ध्यान में शांति का, आनंद का जो अनुभव हो उसे चौबीस घंटे (हमेशा) कैसे बनाए रखें?

Question

प्रश्न – पूछा है कि साधक को प्रकाश की किरण मिले, उसको सतत बनाए रखने के लिए क्या किया जाए?

Answer ( 1 )

  1. जो अनुभव हो आनंद का, जो शांति का, आनंद का अनुभव हो, उसे हम सतत चौबीस घंटे अपने भीतर बनाए रखें। कैसे बनाए रखेंगे?
    दो रास्ते हैं। एक रास्ता तो है कि हम उस चित्त-स्थिति को, जो ध्यान में अनुभव हुई, उसका जब भी हमें अवसर मिले, पुनः स्मरण करें। जैसे ध्यान के समय शांत श्वास ली है। जब भी दिन में समय मिले, जब आप कोई विशेष काम में नहीं लगे हैं, उस समय श्वास को धीमा कर लें और नाक के पास जहां श्वास का कंपन हो, उसका थोड़ा-सा स्मरण करें। उस स्मरण के साथ ही उस भाव को फिर से आरोपित कर लें कि आप आनंदित हैं, प्रफुल्लित हैं, शांत हैं, स्वस्थ हैं। उस भाव को पुनः स्मरण कर लें। जब भी स्मरण आ जाए–सोते समय, उठते समय, रास्ते पर जाते समय–जहां भी स्मरण आ जाए, उस भाव को पुनः आवर्तित कर लें।

    उसका परिणाम होगा कि दिन में अनेक बार वह स्मृति, वह स्मरण आपके भीतर आघात करेगा और कुछ समय में आपको उसे अलग से याद करने की जरूरत न रह जाएगी। वह आपके साथ वैसे ही रहने लगेगा, जैसे श्वासें आपके साथ हैं।
    एक तो इस भाव-स्थिति को बार-बार स्मरण करना। जब भी खयाल मिल जाए–बिस्तर पर लेट गए हैं, स्मरण आया है, ध्यान की स्थिति को वापस दोहराने का भाव कर लें। रास्ते पर घूमने गए हैं, रात्रि को चांद के नीचे बैठे हैं, किसी दरख्त के पास बैठे हैं, कोई नहीं है, कमरे में अकेले बैठे हैं, पुनः स्मरण कर लें। बस में सफर कर रहे हैं, या ट्रेन में सफर कर रहे हैं, अकेले बैठे हैं, आंख बंद कर लें, उस भाव-स्थिति को पुनः स्मरण कर लें। दिन के व्यस्त काम-काज में भी, दफ्तर में भी, दो मिनट के लिए कभी उठ जाएं, खिड़की के पास खड़े हो जाएं, गहरी श्वास ले लें, उस भाव-स्थिति को स्मरण कर लें।
    दिन में ऐसा अगर दस-पच्चीस बार, मिनट आधा मिनट को भी उस स्थिति को स्मरण किया, तो उसका सातत्य घना होगा और कुछ दिनों में आप पाएंगे, उसे स्मरण नहीं करना होता है, वह स्मरण बना रहेगा। तो यह एक रास्ता, ध्यान में जो अनुभव हो, उसे इस भांति निरंतर विचार के माध्यम से स्वयं की स्मृति में प्रवेश दिलाने का है।
    दूसरा रास्ता, रात्रि को सोते समय, जैसे अभी मैंने आपको संकल्प करने के लिए कहा है, जब संकल्प आपका प्रगाढ़ जिस रास्ते से होता है, उसी रास्ते से ध्यान की स्मृति को भी कायम रखा जा सकता है। जब ध्यान का एक अनुभव आने लगे, तो रात्रि को सोते समय वही प्रक्रिया करें और उस वक्त यह भाव मन में दोहराएं कि ध्यान में मुझे जो भी अनुभव होगा, उसकी स्मृति मुझे चौबीस घंटे बनी रहेगी। जो मैंने संकल्प के लिए प्रयोग बताया है–श्वास को बाहर फेंक कर संकल्प करने का या श्वास को भीतर लेकर संकल्प करने का–जब आपको कुछ अनुभव आने लगे शांति का, तो इसी प्रक्रिया के माध्यम से यह संकल्प मन में दोहराएं कि ध्यान में मुझे जो भी अनुभव होगा, वह मुझे चौबीस घंटा, एक सतत अंतःस्मरण उसका मेरे भीतर बना रहेगा।
    इसको दोहराने से आप पाएंगे कि आपको बिना किसी कारण के अचानक दिन में कई बार ध्यान की स्थिति का खयाल आ जाएगा। ये दोनों संयुक्त करें, तो और भी ज्यादा लाभ होगा। फिर अभी हम विचार और भाव की शुद्धि के संबंध में जब बात करेंगे, तो इस संबंध में और बहुत-सी बातें चर्चा हो सकेंगी। लेकिन इन दोनों बातों का प्रयोग किया जा सकता है।
    बहुत-सा समय चौबीस घंटे का हमारे पास व्यर्थ होता है, जिसका हम कोई उपयोग नहीं करते। उस व्यर्थ के समय में अगर ध्यान की स्मृति को दोहराते हैं, तो बहुत अंतर पड़ेगा।
    इसको कभी इस तरह खयाल करें। अगर आपको दो वर्ष पहले किसी व्यक्ति ने गाली दी थी, दो वर्ष पहले आपका किसी ने अपमान किया था, दो वर्ष पहले कहीं आपके साथ कोई दुर्घटना घटी थी, अगर आप आज भी उसे स्मरण करने बैठेंगे, तो उस पूरी घटना को स्मरण करते-करते आप यह भी हैरान हो जाएंगे कि घटना को स्मरण करते-करते आपके शरीर की और चित्त की अवस्था भी उसी छाप को ले लेगी, जो दो वर्ष पहले घटित हुआ होगा। अगर दो वर्ष पहले आपका कोई भारी अपमान हुआ था, आप आज बैठकर अगर उसका स्मरण करेंगे कि वह घटना कैसे घटी थी और कैसे अपमान हुआ था, तो आप स्मरण करते-करते हैरान होंगे कि आपका शरीर और आपका चित्त उसी अवस्था में पुनः पहुंच गया है और आप जैसे फिर से अपमान को अनुभव कर रहे हैं।
    हमारे चित्त में संग्रह है और वह विलीन नहीं होता। जो भी अनुभव होते हैं, वे संगृहीत हो जाते हैं। अगर उनकी स्मृति को फिर से पुकारा जाए, तो वे अनुभव जगाए जा सकते हैं और हम दुबारा उन्हीं अनुभूतियों में प्रवेश पा सकते हैं। मनुष्य के मन से कोई भी स्मृति नष्ट नहीं होती है।
    तो अगर आज सुबह आपको ध्यान में अच्छा लगा हो, तो दिन में दस-पांच बार उसका पुनर्स्मरण बहुत महत्वपूर्ण होगा। उस भांति वह स्मृति गहरी होगी। और बार-बार स्मरण आ जाने से वह चित्त के स्थायी स्वभाव का हिस्सा बनने लगेगी। इसे, यह जो प्रश्न पूछा है, इस भांति अगर इस पर प्रयोग हुआ, तो लाभ होगा। और यह करना चाहिए।
    अक्सर मनुष्य की भूल यह है कि जो भी गलत है, उसका तो वह स्मरण करता है; और जो भी शुभ है, उसका स्मरण नहीं करता। मनुष्य की बुनियादी भूलों में से एक यह है कि जो भी नकारात्मक है, निगेटिव है, उसका वह स्मरण करता है; और जो भी विधायक है, उसका स्मरण नहीं करता। आपको शायद ही वे क्षण याद आते हों, जब आप प्रेम से भरे हुए थे; शायद ही वे क्षण याद आते हों, जब आपने स्वास्थ्य की कोई बहुत अदभुत अनुभूति की थी; शायद ही वे क्षण याद आते हों, जब आप बहुत शांत हो गए थे। लेकिन आपको वे स्मरण रोज आते हैं, जब आप क्रोधित हुए थे, जब आप अशांत हुए थे; जब किसी ने आपका अपमान किया था, या आपने किसी से बदला लिया था। आप उन-उन बातों को निरंतर स्मरण करते हैं, जो घातक हैं; और उनका स्मरण शायद ही होता हो, जो कि आपके जीवन के लिए विधायक हो सकती हैं।
    विधायक अनुभूतियों का स्मरण बहुत बहुमूल्य है। उन-उन अनुभूतियों को निरंतर स्मरण करने से दो बातें होंगी। सबसे महत्वपूर्ण तो यह होगा कि अगर आप विधायक अनुभूतियों को स्मरण करते हैं, तो उन अनुभूतियों के वापस पैदा होने की संभावना आपके भीतर बढ़ जाएगी। जो आदमी घृणा की बातों को बार-बार याद करता हो, बहुत संभावना है, आज भी घृणा की कोई घटना उससे घटेगी। जो आदमी उदासी की बातों को बार-बार स्मरण करता हो, बहुत संभव है, आज वह फिर उदास होगा। क्योंकि उसके एक तरह के झुकाव पैदा हो जाते हैं और वही बातें उसमें पुनरुक्त हो जाती हैं। ये, ये जो भाव हैं, स्थायी बन जाते हैं और जीवन में उन-उन भावों का बार-बार पैदा हो जाना आसान हो जाता है।
    इसको अपने भीतर विचार करें कि आप किस तरह के भावों को स्मरण करने के आदी हैं। हर आदमी स्मरण करता है। किस तरह के भावों को आप स्मरण करने के आदी हैं? और यह स्मरण रखें कि अतीत के जिन भावों को आप स्मरण करते हैं, भविष्य में आप उन्हीं भावों को, बीजों को बो रहे हैं और उनकी फसल को काटेंगे। अतीत का स्मरण भविष्य के लिए रास्ता बन जाता है।
    स्मरणपूर्वक, जो व्यर्थ है, जिसका कोई उपयोग नहीं है, उसे याद न करें। उसका कोई मूल्य नहीं है। अगर उसका स्मरण भी आ जाए, तो रुकें और उस स्मरण को कहें कि बाहर हो जाओ, तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं है। कांटों को भूल जाएं और फूलों को स्मरण रखें। कांटे जरूर बहुत हैं, लेकिन फूल भी हैं। जो फूलों को स्मरण रखेगा, उसके जीवन में कांटे क्षीण होते जाएंगे और फूल बढ़ जाएंगे। और जो कांटों को स्मरण रखेगा, उसके जीवन में हो सकता है, फूल विलीन हो जाएं और केवल कांटे रह जाएं।
    हम क्या स्मरण करते हैं, वही हम बनते चले जाते हैं। जिसका हम स्मरण करते हैं, वही हम हो जाते हैं। जिसका हम निरंतर विचार करते हैं, वह विचार हमें परिवर्तित कर देता है और हमारा प्राण हो जाता है। इसलिए शुभ, सद, जो भी आपको श्रेष्ठ मालूम पड़े, उसे स्मरण करें। और जीवन में–इतना दरिद्र जीवन कोई भी नहीं है कि उसके जीवन में कोई शांति के, आनंद के, सौंदर्य के, प्रेम के क्षण न घटित हुए हों। और अगर आप उनके स्मरण में समर्थ हो गए, तो यह भी हो सकता है कि आपके चारों तरफ अंधकार हो, लेकिन आपकी स्मृति में प्रकाश हो और इसलिए चारों तरफ का अंधकार भी आपको दिखायी न पड़े। यह भी हो सकता है, आपके चारों तरफ दुख हो, लेकिन आपके भीतर कोई प्रेम की, कोई सौंदर्य की, कोई शांति की अनुभूति हो और आपको चारों तरफ का दुख भी दिखायी न पड़े। यह संभव है, यह संभव है कि बिलकुल कांटों के बीच में कोई व्यक्ति फूलों में हो। इसके विपरीत भी संभव है। और यह हमारे ऊपर निर्भर है।
    यह मनुष्य के ऊपर निर्भर है कि वह अपने को कहां स्थापित कर देता है, वह अपने को कहां बिठा देता है। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम स्वर्ग में रहते हैं या नर्क में रहते हैं। मैं आपको कहना चाहूंगा, स्वर्ग और नर्क कोई भौगोलिक स्थान नहीं हैं। वे मानसिक, मनोवैज्ञानिक स्थितियां हैं। हममें से अधिकतर लोग दिन में कई बार नर्क में चले जाते हैं और कई बार स्वर्ग में आ जाते हैं। और हममें से कई लोग दिनभर नर्क में रहते हैं। और हममें से कई लोग स्वर्ग में वापस लौटने का रास्ता ही भूल जाते हैं। लेकिन ऐसे लोग भी हैं, जो चौबीस घंटे स्वर्ग में रहते हैं। इसी जमीन पर, इन्हीं स्थितियों में ऐसे लोग हैं, जो स्वर्ग में रहते हैं। आप भी उनमें से एक बन सकते हैं। कोई बाधा नहीं है, सिवाय कुछ वैज्ञानिक नियमों को समझने के।
    एक स्मरण मुझे आया। बुद्ध का एक शिष्य था, पूर्ण। उसकी दीक्षा पूरी हुई, उसकी साधना पूरी हुई। पूर्ण ने कहा कि ‘अब मैं जाऊं और आपके संदेश को उनसे कह दूं, जिनको उसकी जरूरत है।’ बुद्ध ने कहा, ‘तुम्हें मैं जाने की आज्ञा तो दूं, लेकिन एक बात पूछ लूं: तुम कहां जाना चाहोगे?’ बिहार में एक छोटा-सा हिस्सा था ‘सूखा’। पूर्ण ने कहा, ‘मैं सूखा की तरफ जाऊं। अब तक कोई भिक्षु वहां नहीं गया। और वहां के लोग आपके अमर संदेश से वंचित हैं।’
    बुद्ध ने कहा, ‘वहां कोई नहीं गया, इसके पीछे कारण था। वहां के लोग बहुत बुरे हैं। हो सकता है, तुम वहां जाओ, वे तुम्हारा अपमान करें। वे तुम्हें गालियां दें, तुम्हें परेशान करें, तो तुम्हारे मन में क्या होगा?’ पूर्ण ने कहा, ‘मैं उन्हें धन्यवाद दूंगा। धन्यवाद दूंगा कि वे केवल गालियां देते हैं, अपमान करते हैं, लेकिन मारते नहीं।’ उसने कहा, ‘मैं उन्हें धन्यवाद दूंगा कि वे गालियां देते हैं, अपमान करते हैं, लेकिन मारते नहीं हैं। मार भी सकते थे।’ बुद्ध ने कहा, ‘यह भी हो सकता है कि उनमें से कोई तुम्हें मारे, तो तुम्हारे मन को क्या होगा?’ उसने कहा, ‘मैं धन्यवाद दूंगा कि वे मारते हैं, लेकिन मार ही नहीं डालते हैं। वे मार भी डाल सकते थे।’
    बुद्ध ने कहा, ‘मैं अंतिम एक बात और पूछता हूं। यह भी हो सकता है, कोई तुम्हें मार ही डाले, तो तुम्हारे मन को क्या होगा?’ उसने कहा, ‘मैं धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने मुझे उस जीवन से छुटकारा दिला दिया, जिसमें कोई भूल हो सकती थी।’ उस पूर्ण ने कहा, ‘मैं धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने मुझे उस जीवन से छुटकारा दिला दिया, जिसमें कोई भूल हो सकती थी। मैं उनका अनुग्रह मानूंगा।’ बुद्ध ने कहा, ‘तब तुम कहीं भी जाओ। अब इस जमीन पर सब जगह तुम्हारे लिए परिवार है, क्योंकि जिसके हृदय की यह स्थिति है, उसके लिए इस जमीन पर कोई कांटे नहीं हैं।’
    कल मैं बात करता था रास्ते में। महावीर के लिए कहा जाता है–बड़ी झूठी बात लगेगी–महावीर के लिए कहा जाता है कि वे जब रास्तों पर चलते थे, तो कांटे अगर सीधे पड़े हों, तो वे उलटे हो जाते थे। यह बात कितनी झूठ है! कोई कांटे को क्या मतलब कि कौन चलता है? किसी कांटे को क्या प्रयोजन कि महावीर चलते हैं या कौन चलता है? और कांटे कैसे सीधे पड़े हों तो उलटे हो जाएंगे? और मैंने सुना है कि मोहम्मद के बाबत कहा जाता है कि जब वे अरब के गर्म रेगिस्तानों में चलते थे, तो एक बदली उनके ऊपर छाया किए रहती थी। यह कितनी झूठी बात है! बदलियों को क्या प्रयोजन कि नीचे कौन चलता है? मोहम्मद चलते हैं या कौन चलता है, वे कैसे छायाएं करेंगी?
    लेकिन मैं आपसे कहूं, ये बातें सच हैं। कोई कांटे उलटकर उलटे नहीं होते और कोई बदलियां नहीं चलतीं, लेकिन इनमें हमने कुछ सचाइयां जाहिर की हैं। हमने कुछ सचाइयां जाहिर की हैं, इन बातों में हमने कुछ प्रेम भरी बातें कहीं हैं। हमने यह कहना चाहा है कि जिस आदमी के हृदय में कोई कांटा नहीं रह गया, इस जगत में उसके लिए कोई कांटा सीधा नहीं है। और हमने यह कहा है कि जिस आदमी के हृदय में उत्ताप नहीं रह गया, इस जगत में उसके लिए हर जगह एक छायादार बदली है और उसे कहीं कोई धूप नहीं है। हमने यह कहना चाहा है। और यह बड़ी सच बात है।
    हमारे चित्त की स्थिति हम जैसी बनाए रखेंगे, यह दुनिया भी ठीक वैसी बन जाती है। न मालूम कौन-सा चमत्कार है कि जो आदमी भला होना शुरू होता है, यह सारी दुनिया उसे एक भली दुनिया में परिवर्तित हो जाती है। और जो आदमी प्रेम से भरता है, इस सारी दुनिया का प्रेम उसकी तरफ प्रवाहित होने लगता है। और यह नियम इतना शाश्वत है कि जो आदमी घृणा से भरेगा, प्रतिकार में घृणा उसे उपलब्ध होने लगेगी। हम जो अपने चारों तरफ फेंकते हैं, वही हमें उपलब्ध हो जाता है। इसके सिवाय कोई रास्ता भी नहीं है।
    तो चौबीस घंटे उन क्षणों का स्मरण करें, जो जीवन में अदभुत थे, ईश्वरीय थे। वे छोटे-छोटे क्षण, उनका स्मरण करें और उन क्षणों पर अपने जीवन को खड़ा करें। और उन बड़ी-बड़ी घटनाओं को भी भूल जाएं, जो दुख की हैं, पीड़ा की हैं, घृणा की हैं, हिंसा की हैं। उनका कोई मूल्य नहीं है। उन्हें विसर्जित कर दें, उन्हें झड़ा दें। जैसे सूखे पत्ते दरख्तों से गिर जाते हैं, वैसे जो व्यर्थ है, उसे छोड़ते चले जाएं; और जो सार्थक है और जीवंत है, उसे स्मरणपूर्वक पकड़ते चले जाएं। चौबीस घंटे इसका सातत्य रहे। एक धारा मन में बहती रहे शुभ की, सौंदर्य की, प्रेम की, आनंद की।
    तो आप क्रमशः पाएंगे कि जिसका आप स्मरण कर रहे हैं, वे घटनाएं बढ़नी शुरू हो गयी हैं। और जिसको आप निरंतर साध रहे हैं, उसके चारों तरफ दर्शन होने शुरू हो जाएंगे। और तब यही दुनिया बहुत दूसरे ढंग की दिखायी पड़ती है। और तब ये ही लोग बहुत दूसरे लोग हो जाते हैं। और ये ही आंखें और ये ही फूल और ये ही पत्थर एक नए अर्थ को ले लेते हैं, जो हमने कभी पहले जाना नहीं था। क्योंकि हम कुछ और बातों में उलझे हुए थे।
    तो मैंने जो कहा, ध्यान में जो अनुभव हो–थोड़ा-सा भी प्रकाश, थोड़ी-सी भी किरणें, थोड़ी-सी भी शांति–उसे स्मरण रखें। जैसे एक छोटे-से बच्चे को उसकी मां सम्हालती है, वैसे जो भी छोटी-छोटी अनुभूतियां हों, उन्हें सम्हालें। उन्हें अगर नहीं सम्हालेंगे, वे मर जाएंगी। और जो जितनी मूल्यवान चीज होती है, उसे उतना सम्हालना होता है।
    जानवरों के भी बच्चे होते हैं, उनको सम्हालना नहीं होता। और जितने कम विकसित जानवर हैं, उनके बच्चों को उतना ही नहीं सम्हालना होता, वे अपने आप सम्हल जाते हैं। जैसे-जैसे विकास की सीढ़ी आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे आप पाते हैं–अगर मनुष्य के बच्चे को न सम्हाला जाए, वह जी ही नहीं सकता। मनुष्य के बच्चे को न सम्हाला जाए, वह जी नहीं सकता। उसके प्राण समाप्त हो जाएंगे। जो जितनी श्रेष्ठ स्थिति है जीवन की, उसे उतने ही सम्हालने की जरूरत पड़ती है।
    तो जीवन में भी जो अनुभूतियां मूल्यवान हैं, उनको उतना ही सम्हालना होता है। उतने ही प्रेम से उनको सम्हालना होता है। तो छोटे-से भी अनुभव हों, उन्हें सम्हालें; वैसे ही जैसे…। आपने पूछा, कैसे सम्हालें? अगर मैं आपको कुछ हीरे दे दूं, तो आप उन्हें कैसे सम्हालेंगे? अगर आपको कोई बहुमूल्य खजाना मिल जाए, उसे आप कैसे सम्हालेंगे? उसे आप कैसे सम्हालेंगे? उसे आप कहां रखेंगे? उसे आप छिपाकर रखना चाहेंगे; उसे अपने हृदय के करीब रखना चाहेंगे।
    एक भिखमंगा मरता था एक अस्पताल में। और जब पादरी उसके पास गया और डाक्टरों ने कह दिया कि वह मरने को है। और पादरी उसके पास गया अंतिम भगवान की प्रार्थना करवाने के लिए। उससे कहा, ‘तुम हाथ जोड़ो।’ उसने एक ही हाथ उठाया। एक हाथ की मुट्ठी बंद थी। पादरी ने कहा, ‘दोनों हाथ जोड़ो।’ उसने कहा, ‘क्षमा करें, दूसरा मैं नहीं खोल सकता हूं।’
    वह आदमी मरने को है और दूसरा हाथ नहीं खोल रहा है! वह मर गया दो क्षण बाद। हाथ खोला गया। कुछ गंदे सिक्के वह इकट्ठे किए हुए था, जिस पर उसने मुट्ठी बांधी हुई थी। कुछ गंदे सिक्के! उसे पता है, मर रहा है, लेकिन मुट्ठी बंधी हुई है!
    साधारण सिक्कों को हम सम्हालना जानते हैं, सब जानते हैं। और जो श्रेष्ठतम सिक्के हैं, उन्हें सम्हालने का हमें कुछ पता नहीं है। और हम उसी भिखमंगे की तरह हैं, जो एक दिन मुट्ठी बंद किए हुए पाए जाएंगे। और जब उनकी मुट्ठी खोली जाएगी, तो कुछ गंदे सिक्कों के सिवाय वहां कुछ भी नहीं मिलेगा।
    उन अनुभूतियों को सम्हालें, वे ही असली सिक्के हैं, जिन्होंने आपके जीवन को स्फुरणा दी हो, प्रेरणा दी हो, आपके भीतर कुछ परिवर्तित किया हो, कुछ कंपित हुआ हो, कुछ श्रेष्ठ की तरफ आपके भीतर लपट पैदा हुई हो। और उन्हें इस भांति सम्हालें। ये दो रास्ते मैंने कहे। क्रमशः प्रयोग करने से बात समझ में आ सकेगी।

    — ओशो (ध्‍यान सूत्र | प्रवचन–03)

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