ओशो ने आज के मुनष्य को यंत्र या मैकेनिकल क्यों कहा? क्या हम मशीन की तरह जीने लगे है?

Question

प्रश्न – पूछा गया हैः मैं मनुष्य को यंत्र क्यों कह रहा हूं?

Answer ( 1 )

  1. एक छोटी सी कहानी से आपको यह समझाना चाहूंगा।

    एक सुबह एक गांव में बुद्ध का आगमन हुआ था। उन्होंने उस गांव के लोगों को समझाना शुरू किया; सामने ही एक व्यक्ति बैठ कर अपने पैर का अंगूठा हिलाए जा रहा था, बुद्ध ने बोलना बंद करके उस व्यक्ति को कहाः मेरे मित्र, तुम्हारा अंगूठा क्यों हिलता है? तुम्हारा यह पैर क्यों हिलता है? जैसे ही बुद्ध ने यह कहा, यह पूछा कि तुम्हारा पैर क्यों हिलता है, उसके पैर का हिलना बंद हो गया। और उस व्यक्ति ने कहा, जहां तक मेरा सवाल है, मुझे इसका स्मरण भी नहीं था कि मेरा पैर हिल रहा है! आपने कहा, मुझे स्मरण आया और मेरा पैर रुक गया।

    मुझे खयाल भी नहीं था, बोध भी नहीं था कि मेरा पैर हिल रहा है। बुद्ध ने कहा, तुम्हारा पैर है, और हिलता है, और तुम्हें पता नहीं? तो तुम आदमी हो या यंत्र हो?
    यंत्र हम उसे कहते हैं, जिसे अपनी गति का कोई बोध नहीं है। यंत्र हम उसे कहते हैं, जिसे अपनी गति का कोई बोध नहीं है। उसमें गति हो रही है, लेकिन उसे कुछ पता नहीं है। उसे कोई होश नहीं है, उस गति का। मनुष्य को मैंने यंत्र कहा इसलिए कि जो कुछ हममें हो रहा है न तो हमें उसका पता है कि वह क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है, और न ही हम उसके मालिक हैं कि हम चाहें तो वह हो, और हम चाहें तो वह न हो। कोई भी यंत्र अपना मालिक नहीं होता। आदमी भी अपना मालिक नहीं है। इसलिए उसे मैंने यंत्र कहा। आपके भीतर जब भय पैदा होता है, फीयर पैदा होता है, तब आप उसे पैदा करते हैं? या कि आप उसके मालिक होते हैं? या कि आप चाहें तो उसे पैदा न होने दें? या जब आप चाहें तब भय को पैदा कर लें? कुछ भी आपके हाथ में नहीं है। आप अपने ही हाथ में नहीं हैं। कितनी बार नहीं ऐसा मौका आता है कि हम कहते हैं, मेरे बावजूद यह हो गया, इंस्पाइट ऑफ मी। कितनी बार नहीं हम यह कहते हैं कि मैं तो नहीं चाहता था, फिर भी यह हो गया। अगर आप ही नहीं चाहते थे और आपके भीतर कुछ हो जाता है, इसका क्या अर्थ हुआ? इसका अर्थ हुआ आप अपने मालिक नहीं हैं। कोई यंत्र अपना मालिक नहीं होता। लेकिन मनुष्य तो अपना मालिक होगा। उसके जीवन में, उसके विचार में, उसके भाव में, वह स्वामी होगा, उसका अधिकार होगा। और यह स्वामित्व, यह मालकियत तभी उपलब्ध हो सकती है, जब उसे अपने जीवन की सारी क्रियाओं का बोध हो, अवेयरनेस हो। वह उसे जानता हो, पहचानता हो। न तो हम पहचानते हैं और न हम मालिक हैं।
    एक गांव में एक महिला ने उस गांव में आए हुए एक फकीर के पास अपने बच्चे को ले जाकर मौजूद किया और उस फकीर को कहा कि मेरा यह बच्चा रोज-रोज बिगड़ता जाता है। इसने सारी शिष्टता और सभ्यता छोड़ दी है, इसने सारे नियम तोड़ दिए हैं, हमारे परिवार के। इसे थोड़ा आप भयभीत कर दें, डरा दें, शायद ये ठीक हो जाए। उस फकीर ने इतनी बात सुनी, उसने जोर से आंखें निकाली, हाथ-पैर हिलाए और वह कूद के उस बच्चे के सामने खड़ा हो गया, जैसे उसकी जान ले लेगा। वह बच्चा तो इतना घबड़ा गया कि वह भागा। लेकिन फकीर कूदता ही गया और इतने जोर से चिल्लाया कि बच्चा तो भाग गया, उसकी मां बेहोश होकर गिर पड़ी। और जब उसकी मां बेहोश होकर गिर पड़ी, तो वह फकीर भी निकल भागा। थोड़ी देर बाद जब उस स्त्री को होश आया, तो उसने बैठ कर प्रतीक्षा की कि वह फकीर आ जाए, थोड़ी देर बाद वह फकीर भीतर लौटा। उस स्त्री ने कहा आपने तो हद कर दी, मैंने बच्चे को डराने को कहा था, मुझे डराने को नहीं कहा था।
    वह फकीर बोला तू पूछती है, तेरी; माना कि तूने बच्चे को डराने को कहा था, लेकिन जब बच्चे को मैंने डराया, तो मुझे खयाल भी न था, कि तू भी डर जाएगी। तू क्यों डर गई? और जब तू डर गई, और तू बेहोश हो गई, तो मुझे पता भी नहीं था कि मैं भी डर जाऊंगा? तुझे बेहोश देख कर मैं भी डर गया और भाग गया। जब भय ने पकड़ा तो उसने बच्चे को ही नहीं पकड़ा, तुझे भी पकड़ लिया और मुझे भी पकड़ लिया। उस फकीर ने कहा सच्चाई यह है कि मुझमें भी चीजें घटित होती हैं, मैं भी उनका मालिक नहीं हूं, तू भी उनकी मालिक नहीं है, बच्चा भी उनका मालिक नहीं है। भय ने पकड़ लिया, उस पर हमारी कोई मालकियत न रही। और जब तू भी भयभीत हो गई तो मुझे भी खयाल न रहा कि यह क्या हो रहा है? मैं भी घबड़ा गया और मैं भी भयभीत हो गया और भाग गया।
    जीवन में हमारे भय, क्रोध, घृणा, हिंसा, प्रेम वे सब घटित हो रहे हैं, उन पर हमारा कोई काबू नहीं है। उनके प्रति काबू होना दूर हमें कोई होश भी नहीं है कि क्या हो रहा है? इसलिए मैंने कहा कि मनुष्य एक यंत्र है। लेकिन यह इसलिए नहीं कहा कि मनुष्य एक यंत्र है, तो बात समाप्त हो जाए, यहां बात समाप्त नहीं होती, यहीं बात शुरू होती है। मनुष्य यंत्र है, यह इसीलिए कह रहा हूं आपसे, किसी मशीन से जाकर यह नहीं कहता हूं कि मशीन! तुम मशीन हो। किसी यंत्र से भी जाकर नहीं कहता हूं कि यंत्र! तुम यंत्र हो। मनुष्य से यह कहा जा सकता है कि तुम यंत्र हो। क्योंकि मनुष्य यदि इस सत्य को समझ ले, तो यंत्र होने के ऊपर भी उठ सकता है। मनुष्य के भीतर यह संभावना है कि वह एक सचेतन आत्मा और व्यक्तित्व बन जाए। लेकिन यह एक संभावना है, यह एक सच्चाई नहीं है। यह हो सकता है, लेकिन यह है नहीं। एक बीज की यह संभावना होती है कि वह वृक्ष बन जाए, लेकिन बीज वृक्ष नहीं है। और अगर कोई बीज भूल से यह समझ ले कि मैं वृक्ष हूं तो फिर वह कभी वृक्ष नहीं बन सकेगा, उसकी संभावना भी समाप्त हो जाएगी। एक बीज को यह जानना ही चाहिए कि मैं बीज हूं, और वृक्ष नहीं। और इस बात को जानने के साथ ही, इस संभावना के द्वार भी खुल सकते हैं कि वह वृक्ष हो जाए।
    मनुष्य एक बीज है, चेतना के लिए लेकिन अभी चेतना नहीं। अभी तो यंत्र है। और अगर इस सारी स्थिति को ठीक से समझ ले, यह अपनी सिचुएशन, यह उसकी चित्त की पूरी दशा, अगर उसे पूरी-पूरी स्पष्ट हो जाए तो इसी के स्पष्ट होने के साथ-साथ उसके भीतर कोई शक्ति जागने लगेगी, जो उसे मनुष्य बना सकती है। मनुष्य, मनुष्य की भांति पैदा नहीं होता, एक बीज की भांति पैदा होता है। उसके भीतर से मनुष्य का जन्म हो सकता है। लेकिन कोई भी मनुष्य, मनुष्य की भांति जन्मता नहीं है। और अधिक लोग इस भूल में पड़ जाते हैं कि वे मनुष्य हैं, और यही भूल उनके जीवन को नष्ट कर देती है।
    जन्म के साथ हम एक पोटेंशियलिटी की तरह, एक बीज की तरह पैदा होते हैं, लेकिन हम उसी को समझ लेते हैं कि हमारा होना समाप्त हो गया, तो हम वहीं ठहर जाते हैं। बहुत कम लोग हैं जो जन्म के ऊपर उठते हों, और जन्म का अतिक्रमण करते हों। जन्म पर ही रुक जाते हैं। जन्म के बाद फिर उनमें कोई विकास नहीं होता। हां, यंत्र की कुशलता बढ़ जाती है, लेकिन यांत्रिकता के ऊपर उठने का कोई, कोई चरण, कोई कदम नहीं उठाया जाता। और वह कदम उठाया भी नहीं जा सकता, जब तक हमें यह खयाल ही पैदा न हो कि हम क्या हैं? इसलिए पहली बात जो मैंने कल आपसे कहनी चाही वह यही कि मनुष्य यदि यह अनुभव कर ले कि वह एक यंत्र है, तो वह मार्ग स्पष्ट हो सकता है, जिसकी यात्रा करने के बाद वह यंत्र न रह जाए। लेकिन हमारे अहंकार को इस बात से बड़ी चोट लगती है कि कोई हमसे कहे कि हम एक यंत्र हैं। मनुष्य के अहंकार को इससे बड़ी चोट लगती है कोई उससे कहेे कि तुम एक मशीन हो।
    मनुष्य को तो इस बात के सुनने में बहुत मजा आता है कि तुम एक परमात्मा हो। तुम्हारे भीतर भगवान वास कर रहा है, इस बात को सुनने में उसे बहुत मजा आता है, इसलिए वह मंदिरों में, मस्जिदों में इकट्ठा होता है, और उन लोगों के पैर पड़ता है, जो उसे समझाते हैं कि तुम तो स्वयं भगवान हो। उसे यह बात सुनकर बड़ा आनंद मालूम होता है कि मैं भगवान हूं। उससे कोई यह कहे कि तुम एक मशीन हो तो उसे बड़ी चोट लगती है, लेकिन कोई उससे कहे कि तुम एक भगवान हो, तो उसे बहुत आनंद मिलता है, उसके अहंकार की बड़ी तृप्ति होती है। उसके ईगो को बड़ा सहारा मिलता है कि मैं भगवान हूं। लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूं इस सत्य को बहुत ठीक से समझ लेना जरूरी है कि जैसे हम हैं, वैसे हम भगवान तो बहुत दूर, मनुष्य भी नहीं हैं। जैसे हम हैं, भगवान होना तो बहुत दूर, हम मनुष्य भी नहीं हैं। हम बिलकुल मशीनों की भांति हैं। हमारा सारा जीवन इस बात की कथा है। हमारे पूरे पांच-छह हजार वर्ष का इतिहास इस बात की कथा है कि हम एक मशीन की भांति जी रहे हैं।
    जो भूल मैंने कल की थी, वही भूल मैं आज भी कर रहा हूं। जो भूल मैंने दस साल पहले की थी, वही भूल मैं दस साल बाद भी करूंगा। अगर एक आदमी आपके दरवाजे से निकलता हो, रोज एक ही गड्ढे में आकर गिर जाता हो, तो एक दिन आप क्षमा कर देंगे कि भूल हो गई, दूसरे दिन वह आदमी फिर आए और उसी गड्ढे में गिर जाए, तो शायद आप को भी संकोच होगा यह कहने में कि यह भूल हो रही है। लेकिन अगर वह तीसरे दिन भी उसी गड्ढे में गिर जाए, चैथे दिन भी, और वर्ष-वर्ष बीतते जाएं और रोज उसी गड्ढे में आकर वह आदमी गिरे, तो आप क्या कहेंगे? आप कहेंगे यह आदमी तो नहीं मालूम होता, कोई मशीन मालूम होती है; जो ठीक गड्ढे में रोज गिर जाती है, और उसी गड्ढे में; उसी भूल से रोज गुजरती है; और फिर भी इसके जीवन में कोई क्रांति नहीं होती, कोई परिवर्तन नहीं होता। जिस क्रोध को हमने हजार बार किया है, और हजार बार दुखी हुए हैं, और पछताएं हैं, वही हम आज भी कर रहे हैं।
    भूल वही है, हम रोज उसे दोहरा रहे हैं। जिस घृणा से हम पीड़ित हुए हैं, उसे हमने बार-बार किया है, आज भी कर रहे हैं। जिस अहंकार ने हमें जलाया है, जिसने हमें चोट पहुंचाई है, उसको हम आज भी पकड़े हुए हैं। हर आदमी नई-नई भूलें थोड़े करता है, और न ही एक आदमी रोज नई भूलें ईजाद करता है, थोड़ी सी भूलें हैं, जिन्हें रोज दोहराता है। और रोज पछताता है। रोज निर्णय करता है कि नहीं, अब यह नहीं करूंगा। लेकिन उसके अगर हाथ में होता न करना तो उसने बहुत पहले करना बंद कर दिया होता। फिर उसे ही करता है, फिर पछताता है, फिर करता है, फिर पछताता है; कोई भी फर्क उसके जीवन में होता नहीं है। क्या बताती है यह बात? यह बताती है कि मनुष्य एक यंत्र है। अहंकार को इससे चोट लगती है। चोट लगेगी भी, क्योंकि जिसका अहंकार नहीं टूटता वह कभी यंत्र होने के ऊपर नहीं उठ सकता है। उसकी तो बात मैं कल रात्रि करूंगा। अभी तो मैं इतना कहना चाहता हूं कि इन कारणों से मैंने कहा कि मनुष्य एक यंत्र है।
    और अगर आप सोचेंगे, खोजेंगे, निरीक्षण करेंगे, थोड़ा अपने जीवन पर विचार करेंगे, तो आपको कठिनाई नहीं होगी इस बात को तय कर लेने में कि आपने जो व्यवहार किया है, वह एक मशीन का व्यवहार है, वह एक आदमी का व्यवहार नहीं है। और अगर यह स्पष्ट हो जाए बहुत कि मैं एक मशीन की भांति जीता रहा हूं, तो जिसे यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि मैं एक मशीन की भांति जी रहा हूं, उसके जीवन में क्रांति की शुरुआत हो जाएगी। किसी बीमारी को ठीक से पहचान लेना, उससे आधा मुक्त हो जाना है। किसी बीमारी का ठीक-ठीक निदान आधा इलाज है। अगर यह समझ में आ जाए कि मैं एक यंत्र हूं, तो हमारे बहुत से भ्रम टूट जाएंगे, हमारे बहुत से अहंकार टूट जाएंगे, हमारा बहुत सा अभिमान टूट जाएगा। और शायद इस अहसास के बाद हमारे भीतर किसी क्रांति की शुरुआत हो सके! मनुष्य परमात्मा हो सकता है, लेकिन है तो मशीन। बीज वृक्ष हो सकता है, लेकिन अभी वृक्ष नहीं है। और जो भूल से इस बात को समझ लेगा, जो बीज कि मैं वृक्ष हो गया, उसकी वृक्ष तक की यात्रा असंभव हो जाएगी, क्योंकि वह इसी भ्रांति में जीने लगेगा, जिसे तोड़ना था, जिस भ्रम को वह उसी भ्रम को और स्थायी करने लगेगा। इसलिए मैंने कहा कि मनुष्य एक मशीन है।
    लेकिन मनुष्य मशीन होने को पैदा नहीं हुआ है। मशीन होने से ही वह दुखी और परेशान, और चिंतित है। मशीन होने के कारण ही उसके जीवन में अंधकार है। जीवन में पीड़ा, और चिंता, और अशांति है। और वह मशीन न रह जाए, तो शांति, और सत्य, और सौंदर्य का जन्म हो सकता है। वह मशीन न रह जाए तभी उसे स्वरूप का बोध हो सकता है, और अनुभव हो सकता है कि मैं कौन हूं? अभी तो वह यंत्र है इसलिए उसे कोई पता नहीं चल सकता कि मैं कौन हूं? और अभी तो वह कितना ही खोजे, और कितना ही शास्त्र पढ़े और कितना ही सिद्धांत सीख ले कि मैं कौन हूं? और दोहराने लगे कि मैं आत्मा हूं, मैं परमात्मा हूं उसका यह दोहराना, उसका यह रिपीटीशन भी मैकेनिकल होगा, बिलकुल झूठा होगा और यांत्रिक होगा।
    ऐसे लोगों को हम सब जानते हैं कि जो सुबह से बैठ कर यह दोहराते हैं कि मैं आत्मा हूं, मैं परमात्मा हूं , मैं ब्रह्म हूं, अहं ब्रह्मास्मि! और दोहराए चले जाते हैं, वर्षों तक। लेकिन उनके जीवन में इससे कोई परिवर्तन पैदा नहीं होता, और हो भी नहीं सकता। क्योंकि अगर यह पता चल जाए कि मैं ईश्वर हूं, तो इसे दोहराने की कोई जरूरत नहीं है, जिसे पता नहीं है कि मैं ईश्वर हूं, वही दोहराता है। अगर आप पुरुष हैं तो आप रोज सुबह उठ कर दोहराते नहीं कि मैं पुरुष हूं, मैं पुरुष हूं…अगर आप स्त्री हैं तो आप रोज दोहराते नहीं कि मैं स्त्री हूं, मैं स्त्री हूं…लेकिन अगर कोई पुरुष रोज सुबह उठ कर दोहराने लगे कि मैं पुरुष हूं, मैं पुरुष हूं तो आपको शक हो जाएगा कि ये पुरुष है या नहीं? इसका दोहराना इस बात की सूचना होगी कि यह जो बात दोहरा रहा है वह बात संदिग्ध है; इसके मन में खुद इसलिए दोहरा-दोहरा कर अपने मन को असंदिग्ध बनाना चाहता है। जो आदमी यह दोहराता है कि मैं आत्मा हूं, मैं ईश्वर हूं, मैं परमात्मा हूं , फलां हैं, ढिंका हैं, वह सब निपट झूठी बातें दोहरा रहा है, जिनका उसे कोई पता नहीं। अगर उसे पता हो जाए, तो दोहराने की कोई भी जरूरत नहीं रह जाती। और इस दोहराने से हमारी यांत्रिकता नहीं टूटती है, बल्कि और मजबूत होती है। और गहरी होती है। क्योंकि हमें यह खयाल ही मिट जाता है कि हम क्या हैं?
    एक जादूगर ने बहुत सी भेड़ें पाल रखीं थीं। उस जादूगर ने उन भेड़ों को बेहोश करके, हिप्नोटाइज करके, सम्मोहित करके यह कह दिया था कि तुम भेड़ नहीं हो, उन भेड़ों को बेहोश करके उस जादूगर ने उनके कान में कह दिया कि तुम भेड़ नहीं हो। इसके पहले भेड़ें हमेशा भयभीत रहती थीं, कि पता नहीं उनको खिलाया जाएगा, पिलाया जाएगा और एक दिन उन्हें काट दिया जाएगा। उस जादूगर ने उनको बेहोश करके कह दिया कि तुम भेड़ हो ही नहीं, तुम तो सिंह हो, तुम तो लायंस हो, तुम भेड़ें नहीं हो। उनके चित्त में यह बात बैठ गई, उस दिन से वे अकड़ कर जीने लगीं। उस दिन से वह यह बात भूल गई कि उन्हें काटने के लिए पाला जा रहा है। और जब उनमें से एक भेड़ काट दी जाती थी, तो बाकी भेड़ सोचती कि वह तो भेड़ थी, मैं तो सिंह हूं। मैं कभी काटे जाने वाली नहीं हूं। रोज भेड़ें कम होती जाती थीं, लेकिन हर भेड़ यही सोचती थी कि वह दूसरी तो भेड़ थी इसलिए काटी गई, और मैं, मैं तो सिंह हूं मैं काटी जाने वाली नहीं हूं।
    उस जादूगर के घर उसका एक मित्र मेहमान हुआ, तो उसने पूछा कि हम भी भेड़ें पालते हैं, और हम भी भेड़ों को काटते हैं, और उनके मांस को बेचते हैं, लेकिन हमारी भेड़ें तो बड़ी भयभीत रहती हैं, और बड़ी परेशान रहती हैं। तुम्हारी भेड़ें तो बड़ी शान से घूमती हैं, और एक भेड़ काटी जाती है, तो दूसरी भेड़ उसकी कोई फिकर नहीं करती है, और शान से घूमती रहती है, बात क्या है? उस जादूगर ने कहाः मैंने एक तरकीब काम में लाई है। इनको बेहोश करके मैंने कह दिया है कि तुम भेड़ नहीं हो, इसलिए ये मौज में घूमती रहती हैं, और इनके भागने का, भयभीत होने का मुझे कोई डर नहीं रह गया। और जब एक भेड़ कटती है, तो बाकी भेड़ें सोचती हैं कि वह भेड़ थी, मैं तो भेड़ नहीं हूं।
    मनुष्य-जाति के साथ भी कुछ मामला ऐसा ही है। हर आदमी को यह खयाल है कि मैं तो कुछ और हूं, बाकी सारी भेड़ें हैं, तो जब मैं आपसे यह कह रहा हूं कि मनुष्य यंत्र है, तो मैं भलीभांति जानता हूं आप अपने पड़ोसी को विचार करके सोच रहे होंगे कि बात तो इस आदमी के बाबत बिलकुल ठीक है, रही मेरी बात, तो मैं तो नहीं हूं, मैं तो एक्सेप्शन हूं। मैं तो एक अपवाद हूं। बाकी लोगों के संबंध में तो यह बात बिलकुल ठीक है। जगह-जगह लोग मेरे पास आते हैं और मुझसे कहते हैं कि आप बात तो बिलकुल ठीक कह रहे हैं, करीब-करीब सभी आदमियों के बाबत यह बात सही है, मैं उनसे पूछता हूं सब आदमियों के बाबत का सवाल नहीं है, यह आपके बाबत सही है या नहीं? और तब मैं पाता हूं कि वह पशोपेश में पड़ जाते हैं, उनकी यह हिम्मत नहीं पड़ती कहने की कि यह मेरे बाबत भी सही है। तो जो बात मैं कह रहा हूं, वह आपके पड़ोसी के लिए नहीं कह रहा हूं, वह आपके संबंध में कह रहा हूं। आपके पास जो बैठे हैं उनकी तरफ देखने की कोई भी जरूरत नहीं है। अगर आपने उनकी तरफ देखा तो मेरी बात फिजूल चली जाएगी, उसका कोई मतलब नहीं होगा।
    आप अपनी तरफ देखें और सोचें। और अगर आपको यह दिखाई पड़ जाए कि यह बात आपके संबंध में सही है, आप दूसरे आदमी हो जाएंगे। इस बात के अहसास के साथ ही आप दूसरे आदमी होने शुरू हो जाएंगे। क्योंकि यह अहसास इस बात की घोषणा है कि अब आप मशीन नहीं रहे, इस बात की स्वीकृति कि मेरा जीवन एक मशीन का जीवन है। कौन दे रहा है इस बात की स्वीकृति? कौन इस बात को अहसास कर रहा है? जो चेतना इस बात को अहसास कर रही है कि मेरा जीवन एक यंत्र है, वह स्वयं यंत्र नहीं हो सकती। इस बात की स्वीकृति से ही आपके भीतर कांशसनेस का, चेतना का जन्म शुरू होता है, प्रारंभ होता है। इसीलिए मैंने जोर दिया कि हमें यह जानना, खोजना और पहचानना चाहिए और उस आदमी को मैं धार्मिक कहूंगा, जिस आदमी ने यह अनुभव किया कि उसका जीवन एक यंत्र है।
    उस आदमी को मैं धार्मिक नहीं कहता, जो रोज सुबह उठ कर माला फेर लेता है, जो रोज सुबह मंदिर हो आता है। वह आदमी तो यंत्र की भांति यह काम भी करता है। उसमें कोई फर्क नहीं है। वह रोज माला फेर लेता है, बरसों तक माला फेरता रहता है। एक मशीन की भांति वह रोज एक काम को पूरा कर लेता है। वह रोज मंदिर भी हो आता है, वह रोज किताब भी पढ़ लेता है, एक ही किताब को वह वर्षों तक पढ़ता रहता है, और दोहराता रहता है, बिलकुल मशीन की भांति, उससे उसके जीवन में कोई अंतर नहीं आता, कोई क्रांति नहीं होती। कोई परिवर्तन नहीं आता, कोई बदलाहट नहीं होती। हो भी नहीं सकती है, क्योंकि बदलाहट की शुरुआत ही उस आदमी ने नहीं समझी। बदलाहट की शुरुआत इस बात से ही हो सकती थी कि वह एहसास करता कि वह तो अभी आदमी भी नहीं है, आदमी से बहुत नीचे के तल पर जी रहा है। मशीन के तल पर जी रहा है। इसलिए कल मैंने यह बात आपसे कही। और कुछ बातें पूछी हैं।

    — ओशो. [क्या मनुष्य एक यंत्र है? प्रवचन-02 ]

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