कोई आदमी आपके भीतर हो तो वह समझ ले कि वह जागा हुआ आदमी है, सोया हुआ आदमी नहीं है। लेकिन नहीं! हम सभी शक कर जाते कि यह आदमी चोर है। और अगर सिक्का उसके खींसे से मिल जाता तब तो बात पक्की हो जाती कि यह आदमी चोर है। कोई दुनिया में मानने को राजी नहीं होता कि यह सिक्का इसका है। लेकिन वह सिक्का उसका था। जिंदगी इतनी ही मिस्टीरियस है। जिदंगी इतनी ही रहस्यपूर्ण है। इसलिए जो जानते हैं वे निर्णय नहीं लेते।
सामान्य आदमी के बाबत भी निर्णय लेना अधार्मिक कृत्य है। पाप है। तो किसी और के बाबत निर्णय लेने का तो कोई अर्थ नहीं, कोई प्रयोजन नहीं।
फिकर छोड़ दें, रामकृष्ण की, अरविंद की, रमन की, किसको क्या हुआ, किसको नहीं हुआ? कृपा करें मुझ पर भी दया करें और मेरी भी फिकर छोड़ दें। इससे आपका कोई संबंध नहीं है, कोई वास्ता नहीं है। क्यों यह जानना चाहते हैं? शायद एक कारण जो हम जानना चाहते हैं ; इस तरह की बात कि आपको आत्म-ज्ञान हुआ या नहीं? आपको ईश्वर की उपलब्धि हुई या नहीं, इस तरह के प्रश्न हैं, आपको आत्मसाक्षात्कार हुआ या नहीं? आपको अभी सत्य मिल गया है? यह क्यों जानना चाहते हैं? शायद इसलिए कि अगर मैं कह दूं कि हां, मुझे सत्य मिल गया है, मैंने ईश्वर को पा लिया है, तो शायद आप मेरे पैर पड़ने लगें और मुझसे कान फुंकवाने के लिए प्रार्थना करने लगें कि आप हमारा कान भी फूंक दें, हमको भी सत्य मिलने की राह बता दें। और भगवान आपको मिल गया है तो थोड़ा बहुत, छटाक-आधी छटाक हमको भी देने की कृपा करें। किसलिए? क्यों यह चिंता है? क्यों यह विचार है? मैं आपको कहूं सत्य कोई किसी को दे नहीं सकता, और परमात्मा किसी को मिला हो, न मिला हो, आपको देने में असमर्थ है।
सत्य की और परमात्मा की खोज अत्यंत निजी और व्यैक्तिक है। इसलिए इसकी चिंता ही छोड़ दें कि किसको मिला और किसको नहीं मिला है। एक बात जान लें कि आपको मिला है या नहीं मिला है, यह सोच लें। मुझे मिला है या नहीं यह मैं सोच लूं, न मिला हो तो खोज पर निकल जाऊं , मिल गया हो तो बात समाप्त हो गई। लेकिन किसी दूसरे के विचार से कोई अर्थ नहीं, कोई प्रयोजन नहीं। हम यह विचार इसीलिए करते रहे हैं आज तक कि हमको यह खयाल है कि किसी दूसरे से हमको मिल सकेगा। किसी दूसरे से कभी किसी को नहीं मिलता। और इस जमीन पर करोड़ों लोगों को नहीं मिल सका, उसका एक कारण यह है कि अधिकतम लोग यह सोच रहे हैं कि कोई हमें दे देगा। हम किसी के पैर पड़ेंगे और किसी को आदर देंगे, और किसी को गुरु मान लेंगे तो वह हमको दे देगा। सत्य ऐसी कोई वस्तु नहीं है कि दी जा सके।
सत्य अनुभव है। और परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है कि मैं आपको ले जाऊं और दिखा दूं कि देखिए ये परमात्मा बैठे हुए हैं। परमात्मा एक अनुभूति है जो आपके प्राणों के प्राण में उदित होगी। वह कहीं आपके बाहर नहीं है कि कोई बता सके कि यह है आ जाओ और इसे ले लो। अगर ऐसा होता तो हमने अब तक जरूर दुकानें खोल दी होतीं जहां हम परमात्मा को बेचते। ऐसे कुछ समझदार लोगों ने खोल दी हैं। मंदिर हैं, मस्जिद हैं, पोप हैं, पादरी हैं, वे क्या कर रहे हैं? वे दुकानें खोले हुए बैठे हैं। जरूर उनसे आप पूछें, तो वे आपके पूछने के पहले खुद ही बताते हैं कि हां मैं ईश्वर का प्रतिनिधि हूं जमीन पर। मैं पैगंबर हूं, मैं ईश्वर का पुत्र हूं। मैं तीर्थंकर हूं। मैं ही हूं ईश्वर का अधिकारी जमीन पर, वह आपके पूछने के पहले ही आपको बता देते हैं। और उनके इस बताने से ही उनका सारा शोषण चलता है। या तो वे लोग इस बात की घोषणा करते हैं कि हां मुझे मिल गया है, आओ, जो आपका किसी भांति शोषण करना चाहते हैं, या वे लोग इस तरह की घोषणा करते हैं जिनके दिमाग खराब हो जाते हैं, और जो पागल हो जाते हैं।
बगदाद में एक खलीफा ने एक आदमी को पकड़वाया जो सड़कों पर यह घोषणा कर रहा था कि मैं पैगंबर हूं। और मोहम्मद के बाद मुझे परमात्मा ने भेजा है कि मैं जाऊं और दुनिया का सुधार कर दूं। दुनिया का सुधार का खयाल जिनको पैदा होता है, उनके दिमागों में जरूर कुछ खराबी होती है। क्योंकि आदमी अपना सुधार कर ले यह काफी है, बहुत काफी है। और अगर उसका सुधार हो जाए तो उससे जो सुगंध फैलनी शुरू होगी वह जरूर दूसरों को सहयोगी होगी। लेकिन दूसरे के सुधार का खयाल अहंकार से ज्यादा और कुछ भी नहीं है। उस आदमी ने घोषणा कर दी सड़कों पर कि मैं पैगंबर हूं। अब मुसलमान यह बरदाश्त नहीं कर सकते हैं कि कोई कहे कि मैं पैगंबर हूं। और न हिंदू यह बरदाश्त कर सकते हैं कि कोई कहे कि मैं अवतार हूं। न जैन यह बरदाश्त कर सकते हैं कि मैं आ गया पच्चीसवां तीर्थंकर। कोई यह बरदाश्त नहीं कर सकता। क्यों? क्योंकि मुर्दा तीर्थंकर और पैगंबर बहुत अच्छे होते हैं, वेे कोई गड़बड़ नहीं करते, कोई क्रांति नहीं करते, कोई परेशानी नहीं करते। जिंदा पैगंबर और तीर्थंकर बहुत खतरनाक भी हो सकते हैं। पहला खतरा तो यह होता है कि वह पुराने तीर्थंकरों को और पैगंबरों को उखाड़ना शुरू कर देते हैं कि वे सब गलत थे, सही मैं हूं।
तो मुसलमान खलीफा ने उसको पकड़वा कर बुलवा लिया कि तुम पागल हो गए हो क्या? मोहम्मद के बाद अब कोई पैगंबर होने वाला नहीं है। लास्ट प्रॉफेट परमात्मा भेज चुका अपना अंतिम आदमी। बार-बार भेजने की जरूरत क्या है? परमात्मा कोई भूल-चूक थोड़े ही करता है कि फिर आदमी भेजे कि अब सुधार कर आओ। उसने अपनी फाइनल किताब भेज दी, खबर उसने भेज दी कि मेरी आखिरी किताब है, अब इसके अनुसार जीओ, अब कोई पैगंबरों के आने की जरूरत नहीं है। कल तक विचार कर लो, उसे कैद खाने में बंद करवा दिया। दूसरे दिन सुबह वह गया और हथकड़ियों में बंधे हुए खंभे से, उस पैगंबर से उसने कहा कि मित्र! कुछ समझ आई। छोड़ दो यह खयाल नहीं तो हत्या के सिवाय कोई रास्ता नहीं है। गर्दन कटवा दी जाएगी, मुफ्त मर जाओगे। सोच लो एक दफा और, कह दो यह बात कि मुझसे गलती हो गई।।मैंने कहा कि मैं पैगंबर हूं।
वह आदमी हंसा, और उसने कहाः मैं तुम्हारी मानंू या भगवान की मानूं? भगवान ने मुझसे कहा कि तुम पैगंबर हो, मैं तुम्हारी मानूं! और रही इस बात की फिकर मत करो कि तुम मुझे फांसी लगा दोगे, पैगंबरों को हमेशा फांसियां लगती रही हैं, कोई नई खबर है? यह तो सबूत होगा मेरा कि मैं पैगम्बर था, कि मुझ पर मुसीबतें आईं। मुसीबतें आती रही हैं पैगंबरों पर। यह कोई नई बात नहीं।।मोहम्मद सताए गए, क्राइस्ट सताए गए, सब पैगंबर सताए गए, मैं भी सताया जाऊंगा, यह तो पहले से पता है। तो तुम इसकी फिकर मत करो, लेकिन मैं पैगंबर हूं। यह बात ही चल रही थी कि पीछे सींखचों के बंद, सींखचों के भीतर से एक आदमी चिल्लाया कि यह आदमी बिलकुल गलत कह रहा है, खलीफा इसकी बात मत मानना। मैंने मोहम्मद के बाद किसी को पैगंबर बना कर भेजा ही नहीं। वह आदमी एक महीने पहले पकड़ा गया था। उस आदमी को यह खयाल थाः मैं स्वयं परमात्मा हूं, पैगंबर-वैगंबर नहीं।।स्वयं परमात्मा। उसने कहाः यह आदमी बिलकुल गलत कह रहा है, मोहम्मद के बाद चैदह सौ साल हो गए, मैंने किसी को भेजा ही नहीं। और भेजूंगा क्यों? मोहम्मद ने सब ठीक काम किया है।
ये लोग इस तरह की घोषणाएं करने वाले लोग, विक्षिप्त हैं। जिसको परमात्मा का अनुभव होगा, उसे सबके भीतर परमात्मा दिखाई पड़ने लगेगा। उसे ऐसा नहीं दिखाई पड़ेगा कि मैं परमात्मा हूं, क्योंकि यह खयाल कि मैं परमात्मा हूं किस बात पर खड़ा है? इस बात पर कि तुम परमात्मा नहीं हो। अगर सभी कुछ परमात्मा है तो मैं कहां रह जाता हूं, मैं कहां ठहरता हूं! ये घोषणाएं कि मुझे आत्म-ज्ञान हो गया, यह घोषणा कि मुझे ज्ञान उपलब्ध हो गया, नासमझी की घोषणाएं हैं। क्योंकि जो आदमी जितना गहरा जाएगा, वह पाएगा जीवन इतना रहस्यपूर्ण है कि उसे जाना ही नहीं जा सकता। जो आदमी पूरी गहराई में स्वयं में प्रविष्ट होगा, वह पाएगा कि जानना नासमझी के सिवाय और कुछ भी नहीं है। जीवन का रहस्य अत्यंत अगम है। सत्य का कोई ओर-छोर नहीं है। परमात्मा की कोई सीमा नहीं है कि मैं उसे जान सकूं। मैं केवल उसमें मिट सकता हूं। और उसके साथ एक हो सकता हूं, लेकिन जान नहीं सकता। जानने का भ्रम अज्ञान के सिवाय और कुछ भी नहीं है।
एक बूंद सागर में गिर जाती है तो सागर हो जाती है, लेकिन सागर को जान थोड़े लेती है। सागर हो जाती है। एक व्यक्ति जब अपने अहंकार से मुक्त हो जाता है, तो परमात्मा के साथ एक हो जाता है, परमात्मा को जान लेने का क्या मतलब? जान तो हम उसे सकते हैं जो हमसे दूर हो और अलग हो, वह तो हमारे प्राणों का प्राण है। और जान हम उसे सकते हैं जिसकी सीमा हो, जान हम उसे सकते हैं जो क्षुद्र हो। जान हम उसे सकते हैं जो हमसे छोटा हो। हमारी बुद्धि जिससे बड़ी हो, उसको हम जान सकते हैं।
परमात्मा को जानने की घोषणा नासमझी और पागलपन के सिवाय और कुछ भी नहीं है। जो व्यक्ति जैसे-जैसे जागता है और भीतर जाता है, और वह पाता है कि जीवन तो है अननोन। अननोन ही नहीं, अज्ञात ही नहीं, अननोएबल, अज्ञेय। और वह जानता है कि जीवन है अज्ञेय। और सत्य है अज्ञेय। और मैं हूं ना-कुछ। नहीं, ना-कुछ, शून्य। कौन जाने, मिट जाता है व्यक्ति। और उस मिटने में हो जाता है एक किसी जीवन के केंद्र के साथ। लेकिन तब वह घोषणा करने, चिल्लाने आता नहीं कि मैंने जान लिया है।
रामकृष्ण कहा करते थे, एक बार समुद्र के किनारे मेला भरा था। उसमें आदमी भी गए देखने और कुछ नमक के पुतले और पुतलियां भी गए। सच तो यह है कि मेलों में आदमी तो शायद ही जाते हों, पुतले-पुतलियां ही ज्यादा जाते हैं। तो नमक के पुतले भी उसको देखने चले गए। और नदी के किनारे, समुद्र के किनारे खड़े होकर विचार करने लगे कि कितना गहरा है यह समुद्र। एक नमक के पुतले ने कहा तुम ठहरो, मैं जाता हूं और अभी थाह का पता लगा कर आता हूं। वह नमक का पुतला उसी तरह का आदमी रहा होगा, जिस तरह आदमियों में नेतागण होते हैं। आगे चलने वाले लोग। वह भी एक लीडर एक नेता रहा होगा पुतलियों का, वह कूद पड़ा। लेकिन मेला उजड़ गया, दिन आए और गए, और वह पुतला वापस नहीं लौटा। बाकी पुतले थक गए और लौट गए। वह पुतला वापस नहीं आया बताने कि समुद्र कितना गहरा है? नमक का पुतला था समुद्र में गया तो खो गया। नमक पिघल गया और समुद्र के साथ एक हो गया। कौन लौटे और कहे कि मैंने जान ली समुद्र की गहराई, कि यह है गहराई!
जो लोग परमात्मा को खोजने जाते हैं, वे परमात्मा को तो नहीं पाते, खुद को जरूर खो देते हैं। और वह जो खो देना है, वही परमात्मा का पा लेना है, लेकिन तब घोषणा करने वाला कोई अहंकार नहीं रह जाता कि मैंने पा लिया है। लेकिन हम इसकी तलाश करते हैं कि कोई कहे, दावे के साथ कि मैंने पा लिया है। हम हैं इतने कमजोर लोग कि जब कोई जोर से टेबल ठोक कर कहता है कि मैंने पा लिया है तो हमारी हिम्मत नहीं पड़ती, हम सोचते हैं जब इतने जोर से कहता है, तो जरूर पा लिया होगा। इसलिए जिसको पा लेने की घोषणा करनी हो उसे धीरे-धीरे नहीं करनी पड़ती, बहुत जोर से करनी पड़ती है। और जब हमें लगता है कि यह आदमी इतने जोर से कह रहा है, तो इसने जरूर पा लिया होगा तो हम उसके पैर पकड़ते हैं और सोचते हैं कि शायद हमको भी दिलवा दे। भगवान से दोस्ताना है इसका, जैसे मिनिस्टरों से किसी का दोस्ताना होता है। कुछ न कुछ रास्ता बना देगा, कुछ रिश्वत की जरूरत होगी, तो हम करेंगे इंतजाम। भगवान की स्तुति करेंगे, प्रार्थना करेंगे कि हे पतित पावन! तुम महान हो, हम छोटे हैं, दया करो, कृपा करो। और इसकी बीच में दलाली होगी, यह बीच में रहेगा, कुछ इंतजाम हो जाएगा; कुछ करवा देगा। सारी गुरुडम हमारी इसी पागलपन पर खड़ी हुई है, सारे गुरुओं का धंधा हमारे इसी पागलपन पर खड़ा हुआ है।
मैं आपका गुरु नहीं हूं इसलिए मुझे यह दावा करने की कोई जरूरत नहीं है कि मैंने आत्मा को पा लिया है, या ज्ञान को पा लिया। और न मैं आपका गुरु होना चाहता हूं। इसलिए आप बिलकुल फिकर छोड़ दें कि मैंने पाया कि नहीं पाया। इसकी कोई भी खोज की जरूरत नहीं है। खोजें इस बात को कि आप कहां खड़े हैं? आप कहां हैं, किस चित्त की दशा में हैं? और उसे तोड़ें। और उसका प्रयास करें। नींद की स्थिति में हम हैं। और नींद टूटनी जरूरी है।
— ओशो [क्या मनुष्य एक यंत्र है? – प्रवचन-04]
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