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“स्‍त्री और पुरुष भिन्न हैं, लेकिन असमान नहीं !” – ओशो

स्‍त्री और पुरुष के इतिहास में भेद की, भिन्नता की, लम्बी कहानी जुड़ी हुई है। बहुत प्रकार के वर्ग हमने निर्मित किये हैं। गरीब का, अमीर का; धन के आधार पर, पद के आधार पर। और सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि हमने स्‍त्री पुरुष के बीच भी वर्गोंका निर्माण किया है! शायद हमारे और सारे वर्ग जल्दी मिट जायेंगे, स्‍त्री पुरुष के बीच खड़ी की गयी दीवाल को मिटाने में बहुत समय लग सकता है। बहुत कारण हैं।

स्‍त्री और पुरुष भिन्न हैं, यह तो निशित है, लेकिन असमान नहीं।

भिन्नता और असमानता दो अलग बातें हैं। भिन्न होना एक बात है। सच में एक आदमी दूसरे आदमी से भिन्न है ही। कोई आदमी समान नहीं है।। कोई पुरुष भी समान नहीं है। स्‍त्री और पुरुष भी भिन्न हैं। लेकिन भिन्नता तो वर्ग बनाना, ऊंचा—नीचा बनाना, मनुष्य का पुराना षड्यंत्र और शैतानी रही है।

हजारों वर्षों का अतीत का इतिहास स्‍त्री के शोषण का इतिहास भी है। पुरुष ने ही चूंकि सारे कानून निर्मित किये हैं, और पुरुष चूंकि शक्तिशाली था। उसने स्‍त्री पर जो भी थोपना चाहा, थोप दिया।

जब तक स्‍त्री के ऊपर से गुलामी नहीं उठती, तब तक दुनिया से गुलामी का बिलकुल अंत नहीं हो सकता।

राष्ट्र स्वतंत्र हो जायेंगे। आज नहीं कल, गरीब और अमीर के बीच के फासले भी कम हो जायेंगे, लेकिन स्‍त्री और पुरुष के बीच शोषण का जाल सबसे गहरा है। स्‍त्री और पुरुष के बीच फासले की कहानी इतनी लंबी गयी है कि करीब—करीब भूल गयी है! स्वयं स्रियों को भी भूल गयी है, पुरुषों को भी भूल गयी है!

इस संबंध में थोड़ी बातें विचार करना उपयोगी होगा। इसलिए कि आने वाली जिंदगी को जिसे आप बनाने में लगेंगे— हो सकता है स्‍त्री और पुरुष के बीच समानता का, स्वतंत्रता का, एक समाज और एक परिवार निर्मित कर सकें। अगर खयाल ही न हो तो हम पुराने ढांचों में ही फिर घूमकर जीने लगते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि हमने कब पुरानी लीकों पर चलना शुरू कर दिया है!

आदमी सबसे ज्यादा सुगम इसे ही पाता है कि जो हो रहा था, वैसा ही होता चला जाये, लीस्ट रेसिस्टेंस वहीं है। इसलिए पुराने ढंग का परिवार चलता चला जाता है। पुरानी समाज व्यवस्था चली जाती है। पुराने ढंग से सोचने के ढंग चलते चले जाते हैं। तोड़ने में कठिनाई मालूम पड़ती है, बदलने में मुश्किल मालूम पड़ती है—दो कारणों से। एक तो पुराने की आदत और दूसरा नये को निर्माण करने की मुश्‍किल।

सिर्फ वे ही पीढ़ियां पुराने को तोड़ती हैं, जो नये को सृजन देने की क्षमता रखती है। विश्वास रखती हैं स्वयं पर। और स्वयं का विश्वास न हो तो हम पुरानी पीढ़ी के पीछे चलते चले जाते हैं। वह पुरानी पीढ़ी भी अपने से पुरानी पीढ़ी के पीछे चल रही है! कुछ छोटी—सी स्मरणीय बातें पहले हम खयाल कर लें—स्‍त्री और पुरुष के बीच फासले, असमानता किस—किस रूप में खड़ी हुई है।

भिन्नता शुनिश्रित है और भिन्नता होनी ही चाहिए। भिन्नता ही स्‍त्री को व्यक्तित्व देती है और पुरुष को व्यक्तित्व देती है। लेकिन हमने भिन्नता को ही असमानता में बदल दिया। इसलिए सारी दूनिया में स्त्रियां भिन्नता को तोड़ने की कोशिश कर रही हैं, ताकि वे ठीक पुरुष जैसी मालूम पड़ने लगें। उन्हें शायद खयाल है कि इस भांति असमानता भी टूट जायेगी।

मैंने सुना है, एक सिनेमा गृह के सामने अमरीका के किसी नगर में बड़ी भीड़ है। क्यू लगा हुआ है। लंबी कतार है। लोग टिकट लेने को खड़े हैं। एक बूढ़े आदमी ने अपने सामने खड़े हुए व्यक्ति से पूछा, आप देखते हैं, वह सामने जो लड़का खड़ा हुआ है, उसने किस तरह लड़कियों जैसे बाल बढ़ा रखे हैं। उस सामने वाले व्यक्ति ने कहा, माफ करिये, वह लड़का नहीं है, वह मेरी लड़की है। उस बूढ़े ने कहा, क्षमा करिये, मुझे क्या पता था कि आपकी लड़की है। तो आप उसके पिता हैं? उसने कहा कि नहीं, मै उसकी मां हूं!

कपडों का फासला कम किया जा रहा है। धीरे—धीरे कपड़े करीब एक जैसे होते जा रहे हैं। हो सकता है, सौ वर्ष बाद कपड़ों के आधार पर फर्क करना मुश्किल हो जाये। लेकिन, कपड़ों के फासले कम हो जाने से भिन्नता नहीं मिट जायेगी। भिन्नता गहरी, बायोलाजिकल, जैविक और शारीरिक है। भिन्नता साइकोलाजिकल भी है बहुत गहरे में। कपड़ों से कुछ फर्क नहीं पड़ जाने वाला है। एक

पुरुषों ने भी भिन्नता मिटाने के बहुत प्रयोग किये हैं। हमें खयाल में नहीं है। क्योंकि हम आदी हो जाते हैं। राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर की मूर्तियां और चित्र आपने देखे होंगे। और अगर सोचते होंगे थोड़ा—बहुत तो यह खयाल आया होगा कि इन लोगों के चेहरे पर दाढ़ी मूंछ क्यों दिखायी नहीं पड़ते? असंभव है यह बात। एकाध के साथ हो भी सकता है कि किसी एक राम, कृष्ण, महावीर, किसी एक को दाढ़ी मूंछ न रही हो। यह संभव है। कभी हजार में एक पुरुष को नहीं भी होती है। लेकिन चौबीस जैनियों के तीर्थंकर, हिन्दुओं के सब अवतार, बुद्धों की सारी कल्पना, किसी को दाढ़ी मूंछ नहीं है! कुछ कारण है। पुरुष को ऐसा लगा है कि स्‍त्री सुन्दर है, तो स्‍त्री जैसे होने से जैसे पुरुष भी सुन्दर हो जायेगा। फिर राम और कृष्ण को तो हमने मान लिया कि उनको दाढ़ी मूंछ होती ही नहीं। फिर हम क्या करें? तो सारी जमीन पर पुरुष दाढ़ी मूंछ को काटने की कोशिश में लगा है। स्‍त्री जैसा चेहरा बनाने की चेष्टा चल रही है। उससे भी कोई भेद मिट जाने वाले नहीं हैं।

न कपड़े बदलने से कोई फर्क पड़ने वाला है। न सपनों पर ऊपरी फर्क कर लेने से कुछ फर्क पड़ने वाला है। भेद गहरा है और अगर भेद मिटाने कि कोशिश से हम चाहते हों कि असमानता मिटे तो असमानता कभी नहीं मिटेगी। असमानता हमारी थोपी हुई है। भेद में असमानता नहीं है। दो भिन्न व्यक्ति बिलकुल समान हो सकते हैं। समान प्रतिष्ठा दी जा सकती है।

पहली भूल मनुष्य ने यह की कि भिन्नता को असमानता समझा। डिफरेंस को इनइक्यालिटी समझा। और अब उसी भूल पर दूसरी भूल चल रही है कि हम भिन्नता को कम कर लें। जो काम पुरुष करते हैं, वे ही स्रियां करें! जो कपड़े वे पहनते हैं, वे हम भी पहनें! जिस भाषा का वे उपयोग करते हैं, स्त्रियां भी वैसी ही करें! अमरीका में जिन शब्दों का उपयोग स्त्रियों ने कभी भी नहीं किया था मनुष्य के इतिहास में, कुछ गालियां सिर्फ पुरुष ही देते हैं, वह उनका गौरव है। अमरीका की लड़कियां उन्हीं गालियों को देने के लिए भी चेष्टा में संलगन हैं! उन गालियों का भी उपयोग कर रही हैं! क्योंकि पुरुष के साथ समान खड़े हो जाने की बात है।

और समानता का खयाल ऐसा है कि हम शायद भेद, भिन्नता को किसी तरह से लीप—पोत कर एक—सा कर दें, तो शायद समानता उपलब्ध हो जाय। नहीं, समानता उससे उपलब्ध नहीं होगी, क्योंकि असमानता का भी मूल आधार वह नहीं है। असमानता किन्हीं और कारणों से निर्मित हुई है। और जैसे हम कहानी सुनते हैं कि सत्यवान मर गया है, सावित्री उसे दूर से जाकर लौटा लायी है। लेकिन कभी कोई कहानी ऐसी सुनी कि पली मर गयी हो और पति दूर से जाकर लौटा लाया हो। नहीं सुनी है हमने।

स्रियां लाखों वर्ष तक इस देश में पुरुषों के ऊपर बर्बाद होती रही हैं। मरकर सती होती रही है। कभी ऐसा सुना, कि कोई पुरुष भी किसी स्‍त्री के लिए सती हो गया हो? क्योंकि सारा नियम, सारी व्यवस्था, सारा अनुशासन पुरुष ने पैदा किया है। वह स्‍त्री पर थोपा हुआ है। सारी कहानियां उसने गढ़ी है। वह कहानियां गढ़ता है, जिसमें पुरुष को स्‍त्री बचाकर लौट आती है। और ऐसी कहानी नहीं गढ़ता, जिसमें पुरुष स्‍त्री को बचाकर लौटता हो।

स्‍त्री गयी कि पुरुष दूसरी स्‍त्री की खोज में लग जाता है, उसको बचाने का सवाल नहीं है। पुरुष ने अपनी शुविधा के लिये सारा इलजाम कर लिया है। असल में जिसके पास थोड़ी—सी भी शक्ति हो, किसी भांति की, वे जो थोड़े भी निर्बल हों किसी भी भांति से, उनके ऊपर सवार हो ही जाते हैं। मालिक बन ही जाते हैं। गुलामी पैदा हो जाती है।

पुरुष थोड़ा शक्तिशाली है शरीर की दृष्टि से। ऐसे यह शक्तिशाली होना किन्हीं और कारणों से पुरुष को पीछे भी डाल देता है। पुरुष के पास स्ट्रैंग्थ और शक्ति ज्यादा है। लेकिन रेसिस्टेंस उतनी ज्यादा नहीं है, जितनी स्‍त्री के पास है। और अगर पुरुष और स्‍त्री दोनों को किसी पीड़ा में सफरिंग में से गुजरना पड़े तो पुरुष जल्दी टूट जाता है। स्‍त्री ज्यादा देर तक टिकती है। रेसिस्टेंस उसकी ज्यादा है। प्रतिरोधक शक्ति उसकी ज्यादा है। लेकिन सामान्य शक्ति कम है। शायद प्रकृति के लिए यह जरूरी है कि दोनों में यह भेद हो, क्योंकि स्‍त्री कुछ पीड़ाएं झेलती है।

जो पुरुष अगर एक बार भी झेले, तो फिर सारी पुरुष जाति कभी झेलने को राजी, नहीं होगी। नौ महीने तक एक बच्चे को पेट में रखना और फिर उसे जन्म देने की पीडा और फिर उसे बड़ा करने की पीड़ा, वह कोई पुरुष कभी राजी नहीं होगा। अगर एक रात भी एक छोटे बच्चे के साथ पति को छोड़ दिया जाय तो या तो वह उसकी गर्दन दबाने की सोचेगा या अपनी गर्दन दबाने की सोचेगा।

मैंने सुना है, एक दिन सुबह मास्को की सड़क पर एक आदमी छोटी—सी बच्चों की गाड़ी को धक्का देता हुआ चला जा रहा है। सुबह है लोग घूमने निकले हैं। फूल खिले हैं, पक्षी खिले हैं। वह आदमी रास्ते में चलते—चलते बार—बार यह कहता है अब्राहम शांत रह— अब्राहम उसका नाम होगा। पता नहीं, वह किससे कह रहा है। वह बार—बार कहता है, अब्राहम शांत रह। अब्राहम धीरज रख। बच्चा रो रहा है। वह गाड़ी को धक्के दे रहा है। एक बूढ़ी औरत उसके पास आती है। वह कहती है, क्या बच्चे का नाम अब्राहम है?

वह आदमी कहता है, क्षमा करना, अब्राहम मेरा नाम है। मैं अपने को समझा रहा हूं। शान्त रह, धीरज रख, अभी घर आया चला जाता है। इस बच्चे को तो समझाने का सवाल नहीं है। अपने को समझा रहा हूं कि किसी तरह दोनों सही सलामत घर पहुंच जायें।

स्‍त्री के पास एक प्रतिरोधक शक्ति है, जो प्रकृति ने उसे दी है। एक रेसिस्टेंस की ताकत है। बहुत बड़ी ताकत है। कितनी ही पीड़ा और कितने ही दुख और कितने ही दमन के बीच वह जिंदा रहती है और मुस्करा भी सकती है। पुरुषों ने जितना दबाया है स्‍त्री को, अगर स्रियों ने उस दमन को, उस पीड़ा को कष्ट से लिया होता तो शायद वे कभी की टूट गयी होतीं। लेकिन वे नहीं टूटी हैं। उनकी मुस्कराहट भी नहीं टूटी है। इतनी लम्बी परतंत्रता के बाद भी उसके चेहरे पर कम तनाव है पुरुष की बजाय।

रेसिस्टेंस की, झेलने की, सहने की, टालरेंस की, सहिष्णुता की बड़ी शक्ति उसके पास है। लेकिन मस्कुलर, बड़े पत्थर उठाने की, और बड़ी कुल्हाड़ी चलाने की शक्ति पुरुष के पास है। शायद जरूरी है कि पुरुष के पास वैसी शक्ति ज्यादा हो। उसे कुछ काम करने हैं जिंदगी में, वह वैसी शक्ति की मांग करते हैं। स्‍त्री को जो काम करने हैं, वह वैसी शक्ति की मांग करते हैं। और प्रकृति या अगर हम कहें परमात्मा इतनी व्यवस्था देता है जीवन को कि सब तरफ से जो जरूरी है जिसके लिए, वह उसको मिल जाता है।

कभी हमने खयाल भी नहीं किया। जमीन पर, इतनी बड़ी पृथ्वी पर कोई तीन—साढ़े तीन अरब लोग हैं स्रियां पुरुष सब मिलाकर। किसी घर में लड़के ही लड़के पैदा हो जाते हैं। किसी घर में लड़कियां भी हो जाती हैं। लेकिन अगर पूरी पृथ्वी का हम हिसाब रखें तो लड़के और लड़कियां करीब—करीब बराबर पैदा होते हैं। पैदा होते वक्त बराबर नहीं होते। लेकिन पांच छ: साल में बराबर हो जाते हैं; पैदा होते वक्त 125 लड़के पैदा होते हैं सौ लड़कियों पर। क्योंकि लड़कों का रेसिस्टेंस कम है। पच्चीस लड़के तो जवान होते—होते मर जाने वाले हैं। लड़के ज्यादा पैदा होते हैं। लड़कियां कम पैदा होती हैं, लेकिन जवान होते—होते लड़के और लडकियों की संख्या दुनिया में करीब—करीब बराबर हो जाती है।

कोई बहुत गहरी व्यवस्था भीतर से काम करती है। नहीं तो कभी ऐसा भी हो सकता है, इसमें कोई दुर्घटना तो नहीं कि जमीन पर स्रियां हो जायें एकबार। या पुरुष ही पुरुष हो जायें। यह संभावना है, अगर बिलकुल अंधेरे में व्यवस्था चल रही हो। लेकिन भीतर कोई नियम काम करता है। और नियम के पीछे बायोलाजिकल व्यवस्था दे। जितने अणु होते हैं, वीर्याणु होते हैं; उनमें आधे स्रियों को पैदा करने में समर्थ हैं, आधे पुरुषों को इसलिए कितना ही एक घर में भेद पड़े, लम्बे विस्तार पर भेद बराबर हो जाता है।

स्‍त्री को वह शक्तियां मिली हुई हैं, जो उसे अपने काम को—और स्‍त्री का बड़े से बड़ा काम उसका मां होना है। उससे बड़ा काम संभव नहीं है। और शायद मां होने से बडी कोई संभावना पुरुष के लिए तो है ही नहीं। स्‍त्री कं लिए भी नहीं है। मां होने की संभावना हम सामान्य रूप से महण कर लेते हैं।

कभी आपने नहीं सोचा होगा, इतने पेन्टर हुए, इतने मूर्तिकार हुए, इतने चित्रकार, इतने कवि, इतने आर्किटेक्‍ट, लेकिन स्‍त्री कोई एक बड़ी चित्रकार नहीं हुई! कोई एक स्‍त्री बडी आर्किटेक्ट, वास्तुकला में अग्रणी नहीं हुई! कोई एक स्‍त्री ने बहुत बड़े संगीत को जन्म नहीं दिया! कोई एक स्‍त्री ने कोई बहुत अदभुत मूर्ति नहीं काटी! सृजन न,। सारा काम पुरुष ने किया है। और कई बार पुरुष को ऐसा खयाल आता है कि क्रिएटिव, सृजनात्मक शक्ति हमीर पास है। स्‍त्री के पास कोई सृजनात्मक शक्ति नहीं है।

लेकिन बात उलटी है। स्‍त्री पुरुष को पैदा करने मैं इतना बड़ा श्रम कर लेती है कि और कोई सृजन करने कि जरूरत नहीं रह जाती। स्‍त्री के पास अपना एक क्रिएटिव एक्ट है। एक सृजनात्‍मक कृत्य है, जो इतना बड़ा कि न, पत्थर की मूर्ति बनाना और एक जीवित व्यक्ति को बड़ा करना.. लेकिन स्‍त्री के काम को हमने सहज स्वीकार कर लिया है। और इसीलिए स्‍त्री की सारी सृजनात्‍मक शक्ति उसके मां बनने में लग जाती है। उसके पास और कोई सृजन की न सुविधा बचती है, न शक्ति बचती है। न कोई आयाम, कोई डायमेंशन बचता है। न सोचने का सवाल है।

एक छोटे से घर को सुंदर बनाने में—लेकिन हम कहेंगे, छोटे से घर को सुंदर बनाना, कोई माइकल एंजलो तो पैदा नहीं हो सकता, कोई वानगाग तो पैदा नहीं हो जायेगा। कोई इजरा पाउंड तो पैदा नहीं होगा। कोई कालिदास तो पैदा नहीं होगा। एक छोटे से घर को… लेकिन मैं कुछ घरों में जाकर ठहरता रहा हूं।

एक घर में ठहरता था, मैं हैरान हो गया। गरीब घर है। बहुत सम्पन्न नहीं है। लेकिन इतना साफ सुथरा, इतना स्वच्छ मैंने कोई घर नहीं देखा। लेकिन उस घर की प्रशंसा करने कोई कभी नहीं जायेगा। घर की गृहणी उस घर को ऐसा पवित्र बना रही है कि कोई मंदिर भी उतना स्वच्छ और पवित्र नहीं मालूम पड़ता है। लेकिन उसकी कौन फिक्र करेगा? कौन माइकेल एंजलो,कालिदास और वानगाग में उसकी गिनती करेगा? वह खो जायेगी। या : एक ऐसा काम कर रही है, जिसके लिए कोई प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी। क्यों नहीं मिलेगी? नहीं मिलेगी यह, यह दुनियां पुरुषों की दुनिया है।

स्‍त्री के विकास, स्‍त्री की संभावनाओं, स्त्रियों की जो पोटेशियलिटीज हैं, उनके जो आयाम, ऊंचाइयां हैं, उनको हमने गिनती में ही नहीं लिया है। अगर एक आदमी गणित में कोई नयी खोज कर ले तो नोबल प्राइज मिल सकता है। लेकिन स्रियां निरंतर सृजन के बहुत नये—नये आयाम खोजती हैं। कोई नोबल प्राइज उनके लिए नहीं है! या : स्रियों की दुनिया नहीं हैं। स्रियों को सोचने के लिए, स्रियों को दिशा देने के लिए, उनके जीवन में जो हो, उसे भी मूल्य देने का हमारे पास कोई आधार नहीं है।

हम सिर्फ पुरुषों को आधार देते हैं! इसलिए अगर हम इतिहास उठाकर देखें तो उसमें चोर, डकैत, हल।, बड़े—बड़े आदमी मिल जायेंगे। उसमें चंगेज खां, तैमूर लंग और हिटलर और स्टैलिन और माओ सबका स्‍थान है। लेकिन उसमें हमें ऐसी स्त्रियां खोजने में बड़ी मुश्किल पड़ जायेगी। उनका कोई उल्लेख ही नहीं है जिन्होंने सुन्दर घर बनाया हो। जिन्होंने एक बेटा पैदा किया हो और जिसके साथ, जिसे बड़ा करने में सारी मां की ताकत, सारी प्रार्थना, सारा प्रेम लगा दिया हो। इसका कोई हिसाब नहीं मिलेगा।

पुरुष की एक तरफा अधूरी दूनिया अब तक चली है। और जो पूरा इतिहास है, वह पुरुष का ही इतिहास है, इसलिये युद्धों का, हिंसाओं का इतिहास है।

जिस दिन स्‍त्री भी स्वीकृत होगी और विराट मनुष्यता में उतना ही समान स्थान पा लेगी, जितना पुरुष का है, तो इतिहास भी ठीक दूसरी दिशा लेना शुरू करेगा।

मेरी दृष्टि में जिस दिन स्‍त्री बिलकुल समान हो जाती है, शायद युद्ध असंभव हो जाएं। क्योंकि युद्ध में कोई भी मरे, वह किसी का बेटा होता है। किसी का भाई होता है। किसी का पति होता है।

लेकिन पुरुषों को मरने, मारने की ऐसी लम्बी बीमारी है, क्योंकि बिना मरे मारे, वह अपने पुरुषत्व को ही सिद्ध नहीं कर पाते हैं। वे यह बता ही नहीं पाते हैं कि मैं भी कुछ हूं। तो मरने मारने का एक लम्बा जाल और फिर जो मर जाए ऐसे जाल में उसको आदर देना।

उन्होंने स्त्रियों को भी राजी कर लिया है कि जब तुम्हारे बेटे युद्ध पर जाएं तो तुम टीका करना! रो रही है मां, आंसू टपक रहे है, और वह टीका कर रही है! आशीर्वाद दे रही है! यह पुरुष ने जबर्दस्ती तैयार करवाया हुआ है। अगर दूनिया भर की स्त्रियां तय कर लें, तो युद्ध असंभव हो जायें।

लेकिन सब व्यवस्था, सब सोचना, सारी संस्कृति, सारी सभ्यता पुरुष के गुणों पर खड़ी है। इसलिए पूरी मनुष्यता इतिहास की युद्धों का इतिहास है।

~

अब तक पुरुष ने जो संस्कृति बनायी है, वह गणित की संस्कृति है। वहां नाप, जोख, तौल सब है। स्‍त्री का कोई हाथ इस संस्कृति में नहीं है। क्योंकि उसे समानता का कोई हक नहीं है। उसे कभी हमने पुकारा नहीं कि तुम आओ और तुम एक दूसरे आयाम से, प्रेम के आयाम से भी दान करो कि समाज कैसा हो।

स्‍त्री अगर सोचेगी तो और भाषा में सोचती है। और उसका सोचना भी हमसे बहुत भिन्न है। उसे हम सोचना भी नहीं कह सकते। भावना कह सकते है। पुरुष सोचता है, स्‍त्री भावना करती है। सोचना भी नहीं कह सकते, क्योंकि सोचना गणित की दुनिया का हिसाब है। और इसलिए पुरुष हमेशा हिसाब लगाता है। स्‍त्री हिसाब के आसपास चलती है। ठीक हिसाब नहीं लगा पाती। ठीक हिसाब नहीं है उसके पास।

लेकिन जिंदगी अकेला गणित नहीं है। जिंदगी बहुत बड़े अर्थों में प्रेम है जहां कोई हिसाब नहीं होता। कोई गणित नहीं होता। जिंदगी बहुत बेबूझ है और इस जिंदगी को अगर हमने गणित की सीधी साफ रेखाओं पर निर्मित किया तो हम सीधी साफ रेखाएं बना लेंगे। लेकिन आदमी पुंछता चला जायेगा, मिटता चला जायेगा। और यही हो रहा है। रोज यह हो रहा है कि आदमी की जड़ें नीचे से कट रही हैं। क्योंकि हम जो इंतजाम कर रहे हैं, वह ऐसा इंतजाम है, जिसके ढांचे में जिंदगी नहीं पल सकती।

~

पुरुष ने जो दूनिया बनायी है.. वह पुरुष अधूरा है, अधूरी दुनिया बन गयी है। पुरुष अधूरा है, यह ध्यान रहे। और स्‍त्री के साथ बिना उसकी संस्कृति अधूरी होगी।

तो एक—एक घर में पुरुष एक—एक स्‍त्री को लाया है। एक—एक घर में तो पुरुष अकेला रहने को राजी नहीं है। स्‍त्री भी अकेले रहने को राजी नहीं है। चाहे कितनी कलह हो, स्‍त्री और पुरुष साथ रह रहे हैं!

लेकिन संस्कृति और सभ्यता की जहां दूनिया है, वहां स्‍त्री का बिलकुल प्रवेश नहीं हुआ है। वहां पुरुष बिलकुल अकेला है। पुरुष के अकेले, अधूरेपन ने.. पुरुष बिलकुल अधूरा है, जैसे स्‍त्री अधूरी है। वे काम्पलीमेंटरी हैं, दोनों को मिलाकर एक पूर्ण व्यक्तित्व बनता है।

लेकिन मनुष्य की संस्कृति अधूरी सिद्ध हो रही है। क्योंकि वह आधे पुरुष ने ही निर्मित की है। स्‍त्री से उसने कभी मल नहीं की। स्‍त्री सब गड़बड़ कर देती है, अगर वह आये तो। अगर लेबोरेटरी में उसे ले जाओ तो बजाय इसके कि वह आपकी परखनली और आपके टैस्ट—ट्यूब में क्या हो रहा है यह देखे, हो सकता है टैस्ट—ट्यूब को रंग कर सुंदर बनाने की कोशिश करे। स्‍त्री को लेबोरेटरी में ले जाओ, गड़बड़ होनी शुरू हो जायेगी। या पुरुष को स्‍त्री की बगिया में ले जाओ तो भी गड़बड़ होनी शुरू हो जायेगी। इस गड़बड़ के डर से हमने कम्पार्टमेंट बांट लिए हैं।

पुरुष की एक दुनिया बना दी है। स्‍त्री की एक अलग दुनिया बना दी है। और दोनों के बीच एक बड़ी दीवाल खड़ी कर ली है। और दीवाल खड़ी करके पुरुष अकड़ गया है और कहता है, मुझसे तुम्हारा मुकाबला क्या? का कुछ कर ही नहीं सकती। इसलिए घर में बंद रहो। तुमसे कुछ हो नहीं सकता। हम पुरुष ही कुछ कर सकते है। हम पुरुष श्रेष्ठ हैं। स्त्रियो, तुम्हारा काम है कि तुम बर्तन मलो, खाना बनाओ, बस इतना! इससे ज्यादा तुम्हारा कोई काम नहीं है। बच्चों को बड़ा करो! यह सब पुरुष ने स्‍त्री को एक दीवाल बना करके वहां सौप दिया है और वह बाहर अकेला मालिक होकर बैठ गया है! सब तरफ पुरुष इकट्ठे हो गये हैं।

मेरी दृष्टि में इसीलिए मनुष्य की सभ्यता अब तक सुख की और आनंद की सभ्यता नहीं बन सकी। अब तक मनुष्य की सभ्यता पूर्ण इंटीग्रेटेड नहीं बन सकी है। उसका आधा अंग बिलकुल ही काट दिया गया है। इस आ हो अंग को वापिस समान हक न मिले, इसे वापिस पूरा जीवन, पूरा अवसर, स्वतंत्रता न मिले तो मनुष्य का बहुत भविष्य नहीं माना जा सकता। मनुष्य का भविष्य एकदम अंधकारपूर्ण कहा जा सकता है।

स्‍त्री को लाना है। भेद हैं, भिन्नताएं है। भिन्नताएं आनंदपूर्ण हैं, भिन्नताएं दुख का कारण नहीं हैं। असमानता दुख का कारण है। और असमानता को हमने भिन्नता के आधार पर… असमानता को इतना मजबूत कर लिया है कि कल्पना के बाहर है, कि स्‍त्री और पुरुष मित्र हो सकते हैं। पुरुष को लगता ही नहीं कि स्‍त्री और पुरूष मित्र! नहीं हो सकती! पत्नी हो सकती है! पत्नी यानी दासी।

 

— ओशो (संभोग से समाधि की ओर ( चौदहवां-प्रवचन) नारी एक और आयाम)

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About OSHO ~ ओशो

Osho was born in Kuchwada, M.P. on 11th December, 1931. His parents Swami Devateertha Bharti and Ma Amrit Saraswati became his disciples in later years. He was enlightened at the age of 21 years on March 21, 1953, while he was studying philosophy at D.N. Jain College in Jabalpur. In 1956 Osho did M.A. from the University of Sagar with First Class Honors in Philosophy. He joined Sanskrit College, Raipur in 1957. He was appointed Professor of Philosophy at the University of Jabalpur, in 1958, where He taught until 1966. During this period He traveled widely in India speaking to large audiences and challenging orthodox religious leaders in public debates. After nine years of teaching, He left the university in 1966 for regular spiritual work. He started conducting intense ten-day meditation and Samadhi camps. At times He addressed gatherings of 20000 to 50000 people. In July, 1970, He moved to Mumbai. By this time He came to be known as Bhagwan Shree Rajneesh. He started initiating seekers into Neo-Sannyas, which did not involve renouncing the world. This was a great revolutionary step since sannyas in all other traditions requires renunciation. In 1974 He moved to Poona Ashram, where He gave 90 minutes discourses nearly every morning, alternating every month between Hindi and English. He spoke on Yoga, Zen, Taoism, Tantra and Sufism covering masters like Gautam Buddha, Jesus, Lao Tzu, and other mystics. These discourses have been collected into over 300 volumes and translated into 20 languages. In the evenings, during these years, He gave Energy darshan and sannyas. And while explaining the sannyas names He unraveled many secrets of divine sound, divine light, and other dimensions of spiritualism. These evening talks are compiled in 64 darshan diaries of which 40 are published. In March 1981, He moved to USA, where His disciples raised city of Rajneeshpuram from the ruins of the central Oregonian high desert. In October 1984 Osho ended His three and half years of self-imposed silence, and started speaking to small groups of people. In July 1985 He resumed His public discourses each morning to thousands of seekers gathered in a two-acre meditation hall. During 1985 - 1986 He undertook a World Tour and visited many countries including Nepal, Greece, Uruguay, Jamaica and Portugal. In all, 21 countries denied Him entry or deported Him after arrival. On July 29,1986, He returned to Mumbai, India and shifted to the ashram in Poona, India, in January, 1987. During January-February 1989 He stopped using the name "Bhagwan," retaining only the name Rajneesh. Later He adopted ‘Osho’ as His new name. On 19th January 1990 Osho left His body.

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